Sunday, 22 October 2017



                                    अर्नाल्ड ट्वायनवी  नोबेल विजेता इतिहासकार की मान्यता है कि यदि कोई देश विदेशी तकनीक ,विदेशी भेष -भूषा ,विदेशी खान -पान और जीवन निर्वाह की विदेशी शैली स्वीकार कर लेता है तो उस देश में रहने वाले मानव समाज के मूल्य बोधों में भी परिवर्तन हो जाता है इस परिवर्तन में एक लम्बा समय लग सकता है क्योंकि किसी भी देश का सम्पूर्ण समाज एक साथ विदेशी विचारधारा की समग्र पकड़ में नहीं आता । कई स्तरों पर और कई खण्डों में यह परिवर्तन चलता रहता है । यही कारण है कि कई बार शताब्दियों तक संविधान में लक्षित जीवन मूल्य जन समुदाय के विशाल हिस्से के भाग नहीं बन पाते । ट्वायनबी नें मानव सभ्यता के भिन्न -भिन्न कालखण्डों से उदाहरण प्रस्तुत कर अपनी बात को वैज्ञानिक तर्क पर आधारित करने का प्रयत्न किया है । बीसवीं शताब्दी के मध्य  तक मानव विकास के दिग्गज विद्वान यह मान कर चलते थे कि संस्कृति का सम्बन्ध मानव जाति की भिन्न नस्लों के साथ जुड़ा रहा है । मानव जाति को पाँच , छह नस्लों में बाँटकर उनके साथ संस्कृतियों की भिन्नता को व्याख्यायित करने का प्रयास होता रहता था । फिर आये वे विद्वान नृतत्वशास्त्री जिन्होनें प्रागैतिहासिक और ऐतिहासिक काल की मिथिकों ,कल्पनाओं और मृत्यु तथा जीवन से सम्बंधित अनुमानों को एक दूसरे का पूरक बताया । उनका कहना था की नस्ल वादी सांस्कृतिक व्याख्यायें अवैज्ञानिक हैं । प्रागैतिहासिक काल की बचकानी ,अधपकी पशु मानव चिन्तन पर आधारित अनुमान और कल्पनायें ही मिथकीय रूप लेकर ऐतिहासिक काल में दार्शनिक अवधारणाओं को जन्म दे सकीं थीं । इस प्रकार संस्कृति का सम्बन्ध विशिष्ट ,सामान्य या निम्न नस्लों के के आधार पर व्याख्यायित करने का अर्थ सभ्यता की विकास वाली धारणा को जड़ मूल से नकारना होगा । संस्कृतियों की विभिन्नतायें वस्तुतः भौगोलिक ,जलवायुकि ,ब्रम्हाण्डीय और जीवन सरंक्षणीय कारणों की अपार विभिन्नताओं के कारण अपने प्रारम्भिक रूप से उद् भुत हुयी थीं ।सहस्त्रों   वर्षों के लम्बे काल में  वे एक दूसरे से घुलती -मिलती और टूटती -जुडती रहीं । कहीं प्रस्तरण हुआ कहीं संकुचन । कहीं विस्फोटन हुआ कहीं अवगुंठन । इस प्रकार विश्व की कोई भी संस्कृति अपनें में इतनी विशिष्ट नहीं है कि उसे अन्य संस्कृतियों से सर्वथा अलग एक नयी मानव जीवन शैली के रूप में   स्वीकार कर लिया जाय । बहुत गहरायी से झांकनें पर हम पायेंगें कि अपने प्रारम्भिक काल  में संस्कृति सभ्यता के साथ अभिन्न रूप से जुडी हुयी थी । उदाहरण के लिये मानव द्वारा नग्न शरीर को आच्छादन देने की क्रिया को ले लीजिये । प्रजनन से जुड़े शरीर के कुछ अंगों को विकास के जिस दौर में मनुष्य नें ढककर सभ्य बनने का प्रयास किया वह प्रागैतिहासिक काल के उस दौर में पहुँचता है जहाँ मनुष्य वनमानुष से अलग होकर अगले दो पैरों को हाँथ बनाने की आदिम चेष्टा में रत था । सभ्यता की यह प्रक्रिया गोर ,पीले ,काले गेहुंए आदि किसी भी रंग या नाक ,आँख के किसी भी डिजाइन से बिल्कुल मुक्त वनमानुषों की शाखा में से निकल कर आने वाली आज की मानव जाति की सबसे आदिम पीढी से था । व्यक्तिगत रूप से वहाँ भी अपार विभिन्नता रही होगी पर सामूहिक रूप से नग्न ,द्विपद वनचारियों का एक ऐसा समूह अस्तित्व में आ गया था जो सीधे खड़े होकर प्रजनन के लिये प्रयुक्त होने वाले अपनें शारीरिक अंगों को देख सकता था । धीरे -धीरे शताब्दियों तक चलते हुये प्रजनन व्यापार में उसे यह लगा होगा कि मिथुन की प्रक्रिया अकेले एकान्त में अधिक आनन्ददायक और बाधा रहित होती है ।   प्रजनन के लिये प्रकृति द्वारा बनाये गये इन शारीरिक अंगों को आच्छादन से ढक लेने में उसे पशुओं से अलग अपनी विशिष्ट पहचान बनाने का एक मार्ग मिल गया । समूहिक रूप से स्वीकृति मिल जाने पर वस्त्र धारण मानव सभ्यता की सबसे सबल आधारभूमि बनने लगा । प्रागैतिहासिक काल में आच्छादन की भिन्नता क्षेत्र विशेष की वानस्पतिक भिन्नता पर आधारिक रही होगी । सहस्त्रों वर्षों के विकास क्रम में शरीर का यह आच्छादन सहस्त्रों वर्षों में अपना रूप रंग बदलता रहा है । इस शारीरिक आच्छादन को हमें किसी संस्कृति विशेष जे जोड़ कर देखना न तो वैज्ञानिक लगता है और न ही तर्क संगत । यह समझ में आने वाली बात है कि प्रारम्भिक अवस्था में शरीर को किसी प्रकार ढक लेना ही आवश्यक होता होगा और फिर सैकड़ों पीढ़ियों तक मष्तिष्क की तंत्रिकायें विकसित होकर परिधान के नये -नये आकार खोजती रहीं । हाँथ ,पैर ,ग्रीवा कटि और वक्ष की बनावट नें विकसित मष्तिष्क से नये परिधान रूपा कटियों की माँग की और इस प्रकार आज संसार के फैशन बाजारों में परिधान का निरालापन सभ्यता और विशिष्टता का प्रतीक बन गया । जो बात वस्त्रों पर लागू होती है वही भोजन की अपार विभिन्नताओं पर भी । बाधा रहित प्रजनन नें विपुल श्रष्टि की योजना बनायी और समूहों में बटकर आदिम मानव जाति जीवन का जोखिम उठाती हुयी घने जंगलों ,गहरे दलदलों ,जलते रेगिस्तानों और ऊँचे पहाड़ों में घूम -फिर कर भोजन की सहज उपलब्धता की तलाश करती रही । यद्यपि आज धरती पर अहार की अपार विभिन्नता और चक्राकार विपुलता है पर फिर भी अभी तक सम्पूर्ण मानव जाति को भोजन उपलब्ध कराने की योजनायें फलीभूत नहीं हो पायी हैं । खान -पान की इस विभिन्नता को भी किसी विशेष प्रजाति से जोड़ने का अर्थ आधारभूत कारणों की नासमझी से ही सम्भव है । जो बात भोजन और आच्छादन की विभिन्नता पर लागू होती है वही बात शीत ,आतप और बरसात से बचने के लिये घरौन्दें बनाने पर भी लागू होती है । गुफाओं से निकलकर गुफानुमे घरौंदें और फिर द्विपदी होने के कारण ऊँचाई पर पड़ा कोई आवरण जो शरीर को ढक कर भी सिर को सुरक्षित रखे । यह बहुत छोटी -छोटी आदिम क्रियायें मानव सभ्यता का आधार रही हैं । आज आसमान छूती अट्टालिकाओं की बगल में बने छोटे -छोटे पोलीथीन से ढके घरौन्दें जिन्हें हम झुग्गी -झोपड़ी कहते हैं दरअसल मष्तिष्क की एक ही चिन्तन प्रक्रिया से जन्मे हैं । यह  सोचना कि अट्टालिकायें गोरी संस्कृति का प्रतीक हैं और घरौंदे काली संस्कृति का महज एक बचकानी समझ ही मानी जायेगी ।
                                    हम अर्नाल्ड ट्वायनवी को सम्पूर्ण रूप से स्वीकार न करते हुये केवल इतना मान सकते हैं कि सभ्यता और संस्कृति निरन्तर एक परिवर्तनशील प्रक्रिया है । पश्चिमी और पूर्वी संस्कृतियां कल तक बहुत अलग -अलग दिखायी पड़ रही थीं पर आज एक मिलीजुली विश्व संस्कृति समाज में उभर कर आती दिखायी पड़ती है । बंगाल के पूर्व मुख्य मन्त्री नें जब यह कहा था कि बाबरी मस्जिद का गिराना एक Barbaric घटना है । तो वह सिर्फ यह कहना चाहते थे कि सभ्य मनुष्य मजहब के नाम पर हिंसा या विध्वंस  नहीं करता । आदिम या जंगली जातियाँ ही ऐसा काम कर सकती हैं । इस सबका अर्थ यह है कि विध्वंस और हिंसा से दूर रहना मानव सभ्यता का एक अनिवार्य गुण होना चाहिये । अहिंसक बुद्ध और अहिंसक गांधी इसी लिये बड़े हैं कि उन्होंने पशुबल को आत्मबल से नियन्त्रित करने की बात कही है । इसी प्रकार विश्व की किसी भी सभ्यता में चोरी ,परस्त्रीगमन ,और बलात संपत्ति हरण निन्दनीय कार्य माने जाते हैं । स्पष्ट है कि मानव संस्कृति में इनका बहुत महत्वपूर्ण योगदान  है और एक सभ्य मनुष्य तभी संस्कृत बनता है जब वह इन निन्दनीय कार्यो से ऊपर उठ जाता है । दरअसल तानाशाही और साम्राज्यवाद के युगों में चिन्तन भी अहंकार की सीढी में चढ़कर अपना सर ऊँचा करने लगता है ।
                                         एक युग था जब यूनान की सभ्यता विश्व में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती थी । फिर रोम विश्व सभ्यता का केन्द्र बन गया । साम्राज्यवादी ब्रिटेन सैकड़ों वर्षों तक यह सोचता रहा कि उसकी सभ्यता ही संसार को सर्वश्रेष्ठ संस्कृति को जन्म दे सकती है । आज सारी दुनिया के आगे उसके अहंकार का खोखलापन साबित हो चुका है । अमेरिका का एक वर्ग भी इस गलतफहमी में पड़ गया है कि अमेरिकन सभ्यता ही विश्व संस्कृति का आधार बनेगी । सौभाग्यवश अमेरिका में विचारकों का एक  शक्तिशाली वर्ग अभी भी स्वस्थ्य चिन्तन में लगा हुआ है । उसे इस बात का अभिमान नहीं है कि दुनिया अमरीका की राह पर चले पर इस बात का आग्रह जरूर है कि दुनिया जनतन्त्र की राह पर चले । अब जनतन्त्र की धारणा पर भी चीन की अपनी दार्शनिक व्याख्या है और ईरान की अपनी । इन विवादों में पड़कर हमें मानव संस्कृति को खण्ड रूपों में नहीं देखना होगा । विश्व संस्कृति का विकास आदिम मानव के अन्तरिक्ष मानव तक विकसित होने की अमर गाथा है । राष्ट्रीय सभ्यताओं के अपने -अपनें चेहरे हैं । उन  चेहरों पर अपने -अपने टोप ,मुकुट ,पगड़ियाँ ,टोपियाँ और केश अलकृतियाँ हैं पर विश्व संस्कृति का आधार बनने के लिये जो मूलभूत उपादान आवश्यक हैं वे भारत की पावन मिट्टी में जन्में -पले हैं और सदैव जन्मते -पनपते रहेंगें । बुद्ध का अष्ट मार्ग , गान्धी का अहिंसा दर्शन , नानक का मानव समानता का मूल मन्त्र यही तो है मानव संस्कृति का मूल आधार । यदि पश्चिम इन्हें यह कहकर अस्वीकार  नहीं करता कि ये सब भारत में जन्में हैं । तो हम भारतवासी अहिंसा ,क्षमा और दया के देवता ईसा मसीह को भी भारतीय बना लेने के लिये सहर्ष प्रस्तुत हैं । सूफी पैगम्बर शेख सलीम चिस्ती तो हमारे पास हैं हीं और यदि जिहादी अपना जनून छोड़ दें तो हम मुहम्मद साहब को भी अपने गले का हार बना सकते हैं । भारत ही है जिसने सेकुलरिजम की नास्तिकवादी विचार धारा को नकारा है  और उसे सर्व धर्म समभाव में ढाला है । यदि धर्म को हिंसा के द्वार  से हटाना  है तो भारत की सर्व धर्म समभाव की धारणा ही विश्व को स्वीकार करनी पड़ेगी । कब ऐसा होगा हम नहीं जानते पर ऐसा हुये बिना विश्व संस्कृति का मूल आधार दृढ नहीं किया जा सकता ।

                                          



Tuesday, 10 October 2017

बोली शहादत की
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कर बोली देना बन्द अगति के व्यापारी
यह गीत बिकाऊ नहीं स्वेद का जाया है
यह गीत समर्पित है खेतों खलिहानों को
 यह  गीत धान की पौद रोपनें आया है
यह गीत गरम लोहे पर सरगम बन गिरता
यह गीत क्रान्ति सिंहासन का द्रढ़ पाया है
यह गीत तुम्हारी माया का मुहताज नहीं
यह गीत श्रमिक के ओठों पर लहरायेगा
यह गीत पहाड़ों की छाती को चीर फाड़
मरुथल में जल की प्रबल लहर ले आयेगा
यह कौंध समेटे है प्रताप के भाले की
यह दस्तावेज न बिकनें वाली वाणीं का
है आगत की अंगड़ाई का यह सूर्य नाद
प्रज्वलित भाल यह रक्तिम क्रान्ति  भवानी का
यह गीत तुला पर तुलनें को बेताब नहीं
यह खनक न बननें आया है मधुप्यालों की
इसमें झांसी की आन ,तात्या का तेवर
हुंकार यहां फांसी पर झूले लालों की
यह गीत स्वर्ण की भस्म न खाकर पलता है
यह गणिका का स्वर नहीं काल की छाया है
कर बोली देना बन्द --------------------
 तुमनें खरीद डाले हैं कितनें ही बजार
कितनें उस्तादों का कल तुमनें मोल लिया
मदिरा की छींटें डाल स्वर्ण की झझरी से
कितनी कलियों का घूंघट तुमनें खोल लिया
कितनें वाणी के पुत्र तिजोरी में धांधे
कितनीं बीणा बिक गयीं खनक दूकानों में
कितनें कत्थक कोठों में बंधकर सिसक रहे
चांदी के घुँघरू बाँध दिये हैं गानों में
तुमनें फसलों को पुखराजी रंग दे डाला
तुमनें ऊषा को स्वर्ण पिटारी पहनायी
रजनी को हीरक हार भेंट दे आये तुम
कुदरत सबकी सब सिमट तिजोरी में आयी
तुम समझ रहे सारी कुदरत बाजारू है
हर स्वर महफ़िल में नापा तोला जाता है
हर चन्द्र बदन सोनें के घूंघट से ढकता
हर घूंघट मोती देकर खोला जाता है
हाड़ी रानी की भेंट मगर क्या भूल गये
जीजाबाई का धर्म कभी क्या जाना है
आजाद ,भगत ,बिस्मिल को नारी नें जन्मा
लपटों से झुलसा पड़ा राजपूताना है
कुछ नर कुबेर का घेर तोड़ने आते हैं
यह गीत उन्हीं नरसिंहों की हमसाया है
कर बोली देना बन्द ----------------------
यह गीत पुत्र बन वृद्धा के घर सोयेगा
यह गीत पिता बन कन्यादान करायेगा
यह गीत दिवाली को दुखिया का घर जगमग
करनें को नभ से नखत दीप ले आयेगा
इसका है मूल्य हंसी शिशु की भोली -भाली
इसका है मूल्य श्रमित शिक्षक का खिल जाना
यह बिना मूल्य ही द्वार दीन के जाता है
पर दुःख में इसका मूल्य व्यथा से हिलजाना
यह बिन पैसे का है गुलाम उन लालों का
जो लिये हथेली पर सिर अपना घूम रहे
जिनको सुकराती राग लग गया है अविकल
विष -कंठ बनें जो गारल -सुधषी झूम रहे
यह जलती जेठ -दुपहरी में तरु- तल बैठे
चरवाहों के श्रम -थकित गात सहलायेगा
यह दही विलोती जसुदा के होठों पर पल
हलधर के हल में नयी शक्ति भर लायेगा
चण्डी के मन में अमर प्यास की चाह जगा
यह छिओ राम कह जग का कलुष मिटायेगा
रैदास भगत के चरण चूम कर प्रात रात
यह वाल्मीक को पालागन कर आयेगा
इसको खरीद सकते हैं सिर -फरोश ,फक्कड़
यह नयी श्रष्टि के बीज सजाकर लाया है
कर बोली देना बन्द -----------------------------


Monday, 9 October 2017

                                                                                      नयी सोच की तलाश

                        विद्याधर बाबू तड़के सुबह उठकर शौच आदि से निवृत्त होकर छत पर काफी देर तक चक्कर लगाते रहते हैं | फिर नीचे उतरकर नाश्ता करते हैं और हिन्दी अंग्रेजी के दोनों अखबार लेकर ऊपर कमरे में चले जाते हैं | घण्टे सवा घण्टे में दोनों अखबारों का कचूमर निकाल देते हैं | फिर थोड़ी देर लेट लेते हैं ,शीशा देखते हैं कि दाढ़ी कहीं इतनी अधिक बढ़ तो नहीं गयी है कि अशोभन लगे | दो तीन दिन तो चल ही सकती है | ग्रीष्म की शुरुआत होनें वाली है | दिन अच्छे खासे बड़े होनें लगे हैं | समय कैसे कटेगा ? रिटायरमेन्ट के सत्रह- अठारह साल हो गये हैं | शरीर अभी चल -फिर लेता है | मन भी अभी पूरी तरह नहीं थका है | विद्याधर बाबू आस -पास के पार्कों में दो चार चक्कर लगानें निकल जाते हैं | कभी तिकोना पार्क ,कभी हनुमान पार्क , कभी बाबा लक्ष्मणपुरी पार्क ,कभी जै राधे पार्क और कभी गोकरण पार्क | पार्क में कोई वृद्ध समवयस्क मिल गया तो गपशप हो जाती है नहीं तो छाँह में पड़ी किसी बेन्च पर बैठ कर कुछ देर के लिये सुस्ताते हैं फिर घर वापसी | उस दिन बाबा हनुमान पार्क में बेन्च पर एक सज्जन लेटे थे शायद उन्हें ठंडी छाँह में कुछ झपकी आ रही थी | सज्जन धोती और कमीज पहनें हुये थे और उनकी चप्पलें घास पर रखी थीं | विद्याधर बाबू पार्क के दूसरी तरफ पड़ी एक बेन्च पर कुछ देर के लिये बैठ गये | दूसरी तरफ की बेन्च पर लेटे वृद्ध सज्जन पांच -दस मिनट बाद उठे और चप्पलें पैरों में अटकाकर पार्क को क्रास करनें लगे | विद्याधर बाबू ने देखा कि उन सज्जन की आयु पैंसठ -सत्तर के आस -पास होगी | उन्हें लगा कि घर में उन्हें कोई विशेष काम नहीं है और उन्हीं की तरह वो भी पार्क में समय काटनें आये होंगें | जब वे सज्जन बेन्च के पास आ गये तो विद्याधर बाबू नें उन्हें अपनें पास बुलाकर बैठनें को कहा | वृद्ध सज्जन ने सहज भाव से उनके पास आकर बैठना स्वीकार किया और सबसे पहले यह बात बतायी कि आज सुबह वह मन्दिर में पण्डित जी का प्रवचन सुननें के लिये गये थे | पर मन्दिर के बाहर आँगन में उन्होंने पाया कि उनकी चप्पलें कोई और पहन गया है | सभी चले गये थे और यह एक जोड़ा चप्पल पड़ा था | इसलिये उन्होंने इस जोड़े को पैरों में डाल लिया | उनकी चप्पलें नयी थीं पर इसी किस्म की थीं | यह जोड़ा पुराना है हो सकता है किसी नें गलती से नया जोड़ा पैरों में डाल लिया हो | हो सकता है किसी ने जान -बूझकर ऐसा किया हो | विद्याधर बाबू ने कहा , "चलिये  हटाइये ,काम चल गया दूसरा जोड़ा पहन लीजियेगा |"  वे बोले यहां बडी  महंगायी है | तीन दिन से दाढ़ी नहीं बनी है | नाई दाढ़ी बनवायी के दस रुपये और बाल बनवायी के बीस रुपये माँगता है | हमारे गाँव में दाढ़ी तीन रुपये में और बाल कटाई छह रुपये में हो जाती है | विद्याधर बाबू ने उन सज्जन की मुंह की ओर गौर से देखा पाया कि वृद्ध सज्जन का एक दांत बाहर निकलकर हिल रहा है और कई दांत गिर गये हैं | उनकी धोती भी अधिक साफ़ नहीं है और कमीज भी कई दिनों की पहनी हुयी लग रही है | सोचा कि ये शायद यहां के निवासी नहीं हैं किसी दूसरे राज्य से आये हैं | पूछा कि वे कहाँ से आये हैं ? उन सज्जन ने बताया कि वे बिहार के जहानाबाद के पास से किसी गाँव से आये हुये हैं | उनका लड़का यहां किसी फैक्ट्री में मैनेजर है वे गाँव वापस जाना चाहते हैं पर लड़का कहता है कि प्राइवेट नौकरी में छुट्टी मुश्किल से मिलती है ,कुछ दिन के बाद इन्तजाम करूंगा | विद्याधर बाबू के पूछने पर उन्होंने अपना नाम मधुसूदन बताया और बताया कि वे जाति के मुहार हैं | गया के आस -पास मुहार जाति की काफी बड़ी संख्या है | हम लोग बनिया मानें जाते हैं | अब बात -चीत का सिलसिला प्रारंम्भ  हो गया | विद्याधर बाबू तो सत्तर पार ही कर चुके हैं | मधुसूदन भी सत्तर के आस -पास चल रहे हैं | समवयस्क ही समझिये | विद्याधर बाबू को मधुसूदन की बात समझनें में काफी कुछ मशक्कत करनी पड़ रही थी क्योंकि उनकी भाषा भोजपुरी ,हिन्दी और मैथली का मिला -जुला रूप लिये थी | पर यत्न करने पर समझा जा सकता था |
विद्याधर :- घर में कौन कौन है ?
मधुसूदन :- लड़का ,बहू और दो बच्चे | बड़ा लड़का और छोटी लड़की ,लड़का किसी अंग्रेजी स्कूल में पढता है | 3000 रुपये महीनें का खर्च है | बस आकर ले जाती है | लड़की वहीं पास के स्कूल में पढ़ती है ,छोटी है |
विद्याधर :- आपके लड़के का यहां आना कैसे हुआ ?
मधुसूदन :- जैसे तैसे बच्चे को बारहवीं तक पढ़ाया था | फिर मशीन का एक साल का कोर्स कराया | छह महीनें घर पर बेकार बैठा रहा | गाँव में किरानें की छोटी सी दुकान है | जहानाबाद से माल मंगा लेता हूँ और गाँव में बेचता रहता हूँ | खेती बारी नहीं है पर काम चल जाता है | फिर बच्चे की मां बीमार पड़ गयी | लकवा मार गया | इलाज कराया तो कुछ ठीक सी हो गयी | छह महीनें बाद फिर लकवा मार गया | फिर कुछ ठीक सी होनें लगी | फिर चल बसी | तीन लड़कियां थीं उन सबको व्याह चुका हूँ | अपनें से छोटी लड़की के व्याह में इस लड़के ने भी मदद की थी | लड़के  के मां को गये पांच छह महीनें हो गये | उधर का एक लड़का यहां फैक्ट्री में काम करता है | उसी के साथ लड़के ने मुझे बुलवा लिया | मैनें भी सोचा अकेले में मन नहीं लगता कुछ दिन बहू बेटे के संग रह आऊं |
विद्याधर बाबू :- यह तो बड़ी अच्छी बात है अब आराम से बेटा- बहू के साथ रहिये | पोता पोती  से बोलिये ,बतलाइये | घर जाकर क्या करेंगें | वहां तो आप अकेलेपन से ऊब जायेंगें | आप का समय कैसे कटता है | अखबार पढ़ लेते हैं |
मधुसूदन :- दसवीं तक पढ़ा हूँ|  यहां के अखबार में हमारी तरफ की ख़बरें न के बराबर होती हैं | फिर भी उल्टा -सीधा देख लेता हूँ | लड़का सुबह आठ बजे काम पर चला जाता है और रात को साढ़े आठ बजे वापस आता है | लड़का ,लड़की पढ़ने चले जाते हैं | बहू ने कह दिया है आप उनके जानें के बाद खाना खा लें फिर चाहे जहां घूमें | शाम को वापस आ जांय  | अब मेरी यहां कोई जान -पहचान तो है नहीं ,इन्द्रा कालोनी से गौड़ स्कूल वाली सीधी सड़क पर चलकर पार्क में आ जाता हूँ | कभी -कभी उठकर हनुमान जी की मूर्ति   देख आता हूँ |प्यास लगनें पर प्याऊ से पानी पी लेता हूँ और फिर पार्क में बैठ -लेट लेता हूँ | गाँव में अकेलापन कट जायेगा पर यहां कटना बहुत मुश्किल है |
विद्याधर :- सुबह के बाद शाम तक बाहर बैठनें ,लेटनें में आपको बीच में कुछ खानें -पीनें की जरूरत नहीं पड़ती | आप के पास खर्चे के लिये थोड़े -बहुत रूपये तो होते ही होंगें |
मधुसूदन :- हम लोग साधारण आदमी हैं | जिस फैक्टरी में हमारा लड़का मैनेजर है वहां के मशीन के कारीगर भी ज्यादातर बिहार के हैं | वे समझते हैं कि सुनील बाबू बड़े घर के हैं | पर मुझे झूठ बोलनें से क्या ? पास बुक में चार ,पांच हजार रुपये होंगें | वह पासबुक मैनें लड़के को दे दी है | हप्ते में दस -बीस रुपये दाढ़ी बनवानें के लिये लड़के से मांग लेता हूँ | अपनें हाँथ से दाढ़ी बनानें की आदत मुझे नहीं है | गाँव के किसी भी बूढ़े को नहीं है | वहां नाई दरवाजे पर आ जाता है |
विद्याधर :- मधुसूदन जी ,आपके गाँव की दुनिया तो अभी तक नहीं बदली , कहते हैं अब लल्लू यादव की जगह नितीश कुमार आ गये हैं | पिछले पांच साल में उन्होंने चमत्कार कर दिखाया है इसीलिये जनता ने उन्हें फिर पांच साल के लिये गद्दी पर बिठा दिया है | आपके लड़के को हरियाणा में यह नौकरी क्या बिना सिफारिश के मिल गयी थी |
मधुसूदन :- अरे नहीं उन दिनों हमारे इलाके से गणेश यादव एम ० पी ० थे | उनका एक दामाद ,उनकी एक लड़की हरियाणा के ऊँचें यादव परिवार में व्याही है | दामाद की एक फैक्ट्री इस शहर में भी है | मैं लड़के को लेकर  गणेश यादव के पास दिल्ली आया था, मैं यादव जी की पत्नी के पैरों पर गिर पड़ा और कहा कि मेरे लड़के को लगवाइये | वे दिल्ली अपनी गाड़ी से लड़के को साथ लेकर लड़की ,दामाद से मिलनें आयीं और यह उनके द्वारा फैक्ट्री में लग गया था | उन दिनों मशीन पर मजदूरी का काम ही मिला था | फिर मैं गणेश यादव जी के पास गया और कहा कि मेरे लड़के को सुपरवाइज़र बनवा दीजिये | फैक्ट्री के मालिक ने कहा कि सुपरवाइज़र बननें के लिये 7 से 8 महीनें की एक ट्रेनिंग करनी पड़ेगी | फरीदाबाद में इसका कोर्स है | पैसे जोड़ -जाड़ कर लड़के को उसमें भर्ती करवाया ,तब सुपरवाइज़र लगा था |
विद्याधर :- फिर सुपरवाइज़र से प्रमोशन पाकर अब मैनेजर हो गया है ?
मधुसूदन :-अरे नहीं , अपनें से छोटी लड़की की शादी में घर गया था | 18  दिन की छुट्टी लेकर काम -काज में फंस गया | घर पर भी कुछ मरम्मत करवानी थी | 50 -55  दिन लग गये | नौकरी छूट गयी | अब क्या करता ? फिर दौड़ कर गणेश यादव के पास पहुंचा ,बहुत चिरिया -बिनती की तब उनकी पत्नी फिर अपनी लड़की दामाद से मिलनें आयीं फिर दामाद ने कहा हम दूसरी फैक्ट्री में इसे लगवा देंगें | वहां मैनेजर लग जायेगा | अब किसी दूसरी फैक्ट्री में मैनेजर का काम कर रहा है |
विद्याधर :- बार -बार एम ० पी ० के पास पहुंचते रहे | दामाद ने भी दूसरी फैक्ट्री में लगवाया | फरीदाबाद में ट्रेनिंग भी करवानी पड़ी | कुछ ऊपर का लेन -देन तो नहीं हुआ ?
मधुसूदन :- आप भी हमारी ही तरह से बुजुर्ग हैं | आप से क्या छिपाऊँ ,लेन -देन के बिना हिन्दुस्तान में क्या कोई काम हो सकता है ? न ट्रेनिंग में दाखिला मिल सकता है ,न नौकरी मिल सकती है , अधिकतर लोग चुप्पी साधे रहते हैं | पर जो पैसा जाना था चला गया | अब मुझे चिन्ता यह है कि लड़के की प्राइवेट नौकरी है फिर कहीं छूट न जाय , रास्ते में कई बार गाड़ियां बदलनी पड़ती हैं | अकेले जानें की हिम्मत नहीं पड़ती | उसे छुट्टी नहीं मिल रही है | इधर बहू का व्यवहार भी कई बार मुझे चोट पहुंचाने लगा है | अभी कल ही उसनें पोते को एक थप्पड़ लगायी तो मैनें उससे कहा कि लड़का बड़ा हो रहा है उसे मारना ठीक नहीं | आँखें तरेर कर बोली तोहार क्या ? मुझे इतना बुरा लगा कि मैं डेरा छोड़कर सारा दिन पार्क में चहल कदमी करता रहा | शाम को सुनील आया ,थके -मादे लड़के से दुःख का क्या रोना ? फिर भी मैनें उससे बात बतायी तो उसनें जवाब दिया कि आप बीच में दखल न दिया करो जैसा चलता है चलनें दो | और जब पोता और पोती मेरे कोई  होते ही नहीं तो मेरे यहां रहनें में क्या सुख है  ? मैं अपनें घर गाँव में ही जैसी  जिन्दगी कटेगी काट लूंगा | गांव में एक दूसरे से राम -राम तो होती रहती है और कहीं भी बैठ जाओ तो कोई बुरा नहीं मानता | पहाड़ जैसा दिन बातों -बातों में कट जाता है |
विद्याधर :- देखो मधुसूदन मैं जानता हूँ तुम्हारा मन बहुत दुखी है | पर मनुष्य को अपनी परिस्थितियों से समझौता करना पड़ता है | अभी तो तुम्हें कम से कम 10 -15 साल तो जीना ही है | आगे भी चल सकते हो | मैं तुम्हें एक राय देता हूँ बोलो मानोगे  तो कहूँ |
मधुसूदन :- मेरा मन तो गाँव में लगा है | होली भी निकली जा रही है | अपनी छोटी मोटी दुकान चला लूंगा | बंद पडी है | उपलों पर छोटी मोटी लकड़ियां जुटाकर दो रोटी सेंक लूंगा | बहू के तानें तो सुननें को नहीं मिलेंगें | विद्याधर ने कहा एक छोटी सी घटना से परेशान हो गये |
 मधुसूदन :- अरे एक नहीं कितनी बातें मैं आपसे बताऊँ | अभी उस दिन मेरे पास रोटी के साथ सब्जी रखी मैनें उंगली से सब्जी को छुआ भी नहीं अलग से चम्मच में  सब्जी उठाकर चखी ,बहुत चरचरी थी | कटोरी अलग हटा दी | प्याज के फांकों के साथ रोटी खा ली | फिर शाम को भी मेरे खानें के साथ वही सब्जी मेरे सामनें रख दी | मैनें फिर उसे सामने से अलग सरका दिया | रात को लड़का जब वापस आया तो उससे शिकायत की कि तुम्हारे बाबू बरबादी मचाये हैं | इतनी मंहगायी में मैं सब्जियां तलाश कर लाती हूँ और वे नापसन्दगी का ड्रामा करते हैं | लड़के नें भी मेरे को ही समझाने की कोशिश की जो मिले खा लिया करो | अब क्या करूँ बूढ़ा हो गया हूँ | पेटवा हजम नहीं कर पाता | मेरे मन का तो बन ही नहीं सकता |
विद्याधर :- देखो तुम आज शाम को लौटकर अपनें लड़के से कहना कि तुम्हें 150 रुपये रोज की एक नौकरी मिल रही है  | तुम्हें एक दुकान पर सुबह नौ बजे जाना है और शाम को आठ बजे के बाद घर वापस आना है | तुम दसवीं पास हो | तुम्हें कुछ हिसाब -किताब लिखना होगा | और चीजों की निगरानी करनी होगी | मेरे एक दोस्त हैं जो बड़े आदमी हैं उनके कई गोदाम हैं ,चीजें आती -जाती रहती हैं ,उनका रिकार्ड रखना होता है | कुछ ज्यादा पढ़े -लिखे लोग लगे हैं ,उन्हें सहायता के लिये विश्वास के आदमी चाहिये | तुम अभी स्वस्थ्य लगते हो | चार पांच साल तो सहज में ही खींच जाओगे | कल मैं इसी समय पार्क में फिर आ जाऊंगा | विश्वास से बात करना ,घबराना नहीं ,यदि कोई उल्टी -सीधी बात हो तो तुम्हारे सोने और खानें का इन्तजाम भी हो जायेगा | इतना कहकर विद्याधर बाबू उठनें लगे | मधुसूदन नें उठकर उनकी ओर देखकर पूछा आप मुझसे भी बुजुर्ग हैं ,हंसी तो नहीं कर रहे हैं?
विद्याधर :- अरे मधुसूदन, इस उमर में अपनी उमर के आस -पास के साथी से हंसी करूंगा ? तुम्हीं ने तो बताया था कि गणेश यादव अब चुनाव हार गये हैं और नितीश की पार्टी का आदमी चुनाव जीता है | जिन्दगी के हर मुकाबले में इसी तरह जीत -हार होती रहती है | सबसे बड़ी हार तब होती है जब आदमी हिम्मत हार जाता है और अर्थ उपार्जन में असमर्थ दिखायी पड़ता है | कल इसी समय मुझसे मिलना ,तुम्हारा चेहरा देखकर मैं जान जाऊंगा कि गाँव वापस जानें के लिये तुम्हारी ललक में कुछ कमी आयी है या नहीं |
                                       इस घटना के दो महीनें बाद मधुसूदन जी अपनें पोते और पोती के साथ प्रत्येक रविवार को पार्क में टहलते नजर आते हैं | कई बार वह अपनी पोती को चटपटे, कुरकुरों का पैकेट  खरीद देते हैं और तब पोता बाबा से जिद करता है कि उसे भी पैकेट खरीद कर दिया जाय | घर पर मम्मीं ने यह कहना बन्द कर दिया है कि ," तोहार क्या ? " अब पोता और पोती मधुसूदन के सभी कुछ हैं | बहू भी उनसे पूछ कर सब्जी लाती है | विद्याधर जी एकाधबार पार्क में उन्हें मिल जाते हैं तो मधुसूदन जी झुककर उनके पैर छूना चाहते हैं | विद्याधर जी ना ना करते हुये दूर हटते हैं और मन में ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि और दुःख यदि देनें ही पड़ें तो प्रभु के उस दान को स्वीकार करना ही होगा पर बुढ़ापे की कंगाली भगवान् मेरे किसी घृणित शत्रु को भी न दें | 9 प्रतिशत आर्थिक प्रगति की दर से विकास करते भारत के माथे पर सबसे बड़े कलंक का टीका असहाय वृद्धजनों की लाचारी है ,और इस लाचारी का प्रमुख कारण है भारतीय जीवन मूल्यों का उच्च शिक्षा प्राप्त वर्ग द्वारा तिरस्कार | बुढ़ापा अब अपने में सम्मान की वस्तु नहीं है ,उसे सम्मानित करने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर नयी सोच को जन्म देना होगा |

Sunday, 8 October 2017

                                       हम सब औरों से कुछ निराला होना चाहते हैं | निराला होनें की यह इच्छा मानव जन्म के साथ ही प्रारम्भ हो जाती है | | विकासवादी विचारक यह मानते हैं कि मानव मस्तिष्क की विस्मयकारी संरचना में निराला होनें की इच्छा संगुफित है | ऐसा कब अतीत के घने कुहासे में आछन्न भू -भौतकीय युग में घटित हुआ इसकी विवेचना कर पाना अभी तक के अर्जित ज्ञान -विज्ञान से सम्भव नहीं हो पाया है | हाँ , समस्या विश्लेषण से इतना निष्कर्ष अवश्य निकाला जा सकता है कि अस्तित्व रक्षा के लिये कुछ अलग कर दिखानें की मूल शक्ति प्रेरणा ही निरालेपन की इच्छा को जन्म दे पायी होगी | लक्ष्य -लक्ष्य वर्षों तक द्विपदीय नर पशु प्रकृति के भीषण भयावह और घातक प्रहारों को झेलता हुआ अपनी अनगिनत पीढ़ियों तक निरालेपन की इस अदम्य आकांछा को प्रजनन प्रक्रिया के द्वारा विस्तारित करता चला गया | आंधी -अंधड़ ,उत्पलपात और विद्युत आघात ,भू - स्खलन ,अग्नि -वपन, धरित्री -परिदोलन , पर्वतीय और जलीय रूपान्तरण सभी कुछ चलते रहे | जीवन का स्पन्दन धीमा हुआ , मृत पाय हुआ फिर भी बचता रहा | प्रजनन की अदम्य प्रेरणा किसी न किसी प्रकार जीवन को संरक्षण देती रही | मानव सभ्यता की कहानी इतनी विस्मयकारक ,भयावह ,रोमांचक और जोखिम भरी है कि उसे केवल आंशिक रूप में ही सहस्त्रों वर्षों के शब्द वद्ध प्रयासों में विश्लेषित किया जा सका है | पर निरालेपन की आकांक्षा औरों से अलग होनें की दुर्दमनीय मनोवृत्ति व्यक्ति से उठकर समूह में होती हुयी विशिष्ट क्षेत्रों और राष्ट्रों तक अपनें परिष्कृत रूप में जा पहुंचीं | राष्ट्र की अवधारणा भी बहुत पुरानी नहीं है | मानव सभ्यता का काल भी ब्रम्हाण्ड की काल गणना में प्रकाशित उल्का की एक झलक ही तो है | इतिहासकार कहते हैं कि मानव ने समूह वद्ध होकर ही प्रकृति के अन्य चेतन प्राणियों से लड़कर अस्तित्व की लड़ाई जीती | फिर धीरे -धीरे सामूहिक आधार पर ही ग्राम ,गण और क्षेत्र राज्य बनें | आदिम जनतन्त्र का कैसा रूप रहा है इसका अनुमान मात्र ही मेधावी मष्तिष्कों के द्वारा लगाया गया है | विरोधी विचारों के पुष्ट -अपुष्ट कल्पनाओं नें और भूखण्डीय स्वार्थों ने अनेक छवि चित्र पेश किये हैं | जो सच्चायी पर सुनिश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता | पर अब इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे  दशक की समाप्ति के बाद जनतन्त्र के जिस वातावरण ने विश्व के सभ्य समाज का अधिकाँश जन समुदाय सांस ले रहा है वह व्यक्तित्व स्वतन्त्रता को सर्वाधिक मान्यता देकर उसे ही जनतन्त्र का चरम उत्कर्ष मान रहा है | दूसरे शब्दों में व्यक्ति का निरालापन आज उसकी सार्थकता का सबसे सार्थक प्रतीक है | व्यक्ति का यह निरालापन ही राष्ट्र के निरालेपन में परिवर्तित होकर राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बनता जा रहा है | उदाहरण के लिये टाटा ग्रुप ने अपनी छोटी सस्ती गाड़ी नैनों को राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़कर बाजार में पेश किया था | बिना बिजली के पानी शुद्ध करनें की तरकीब जिसे टाटा ने स्वच्छ के नाम से बाजार में पेश किया उसे भी हिन्दुस्तान की नयी खोजों के रूप में चर्चित -प्रशंसित किया गया | कुछ अन्य कार्पोरेट घरानें भी इसी प्रकार भारत की तकनीकी प्रतिभाओं को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय गौरव गाथा में अध्याय को जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं | भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए ० पी ० जे ० कलाम तो जहां कहीं भी अपना प्रेरणादायक सन्देश सुनानें जाते थे वहां इसी बात पर जोर देते थे कि भारत की प्रतिभा का निरालापन यदि सहारा पा जाय तो अपनी खोजों से विश्व को चमत्कृत कर सकता है | आखिर हमारी सबसे चमकीली प्रतिभायें आई ० आई ० टी ० में प्रवेश के लिये शायद इतना अधिक प्रयास इसीलिये करती हैं कि उनकी शिक्षा का स्वरूप प्रतिभा की अपार संम्भावनाओं को चमकानें में समर्थ है | आमिर खान की फिल्म थ्री इडीयट्स में भले ही नैसर्गिक प्रतिभा को शिक्षा से अलग कर स्वतन्त्र रूप से दर्शानें की कोशिश की गयी हो पर सत्य यही है कि प्रतिभा का सम्पूर्ण पल्लवन बिना उचित निर्देश और सहायक परिवेश के बिना संम्भव नहीं हो सकता | तकनीकी प्रतिभा ललित कलाओं की प्रतिभा से एक भिन्न प्रकार की मनोशक्ति होती है | प्रारंम्भिक सीढ़ियों को जानें बिना तकनीकी ऊंचाई पर पहुँच जाना लगभग असंम्भव सा ही होता है | शिक्षा के प्रारंम्भिक वर्षों में ही किशोरावस्था के प्रारंम्भ के साथ ही विद्यार्थी की क्षमता का आभाष होनें लगता है और यहीं से हम उसके निरालेपन का आभाष पानें लगते हैं | शायद यही कारण है कि भारत सरकार 14 वर्ष तक के सभी बालक बालिकाओं के लिये शिक्षा को अनिवार्य कर रही है | इतनी विशाल जनसंख्या में सहस्त्रों प्रतिभायें इस अनिवार्य शिक्षा के द्वारा प्रकाश में लायी जा सकती हैं | पर हर उत्कृष्ट विचारधारा का एक नकारात्मक पक्ष उस समय उभर कर आता है जब हम उसका विकृत रूप स्वीकार कर उसे अपनें स्वार्थ हित में प्रयोग करनें लगते हैं | उदाहरण के लिये धर्म का विकृत रूप ही घृणा फैलाकर न जानें कितनें नर संहार करवा चुका है | नेहरू जी ने डिस्कवरी आफ इण्डिया में ठीक ही लिखा है कि जब धर्म चिन्तन की ऊंचाइयों से लुढ़क कर मात्र निर्जीव रूढ़ियों में बंध जाता है तो वह कल्याणकारी न होकर किसी भी समाज को संड़ांध से भर देता है | आधुनिक विश्व का आतंकवाद धर्म के इसी विकृत रूप को पेश करता दिखायी पड़ रहा है |
                             जिस प्रकार धर्म का निरालापन जनूनी चोला ओढ़कर हिंसा का रक्तरंजित खेल खेलता है वैसे ही व्यक्ति का निरालापन जब अपनी सीमा से मर्यादा का बन्धन तोड़कर उच्छृंखल हो जाता है तो पागलपन में बदल जाता है | अधिकाँश तो मानसिक रोगी हो जाते हैं | पर कुछ ऐसे होते हैं जो अपनें मानसिक रोग को निरालापन बताकर अन्य मानसिक रोगियों को अपनें पीछे लगा लेते हैं और नये पैगम्बर होनें का दावा करते हैं | दुनिया के किसी भी देश में नये पैगम्बरों की कमी नहीं है | मुल्ला -मौलवियों की छोड़िये ,अमरीका में भी इनकी भरमार है और भारत का क्या कहना यहां तो हर गली ,मुहल्ले में कोई न कोई पैगम्बर बैठा है | फिर भी निरालापन यदि  सर्वथा समाप्त कर दिया जाय तो विश्व वैचित्र्य शून्य हो जायेगा | भिन्नता ही आकर्षण ,विकर्षण ,संश्लेषण और विश्लेषण को जन्म देती है | इसलिये निरालापन तो रहना  ही चाहिये | हर व्यक्ति औरों के सामान भी है और औरों से अलग भी | जैविक धरातल पर वह मानव है ,सामाजिक धरातल पर वह नागरिक है पर मानसिक धरातल पर वह एक व्यक्ति है | सामाजिक संप्रेषण ,समन्वयन और सहजीवन के लिये वह अपनें मानसिक निरालेपन को समझौते के द्वारा सामाजिक आचार संहिता से मर्यादित करता है | पर यह मर्यादायें यदि उसके लिये कटघरा बन जाती हैं तो वह इन्हें तोड़कर नयी मर्यादाओं की बात करता है | और यदि उसकी द्रष्टि सकारात्मक होती है तो कालान्तर में मर्यादायें अपना रूप बदल देती हैं | परिवार ,ग्राम्य ,राज्य और विश्व के सभी स्तर पर यह चलता रहता है | कुछ परिवर्तन चर्चित होते हैं पर अधिकाँश अचर्चित रहते हैं | प्रतिगामी शक्तियां इन परिवर्तनों से टकराती हैं ,कुछ समय के लिये विजयी दिखाई पड़ती हैं फिर सिर पटक कर लौट जाती हैं  इस प्रकार का सृजनात्मक निरालापन भौतिक सन्दर्भ में बढ़ावे की मांग करता है | | ऐसा न होने पर साम्यवादी व्यवस्था का बुलडोजर ही भिन्न -भिन्न रूप और नाम लेकर राजतन्त्र का अनिवार्य अंग बनता चला जाता है |
                                              भारत ने अत्यन्त प्राचीनकाल में आत्म तत्व की तलाश में इतनें अधिक प्रयोग किये थे कि उन प्रयोगों की बहुसंख्या ही हमें कई बार उनमें किये गये सार्थक प्रयोगों की ओर से दूर हटा देती है | परमशक्ति की उपलब्द्धि का यह प्रयास सच पूछो तो उत्कृष्टता का यानि औरों से अलग निरालेपन का एक नया सोपान खोज लेने का एक प्रयास ही था | ऐसा सत्य जान लेना जो शब्दों में वर्णित ही न किया जा सके ,ऐसी जीवन मिठास पा  लेना जो गूंगे का गुड़ हो एक प्रकार का व्यक्तिगत निरालापन ही था | आज के सन्दर्भ में हमें तकनीकी श्रेष्ठता का ,मौलिक वैज्ञानिक चिन्तन का वह निरालापन प्राप्त करना होगा जिसे न केवल शब्द वद्ध किया जा सके बल्कि व्यवहार के धरातल पर भारत की बहुसंख्यक जनता को सभ्य जीवन की सुविधायें देनें के लिये प्रयोग किया जा सके ,प्रतिभा के इस निरालेपन को पल्लवित करने के लिये 'माटी ' संकल्पित रही है और रहेगी | इतिहास करवट ले रहा है | पिछली कुछ शताब्दियां अमरीका और योरोप के साथ थीं | इक्कीसवीं सदी , क्या पता एशिया के नाम लिखी जाय | अर्थशास्त्रियों नें एक खोज के आधार पर यह सिद्ध किया है कि ईसा की प्रथम शताब्दी में भारत विश्व के पूरे जी ० डी ० पी ० का लगभग 33 प्रतिशत प्रोड्यूस कर रहा था ,चीन 26 प्रतिशत ,और पश्चिमी योरोप केवल 7 प्रतिशत | अतीत का हमारा वह गौरव लगभग दो हजार वर्षों तक धुंधला होता चला गया | बीच -बीच में उसमें थोड़ी बहुत चमक आयी | निराशा और पराजय की बदलियां उसे बार -बार आक्रान्त करती रहीं | प्रकाश की जो किरणें अब दिखायी पड़ रही हैं वे एक लम्बा स्थायित्व पा सकें ,यही ' माटी  ' की अभिलाषा है | हम आप सब को फिर से ,सम्पूर्ण मन प्राण से राष्ट्र के प्रति समर्पित होनें के लिये पुकारते हैं |

Saturday, 7 October 2017

                            कितनी बार ऐसा होता है कि हम भीड़ -भाड़ से हटकर एकान्त में बैठना चाहते हैं | तपस्वी ,साधु और गुफावासी ऋषि -मुनि एकान्त में रहकर ही परम सत्य की खोज करते हैं | अपनें -अपनें  मापदण्डों के अनुसार वे इस परम सत्य का साक्षात्कार भी कर लेते हैं | विश्व की हर सभ्यता में एक काल ऐसा रहा है जब अन्तिम सत्य पा जानें का दावा करने वाले खोजियों ने मनुष्य को संसार छोड़कर मुक्ति ,मोक्ष या अन्तिम सत्य की तलाश में लग जानें के लिये प्रेरित और प्रोत्साहित किया | एकान्त वास कर सत्य अन्वेषण की इस पुकार को मिथ्या कहकर नकार देना अनुचित ही होगा | पर इस सत्य को भी  हमें स्वीकार करना ही होगा  कि मानव सभ्यता के लगभग सभी टिकाऊ मूल्य जो सभ्यता के आधार स्तंम्भ बने हैं सामूहिक जीवन से ही प्राप्त हुये हैं | एकान्त वासियों के लिये भी सामाजिक सम्पर्क की आवश्यकता उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना मनन चिन्तन के लिये एकान्त की | सुदूर अतीत में शायद कभी ऐसा रहा हो जब अकेला व्यक्ति अपनें भरण -पोषण के लिये प्रकृति संसाधन एकत्रित कर लेता हो | पर बिना हमजोलियों के सहवास के उसे जीवन निरर्थक ही लगता होगा | विगत के सन्दर्भ आज उतनें सटीक नहीं हैं और अब हम एकान्तवास की कल्पना अपनें जीवन के उन प्राइवेट क्षणों से जोड़ सकते हैं जब हम दिन के चौबीस घण्टों में अपनें निजी आवासों पर होते हैं | पारिवारिक जीवन भी विशाल मानव समुदाय से अलग हटकर एक प्रकार का एकान्तवास ही है | जो हमें जीवन के बड़े सत्यों की तलाश में प्रवृत्त करता है | समाजशास्त्री आज एक मत से यह सिद्धान्त स्वीकार कर चुके हैं कि सामूहिक जीवन में ही मानव विकास की अजेय विजय यात्रा का सूत्रपात किया था और आज भी मानव समाज की सामाजिक भावना ही हमें विकास के अगले दौर में पहुंचा सकेगी | व्यक्ति परिवार का भाग होता है , परिवार ग्राम का , ग्राम कबीले का , कबीला क्षेत्र का , क्षेत्र छोटे या बड़े राष्ट्र का और राष्ट्र छोटे -बड़े भूखण्ड का तथा भूखण्डों की इकाइयाँ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का | चेतना की ये सामूहिक ऊँचाइयाँ मानव विकास के सोपानों को चिन्हित करती हैं | हममें से अभी भी कुछ कबीले , कुछ क्षेत्र या भूखण्ड अन्तर्राष्ट्रीय मानव समुदाय का एक सहज अंग नहीं बन सके हैं क्योंकि उनका चिन्तन विकास की पूरी गति नहीं प्राप्त कर सका है | सच तो यह है कि जो व्यक्ति जितना बड़ा होता है उसका चिन्तन भी उतना ही बड़ा होता है | इस बड़े चिन्तन के लिये आधुनिक या अत्याधुनिक होना ही आवश्यक नहीं है | ऐसा चिन्तन कम से कम भारतीय संस्कृति के प्रभात में भी देखा जा सकता है |  अंग्रेजी भाषा के प्रसिद्ध कवि John Donne  नें सत्रहवीं शताब्दी में ही कहा था ' यह मत पूछने जाओ कि चर्च का घण्टा बजकर किसकी मृत्यु की सूचना दे रहा है | यह तुम्हारी अपनी मृत्यु की सूचना है क्योंकि तुम मानव जाति का एक अविभाज्य अंग हो |'आज विश्व का लगभग सभी शिक्षित जन समुदाय इस सत्य को स्वीकार कर चुका है कि भौगोलिक ,क्षेत्रीय या राष्ट्रीय सीमायें मात्र प्रबन्धन पटुता के लिये बनायी गयीं हैं उन्हें मानव जाति को विभाजित करने के लिये इस्तेमाल नहीं करना चाहिये | अब किसी भी राष्ट्र के हित उसके पड़ोसी राष्ट्रों के  साथ तो मिले -जुले हैं हीं पर साथ ही उन हितों का संम्बन्ध समस्त मानव जाति के विकास से भी है | ब्रिटेन के प्रधान मन्त्री मैकमिलन ने साउथ अफ्रीका के अपनें दौरे के दरमियान जब  यह बात कही थी कि रंग भेद एकाध दशक में इतिहास के कूड़े -कचरे में फेंक देनें वाली नीति के रूप में जाना जायेगा तब साउथ अफ्रीका के श्वेत नेताओं ने उनकी तीखी आलोचना की थी | पर प्रधानमन्त्री मैकमिलन नें जिस दूर द्रष्टि का परिचय दिया था वह आज इतिहास का अमर सत्य है | यदि कोई शिक्षित आधुनिक युवक चाहे वह किसी भी देश का हो आज यह मानता है कि रंग भेद के कारण या जाति भेद के कारण वह जन्म से ही अन्य व्यक्तियों से श्रेष्ठ है तो उसे एक मानसिक रोगी ही करार दिया जायेगा | विज्ञान ,कला साहित्य ,खेल ,शौर्य ,राजनीति ,अन्तरिक्ष अनुसन्धान और सत्य धर्म की खोज कोई भी तो ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमें हर रंग ,हर जाति , और हर नस्ल के श्रेष्ठ लोगों ने अपनी पहचान न बनायी हो | राजनीति के सत्ता गलियारों में आज उन विदेश मन्त्रियों को सच्चे राष्ट्रीय सेवकों के रूप में लिया जाता है जो अपनी कुशल दूरगामी द्रष्टि के द्वारा विश्व जनमत को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं | सच तो यह है कि अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों से जुड़े रहनें वाले प्रबुद्ध मनीषी प्रशासन को विशालता का एक नया आयाम देनें में समर्थ होते हैं | भारत की मध्ययुगीन सभ्यता में कुछ समय ऐसा था जब शारीरिक श्रम की महत्ता को पूरे गौरव के साथ स्वीकार नहीं किया गया | हिन्दी भाषा के कुछ शब्द जो कर्म वाचक संज्ञाओं या विशेषणों के रूप में प्रयोग होते थे अपना महत्व खोकर हीन भाव के प्रतीक बन गये | भाषा के विचारकों को इन शब्दों को नयी प्रांजलता देकर फिर से सार्थक ऊँचाइयों पर पहुचानें का प्रयास करना चाहिये | जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के शोधार्थियों नें कुछ आवश्यक काम किया है | 'माटी ' इस दिशा में किये जा रहे प्रयत्नों की तलाश में है और भाषा शास्त्रियों से सम्पर्क साधे हुये है | सार्थक सामाजिक श्रम से जुड़े कुछ समुदाय स्वयं भी इस दिशा में प्रयत्नशील हैं | उनके प्रयत्नों को एक वैज्ञानिक आधार देनें की आवश्यकता है | गहरी सूझ -बूझ वाले माटी के पाठक इस बात से भली भांति परिचित होंगें कि हम अपने लेखों और रचनाओं में विश्व के जानें -मानें विचारकों की बातें उद्धत करते रहते हैं | ऐसा इसलिये है कि हम यह बताना चाहते हैं कि अपनें सर्वोत्कर्ष रूप में प्रतिभा किसी देश काल में न बंधकर सम्पूर्ण मानव जाति को सम्बोधित करती है | 'माटी ' कई बार अपनी रचनाओं में ऐसे शब्द समूहों को भी निखारती रहती है जो अर्थ संकुचन के कारण व्यापक स्तर पर प्रयोग नहीं किये जाते | ग्राम सभ्यता से जुड़े कई शब्द कल तक भले ही ऊँचें कद के योग्य न मानें गये हों पर आज तो उन्हें पूरे आदर के साथ स्वीकारना होगा | हलवाहा यदि हलधर होकर अपनें पौराणिक प्रसंगों के कारण गरिमा मण्डित हो जाता है या पापी यदि तन्तुवाय के रूप में सार्थक बनता है तो हमें इन शब्दों का संस्कारीकरण करना होगा | ये मात्र सुझाव की एक द्रष्टि है | इस दिशा में भाषाविदों द्वारा कई अधिक सार्थक प्रयोग किये जा सकते हैं | 

Friday, 6 October 2017

                       विज्ञान और टेक्नालॉजी अपनें में विकास की अपार संम्भावनायें छिपाये है | पिछले डेढ़ -दो दशक में संसार नें जितना परिवर्तन देखा है उतना पिछली कई शताब्दियों में भी संम्भव नहीं हो पाया था | जब औद्योगिक क्रान्ति अपनें चरम पर पहुँच चुकी थी तब ऐसा लग रहा था कि मध्य युगीन व्यवस्था बहुत कुछ आदिम सभ्यता का ही प्रतिरूप है | पर आज सूचना प्रद्योगकीय ,कम्प्यूटरीकरण और अन्तरिक्ष प्रसार पद्धतियों में औद्योगिक क्रान्ति को आदिम सभ्यता के विकास के एक छोटी मन्जिल के रूप में ही प्रस्तुत करना प्रारम्भ कर दिया है | बहुविध्य पाठकों को यह बतानें की आवश्यकता ' माटी ' नहीं समझती कि आनें वाले वर्षों में कागज़ का प्रयोग नाम -मात्र का  ही रह जायेगा | इलेक्ट्रानिक मीडिया ही विश्व सम्पर्क का सबसे सशक्त प्रचार साधन बनकर उभर चुका है | पर कागज़ पर लिखे शब्द हों या स्वचालित पर्दे पर उभरे ट्वीट -ब्लॉग ,ट्वीटर या प्रशासनिक प्रचार तथा सांख्यकीय गणनायें , सबमें शब्द और अंक के महत्व को पूरी महत्ता के साथ स्वीकार ही करना पड़ेगा | चिन्तन का मूर्त रूप शब्द या सांकेतिक शब्द चिन्हों के द्वारा ही संभ्भव है | और इस लिये सम्प्रेषण का प्रकार बदल जानें पर भी सम्प्रेषण की अनिवार्यता या महत्ता कभी कम नहीं हो सकती | गहन चिन्तन और गहन भावानुभूति के सम्राटों को तकनीकी नवीनतायें कुछ देर के लिये भ्रमित भले ही कर दें पर उनके पास जो अक्षय कोष है उसकी भागीदारी के बिना मानवता के उज्वल भविष्य की कल्पना ही नहीं की जा सकती | विज्ञान ने भी इधर हाल  ही में अत्यन्त गहरे दार्शनिक प्रश्नों के कुछ विज्ञान सम्मत उत्तर प्रस्तुत किये हैं | दर्शन का सबसे पहला मूल प्रश्न है जीवन के आविर्भाव की गुत्थी को सुलझाना | अंग्रेजी में बहुधा फिलासफी के विद्यार्थियों से प्रश्न पूछा जाता है कि पहले अण्डा या मुर्गी | | अब यदि मुर्गी नहीं थी तो अण्डा कहाँ से आया ? और यदि अण्डा नहीं था तो मुर्गी कहाँ से आयी ? और यदि कुछ नहीं था तो न कुछ में से कुछ कैसे पैदा हो गया ? महर्षि भारद्वाज से लेकर यूनान के अफलातून तक और ब्रिटेन के बर्टेन्ड रसल से लेकर भारत के राधाकृष्णन तक सभी ने इन प्रश्नों के अपनें -अपनें उत्तर प्रस्तुत किये हैं | ब्रिटेन में कुछ समय पहले अत्यन्त उच्चस्तरीय प्रयोगशाला परीक्षणों में यह पाया गया  है  कि मुर्गी के अण्डे के ऊपर जो कड़ा छिलका होता है वह जिस प्रोटीन से बनता है वह प्रोटीन केवल एक मुर्गी के भीतर ही बन सकता है | इस प्रोटीन का वैज्ञानिक नाम Ovocleidin-17 है और यह प्रोटीन ही मुर्गी के अण्डे के ऊपर एक कड़ा खोल बना सकती है | अब अगर यह प्रोटीन मुर्गी के भीतर ही बनता है तो स्पष्ट है कि मुर्गी को पहले होना चाहिये और अण्डे को बाद में , बात अगर यहीं तक रहती तो शायद समस्या का हल हो गया होता ,पर फिर प्रश्न उठता है कि यदि अण्डा नहीं था तो मुर्गी कहाँ से आयी ? समस्या हल भी हो गयी और हल में से समस्या फिर उठ खड़ी हुयी | विकासवादी वैज्ञानिक यह कहते हैं कि शायद प्रोटीन Ovocleidin-17 अपनें गैर ठोस या तरल रूप में धरती के वातावरण में कहीं फ़ैली हुयी थी और उसी ने सबसे पहले कुछ अज्ञात कारणों से अण्डे का रूप लिया होगा | अब समस्या खड़ी होती है उन अज्ञात कारणों के निरूपण की | ढाक के वही तीन पात ,फिर जहां के तहाँ अब विज्ञान के शोधार्थी और आगे बढ़ते हैं वे कहते हैं कि हर अण्डा एक प्रकार का नहीं होता | अण्डों का बनना मुर्गी के अण्डों के बननें से बहुत पहले शुरू हो चुका था | अलग -अलग पक्षी अलग -अलग किस्म की प्रोटीन से अपनें अण्डे बनाते हैं | दरअसल समस्या पक्षी जगत से बहुत पीछे हमें उस काल में ले जाती है जब डायनासोर धरती के अधिकाँश भागों में फैले थे | यह सरीसृपों का ज़माना था और वे भी अण्डों के द्वारा ही मृत्यु की अमिट विभीषका को मिटाकर नयी श्रष्टि को जन्म देते थे | पक्षी जगत तो इन्हीं सरीसृपों से विकसित होकर लाखों वर्ष बाद अस्तित्व में आया | अण्डे बनानें वाली प्रोटीन की कई किस्में पहले से ही श्रष्टि की अदभुत प्रयोगशाला में उपस्थित थी और बाद में इन्हीं प्रोटीनों में से Ovocleidin-17 एक नया रूप लेकर अस्तित्व में आयी | यह विकासवादी वैज्ञानिक कहते हैं कि मुर्गी और अण्डे वाला प्रश्न वैज्ञानिक सन्दर्भों में अधिक सार्थक नहीं लगता | न तो अण्डा पहले था न मुर्गी | इनसे बहुत पहले थे सरीसृपों के नाना रूप और आकार | दैत्याकार ,मध्यम  , लघु ,तथा द्रश्य और अद्रश्य | अनगिनत जीवकणों की अप्रतिहत अविरल अनन्त कोटि धारा प्रवाह के अस्तित्व को ही वैज्ञानिक उत्तर के रूप में ही स्वीकारना चाहिये | वैज्ञानिक शोधकर्ताओं के लिये और विकासवादी पण्डितों के लिये यह विस्मयकारी वैज्ञानिक उत्तर प्रणाली भले ही शोध सन्तोष प्रदान कर दे पर हम सामान्य जनों के लिये तो यह प्रश्न अबूझा ही खड़ा है | कौन पहले था अण्डा या मुर्गी ? गहरायी से इस प्रश्न पर झाँक कर देखें तो इसमें वेदान्त का सबसे गूढ़ प्रश्न छिपा हुआ है | जीवात्मा और जीवात्मा को परिवेष्ठित करनें वाला कलेवर इन दोनों में से प्राथमिक कौन है | सबसे पहले दैव है या पदार्थ और क्या दैव और  पदार्थ अनन्य रूप से जुड़े तो नहीं हैं | ' माटी  ' का संपादक तो माटी में ही मानव जीवन की अनन्य संम्भावनायें तलाशनें में लगा है और ' माटी  ' को ही ब्रम्ह का प्रतीक मान कर उसकी पूजा अर्चना की आराधना करता है | ज्ञान -विज्ञान , धर्म -धारणा , स्पन्दन और स्तंम्भन ,शुक और शायिका सभी में उसे मृत्तिका में घुले -मिले परमतत्व के दर्शन होते हैं | ऊर्ध्वगामी अंकुरों को मेरा नमस्कार समर्पित है | 
                                                                 ताऊ की पराजय

             ताऊ मुरलीधर और ताई रुक्मणी देवी की भी अपनी तरह की जिन्दगी जीनें की एक निराली कहानी है | अस्सी वर्ष के मुरलीधर जी 20 वर्ष पहले बिजली महकमें से एस ० डी  ० ओ ० के पद से सेवानिवृत्त हुये थे | ताई रुक्मणी भी इनसे 2 -3  वर्ष छोटी रही होंगीं  और अब कमर झुक जानें पर भी घर  के काम -काज में कुछ न कुछ करने के बिना चैन से नहीं बैठ पातीं | दरअसल उनके चारो बच्चे अब शादी के बाद अपने भरे -पुरे परिवारों को लेकर देश के अलग -अलग शहरों में अच्छे कामों में लगे हुये हैं | ताऊ और ताई अपने पुराने मकान में उल्टा -सीधा जीवन -यापन कर रहे हैं | घर के काम -काज में थोड़ी -बहुत मदद काम करने वालियों के द्वारा मिल जाती है | ताऊ को अच्छी -खासी पेन्शन मिलती है और कोई आर्थिक परेशानी नहीं है | पर हाँ गाँठ के जोड़ों का दर्द उन्हें बहुत तंग करता है खासकर भद्दर सर्दी के दिनों में आस -पास के पड़ोसी रोज सलाह देते हैं कि वे दोनों अपनें किसी बच्चे के पास चले जांय
 अब बहुत बूढ़े हो गये हैं | ताऊ और ताई सुनी -अनसुनी कर देते हैं | हो सकता है वे अपनी आजाद जिन्दगी के इतनें आदी हो गये हों कि बुढ़ापे की मजबूरी के बावजूद उन्हें अपनी आजादी खोना अच्छा नहीं लगता यह भी हो सकता है कि उन्होंने मन में यह ठान लिया हो कि अब वहीं जायेंगें जहां से फिर कभी लौटकर आना न पड़े | जो हो ताऊ और ताई की जोड़ी अपनें घोर बुढ़ापे में भी कभी लड़ती -झगड़ती दिखायी नहीं पड़ती | ताई घर के काम -काज के बाद सारा दिन दरवाजे पर मचिया डाले बैठी रहती है | दरवाजों की बात इसलिये कही गयी है कि उनके घर में अगले और  पिछले दो दरवाजे हैं | ताई कभी अगले दरवाजे पर बैठी दिखायीपड़ेगी तो कभी पिछले दरवाजे पर | दोनों तरफ सड़कें हैं | सड़क से  गुजरनें वाली हर स्त्री से ताई की राम -राम होती रहती है और सुख -दुःख ,सब्जी का भाव , और मंहगाई का रोना -धोना चलता रहता है | ताऊ ऊपर की छत पर या गैलरी में चक्कर लगाते रहते हैं | थक गये तो अखबार के पन्ने पलट लिये | बड़ी हिम्मत की तो बिजली या टेलीफोन का बिल देने दफ्तरों तक चले जाते हैं | पर अब पिछले कुछ दिनों से ताऊ और ताई में कुछ खटपट सुनायी पड़ने लगी है | बात मामूली सी है पर बात के मामूलीपन में भी पुरुष और नारी के व्यक्तित्व की टकराहट सुनायी पड़ने लगी है |
                                आप सब जानते हैं कि इन दिनों हिन्दुस्तान में जिन तीन चीजों पर सबसे अधिक चर्चा होती है वे हैं क्रिकेट ,फिल्म और चुनावी राजनीति | अब ताऊ मुरलीधर और ताई रुक्मणी को तो फिल्म देखे ज़माना बीत गया  सो इस विषय में कोई झगड़े का सवाल ही नहीं ,चुनावी राजनीति से ताऊ जी को कोई प्रयोजन नहीं क्योंकि उनकी पेन्शन तो चलनी ही है | वे सिर्फ चाहते हैं कि कोई ऐसी सरकार आ जाये जो उनसे हर साल जिन्दा रहनें का सार्टिफिकेट न मांगें | जब मर जायेंगें तब ताई को सार्टिफिकेट  देनी ही होगी | अब रह गयी क्रिकेट की बात तो इस पर भी ताऊ को कोई विशेषज्ञ होनें का दंम्भ नहीं है | हाँ उन्हें कभी -कभी ऐसा जरूर लगता है कि उनका सौभाग्य है कि उनके देश में महात्मा गांधी जैसा महापुरुष पैदा हुआ था और अब अखबार वाले किसी महाशतक मारने वाले सचिन तेन्दुलकर को हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा सपूत मानते हैं | पर ताऊ और ताई की सोच से तो दुनिया नहीं चलती | इम्तिहान के बाद अप्रैल के महीनें में स्कूल बंद और निट्ठल्ले बच्चों को क्रिकेट खेलनें के लिये खुली जगह की जरूरत | अब गली -कूंचों के सभी बच्चे क्रिकेट स्टेडियम में तो जाकर खेल नहीं सकते | उन्हें तो घर के आस -पास की सड़कों पर ईंटें लगाकर बैट  और बल्ला खेलनें का नशा चढ़ता है | क्रिकेट मैचों का तो यह हाल है कि टी ० वी ० पर कोई न कोई मैच चलता ही रहता है और कमेन्ट्री करने वाले चौके और छक्के पर इतनी जोर चिल्लाते हैं कि अर्ध -बहरों का भी दिमाग बौखला जाये | अब स्कूली बच्चे ऐसी कमेन्ट्री सुनकर जोश से भर जाते हैं और सड़कों पर चौका और छक्का लगानें लगते हैं | ताई रुक्मणी देवी के अगले दरवाजे पर भी तीस फुटा सड़क है और पिछले दरवाजे पर भी इसी प्रकार की सीधी सड़क , जब आगे की सड़क पर बच्चों की धमा -चौकड़ी चलती है तो वे दरवाजा बन्द कर पिछले दरवाजे पर जाकर बैठती हैं | पर हिन्दुस्तान में खासकर निम्न -मध्यवर्ग में और सभी चीजों का अभाव है पर बच्चों का अभाव नहीं है | जब स्कूल बन्द हों तो फिर कोई सड़क क्रिकेट खेलनें का सुअवसर क्यों न पायें | अब ताई की दोनों ओर की सड़कों पर चौके और छक्के लगने लगे हैं और शोरगुल्ल और भागदौड़ में कामकाज के लिये निकलती घर की स्त्रियों के लिये भी बाधा पहुंचने लगी है | ताई का मूड खराब हो जाता है | पर क्या करें बच्चे मानते ही नहीं और कुछ शरारती बच्चे तो यह तक कहते सुनें जाते हैं कि बुढ़िया की बक -बक से हम सहवाग और विराट कोहली बनने से कैसे रह जांयें ? हमें तो चौका और छक्का मारना ही है | ज्यादा शोरगुल होनें पर ताई दोनों ओर के दरवाजे बन्द कर अन्दर कमरे में लेट जाती हैं | अप्रैल की तेज धूप अन्दर कमरे में कुछ असहनीय बन जाती है | दोनों तरफ की सड़कों से आने वाला हल्ला -गुल्ला उन्हें कुछ गुस्सा जरूर देता है | आस -पास पड़ोस के बच्चे सड़कों पर अपना हक़ तो रखते ही हैं | जब तक सड़क पर गेंद की दौड़ लगती रही तब तक बच्चे ताई की परवाह नहीं करते रहे पर जब उदीयमान महान बल्लेबाजों ने चौके और छक्के दागने शुरू किये तब बच्चों को ताई की ताकत का अन्दाजा होनें लगा | अब कट लगाकर बगल में उछाला गया गेन्द चहारदीवारी के अन्दर आ गया | पहले एक दो दिन  ऊपर छज्जे में बैठे ताऊ ने बच्चों को दरवाजा खोलकर गेन्द उठा ले जानें दिया पर जब आगे और पीछे से भी गेंदों के चहरदीवारी प्रवेश के आक्रमण शुरू हुये तो वे तंग आकर अपने कमरे में लेट गये | अब जब बच्चों ने बिना आज्ञां पाये दरवाजा खोलकर चहरदीवारी के अन्दर आकर गेंद उठाने की कोशिश की तो उन्हें ताई की ताकत का अन्दाज लगा | ताई रुक्मणी बन्द दरवाजे के पीछे कुर्सी डालकर अपना बेंत लेकर बैठ गयीं | पीछे के दरवाजे पर उन्होंने ताला लगा दिया | कुछ लड़के दरवाजे से ऊपर झांककर ताई से गेंद देनें की बात करने लगे तो उन्होंने चिल्लाकर कहा कि अपनें दादा -दादी को बुला लावें | वे किसी की नौकर नहीं हैं अपने घरों में खेल खेलें या स्कूल के मैंदानों में जांये | हिन्दुस्तान की सरकार इतना पैसा स्कूलों पर खर्च कर रही है और सभी स्कूलों में खेल के मैदान बनाये गये हैं फिर सड़कों पर धमा -चौकड़ी मचाने का क्या मतलब | बहुत कहनें -सुननें पर एक -दो बार ताई ने बच्चों को अन्दर बुलाकर गेंद उठवा देनें दिया | ऐसा इसलिये हुआ कि ताऊ मुरलीधर ने ऊपर से बच्चों की सिफारिश की और ताई को अपना हठ छोड़ना पड़ा | पर ताई रुक्मणी देवी भी हिन्दी का अखबार पढ़ लेती थीं और उन्हें पता था कि आज के आजाद भारत में पति और पत्नी को बराबर का अधिकार है और पति की हर बात को मान लेनें की मजबूरी नहीं है | उन्होनें मन ही मन तय  किया कि इन उपद्रवी बच्चों को ठीक करनें का कोई उपाय निकालना ही होगा | दो बच्चे जिनमें एक का नाम पोंटा और दूसरे का नाम टप्पू था ताई को कतई भाते ही नहीं थे | ऐसा इसलिये था कि उन दोनों को उन्होंने यह कहते सुना था कि घड़ी की टक -टक और बुढ़िया की बक -बक तो चलती ही रहती है | पर सवाल था कि ताऊ मुरलीधर भी बच्चों का पक्ष ले रहे थे तो कोई कारगर उपाय सोचा जाय | और फिर इतवार की उस सुबह करीब नौ बजे दिन में वह  मौक़ा हाँथ में लग गया | नाश्ता करने के बाद वह पीछे मचिया पर अखबार हाँथ में लिये ममता बनर्जी का फोटो देख रही थीं | मन ही मन खुश हो रही थीं कि ममता जी ने दिनेश त्रिवेदी को सीधा कर दिया | इसी समय चहरदीवारी को फांदता हुआ एक गेंद उनके पैरों के पास आ गिरा | खुदा का शुक्र था कि वह गेंद उनके पैरों के पास गिरा ,सिर पर नहीं पर शरीर तो एक ही है | पैरों के पास गिरा गेंद सिर पर भी तो गिर सकता था | बच्चे दरवाजे पर खट -खट  करने लगे | ऊपर से ताऊ ने देखकर पूछा क्या है ? बच्चों ने अन्दर गेंद आने की बात कही | सबसे आगे पोंटा और टप्पू खड़े थे | ताऊ ने ताई से कहा कि वे दरवाजा खोलकर बच्चों को गेंद उठा लेनें दें , ताई बिगड़ गयीं बोलीं मेरे सिर में गेंद लगा है | गुलमां पड़ गया है | कितना दर्द हो रहा है | आज गेंद कतई नहीं दूंगीं | हमें अपनें घर में भी अपनी मर्जी से जीने का हक़ नहीं है | ताऊ ने बच्चों के प्रति कुछ सहानुभूति दिखाने की बात कही | तो ताई बिगड़ गयीं कि एक तुम्हीं हो जो दुनिया भर में सहानुभूति दिखाया करते हो मैं क्या बच्चों की मां नहीं हूँ | बच्चे जब बच्चों जैसा व्यवहार करते हैं तभी उन्हें प्यार किया जाता है | पोंटा ,टप्पू की मण्डली तो शैतान मण्डली है इनसे तो भगवान ही बचायें | अब ताऊ क्या करते , हार मानकर ऊपर अपने कमरे में जा बैठे | बच्चों का आख़िरी दांव भी खाली चला गया | ताऊ की सिफारिश नहीं चली | बच्चों ने अब एक नयी तरकीब सोची | एक गेंद गया तो गया ,एक दूसरा नया गेंद लाया जाय | पोंटा कहीं से एक नया गेंद उड़ा लाया था | वह उसे ले आया और फिर चौके -छक्के शुरू हो गये | पर नये गेंद की जवानी घिसे -पिटे गेंद के बुढ़ापे से ज्यादा मनचली थी और लगभग 10 मिनट बाद बाल के एक कट ने उसे ऐसी उछाल दी कि चहरदीवारी फांद कर ताई के पैर छूने लगा | अब यह ब्रम्हास्त्र भी खाली चला गया | | पूरी क्रिकेट मण्डली पर उदासी की चादर दौड़ गयी, ऊपर से ताऊ ने झांककर देखा पर हिम्मत नहीं हुयी कि ताई से कुछ कहें | 8 -10  बच्चे दरवाजे के पास सिर झुकाये खड़े थे | ठीक इसी समय सड़क पर से ताई की हम उम्र सहेली रामप्यारी अपने छह -सात साल के पोते को अपने साथ लिये हुये ताई से मिलने के लिये दरवाजे पर आ गयी | दरअसल रामप्यारी इसी मुहल्ले में पांच -सात घरों के बाद रहती थीं | वे  अक्सर अपनी बहुओं का दुखड़ा रोनें के लिये ताई के पास आ जाया करती थीं | ताई की अपनी बहुयें उनसे दूर रह रहीं थीं पर वे जानती थीं कि सभी जगह बहुओं के दुखड़ों की कहानी मिलती -जुलती रहती है |
                                 दरवाजे पर सिर झुकाये चुप -चाप बच्चों को देखकर रामप्यारी ने कारण जानना चाहा | बच्चों ने फुस-फुसकर  करके सारी बात बतायी | पोंटा और टप्पू रामप्यारी को ताई कहते थे और उनके पैर छूते थे | रामप्यारी जान गयी कि पोंटा और टप्पू की शरारत ने रुक्मणी बहन को नाराज कर दिया है वरना उनका दिल तो चन्दन की तरह साफ़ और पवित्र है | वह तो सभी बच्चों को प्यार करती हैं | पर क्या किया जाये | कई बार मातायें और दादियां अपनें निजी बच्चों की शरारत से भी तंग आ जाती हैं | रामप्यारी ने चुपके पोंटा और टप्पू को कुछ समझाया और कहा जब वह दरवाजा खट -ख़ट  करके खुलवायेंगीं तो वे दोनों वैसा ही करें जैसा कि उसने कहा है | और हुआ भी ऐसा ही | रामप्यारी ने जब ख़ट -ख़ट  की तो रुक्मणी ताई ने जानना चाहा कि कौन है ? दीदी मैं हूँ रामप्यारी | रुक्मणी ताई ने उठकर दरवाजा खोला | रामप्यारी अन्दर आयीं और उनके पीछे -पीछे पोंटा और टप्पू ,वे दोनों रुक्मणी ताई के पैरों पर लेट गये ,बोले ताई हमें माफ़ कर दो | हमसे गल्ती हो गयी | हमारी अम्मा और बड़ी अम्मा ने आपकी इतनी तारीफ़ की कि हमें अपनी गल्ती का अन्दाजा हो गया है | हम सब आपके पोते हैं ,अब हम कभी यहां क्रिकेट नहीं खेलेंगें | सामनें जहां यह कूड़ा पड़ता है ,वहां खेल का जुगाड़ करेंगें |
                            न जानें क्या जादू हो गया ताई रुक्मणी ने उन दोनों के सिर पर प्यार का हाँथ फेरा ,बोली लो -लो अपनी दोनों गेंदें ले जाओ | क्यों नहीं खेलोगे यहां ? अपने बच्चे अपनी सड़क पर नहीं खेलेंगें तो कहाँ खेलेंगें ? रामप्यारी ने ताई रुक्मणी को जिन्हें वे अपनी बड़ी बहन  मानती थीं ,पैरों में हाँथ लगाकर आदर दिया | बोलीं दिल हो तो ऐसा हो | तभी तो सारे मुहल्ले में रुक्मणी ताई की वाहवाही होती रहती है | ऊपर के छज्जे से ताऊ मुरलीधर नें झाँक कर देखा | ताई रुक्मणी ने उनकी तरफ विजय भरी द्रष्टि डाली | ताऊ को पहली बार अपनी पराजय में भी विजय का आभाष मिला |