Wednesday, 26 July 2017

घसीटे ने डायलागों पर बहुत मेहनत की थी पर माँ भगवती का उच्चारण उसके मुंह से साफ़ नहीं निकल रहा था | दरअसल उसकी जहरीली पत्नी का नाम भगवन्ती था | वो भी एक लम्बी -चौड़ी औरत थी जो दूसरों के खेतों में मजदूरी करके अपना ,अपने पति और अपने तीन बच्चों का पेट पालती थी | जब खेतों ,खलिहानों से मजदूरी करके वह लौटती तो उसका शरीर इतना थका होता कि गाँव की राम लीला उसे अपनी ओर नहीं खींच पायी थी  पर दूसरे दिन की राम लीला में घसीटे ने जिसे रोल अदा करने के लिए कुछ पिलाने का लालच दिया गया था ,अपनी पत्नी के सामने शेखी मारी थी कि उसका आज का ताड़का का रोल गाँव के लोगों के लिए यादगार बन जाएगा उस दिन भगवन्ती ने रमाकान्त के पिता के खेतों में ज्वार के भुट्टे काटे थे | काटे गए भुट्टों में से १/१० हिस्सा उसको भी मिला था  घसीटे को तो पार्ट तैय्यार करने के लिए रमाकान्त ने काफी कुछ खिला दिया था पर घर पर बच्चे माँ को तंग कर रहे थे कि उसे कुछ पैसे दें ताकि मेले में लगी दुकानों से वे मोमफलियाँ खरीद सकें | भगवन्ती ने घर आकर मूसल से भुट्टे कूटे | निकली हुयी जुडरी को लेकर वह लाला मुसद्दी मल के यहाँ बेच आयी | मुसद्दी की छोटी सी दुकान गाँव में थी और सारे गरीब पासियों के घर उसी के सहारे उधार पर चलते थे | मुसद्दी ने उससे कहा था ,"अरे भगवंतिया ,आज तो तेरा शौहर अपना जौहर दिखायेगा जा के देख आना |" भगवन्ती पैसे पाकर खुश थी अब बच्चों के लिए मूँगफलियाँ खरीदनें का बल उसमें आ गया था और इसलिए वह अपने तीनों बच्चों को लेकर बिछी दरियों पर सबसे पीछे जाकर बैठ गयी | विश्वामित्र जी का और राम लक्ष्मण जी का जंगल से गुजरना ,जंगल के प्रमुख स्थानों का परिचय ,राक्षसों की अमानवीय रत  लीलाओं से परिचित कराना आदि होने के बाद विश्वामित्र उस आश्रम की ओर बढ़ते हैं | जहां ताड़का का आतंक हर पत्ते के हिलने से झंकृत होता था | उस वन खण्ड का प्रत्येक वृक्ष वायु के झोंकों से जब हिलता तो लगता जैसे ताड़का ताड़का की आवाज आ रही है | अब समय आ गया था जब परदे के पीछे से दौड़ती हुयी ताड़का दर्शकों के सामने आकर तखत पर खड़ी हो जाय | राम ,लक्ष्मण तखत के पार्श्व में खड़े थे ,बीच में गुरु विश्वामित्र के साथ इतने तख्तों का इंतजाम नहीं हो सका था कि विश्वामित्र के साथ खड़े हुए राम ,लक्ष्मण ऊपर ही रहते और ताड़का दौड़कर अपनी डींग हाँकती रहती इसलिए वे पार्श्व में खड़े थे | मैनेजमेंट ऐसा किया  गया था कि नीचे रहकर ही दर्शकों की ओर मुंह करके लक्ष्मण जी अपना संवाद बोले | हुआ यों कि जब काला चोंगा और काली लुंगी बांधे घसीटा बाहर निकलने के लिए फुर्ती से उठा तो उसका चोंगे में छिपा हुआ मूसल फिसल कर नीचे गिर पड़ा और उसे पता तक नहीं लगा | परदे से बाहर आते ही घसीटे को लगा कि उसका मूसल तो है ही नहीं ,अब वह धनुष -बाण से लड़ाई कैसे लड़ेगा | उसे तो अपने डायलागों के साथ मूसल दो चार हाँथ करने थे | डायलॉग के उस हिस्से पर जब वह पहुंचा जहां उसे कहना था कौन माँ भगवती ?कहाँ है माँ भगवती ? माँ भगवती को हर रोज मैं मूसल से कूटती हूँ | "तब जोश में होने के कारण वह डायलॉग के कुछ शब्द भूल गया | उन शब्दों की जगह जो शब्द उसकी जबान पर सहज रूप से आ गए वही मुंह से निकलने लगे | रमाकांत जी  जानते थे कि आगे क्या होना है | इसलिए वे पीछे गिरे हुए मूसल को उठाकर घसीटे को देने आ गए | छह फुटा घसीटा लम्बे काले कुर्ते ,काली तहमद ,काली ओढ़नी और सन से रँगे काले बालों में बहुत भयानक लग रहा था | वैसे भी वह मर्द था उसके मन में आया औरत कितनी भी बहादुर हो औरत ही तो है मैं ताड़का न होकर ताड़कासुर बनूँगां | तख़्त पर से वह चिल्लाया कहाँ है भगवन्ती ? कौन है भगवन्ती ? मैं हर रोज भगवन्ती को मूसल से कूटता हूँ | रमाकांत ने पीछे से इशारा कर उससे मूसल लेने को कहा ताकि वह जमीन पर चार छह बार मूसल मार कर इस डायलॉग को फिर दोहरावे | कुंजरपुर के सभी उपस्थित दर्शक जिनमें स्त्रियां ही अधिक थीं घसीटे का भयानक रूप देखकर भयभीत हो उठीं पर इसी बीच एक घटना घट गयी | भगवंतिया नीचे से उठकर बड़ी तेजी के साथ औरतों के बीच से भगती हुयी स्टेज पर चढ़ गयी ,उसके पीछे तीनों बच्चे मूंगफलियों के दानें मुंह में डालते और छिलके फैलाते स्टेज के पास आ गए | मूसल हाँथ में लेकर घसीटे ने फिर दोहराया ,"कौन है भगवंतिया? भगवंतियाँ ने झपट कर उसका मूसल छीन लिया बोली दहिजार  मैं हूँ भगवंतिया ,तेरे बच्चों की माँ | तू मुझे ही मूसल से मारेगा जरूरत पडी तो मैं दो एक मूसल तेरी पीठ पर मारकर तेरी अकड़ निकाल दूंगीं | कामचोर बच्चों को खिला नहीं सकता ,ताड़ी पीकर पड़ा रहता है | ताड़का बनने चला है | फिर उसने मुनि विश्वामित्र और श्री राम और लक्ष्मण को प्रणाम किया और कहा महाराज आप और बड़े राक्षसों का वध करिये कुंजरपुर की इस ताड़का के लिए भगवंतिया ही काफी है | अपनी पियक्कड़ी में माँ भगवती को भगवंतिया कहकर पुकारता है | मैं अपना अपमान बर्दाश्त कर लूंगीं पर माँ भगवती का अपमान कतई बर्दाश्त नहीं करूँगीं | फिर उसने घसीटे को हाँथ से पकड़कर परदे के पीछे ले जाने के लिए खींचा और कहा चल दफा हो ताड़का मर गयी | अब मर्द बनना सीख इतना कहकर सूत जी बोले अरे बेटा कुछ झपकी सी आ रही है रामगुलमवा से बोल कि एक ठो प्याली गहरी चाय की बना लावै ,कल शाम को कथा का सूत्र आगे बढ़ाऊंगा | और एक -एक प्याला चाय पीकर मेरे घर की वो गप्प गोष्ठी समाप्त हुयी | | तभी बाहर से गाड़ी रुकने की आवाज आयी और मैं जान गया कि गृहणियां लीला देखकर अपने घर आ पहुँची हैं | श्री राम जी से मन ही मन प्रार्थना की कि वे मुझे रात्रि शयन में ताड़का दर्शन से बचावें| 
सूत जी बात को आगे बढ़ाते हुए बोले ," पहले दिन की रामलीला अच्छे ढंग से अभिनीत हुयी | दशरथ के आश्रम पर सज्जन सिंह जी के पिता सन के सफ़ेद बाल लगाकर बैठे | मुझे विश्वामित्र के रूप में पेश किया गया | रमाकान्त के पिता गुरु वशिष्ठ के रूप में उपस्थित हुये | पीले कपड़ों का कुर्ता और सन के सफ़ेद बाल आसानी से उपलब्ध थे ही | सज्जन के पिता ने दशरथ का  बहुत अच्छा अभिनय किया |  राम लक्ष्मण को अपने से अलग होने की बात सुनते ही उनकी आँखों में आंसू आ गये | गाँव के सभी नर -नारी प्रभावित हुये | भक्ति का सीधा असर भोले -भाले ग्रामीणों के हृदय पर पड़ता है | मातायें ,बहनें तो भावुक होती ही हैं पुत्र वियोग के डर  से उमड़ते आंसुओं ने उनकी आँखों में भी आंसू ला दिये | पर मुझे   विश्वामित्र के रूप में द्रढ़ तो रहना  ही था | मुझे न तो राज्य चाहिये था न हाथी ,घोड़े न मणि माणिक क्योंकि मैं जान गया था कि निश्चरों का विनाश श्री राम ही कर सकते हैं | और अनुज श्री लक्ष्मण के साथ होने पर उनके गौरव में वृद्धि होगी और उनके दैवी कार्य में समयोचित सहायता मिलेगी | गोसाईं जी की इस पंक्ति को मैं बराबर अपने ध्यान में रखे हुये था ," गाधि तनै मन चिन्ता व्यापी ,हरि बिनु मिटै न निशिचर पापी |" मेरे अभिनय में भावुकता का अभाव था इसलिये शायद वह अधिक प्रभावी न बन सका | वशिष्ठ जी के कहने पर चक्रवर्ती सम्राट दशरथ को मेरी मांग स्वीकार करनी पडी | गुरु वशिष्ठ ने भी अपना रोल बहुत अच्छी तरह निभाया | रमाकान्त के पिता रामायण का अच्छा ज्ञान रखते थे उन्होंने अयोध्या नरेश को समझाया कि जगत के कल्याण के लिये अपने सुख का बलिदान कर देना चाहिये | आंसू बहाते हुये महाराज ने आखिर राम ,लक्ष्मण को अपने पास बुलाया | परदे के पीछे से माताओं के आंसू भीगी पुकार सुनायी पडी हाय न जानें कहाँ  हमारे हृदय के टुकड़ों को भेजा जा रहा है | कुंजरपुर की कुछ स्त्रियों को यह वाक्य सिखा दिया गया था | पर परदे के पीछे से बारह वर्षीय सन्तू और लगभग उतनी ही उम्र का चिन्टू ,राम और लक्ष्मण बनकर विश्वामित्र जी के पास उपस्थित हुये  तुलसीदास जी की रामायण में शायद इसकी चर्चा नहीं की गयी है पर रमाकान्त और सज्जन सिंह ने एक नया दृश्य जोड़ा था | जब सन्तू और चिन्टू परदे के पीछे से बाहर निकल कर आये तो उनके गले में मोती की माला और बाँहों पर रत्नों के बाजूबन्द लगे थे उनके कपडे भी राजसी ठाठ के थे | उनके बालों की सज्जा भी अलंकृत ढंग से की गयी थी | | यह बनावटी मूंगे और बाजूबन्द तथा कपडे रमा और सज्जन ने कैसे इकठ्ठे किये ये तो वही जानते होंगें पर मुझे अत्यन्त खुशी हुयी कि कुंजरपुर में भी नयी प्रतिभाएं उभर रही हैं जो समय के साथ महाकाव्यीय गाथाओं को नया रूप देती जा रही हैं | मैं तो विश्वामित्र के रूप में इस द्रश्य के लिए पहले से ही प्रस्तुत था | राम और लक्ष्मण ने गुरु वशिष्ठ को प्रणाम करने के बाद मुझे प्रणाम किया और फिर उसके बाद दशरथ जी को | अयोध्या नरेश दशरथ जी ने अपने तखत से उतर कर जिस तख़्त के के एक स्टूल पर मैं बैठा था उसके पास आये और राम और लक्ष्मण का हाँथ दायें और बायें हाँथ में पकड़वा दिया और कहा हे मुनि श्रेष्ठ ,हे वीर श्रेष्ठ, हे विश्व विजयी ,हे विश्वामित्र मैं अपने इन दोनों पुत्रों को आपकी शरण में देता हूँ | हे मुनि श्रेष्ठ ,इन्हें महामानव बनाने का उत्तरदायित्व अब तुम्हारा है | इसके बाद महाराज दशरथ मुझे प्रणाम कर अपने तख़्त पर चले गए | कहना न होगा कि तख़्त पर एक चादर बिछाकर और धान के पयाल का एक टीला सा बनाकर एक सिंहासन का रूप दिया गया था | मैनें अब राम और लक्ष्मण से कहा वत्स जाओ अपनी माताओं का चरण स्पर्श कर उनसे विदा मांगों और कहो कि मुनि विश्वामित्र उन्हें यह बचन देते हैं कि दोनों राजकुमार अपार यश कमाकर उनके पास सकुशल वापस आयेंगें | साथ ही अपने इन राजसी वस्त्रों और आभूषणों का परित्याग करो ,अलंकृत बालों को ऊपर की तरफ संवार कर वीर भेषी जूड़ा बांधों फिर हाँथ में धनुष -बाण लेकर मेरे पास आओ | यथा समय मैं तुम्हें दिव्य अस्त्र -शस्त्रों से सुसज्जित कर दूंगा | राम और लक्ष्मण परदे के पीछे चले गए | वशिष्ठ जी उठकर विश्वामित्र के पास आये और दोनों ने एक दूसरे को प्रणाम किया | विश्वामित्र जी ने विदा देने को कहा | पर्दा डाल दिया गया और भजन स्तुति के साथ पहले दिन का राम लीला मन्चन समाप्त हुआ |  आस -पास के गावों में कुछेक घण्टों के बाद यह खबर फ़ैल गयी कि कुंजरपुर की रामलीला तो एक निराली रामलीला है और वैसी रामलीला तो बड़े -बड़े शहरों में भी नहीं होती | अगले दिन ताड़का वध होना था | अब एक समस्या आ खड़ी हुयी | हमनें अन्य पात्रों का चयन तो कर लिया था पर उस समय यह ख्याल ही नहीं किया था कि ताड़का का अभिनय कौन करेगा | दिमाग में शायद यह बात इसलिए न आयी हो कि ताड़का का पार्ट महत्वपूर्ण न लगा हो और सोचा गया होगा कि किसी को भी इसके लिए काले कपडे पहना कर खड़ा कर दिया जायेगा पर अब सवाल यह था कि दूसरे दिन की राम लीला को कम से कम दो घण्टे तक तो चलाया ही जाय | इसके लिए विश्वामित्र के साथ श्री राम ,लक्ष्मण का भीषण वन के बीच से गुजरना और राक्षसों के भीषण अत्याचार की कहानी बताना तो था ही पर इसका प्रमुख आकर्षण ताड़का वध था | अब यदि ताड़का वध बिना किसी संवाद के करा दिया जाता तो उसका अपेक्षित प्रभाव दर्शकों के हृदयों पर नहीं पड़ता | इसलिए ताड़का द्वारा कुछ संवाद बोले जानें थे जिनमें से अधिकाँश का उत्तर लक्ष्मण जी को देना था और सर छोड़ने से पहले एकाध बात राम जी को भी कहनी थी | रमाकांत और सज्जन सिंह ने मुझसे परामर्श कर कुछ डायलॉग बना तो लिए थे पर वे डायलॉग ताड़का का पार्ट अदा करने वाला गाँव का अपढ़ पासी घसीटा याद भी कर पायेगा या नहीं इस पर सन्देह था | ताड़ी पियक्कङ घसीटा को इसलिए चुनना पड़ा क्योंकि इस रोल के लिए और कोई तैय्यार नहीं था और फिर वह छः फुटा अधेड़ तो था ही जिसकी फटी हुयी भयानक आवाज नर -नारी का मिला जुला स्वर लगती थी | डायलॉग में एक वाक्य यह भी था ," रबड़ के पुतलो ,हम तुम्हें कच्चा चबा जायेंगें ,हमनें न जानें कितने जूड़ा  धारियों का खून पिया है | "इसके उत्तर में लक्ष्मण जी कहते हैं ,"नीच राक्षसी तू औरत होकर भी महात्माओं का खून पीती है ,तू माँ भगवती से नहीं डरती |"इस वाक्य के उत्तर में ताड़का को कहना था कौन माँ भगवती ? मैं माँ भगवती को हर रोज मूसल से कूटती हूँ | और यह कहकर दनादन कई मूसल जमीन पर मारने थे | सज्जन सिंह ने एक मूसल अपने घर से लाकर घसीटे को दे दिया था जो वह अपने काले चोंगे में छिपाये था | (क्रमशः )

Monday, 24 July 2017

पहले दिन दशरथ के दरबार में विश्वामित्र जी का पहुँचना दिखाया जायगा | राम ,लक्ष्मण को लेकर विश्वामित्र अपने आश्रम की ओर चलेंगें | उसके बाद कुछ भजन होंगें और पर्दा डाल दिया जायेगा | उसके अगले दिन विश्वामित्र जी श्री राम ,लक्ष्मण को राक्षसों के अत्याचार की कहानियां सुनायेंगें और ताड़का के आतंक का जिक्र करेंगें और फिर ताड़का वध होगा | इसके बाद भगवान् की स्तुति होगी और पर्दा डाल दिया जायेगा | तीसरे दिन फुलवारी का मन्चन  होगा श्री राम माँ सीता को देखेंगें और माँ सीता राम को देखेंगीं | पार्वती पूजन होगा और फिर पार्वती जी का माँ सीता को दिया गया आशीर्वाद ऊँचे स्वरों में सुनाया जायेगा | भजन ,स्तुति के बाद पर्दा डाल दिया जायेगा | चौथे दिन धनुष भंग होगा | सारे राजे ,महाराजे आयंगें | रावण ,बाणासुर आयेंगें ,फिर श्री राम जी विश्वामित्र की आज्ञां लेकर धनुष भंग करेंगें और फिर आयेंगें फरसा लेकर जमदग्नि पुत्र परशुराम | वाद -विवाद के बाद परशुराम श्री राम की शक्ति को पहचानेंगे और श्री राम की स्तुति करेंगें और फिर पर्दा डाल दिया जायेगा | चार दिन की तैय्यारी पूरी कर ली गयी थी पर आगे का प्रोग्राम पूरी तरह तैय्यार नहीं था  इसलिए मुनादी करवा दी गयी थी | इसी प्रकार राम लीला की अन्य घटनायें मन्चित की जाती रहेंगीं | परशुरामी करनें के लिए पड़ोस के गाँव से ठाकुर शिव कुमार सिंह की सहमति मिल चुकी थी उनका शरीर भी अच्छा था और उनका संवाद बोलने का ढंग भी लोगों को भा जाता था |
                         पाठक शायद यह जानना चाहेंगें कि सूत जी कौन थे और कैसे मेरे यहां कहानी सुनाने के लिए पहुंचे | मैं बता दूँ कि सूत जी का पूरा नाम सूरत जी है और अब वे जिस शहर में मैं बैंक मैनेजर हूँ उसी शहर में रहने लगे हैं | उनके मकान के नीचे राधा कृष्ण का मन्दिर है और ऊपर उनके भक्त ,सेवक भजनू के रहने के कमरे हैं | इस वर्ष की दशहरा को गृहणियां और बच्चे शहर में मेला देखने चले गये थे | मेरे पास -पड़ोस के चार पांच घरों के वृद्ध सज्जन मेरे यहां इकठ्ठे हो गये थे | चपरासी राम गुलाम बातचीत के बीच चाय के प्याले ले आता था | सूरत जी को भी बुला लिया गया था ताकि वे रामायण सम्बन्धी एकाध घटनाओं से हम लोगों को परिचित करायें और मनोविनोद के साथ हमें कुछ धार्मिक शिक्षा भी मिले | सूरत जी को मैं सूत जी कहता था क्योंकि उनके किस्से कहानियां बहुत दिलचस्प होते थे | लोग जानते थे कि मैं सूत जी का प्रशंसक हूँ और इसलिये सूत जी की सिफारिश लेकर मेरे पास बैंक में काम कराने आते थे | धीरे धीरे सूत जी पूजा पाठ के बाद मेरे यहां हर शाम एक कप चाय पीने मेरे घर आने लगे थे | हम लोगों ने बात  को आगे बढ़ाने के लिये सूत जी से आग्रह किया कि कुंजरपुर की राम लीला किस प्रकार सफलता की मंजिलें छू सकी इस पर थोड़ा सा प्रकाश और डालें | (क्रमशः )

कुन्जरपुर की रामलीला

                                                                   कुन्जरपुर की रामलीला

                         सूत जी आगे बोले , " मन्दिर पुनुरुद्धार के काम में मैं एक छोटे से गाँव कुन्जरपुर में जा पहुंचा | गाँव के एक कोनें में एक छोटा पानी का भराव था | बरसात में यह भराव लम्बा -चौड़ा हो जाता था पर गर्मी में एक तलैय्या जैसा दिखाई देता था | कुंजरपुर के लोग इसे गुरू तालाब के नाम से जानते थे | इस तालाब के एक कोने पर टूटा -फूटा श्री राम और सीता का मन्दिर था | मैं वहीं टिक गया | धीरे -धीरे मन्दिर का सुधार होने लगा | पास के बड़े गाँव में चला जाता | कभी -कभी शहरों में भी घूम आता | कुछ दानी और धर्म प्रेमी चन्दा देने लगे | दो वर्ष के भीतर -भीतर मन्दिर का पुनुरुद्धार हो गया | छोटा होने पर भी मन्दिर देखने में सुन्दर लगता था | गाँव के लोगों से कह सुन कर मैनें तालाब के किनारों को और बढ़ाना और गहरा करवाना शुरू करवाया | पिछले साल खूब बरसात हुयी थी | तालाब लबालब भर गया था अब उसके चारो ओर सीढिया बनाने की बात सोची | गंगाधाम के महन्त सांवल दास के पास पहुंचा उनसे प्रार्थना की उन्होंने अपने एक भक्त करोड़ीमल से कह दिया और इसप्रकार तालाब के चारो ओर सीढ़ियां बन गयीं | कुंजरपुर के लोग एक -एक करके अपने घर से एक दिन का भोजन ले आते थे | शाम को मैं केवल दूध ही लेता था | गाँव के लोग सीधे -सच्चे और निःश्च्छल हृदय के होते हैं | शाम के समय मन्दिर में आ बैठते | जीवन मरण की चर्चा होती रहती | अब गाँव के हर जन्म और मृत्यु में मेरा होना अनिवार्य बन गया | उत्सव और शादी व्याह में भी मुझे सम्मान मिलने लगा | मुझे जो भी मिलता सब मन्दिर की साज -सजावट में लग जाता | नये आले बनवाये और नयी मूर्तियां मगवायीं पर पुरानी श्री राम और माँ सीता की मूर्ति ही गर्भ गृह में स्थापित की गयी | मन्दिर की मान्यता बढ़ने लगी | कुंजरपुर ग्राम के कुछ लोग नये बीज और रासायनिक खाद का इस्तेमाल कर अच्छी फसल लेने लगे | कुछ लड़के पढ़ लिख कर प्राईमरी मास्टर बन गये | एक पोस्टमैन भी बन गया | और कुछ नवयुवकों ने शहर में जाकर कालेज में पढ़ना शुरू किया | कालेज में उन दिनों दशहरे से लेकर दीवाली तक लम्बी छुट्टियां होती थीं | अबकी बार रमाकांत और सज्जन सिंह जब छुट्टी में घर आये तो मन्दिर में मेरे पास आकर बैठ गये बोले ," महात्मा जी इस तालाब के आस -पास काफी मैदान पड़ा है हम लोग क्यों न यहां दशहरे में राम लीला का आयोजन करें | श्री राम और माँ सीता का मन्दिर तो यहां है ही | आपको आस -पास के गाँवों के लोग जानते हैं मेला चल निकलेगा | दुकानें आने लगेंगी | उनसे थोड़ा बहुत किराया ले लिया जाया करेगा | खर्चा निकलने लगेगा | शुरू में हम लोग खाते -पीते घरों से चन्दा इकठ्ठा कर लेंगें |
                                  मुझे उनकी बात अच्छी लगी | उनकी बात में दम था | धर्म भावना के साथ साथ व्यापारिक सूझ बूझ भी थी | वे दोनों ही बी ० काम ० के छात्र थे पर मैनें सोचा कि राम लीला के लिए अभिनय करने वाले छोटे बड़े कलाकार कहाँ से इकठ्ठे किये जायेंगें | रमा और सज्जन ने कहा कि शुरुआत तो  छोटे पैमाने पर ही होगी | गाँव के 10 -12 -13 वर्ष के बच्चों को राम ,सीता ,लक्ष्मण आदि बना दिया जाएगा | हनुमान का पार्ट हम दोनों में से कोई एक कर लेगा | रावण के पार्ट के लिए ऊदल पहलवान को ले लिया जायेगा आदि आदि | उन्होंने कहा पहले एक दो तख़्त डाल कर और एक दो दरियाँ बिछाकर काम किया जायेगा | उन्होंने कहा कि एक दो कनाते और एक तम्बू अपने क्लास रूम के साथी लाला छोटू मल के बेटे के घर से ले आयेंगें |
                                       मैं जानता था कि हर बड़े काम की शुरुवात छोटी होती है | माँ के पेट से आने वाला शिशु कितना नन्हा और असहाय होता है पर वही आगे चलकर भीम ,अर्जुन और आल्हा -ऊदल बनते हैं | पीपल ,बरगद और नीम के पेड़ों को ही देखो कितनी छोटी शुरुवात और कितना विशाल आकार ?एक दिन कुंजरपुर की रामलीला भी आस -पास दस कोशी में मशहूर हो जायेगी | मेरी सहमति होने पर रमाकान्त और सज्जन सिंह ने कोशिश करके कुंजरपुर के 15 -20  खाते पीते मन्दिर में बुलाकर और उनसे राय  -मशविरा कर रामलीला की एक योजना बना डाली | गाँव के एक कोनें में पासियों के कुछ घर थे | मैनें कहा कि उन पासी घरों में से भी किसी एक को बुला लाओ | रमाकांत ने कहा उनमें से ज्यादातर नशीलची हैं और घसीटवा तो ताड़ी पीने शहर तक जाता है | मैनें देखा था कि छः फुटा घसीटा शहर जाते समय मन्दिर में माथा टेकता हुआ जाता था | मैनें कहा अरे बेटो घसीटो को ही बुला लो | घसीटे ने सभी शारीरिक काम करने की हामी भरी और कहा खुदाई ,भरायी तखत बिछानें या पर्दा लगाने आदि किसी भी काम को वह खुशी खुशी करेगा और कोई मजदूरी नहीं लेगा | अब क्या था राम लीला चल निकली|  तय हुआ कि प्रारम्भ में राम लीला की कुछ छवियाँ ही बिछे तख्तों पर परदे लगाकर अभिनीत की जांय | एकाध गैस का हंडा लगा दिया जायेगा और सामने दरियों पर बैठकर लोग रामलीला के द्रश्य देख सकेंगें | एक ढोलकिया से कहकर आस -पास के गाँव में भी मुनादी करवा दी गयी | (क्रमशः )

Sunday, 23 July 2017

 औरंगजेब के कट्टर इस्लामी जनून के कारण हिन्दुस्तान के इस्लाम से इतर अन्य दार्शनिक विचारधाराओं के अनुयायी दूसरी या तीसरी श्रेणी के नागरिक बन गए हैं | जजिया कर तो उन पर लगा ही है साथ ही ऊँचे पदों पर भी उनकी नियुक्ति रुक गयी है | औरंगजेब कट्टर मुल्लाओं  की चपेट में है | शरीयत की गलत - सलत व्याख्या की जा रही है | सर क़त्ल किये जा रहे हैं | मन्दिर गिराये जा रहे हैं ,गुरु तेगबहादुर के दोनों पुत्रों को दीवार में जीवित चुनवा दिया गया | उन्होंने सर दिया पर सार न दिया | ऐसे में माता भवानी के पुजारी समर्थ रामदास से शक्ति प्राप्त करने वाला प्रेरणा पुरुष शिवाजी राजे महाराष्ट्र में स्वतंत्रता का बिगुल बजा देते हैं | महाराज जय सिंह द्वारा आदरपूर्ण बराबरी के व्यवहार की आशा पर शिवाजी उनके साथ दिल्ली आये थे पर औरंगजेब के दरबार में उन्हें पांच हजारी पंक्ति में खड़ाकर उनका घोर अपमान किया गया |
              कवि भूषण ने लिखा है -
                                                 " सावन के आगे ठाढ़े रहिबे के जोग ,
                                                     ताहि खड़ो कियो जाय प्यादन के नियरे |"
शिवाजी ने भरे दरबार में ही निडर होकर अपना विरोध और क्रोध प्रकट किया |उन्हें महाराज जय सिंह के कहने पर महाराज जय सिंह के महल में ही कैद कर लिया गया | | शिवाजी राजे किस प्रकार मिठाई के लम्बे -चौड़े झाले में छिपकर नजर कैद से मुक्त हो गए इसका विस्तृत विवरण 'माटी ' के पाठकों ने इतिहास के पन्नों में पढ़ा ही होगा | हिन्दू जाति के इस सिर मौर वीर का संरक्षण पूरी सतर्कता के साथ हिन्दू संस्कृति के चिन्तक ,विचारक और संरक्षक करते रहे | एक लम्बे अरसे के बाद एक छद्म वेश में शिवाजी राजे माँ जीजाबाई के सामने उपस्थित होकर कोई भिक्षा पाने की प्रार्थना करने लगे | उनका वेष परिवर्तन इतनी कुशलता से हुआ था कि स्वयं उनकी माँ ही उन्हें प्रथम द्रष्टि में पहचान नहीं पायीं | अपनी लम्बी गुप्त यात्रा के दौरान शिवाजी ने भारत की लक्ष- 2 जनता के हृदय के भावों को पूरी तरह समझ लिया था | वे आश्वस्त थे कि औरंगजेब की कट्टर इस्लामी नीति के खिलाफ उन्हें न केवल हिन्दुओं का व्यापक समर्थन मिलेगा बल्कि सहिष्णु मुसलमान भाई भी उनका पूरा साथ देंगें | हिन्दुस्तान में जन्में पले पुसे और अकबरी परम्परा के मुस्लिम वर्ग सहकारिता और सह अस्तित्व को कैसे नकार सकते हैं | शिवाजी राजे का जय रथ माँ जीजाबाई का आशीर्वाद लेकर और समर्थ रामदास से शक्ति पाकर विजय यात्रा पर निकल पड़ा | मुग़ल साम्राज्य की सारी फ़ौज उन्हें पस्त करने में लगा दी गयी स्वयं शहनशाह औरंगजेब वर्षों दक्षिण में टिके रहे ताकि शिवाजी को पकड़कर कैद कर लिया जाय या मार दिया जाय पर भारत का भविष्य अभी एक नयी गुलामी आने की प्रतीक्षा कर रहा था | शिवाजी द्वारा स्वतन्त्र स्थापित राज्य औरंगजेब के लिए न मिटने वाला सरदर्द बन गया | काशी में शिवाजी को क्षत्रियत्व प्रदान कर उन्हें चक्रवर्ती सम्राट के रूप में विभूषित किया गया | वे आज तक छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से जाने जाते हैं | शिवा राजे तो उनके प्रारम्भिक विजय काल का सम्बोधन था | महाकवि भूषण को पहली बार दक्षिणावर्त की धरती पर पहली बार एक ऐसा जननायक देखने को मिला जिसमें श्री राम की वीरता और श्री कृष्ण की उदारता दोनों आदर्श रूप में समन्वित हुयी थीं | इतिहास का सत्य तो इतिहासकार जानें पर जन श्रुतियाँ तो यह कहती है कि शिवाजी ने एक के बाद एक बावन विजयें हासिल कीं | 'माटी ' कोई इतिहास की पत्रिका नहीं है ,इतिहास का धूमिल आधार पाकर शब्द शिल्पियों की कल्पनायें और अधिक रंग बिरंगी दिखायी पड़ने लगती हैं | 'माटी 'नहीं जानती कि वे 52 किले कौन कौन से थे ?पर कुछ प्रसिद्ध विजयों से इतिहास के पन्नें भरे पड़े हैं जैसे सिंहगढ़ की विजय ,या पुरन्दर की विजय आदि आदि | कहते हैं महाकवि भूषण  ने इन्ही बावन विजयों के आधार पर शिवा बावनी लिखी जिसका एक एक सवैय्या छंद  हिन्दी भाषा का का सबसे चमकदार नगीना है | कौन  हिन्दी भाषा -भाषी प्रेमी है जो शिवा बावनी पढ़कर वीर काव्य के प्रभाव से अछूता रह जाय | और विजयों से भी अधिक था खुंखार कट्टरपन्थियों के लिये शिवाजी नाम का आतंक | उनके नाम से ही मुसलमान ,नवाब ,सेनापति और शासक थर्रा उठते थे | उनके नाम का यह आतंक मुसलमान शासकों के घरों में घुसकर उनकी बेगमों का दिल भी दहला देता था तभी तो भूषण ने शिवाजी के नाम से त्रास को अविस्मरणीय पंक्तियों में चित्रित किया है |
"ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहन वारी
ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहाती हैं |
कन्द मूल भोग करें ,कन्द मूल भोग करें
तीन बेर खाती, वे तीन बेर खाती हैं |
सरजा शिवाजी शिवराज वीर तेरे त्रास
नगन जडाती तै वे नगन जडाती हैं |"
                 छत्रपति शिवाजी की मृत्यु के बाद भी उनके वीरत्व और स्वाभिमान की परम्परा मराठा साम्राज्य के कर्णधारों की सबसे मूल्यवान धरोहर बनी रही ,जब मराठा साम्राज्य की शक्ति पेशवाओं के हाँथ में आयी तब मराठा साम्राज्य का आतंक ,दिल्ली के सिंहासन पर बैठे नपुंसक सम्राटों को सदैव नतमस्तक किये रहता था | पेशवा बाजी राव प्रथम और द्वितीय की तुलना तो महान विजेता सम्राट स्कन्दगुप्त से की जाती है | अश्वारूढ़ विशाल मराठा वाहिनी रात रात भर में सैकड़ों मीलों का सफर कर शत्रु सेनाओं को रौंद कर रख देती थी | हिन्दी कविता प्रेमी सभी उस दोहे से परिचित होंगें जो ओरछा के राजा छत्रसाल ने पेशवा बाजीराव को लिखा था | जनश्रुति है और अधिकतर इतिहासकार इस जनश्रुति से सहमत हैं कि जब छत्रसाल की सेना चारो ओर मुग़ल सेना से घेर ली गयी और पराजय उनके सामने मुंह बाये खड़ी हो गयी तो उन्होंने  एक कुशल अश्वारोही को कविता की दो पंक्तियाँ लिख कर हिन्दू धर्म रक्षक बाजी राव पेशवा के पास लिख भेजी | दोहा इस प्रकार था |
" जो गति ग्राह गजेन्द्र की ,सो गति बरनऊ आज \
बाजी जाति बुन्देल की ,वाजी राखौ लाज |"
                                         जिस समय यह पत्र बाजीराव को मिला उस समय उनकी विशाल सेना ओरछा से सैकड़ों मील दूर थी पर बुन्देल की लाज तो रखनी ही थी | रातोंरात घोड़ों के खुरों से सैकड़ों मील धरती की परतें उघड़ गयीं | मुग़ल सेना दोहरी मार से पिटकर पराजित होकर भागी | न जानें कितने अस्त्र -शस्त्र और भार असवात छोड़ गयी | शव सड़ते रहे ,घायल तड़पते  रहे | भूषण जी ने इन छत्रसाल की गुणगाथा में भी कुछ अत्यन्त प्रभावशाली वीर छंद ,सवैये लिखे हैं | सभी हिन्दी कविता प्रेमी ऐसी पंक्तियों से परिचित हैं |
" रैया राव चम्पत के छत्रसाल महाराज
भूषण सकै करि बखान कोऊ बलन को
पक्षी पर छीने ऐसे परे पर छीने वीर
तेरी वरछी ने वर छीनें हैं खलन के |"
                                                  पर हम बात कर रहे थे महाकवि भूषण और उनकी भाभी द्वारा किये उनके तिरष्कार की ,हम फिर से दोहराते हैं कि इतिहास का सत्य साहित्य का सत्य नहीं होता है ,सच पूछों तो इतिहास का सत्य स्थिर होता है | जबकि साहित्य का सत्य चेतन होता है ,वह फलता -फूलता ,बढ़ता और विस्तारित होता है | जनश्रुति कहती है कि शिवाजी के सुपुत्र साहू जी और अन्य समर्थ मराठा सरदारों ने शिवा बावनी के एक एक छंद पर एक एक हाथी देकर उन्हें पुरष्कृत किया | जनश्रुति यह भी कहती है कि महाराज छत्रसाल ने स्वयं उनकी पालकी उठाने में हाँथ लगाया | "माटी " के पाठक साहित्य की ऊँचाइयों और गहराइयों से परिचित हैं | जनश्रुति में जनकल्पना के पंख लग जाते हैं तो वह गगन बिहारी बन जाती है | वह सुरसा के मुंह का प्रसार पा जाती है और उसमें सभी असंभव सम्भव हो जाता है | तो जनश्रुति कहती है कि महाकवि भूषण बावन गजों की पंक्ति लेकर आगे के सबसे ऊँचे गजराज की पीठ पर बैठ कर त्रिविक्रमपुर पहुंचें ,कहाँ से और कैसे निर्विघ्न पहुँच गए यह हाथियों के महावत जानते होंगें | पर उनके पहुंचने की खबर पाकर त्रिविक्रमपुर की बाजार ,गलियों और नुक्कड़ों पर भीड़ उमड़ पडी | हांथियों की पंक्ति भीड़ से रास्ता बनाती हुयी मतिराम त्रिपाठी के अगले द्वार पर पहुँच गयी | वृद्धा माँ तो कुछ सुन समझ नहीं पायी पर भाभियाँ और उनके बाल -बच्चे घबरा कर कक्ष में छुपने के लिए भगे | उन्हें भ्रम हुआ कि शायद कोई नवाबी या लुटेरी मुस्लिम सेना का कोई सिपह सालार उनका घर और नगर लूटने आया है | बूढ़ी स्त्रियों ,मर्दों और बच्चों को मार दिया जायेगा | नवयुवक यदि बच निकले तो उनका भाग्य नहीं तो कुत्तों और सियारों का भोजन बनेंगें ,और नवयुवतियाँ भेड़िया सिपाहियों के लिये कामेच्छा पूर्ती का साधन बनेंगीं | पर मतिराम त्रिपाठी और उनके अग्रज जिनका नाम शायद मैं गलत हूँ कृपा राम था ,वीर पुत्र और वीर बन्धु थे | उन्होंने छत पर चढ़कर हस्तियों की उस लम्बी पंक्ति को देखा | उन्होंने देखा कि सबसे आगे सबसे ऊँचे गजराज पर उनका सबसे छोटा भाई भूषण बैठा है ,उसके सिर पर छत्र लहरा रहा है ,वह राज कवि के वेष कीमती वस्त्र पहनें है | उसका महावत भी एक विशेष पगड़ी धारण किये हुये है | उन्हें भ्रम हुआ कि कहीं वह कोई सपना तो नहीं देख रहे हैं | उन्होंने फिर आँखें मलीं | हस्ति पंक्ति कुछ और नजदीक आ गयी थी | अरे हाँ यह तो भूषण ही है ,आश्चर्य से फटती  हुयी आँखें लिये वह सीढ़ियों से शीघ्रता से उतर कर नीचे आये | कृपा राम और मतिराम ने अपनी अपनी गृहणियों और बच्चों को कक्ष से बाहर आने को कहा ,चिल्लाते गए कि छुटुवा आ गया है | माँ ने नहीं सुना  पर उन्होंने जोर से चिल्लाकर कहा , " अम्मा छुटुवा आ गया ,भूषण घर आ गया ,धन्य हुए हमारे भाग्य | "भूषण का गजराज द्वार पर पहुंचा | उसने सूंड़ उठाकर भाइयों का अभिवादन किया | भाइयों ने कुछ देर भूषण के नीचे उतरने की प्रतीक्षा की ,तब भूषण ने कहा भाभियाँ कहाँ हैं ?छोटी भाभी से कहो कि थाली में थोड़ा सा नमक डाल कर द्वार पर आये और मुझे नीचे उतरने का हुक्म दे | साहित्यकार यह नहीं बताते कि छोटी भाभी नमक लेकर आयी या नहीं आयी हाँ यह अवश्य बताते हैं कि सिर ढके मुखड़ों के नीचे झुकाकर सुख के आंसू द्वार की देहरी पर टप -टप  गिर पड़े | महाकवि भूषण महावत द्वारा हाथी को बिठाल कर नीचे उतारे गये | उन्होंने ज्येष्ठ भ्राताओं और भाभियों के चरण स्पर्श किये और वृद्धा माँ के पैरों पर गिरकर काफी देर चुपचाप रोते रहे | "माटी ' नहीं जानती कि वे क्यों रोये ?शायद दिवंगत पिता की याद में ,शायद अपरम्पार भगवत कृपा की कृतग्यता के रूप में ,शायद महानायक अद्वितीय अश्वारोही ,हिन्दू धर्म उद्धारक छत्रपति शिवाजी की पावन स्मृति में | 'माटी 'के पाठक इस बारे में स्वतन्त्र निर्णय लेने के लिये पूर्ण रूप से बन्धन मुक्त हैं |









                     

Friday, 21 July 2017

भूषण का आत्म अभिमान चोट खाता है ,कहते हैं ,"भाभी मैं क्या किसी हाथी नसीन से कम हूँ | " मेरी प्रशंसा क्या किसी हाथी नसीन से कम होती है | भाभी को नहले पर दहला लगाना आता है | आखिर वह मतिराम की पत्नी है | उसके पति स्वयं जानें मानें कवि हैं | फिर भी वह गृह गृहस्थी चलाने के लिए जायदाद की पूरी देख भाल करते हैं | अपना समय फिजूल की शेखियों में बर्बाद नहीं करते | वह चोट करती है ," सभी के भाग्य में हाथी नसीन होना नहीं होता | बेकार की शेखी मत बघारो लाला मैनें तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है | बोलो और नमक तो नहीं चाहिए ,वह छोटा विभीषण रो रहा है | न जानें क्या होता है | अद्द्भुत प्रतिभा के धनी ,हिन्दू संस्कृति के प्रति पूर्णतः समर्पित भाभी के शब्दों का प्रहार झेल कर तिलमिला उठते हैं | पर अपने आवेश को नियन्त्रत कर शान्त स्वर में कहते हैं देखो भाभी तुम मेरी आदरणीया हो ,तुम मेरी माँ तुल्य हो क्या जैसा जो कुछ मैं हूँ वह तुम्हारी माप पर खरा नहीं उतरता | यदि मैं हाथी नसीन हो जाऊँ तो क्या मैं कुछ बदल जाऊँगा | भूषण तो भूषण ही रहेगा,भाभी उसे बिकने के लिए बाध्य मत करो | उत्तर भारत में तो मेरा  खरीददार दिखता ही नहीं | हलाहल कूट को बस त्रिनेत्र शिव ही कंठ में धारण कर सकते हैं | बच्चे के रोने की आवाज तेज होती है |,भाभी उठ खड़ी होती है ,उठते -उठते कहती है ,जब ब्याह कर आयी थी तुम्हारे बड़े भाई भी इसी प्रकार की लम्बी -चौड़ी हांका करते थे ,कहते थे राजसी ठाठ से घर को मढ़ दूंगा | कहते थे स्वर्ण आभूषणों से मेरे रूप को कई गुना बढ़ा देंगें | अरे लाला तुम सब भाइयों में अपना बड़प्पन दिखाने का मर्ज लग गया है | मेरे जेठ जी कुछ लिखते -विखते रहते हैं | बड़ी बहना भी कह रही थी कि इन लफ्फाजी करने वाले भाइयों में सभी केवल प्रशंसा का आसव पीकर मस्त रहते हैं | जीवन की कठोर सच्चाई से इनका कोई परिचय नहीं है | हमारी नसीब में बैलगाड़ी ही बनी रही यही बहुत है | हमारी गैय्या बछड़े देती रहे तो खेती बाड़ी चलती रहेगी | रथ हमारे भाग्य में कहाँ है | और हाथी क्या हमारी जिन्दगी कभी हमारे दरवाजे पर खड़ा हो सकता है |
                                   भूषण ने अभी तक  कुछ ही कौर मुंह में डाले हैं | तीन चौथाई भोजन थाली में अनछुआ पड़ा है ,भाभी तो खड़ी ही थी | खुद भी तमग कर खड़े हो जाते हैं | कहते है भाभी मैं अपना अपमान तो बर्दाश्त कर सकता हूँ पर आपनें न केवल देवर का अपमान किया है बल्कि अपने पूज्य पति और ज्येष्ठ श्री का भी | हमारे पूज्य पिता आज नहीं हैं ,पर जो विरासत हमनें उनसे पायी है कि वह इतनी भव्य और ओजपूर्ण है कि वह हमें अमरत्व के द्वार तक पहुंचा सकती है | अच्छा तो सुनो भाभी मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब इस घर के द्वार पर तभी आकर भाइयों को अपना मुंह दिखाऊंगा जब मैं सबसे आगे विशाल गजराज पर बैठा हूँगा और मेरे  पीछे हाथियों की लम्बी कतार होगी | तब नमक देने में देरी तो नहीं करोगी भाभी |
                    भूषण यह कहकर उठ जाते हैं और हाँथ पैर धोते हैं ,मुंह पर जल की छीटें मारते हैं ,सिर पर उष्णीष रखते हैं ,वक्ष वस्त्र पहनते हैं फिर माँ के कक्ष में जाकर माँ के चरणों में सिर रखकर उसका आशीर्वाद मांगते हैं | माँ की श्रवण शक्ति बहुत कम है ,भाभी और देवर में क्या बात -चीत हुयी है इसे वह नहीं जानती | माँ आशीर्वाद का हाँथ भूषण के सिर पर रखती है ,कहती है बेटा रात्रि को जल्दी आ जाया करो | स्वर्ग जानें से पहले तुम्हारे पिता ने जो मुझसे कहा था सुनना चाहोगे ? उन्होंने कहा था हमारा भूषण हम दोनों को अमर कर देगा | भूषण के आँखों के जल बिन्दु मां के चरणों पर पड़ते हैं | रुदन को रोककर आँगन से बाहर आकर पदत्राण पहन लेते हैं और शीघ्रता से गृह के मुख्य द्वार से बाहर निकल जाते हैं | सोचते जा रहे हैं कि उत्तरावर्त का शौर्य तो मर चुका ,मेरी रणभेरी किस नरसिंह को हिन्दू संस्कृति के सच्चे उद्धारक के रूप में इतिहास के पटल पर अवतरित होने की प्रेरणा दे पाएगी | चलते हैं ओरछा से होकर महाराष्ट्र की ओर अब तो अन्याय पूर्ण मुल्ला संस्कृति को जड़मूल से उखाड़  ही फेंकना होगा | हिन्दू चिन्तन की सामासिकता कोई कालजयी राष्ट्र पुरुष देश का भविष्य रचने के लिए उभार कर सामने लायेगी | असमर्थ तो यह कर नहीं सकते पर सम्भवतः समर्थ रामदास महाराष्ट्र की चेतना में पुनः नवचेतना का संचार कर दें |
              पटाक्षेप........दूर से गूंजती कविता की पंक्तियाँ " शिवा जो न हो तो सुन्नत होत सबकी |"(क्रमशः )



             

शब्द -समर

                             उत्तर मध्य भारत का एक अर्धविकसित नगर जिसे त्रिविक्रमपुर के नाम से जाना जाता है | त्रिपाठी सद्गृहस्थों का एक साफ़ सुथरा गृह | गृह के बाहर गोबर लिपी भित्ति से आवेष्ठित एक खुला प्रांगण , सुरुचिपूर्ण मिट्टी के बनें ऊँचे धारक घेरों में तुलसी विटपों की सुहानी पंक्ति , गृह के भीतर सबसे पहले बैठका , फिर अगल -बगल के कई कक्ष ,बीच में अन्तर आँगन फिर दोनों ओर कक्ष और कक्षों को जोड़ती हुयी एक चौड़ी दालान | गृह के पीछे हरे -भरे वृक्षों से शीतलता पाने वाला खुला मैदान | गृह के पीछे की भित्ति में  पीछे निकलने के लिये एक द्वार मुख्यतः घर और पड़ोस की महिलाओं के लिए आने -जानें का सुरक्षित मार्ग | चैत्र का महीना समाप्ति की ओर है | दिन के दस बजे हैं | अभी भीषण गर्मी अपनी प्रारम्भिक अवस्था में है | भरे -पुरे घर में स्त्रियों और बच्चों की चहल -पहल ,भूषण नाम से अपनी पहचान बनाने वाले युवा कवि का आगमन | गृह में दो उसकी बड़ी भाभियाँ ,उसकी माँ ,और उसके छोटे आँगन में दौड़ने ,खेलने वाले भतीजे और भतीजियां | दोनों बड़े भाई बाहर वृक्षों और खेतों की देख -रेख में व्यस्त | भाइयों में सबसे छोटा भूषण अभी तक अविवाहित | मस्त मौला ,फक्कड़ पर अद्वतीय सृजनात्मक प्रतिभा का धनी | मुगल सम्राट अकबर ,जहांगीर और शाहजहां के इस्लामी सहिष्णु शासन का काल समाप्त प्राय | औरंगजेब के कट्टर इस्लामी शासन का प्रारम्भ | दाराशिकोह की पराजय और निर्मम ह्त्या | बहु संख्यक हिन्दू जनमानस में आक्रोश |  मुसलमान शासकों द्वारा जजिया कर लागू करने की शुरुआत | कवि भूषण के छन्दों में अन्याय को जला देने के लिए अग्नि की लपटें | आस -पास के सभी क्षेत्रों में उनका सम्मान | हर जगह से  बुलावा | उनका ओजस्वी व्यक्तित्व कविता पाठ | अतुल सम्मान पर  घर की आर्थिक व्यवस्था में योगदान न के बराबर | सदैव हड़बड़ी में ,शीघ्रता में , क्योंकि सभी समूहों ,समितियों और सभाओं में उनकी उपस्थिति अनिवार्य | सिर पर सिर त्राण (पगड़ी ) कटि से ऊपर एक लम्बा सिला हुआ वस्त्र जो भुजाओं में केवल कुहनियों तक पहुंचता है | कटि के नीचे सुथ्थन ढंग की धोती का पहिनाव | पैरों में पात्राण आँगन में पहुंचने से पहले पैरों से जूतियां निकाल देते हैं फिर लम्बे -चौड़े नाबदान पर बैठकर पैर धोते हैं | मिट्टी लगाकर हाँथ साफ़ करते हैं फिर मुंह पर  पानी का हाँथ फेरते हैं | दूर खूंटी पर टँगें एक अंग पोछा से हाँथ और मुंह पोछते हैं | सिर त्राण पहले से ही उतारा जा चुका है अब ऊपर का लम्बा वस्त्र भी निकाल देते हैं | भाभी रसोई के  बाहर काष्ठ पीठ डाल देती है | कांसे की थाली में कटोरियों में दाल ,सब्जी और थाली में चावल -रोटी रखकर सामने रख देती है | यह रोज का सुनिश्चित क्रम है | भाभी जानती है कि भोजन की इतनी मात्रा पर्याप्त है फिर भी कटोरदान पास रखकर कह देती है कि अगर मन में हो तो और रोटियां ले ली जायँ ,एक छोटी कटोरी में शुद्ध घृत भी है फिर भाभी रसोई छोड़कर किसी छोटे बच्चे के हाँथ पाँव धोकर बाहर निकल जाती है | भूषण अपनी इस छोटी भाभी को बहुत सम्मान की द्रष्टि से देखते हैं | यह उन्हें माँ जैसा प्यार करती हैं | मां अब बहुत वृद्ध हो गयी हैं | अलग कक्ष में पडी या बैठी रहती हैं | भोजन करने के बाद भूषण कुछ देर के लिए उनके साथ उठ -बैठ लेते हैं | माँ उनसे कविता के अतिरिक्त कोई और ऐसा काम करने को कहती हैं जो अर्थ उपार्जन की प्रकृति का हो | सुरुचिपूर्वक कवि भूषण भोजन का पहला ग्रास दाल में डुबोकर और सब्जी रखकर मुंह में डालते हैं | उन्हें लगता है कि दाल सब्जी में नमक न के बराबर है | कहीं भाभी भूल तो नहीं गयीं ?ग्रीष्म की ऋतु में भूषण शरीर से अधिक परिश्रम करते हैं क्योंकि लम्बे -चौड़े दिनों में उनका कहीं न कहीं आना -जाना रहता है | शरीर से काफी स्वेद श्रवित होता है कुछ अतिरिक्त नमक की मांग रहती है | भाभी को पुकार कर रसोईं में आकर नमक देने की बात  करते हैं | भाभी को समय लग रहा है | छोटे बच्चे को साफ़ सुथरा करने में समय लगता ही है | भूषण फिर आवाज देते हैं ,भाभी कहती है आती हूँ लाला ,इतने बेताब क्यों हो रहे हो | भूषण कौर लिए बैठे हैं | नमक की कमी से स्वाद किरकिरा हो रहा है | फिर तीसरी आवाज देते हैं | जल्दी करो भाभी मैं कौर लिए बैठा हूँ | कहाँ उलझ गयीं ? भाभी गुस्से में छोटे बच्चे को पालनें पर ही छोड़ देती हैं | छोटा बच्चा जो अभी तक शिशु ही है रोने लगता है | भाभी गुस्से से हाँथ धोकर रसोई में घुसती है ,चुटकी से थोड़ा पिसा सेंधा नमक थाली में रख देती है | कहती है ज्यादा नमक खाते हो इसलिए ज्यादा गुस्सा करते हो | जब किसी को व्याह कर लाना तो उसपर ऐसी हुकूमत करना | मुझे और भी तो कितने झंझट हैं | खाते -खाते भूषण कहते हैं कि उन्हें भी बहुत सारे झंझट हैं और उनके पास समय नहीं होता | बच्चे के रोने की आवाज भाभी तक आती है | भाभी तैश में आकर कहती है ,"लाला तुम तो ऐसे रोब से बातें कर रहे हो जितना कोई हांथी नसीन भी नहीं करता | "(क्रमशः )