Thursday, 18 January 2018

गतांक से आगे

                                                         कितनें अवसरों पर कितनें मंचों पर और कितनें वैविध्यपूर्ण कार्य क्षेत्रों में मुझे सहभागिता का सुअवसर मिल पाया है इसकी आधी अधूरी खोज बीन भी मुझे कुछ चौंकाने वाले स्थलों की ओर ले जाती है | सोचनें लगता हूँ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं दंम्भ की पगडण्डियों पर मिथ्या का अनुसरण कर रहा हूँ | फिर भी मुझे ऐसा लगता है कि मिथ्या में भी शायद कोई समकालीन सभ्यता का भाव होता है तभी तो न जानें कितनी मिथ्यायें काल परिवर्तन के साथ मिथक बनकर जन मानस में अपना स्थान बना लेती हैं | इस धरित्री पर कब और कैसे जीवन का आविर्भाव हुआ और उसके अचल और सचल स्वरूपों में प्राणद ऊर्जा का निरन्तर गतिमान प्रवाहमयता कहाँ से आयी इन सब प्रश्नों का सम्पूर्णतः आश्वस्त करने वाला उत्तर मुझे आज तक नहीं मिल पाया है | और यदि मैं भूल नहीं करता तो शायद विश्व का कोई भी मनीषी शत -प्रतिशत निश्चयात्मकता के साथ जीवन -मरण की पहेली को सुलझा नहीं पाया है | दार्शनिकों की राष्ट्र भाषायें होनें में न होनें का तत्व छिपायें हैं और न होनें में सनातनता की चेतना धार की तलाश करती है | न जानें कितनी बार मुझे दिव्य सन्त महात्माओं की चमत्कार भरी शक्तियों के बारे में पढ़ने और सुननें को मिला है और जिन पारम्परिक परिवारों में हम पले बढ़े हैं उनमें अधिकाँश माताओं ,बहिनों का जीवन चक्र अधिकतर सन्त महात्माओं और बाबाओं के इन चमत्कारी शक्तियों के केन्द्रीय वृत्त में बंधकर ही घूमता रहता है | भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहर लाल जी संम्भवतः एक ऐसे धार्मिक महामानव थे जिन्होनें कहीं भी धर्म का वाह्य प्रदर्शन नहीं किया पर उसे अपनें आचरण में जीवन भर लक्षित करते रहे | धर्म निरपेक्षता अपनें सच्चे अर्थों में उनमें आध्यात्मिकता की उस गहरायी को झलकाती थी जो प्लेटो से लेकर कबीर , विवेकानन्द और मार्टिन लूथर तक पहुँचती है | चमत्कारों के प्रति मैं सदैव से शंकालु रहा हूँ पर सन्तत्व की आचरण पवित्रता के समक्ष मैं सदैव ही नत -मस्तक होता रहा हूँ |
                            तो पुरुन्दर के उस एक मास के प्रशिक्षण के बाद वापसी से पहले पहाड़ी की चोटी पर विशाल चट्टानों में कटी शिव नन्दी की जीवन दीप्ति उजागर करने वाली मूर्ति को प्रणाम करनें का अन्तिम सुअवसर का लाभ उठाया | मैं जानता था कि शताधिक आफीसरों में संम्भवतः मैं अपनें प्रशिक्षकों की द्रष्टि में योग्यता के शीर्षतम स्थान के आस -पास रखा गया हूँगा | कमाण्डेन्ट नें मेरे लिये पूना तक पहुंचाने के लिये एक स्पेशल जीप की व्यवस्था करके इस बात का आभाष दे दिया था कि वे मेरे लिये अपनें हृदय में गहरे लगाव और मानवीय सम्मान का भाव रखते हैं | पूना से बम्बई पहुंचकर मुझे दिल्ली के लिये एक फर्स्ट क्लास कूपे में आरक्षण मिला था | काफी पहले की बात है और जहां तक मैं समझता हूँ उस समय तक एयर कन्डीशन्ड यात्रा की सुनिश्चित व्यवस्था भारतीय रेल नहीं कर पायी थी | प्रथम श्रेणीं का आरक्षण ही उच्चतम सुविधा मानी जाती थी | ' माटी ' के पर्यटन विशेषज्ञ पाठक यह जानते ही हैं कि कूपे में चार सीटें होती हैं | दो नीचे और दो ऊपर | इस कूपे की तीन सीटें पहले से ही आरक्षित थीं और  बाकी एक सीट मेरे आरक्षण के हिस्से में आ गयी थी | हुआ ऐसा कि जो सीट मेरे  हिस्से में आयी थी वो नीचे की थी और शायद आरक्षण करानें के लिये भेजे गये सूबेदार साहब की अतिरिक्त पैरवी के कारण ऐसा हो सका था | बम्बई में स्टेशन पर खड़ी ट्रेन के कूपे में आरक्षित अपनी सीट में बैठकर मैं जूते खोलकर लेटनें की सोच रहा था | ट्रेन छूटनें का टाइम होनें वाला था और तभी  लगभग आठ दस सेना के जवानों के साथ मिलेट्री वर्दी में एक आला सिक्ख  आफीसर उनकी पत्नी और उनकी ग्यारह बारह साल की पुत्री स्टेशन पर आ गये | उन्होंने शीघ्र ही काफी सारा सामान उस कूपे में लाकर रख दिया | | सरदार जी उनकी पत्नी और उनकी पुत्री कूपे में बैठ ही पाये थे कि गाड़ी नें सीटी दी और चल पड़ी |साथ आये जवानों नें उन्हें सल्यूट किया और गाड़ी से उतर आये | सरदार जी नें मेरी और देखा और मैनें उनके परिवार का आँखों ही आँखों में जायजा लिया | वे लगभग 38 वर्ष के रहे होंगें और मैनें उनके Badges को देखकर जान लिया कि वे ब्रिगेडियर रैंक के हैं | उनकी पत्नी 32 ,33 के आस -पास होंगीं और पहली ही द्रष्टि में अपनी ओर आकृष्ट कर लेने वाली मुखाकृति और शरीर रचना उन्होंने प्रकृति के द्वारा पायी थी | मैं जानता था कि मात्र मेजर होनें के नाते मैं सरदार जी के मुकाबले एक जूनियर आफीसर हूँ पर मैं नागरिक वस्त्रों में था | और मैं क्यों और कहाँ जा रहा हूँ इससे वे परिचित नहीं थे | मैं उनसे उम्र में लगभग आठ -दस वर्ष बड़ा था और चूंकि नीचे की बर्थ मेरे नाम पर आरक्षित थी इसलिये उन्हें आराम करने के लिये स्वयं या उनकी बेटी को ऊपर की बर्थ पर जानें की जरूरत थी | मुझे कुछ अजीब सा लगा कि नीचे की एक बर्थ पर उनकी पत्नी हों और बगल की दूसरी बर्थ पर मैं आराम करूं | पहल मैनें ही की | मैनें कहा, सरदार जी अगर आप चाहें तो आप या आपकी बच्ची इस नीचे की बर्थ पर आ जायें | मैं ऊपर आ जाऊँगा | वे बोले , थैंक यू जनाब ,और यह कहकर उन्होंने अपनी बेटी मोनिका को मेरी बर्थ पर जानें को कहा | मैं ऊपर की बर्थ पर चला गया | अब मैं और वह ऊपर की बर्थ्स पर थे और इस समीपता ने हमें बातचीत करनें के लिये प्रेरित किया | उन्होंने पूछा आप कहाँ जा रहे हैं ? और क्या आप सेना में हैं ?मैनें बताया कि मैं दिल्ली के आसपास के कालेज में अंग्रेजी का प्राध्यापक हूँ  और एन. सी. सी. में प्रशिक्षण के लिये एक महीनें के लिये पुरुन्दर आया था | अब उन्हें लगा कि वे मुझसे अधिक विश्वास के साथ बातचीत कर सकते हैं | मिलेट्री के एक बड़े अफसर होनें के नाते वे यह जानते ही थे कि एन  ०सी ० सी ० में उन दिनों मेजर से बड़ा कोई रैंक नहीं होता था और वे एक ब्रिगेडियर थे इसलिये एक बड़प्पन का भाव भी कहीं उनके अन्तर्मन में छिपा था | पर मेरे अंग्रेजी बोलनें के ढंग से वे प्रभावित थे | और उन्हें लग रहा था कि अंग्रेजी के प्राध्यापक होनें के नाते सामान्य ज्ञान और भाषा सौष्टव की द्रष्टि से मैं उनसे कहीं कम न था | कहना न होगा कि हमारी सारी बातचीत अंग्रेजी में हो रही थी और नीचे पड़ी उनकी पत्नी तथा छठी सातवीं में पढ़ने वाली उनकी पुत्री मोनिका भी यह बातचीत सुन रही थी | बात ही बात में उन्होंने मुझे बताया कि वे झांसी जा रहे हैं जहाँ से उन्हें मऊ जाना है और वे मऊ में एक विशेषज्ञ के नाते कर्नल रैंक के आफीसरों के प्रशिक्षण से संम्बन्धित हैं | मैं प्रभावित हुआ क्योंकि  कि उन दिनों 1965  में होने वाली पाकिस्तान की युद्ध योजना अपनें चरम पर पहुँच रही थी और ब्रिगेडियर साहब संम्भवतः रक्षा मन्त्रालय की अत्यन्त गुप्त योजनाओं से थोड़े बहुत परिचित जान पड़ते थे | बातचीत में ही उन्होंने बताया कि मोनिका किसी अत्यन्त प्रसिद्ध क्रिश्चियन स्कूल में पढ़ रही है और वह बाइबिल में आये हुये कुछ प्रसंगों पर मुझसे बातचीत करती है पर मैं बाइबिल के इन प्रसंगों से इतना परिचित नहीं हूँ क्योंकि मेरी पत्नी तो अधिकतर पूजा -पाठ में लगी रहती है |  बातचीत करते काफी समय हो चुका था और मोनिका भी बीच -बीच में हमारी बातों में कुछ हिस्सा लेनें लगी थी | बच्चों का स्वभाव ही कुछ निर्मल होता है और वे जब तक जगते हैं  कुछ न कुछ बातचीत करना चाहते हैं | मोनिका की माँ अलस भरे नींद के झोंके ले रही थी | संम्भवतः यही कारण था कि ब्रिगेडियर साहब कुछ खुलकर बातें कर रहे थे | मैनें मोनिका से कहा बेटे , "तुम्हें बाइबल के कई प्रसंग याद हैं | तुम्हें यह भी पता है कि यूशू जो जोसफ  के बेटे थे , कि उनका जन्म वेथेलम में हुआ था ,कि उनकी माँ का नाम मेरी था और उनका जन्म पशुओं के लिये चारा रखनें वाले नांद या Manger में हुआ था यह सब जानना बहुत अच्छी बात है पर क्या तुम यह बता सकती हो कि राम के भाई शत्रुघन की माता का क्या नाम था मोनिका नें कहा , " I dont know any thing about Ramayana but I think he was a son of a Queen called Koshala. मैं मोनिका के इस अज्ञान पर मन ही मन हंसा और फिर मैनें उसे रामायण की कुछ मूल बातें बतायीं | फिर मैनें उससे पूछा कि क्या वह गुरुग्रन्थ साहब से पूरी तरह परिचित है ?  इस दिशा में भी उसका ज्ञान अधूरा ही लगा | सरदार जी नें मुझे बताया कि दरअसल यह क्रिश्चियन स्कूल में होने के कारण अधिकतर उन्हीं मित्रों के बीच उठती बैठती है जिन्हें पश्चिमी सभ्यता का जीवन जीनें का अवसर मिला है | यह भारतीय परम्पराओं से पूरी तरह परिचित नहीं है | और सच पूछो तो मैं भी योरोपीय अधिक हूँ और हिन्दुस्तानी कम | मोनिका एक प्रतिभाशाली लड़की थी और मेरी बातचीत से उसको लगा कि मैं उसके पिता जैसा या उनसे भी अधिक सामान्य ज्ञान का अधिकारी हूँ और वह मुझसे बड़े आदर के साथ बातचीत करने लगी | मैनें उसे बातों ही बातों में रामायण के एक और महापात्र रावण , उसके पिता विश्रवा  और उसके बाबा पुलत्स्य के बारे में बताया | मैनें रावण की पत्नी मन्दोदरी की चर्चा भी की और मैनें बताया कि मन्दोदरी की बात न माननें के कारण ही रावण अपनें परिवार को विनाश पथ की ओर ले गया | रात का अन्धेरा बढ़ने लगा था | गाड़ी के हल्के धक्कों में हिलता डुलता शरीर अलस भरी ऊँचाइयों में झूल रहा था | मोनिका की माँ और मोनिका धीरे धीरे सो गये | ब्रिगेडियर साहब अब सहज हो गये मुझसे बोले ब्रदर अवस्थी , तुम तो यार पण्डित लगते हो | बहुत सारी धर्म की बातें  जानते हो | मैं तो तोप के गोले और टैन्क संचालन के अलावा और कुछ जाननें का मौक़ा ही नहीं पा सका और फिर आवाज को धीमी करके बोले , " अवस्थी , मैं तुमसे एक बात पूछना चाहूंगा | मेरी पत्नी सांई बाबा की बहुत बड़ी भक्त है | सांई बाबा का फोटो अपनें कमरे में लगा रखा है और हर रोज उनकी पूजा अर्चना करती है | मैनें एक दिन उससे इस बारे में कुछ जानना चाहा तो उसनें कहा कि सांई बाबा ईश्वरीय अवतार हैं , और वे जो भी चाहें कर सकते हैं | मैं मिलेट्री का अफसर हूँ और मैं जानता हूँ कि हमारे राज जाननें  के लिये बहुत सी खुपिया एजेन्सीज  पूजा -पाठ और सन्त महात्माओं की  ओट में हमारी छिपी बातों का पता लगाना चाहती हैं | कहीं ऐसा तो नहीं है कि मेरी पत्नी एक सहज स्वभाव की नारी होनें के कारण किसी खुफिया तन्त्र की चालबाजी में फंस गयी हो |  मैनें कहा सर ,आपनें पूछा नहीं कि आपकी पत्नी को सांई बाबा के चमत्कारों में कैसे विश्वास हुआ | उन्होंने कहा मैनें उससे एक बार ऐसा ही प्रश्न किया था तो उसनें कहा कि उनकी फोटो से पूजा के बाद स्पर्श करनें से एक ऐसी भभूति निकलती है जिसकी सुगन्ध से अत्यन्त गहरा आत्मिक आनन्द प्राप्त होता है | मैनें उससे कहा कि वह मुझे भी उस भभूत का अनुभव कराये | अगले दिन उसनें पूजा के बाद मुझे भीतर बुलाया और कहा कि तस्वीर तुम्हारे सामनें है इसमें कहीं कुछ नहीं है | प्रणाम करके इसे स्पर्श करो तो तुम्हारे हाँथ में भभूति आ जायेगी और उसकी सुगन्ध तुम्हें एक नयी स्फूर्ति देगी | मैनें ऐसा ही किया और सच कहता हूँ अवस्थी न जानें कहाँ से वह महकती हुयी सुनहली भस्म मेरे हाँथ में आ गयी  और मैं विस्मय विमूढ़ हो गया | भाई अवस्थी ,मुझे शक है कोई विदेशी खुफिया जालतन्त्र मेरी धर्म परायण पत्नी के द्वारा मेरे द्वारा संचालित होनें वाली उस सामरिक प्रशिक्षण प्रक्रिया की निगरानी कर रहा है | मैं अन्दर से बहुत शंकाग्रस्त हो उठा हूँ | अत्यन्त धीमी आवाज में उन्होंने कहा , " Awasthi, she is now in deep sleep ." इसीलिये मैं आपसे ये बातें कर रहा हूँ | आप तो प्रोफ़ेसर  हैं ,पण्डित हैं बहुत सी धार्मिक क्रियाओं को जानते हैं | क्या वाकई में सांई बाबा में अदभुत चमत्कारी शक्तियां हैं | क्या मेरी पत्नी का सोचना ठीक है अगर मैं उसके जीवन में दखल देता हूँ तो परिवार की शान्ति नष्ट हो जायेगी | मैं बहुत असमंजस में हूँ कहीं ऐसा तो नहीं है कि मेरा  Careerखतरे में है |
                                  मेरे सामनें एक अत्यन्त जटिल समस्या आ खड़ी हुयी | क्या उत्तर दूँ ? क्या कह दूँ कि चमत्कारों की बात विज्ञान की रासायनिक प्रक्रियाओं का एक सोचा -समझा जाल विस्तरण है | पर ऐसा कैसे कह दूँ | महान सन्तों ,महाकाव्यों में और अतीत के भक्तों की जीवनियों में चमत्कारों की भरमार है | और भारत के कोटि -कोटि नर -नारी उसे निर्विवाद सत्य मानकर चलते हैं | पर विवेक क्या कहता है ? क्या देव की अद्रश्य शक्ति के अतिरिक्त और कोई व्याख्या उपयुक्त नहीं हो सकती | सूफी कवियों नें भी तो गाया है , " रवि ससि , नखत विपहिं ओहि जोती | रतन पदारथ मानक मोती || "
                              तो क्या सांई बाबा उस परम सत्ता के साथ डायरेक्ट कान्टेक्ट में हैं | मैं काफी देर चुप रहा | ब्रिगेडियर साहब नें कहा अवस्थी तुम कुछ बोले नहीं | झांसी आ रही है और मुझे लेने के लिये वहां दस बीस जवान प्लेटफार्म पर खड़े होंगें | मोनिका की माँ अभी नीन्द में है उसे जगाना होगा | बोलो क्या कहते हो ?
                              मैं कुछ कहनें ही जा रहा था कि इसी बीच मोनिका की माँ नें शरीर की हल्की हलचल के साथ अपनीं अलसायी आँखें खोल दीं | लाल -लाल डोरे पड़ी वे आँखें कितनी मादक थीं | ब्रिगेडियर साहब उन आँखों की मादकता में यदि डूब जाते हों तो इसमें उनका क्या दोष है | वे तो एक मिलेट्री आफीसर थे कोई सुजान तो थे नहीं इसलिये रसलीन के इस दोहे के पूरे  अर्थ से   परिचित नहीं थे |
                    " अनियारे दीरघ नयन , किती न तरनि समान
                       वे नयना औरे कछु ,जेहि बस होत सुजान || "
                                               तोपों की गड़गड़ाहट और टैंकों की खड़खड़ाहट सुननें के बाद बंगले पर आकर उन मादक नैनों का मतवालापन उन्हें बहिस्ता में पहुंचा देता हो तो इसके लिये वे क्या करें | मुझे ऐसा लगा -पर शायद ये सच न हो -कि मोनिका की माँ सचमुच सो नहीं रही थी बल्कि सोनें का बहाना कर रही थी | उसनें शायद मेरी सारी बातों को जो मैनें मोनिका से की थीं या जो ब्रिगेडियर साहब से हुयीं थीं सुन लिया था | मुझे लगा कि उसकी उन खुली आँखों में मेरे लिये एक अनकहा निर्देश है कि मैं ब्रिगेडियर हरमेन्दर सिंह के प्रश्न का उत्तर न दूँ , उन आँखों का निर्देश मैं कैसे टाल सकता था | फिर सोचता हूँ मैं उत्तर देता भी   तो उत्तर की तलाश गुरुग्रन्थ साहब में संग्रहित सन्त वाणियों में ही करता | मोनिका की माँ उठ बैठी और ऊपर देखकर बोली मोनी पापा पानी की बोतल देना | काले कजरारे मेघ जैसे बालों से घिरा उसका चन्द्रमुख पूरे कूपे में एक नयी दीप्ति फैला गया |
(क्रमशः )

Tuesday, 16 January 2018

(गतांक से आगे )

                                     लम्बी यात्रा के दौरान पिछले विश्राम स्थल मुड़कर देखनें पर स्पष्ट नजर नहीं आते | धुन्धलके से घिरी वस्तुयें और घटनायें रहस्यमयी लगनें लगती हैं  पर बीते कल का सत्य आज यदि सत्य न भी रहा हो तो भी अपनें युग की सीमाओं में उसकी सार्थकता से इन्कार नहीं किया जा सकता | धोबी घाट पर कही सुनीं बातें आज हमारे लिये बिल्कुल बेमानी हैं | पर सामाजिक नैतिकता निर्माण के प्रारम्भिक काल में उनका काफी कुछ महत्व रहा होगा तभी तो राम जैसे महापुरुष को क्षुद्र मुहों से निकली उपेक्षणींय कटुक्तियों नें विचलित कर दिया था | पर राम का नाम जिसके बिना भारत के सांस्कृतिक अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती न जानें कितनें अन्य नामों के साथ जुड़कर अपावन गर्त की गहराइयों में डूब चुका है ऐसे ही गन्दी नाली में बुदबुदाते कृमि कीटों सा थाह बिहार के सासाराम का सेकेण्ड लेफ्टीनेन्ट का सितारा लगाने वाला जी ० राम | पूरा नाम था गया राम गोंद पर अब हम उसे गुन्डू राम के  नाम से अभिहत करेंगें | कमाण्डेन्ट के दफ्तर में गुन्डू राम को हाजिर किया गया | अपराधी प्रकृति का एक और साक्ष्य उस समय मिला जब गुन्डू राम नें प्रथमतः यह माननें से इन्कार किया कि उसनें किसी लड़की की चोली पर हाँथ रखा था और उसे नोट दिखाये हैं | और जब ब्रिगेडियर साहब नें उससे कहा कि इस दफ्तर से बाहर जाते ही रास्ते घेर कर बैठे हुये मराठे उसे पकड़कर बोटी -बोटी काट डालेंगें तो वह घबरा गया | उसनें कहा कि उस लड़की से तो उसनें सिर्फ यह पूछा था कि वह किस गाँव की है और वह गाँव वहां से कितनी दूर है | जब बाहर बैठी लड़की और उसकी माँ  को उसके सामनें लानें की बात कही गयी तब गुन्डू राम मान गया कि चलते समय गल्ती से उसका हाँथ लड़की की छाती से लग गया था | पर उसनें नोट नहीं दिखाये थे | उसनें कुछ कदम आगे चलकर पैन्ट की जेब से नोट इसलिये निकाले थे कि उसे यकीन हो जाये कि कहीं पूना में उन्हें खो तो नहीं आया है | उसकी इन बातों से हमें स्पष्ट हो गया कि गुन्डू राम एक अत्यन्त घटिया स्तर का अध्यापक है | उसनें कहा कि वह एक इण्टर कालेज में भूगोल पढ़ाता है | वह किस जाति में जन्मा था हम यह बतानें की आवश्यकता नहीं समझते क्योंकि हमारा अनुभव हमें बताता है कि अपराधी प्रवृत्ति के लोग हर जाति , हर काल , और हर क्षेत्र में पाये जाते हैं | पर वह मनुष्य कहा जानें योग्य तो है ही नहीं इतना तो सुनिश्चित ही हो गया | ब्रिगेडियर देसाई नें जब उससे कहा कि वो उसे बाहर बैठे मराठों को सौंप देते हैं और उसे अकेडमी से बाहर निकाल देनें का आर्डर कर देते हैं तो गुन्डू राम के हाँथ पैर फूल गये | पहली बार वह गिड़गिड़ाता हुआ बोला कि उसे मराठों के हाँथ न सौंपा जाय कि वह अकेडमी द्वारा दी जाने वाली हर सजा को मंजूर करेगा , कि वह एक गन्दा इन्सान है और कमीशन के काबिल नहीं है | कि वह अपनें पाप का प्रायश्चित करेगा और अच्छा इन्सान बननें की कोशिश करेगा , कि वह शादी -शुदा है और उसके दो बच्चे हैं , कि उसकी बीबी ग्रेजुएट है और उसका ससुर दिल्ली नगर निगम में सफायी विभाग का कर्मंचारी है | वह कमाण्डेन्ट साहब के पैरों पर गिर पड़ा | और फूट -फूट कर रोने लगा | हम लोगों को ऐसा लगा कि शायद इसका हृदय परिवर्तन हो जाय | हमें रत्नाकर डाकू के बाल्मीक ऋषि बननें की बात याद आ गयी | ब्रिगेडियर देसाई भी भारत की प्राचीन पौराणिक कथाओं से परिचित थे और अन्तरमन से यह चाहते थे कि पापी को सुधरनें का एक मौक़ा मिलना चाहिये | कमाण्डेन्ट साहब ने मेरी ओर देखा | मैनें उनसे निवेदन किया कि जी. राम को कुछ देर के लिये दूसरे कमरे में ले जाया जाय हम लोग फिर आपस में विचार -विमर्श करके दण्ड का स्वरूप और परिमाण तय कर लेंगें | जी. राम ब्रिगेडियर साहब के पैरों से चिपटा रहा पर उनके हुक्म देनें पर वह उठ खड़ा हुआ और दो हवलदार उसे पकड़कर क्वार्टर गार्ड में ले गये जहां वह बन्द कर दिया गया | मैनें ब्रिगेडियर साहब से कहा , " सर ऐसा लगता है कि सारी कालिख के बीच अभी इसमें इन्सानियत का एक चेतन बिन्दु उपस्थित है | अब आप बताइये कि क्या किया जाये | दो बातें स्पष्ट हैं | पहली यह कि हमें इसे मराठों के सुपुर्द नहीं करना चाहिये | यह अपनी अकेडमी में प्रशिक्षण के लिये आया है | इसनें अपराध की गंम्भीरता को स्वीकार कर लिया है अब दण्ड देनें का नैतिक और कानूनी अधिकार हमारा ही  है मराठा दम्पति ने हमें आश्वस्त ही कर दिया है कि वह हमारे निर्णय को स्वीकार कर लेंगें | दूसरी बात यह है यदि यह  अकेडमी में बना रहता है तो यह गाँव से आनें वाले बैरों की नजर में रहेगा और मराठा आनर के नाम पर कोई भी घटना घट सकती है इसलिये इसे अकेडमी से वापस  लौटाना ही होगा |
                                      ब्रिगेडियर साहब कुछ सोच में पड़ गये उन्होंने कर्नल राम सिंह की राय जाननी चाही | कर्नल साहब नें कहा , " सर इसे डी. कमीशन कर दिया जाय और इसके कालेज को इसके अपराध की सूचना दे दी जाय तथा इसके परिवार को भी इसके अपराध से सूचित कर दिया जाय और इसे   अकेडमी से वापस भेज दिया जाये | ब्रिगेडियर साहब नें मेरी ओर देखा मैनें कहा सर, मैं एन ० सी ० सी ० आफीसरों के प्रतिनिधि के रूप में आपके बीच उपस्थित हूँ | कर्नल साहब जी कहना बिल्कुल ठीक है पर कालेज में रिपोर्ट करनें से इसकी नौकरी चली जायेगी और यह दर -दर भटकनें लगेगा | कहीं ऐसा न हो कि हम इसे घोर अपराधी बना दें और यह क़ानून व्यवस्था के लिये एक मुसीबत खड़ी कर दे | सर मुझे एक बार अकेले में जी. राम से मिलनें की इजाजत दीजिये फिर मैं उसकी गल्ती के लिये दिये जानें वाले दण्ड के सम्बन्ध में विश्वास के साथ निवेदन कर सकूंगा | ब्रिगेडियर देसाई नें कैप्टन हूडा को बुलाया मुझे क्वार्टर गार्ड में बन्द जी.  राम से मिलनें की इजाजत मिल गयी | मेरे लिये एक कुर्सी डाल दी गयी | जी. राम जमीन पर बैठ गया | मैनें कहा देखो भाई हम दोनों ही मूलतः अध्यापक हैं | एन. सी. सी. की आफ़ीसरी तो हमारे लिये अतिरिक्त सम्मान और थोड़ी -बहुत अतिरिक्त आय का साधन मात्र है | कर्नल राम सिंह जी चाह रहे हैं कि तुम्हें डी ० कमीशन्ड कर दिया जाये |तुम्हारे कालेज और तुम्हारे परिवार को तुम्हारे अपराध के  बारे में लिख दिया जाय और तुम्हें अकेडमी की जीप में सुरक्षित रूप से पूना ले जाकर गाड़ी में बिठा दिया जाय ताकि तुम बिहार पहुंच जावो | बोलो तुम्हें इस सम्बन्ध में कुछ कहना है | जी. राम नें मेरे पैरों पर माथा रख दिया और रोने लगा | मैनें कहा अरे भाई यह क्या करते हो ? मैं तो तुम्हारा अध्यापक भाई हूँ खुल कर बताओ कि क्या ऊपर कही हुयी बातें तुम्हें जीवन भर के लिये विकार तो नहीं देंगीं | जी. राम बोला , " सर अगर आपनें मेरे कालेज को लिख दिया तो मैं नौकरी से निकाल दिया जाऊँगा | Moral Turpitude का चार्ज मुझे कहीं का नहीं रखेगा , मैं सड़क पर आवारा कुत्ते की भांति भटकनें लगूंगा | इससे  तो मैं मर जाना बेहतर समझूंगा | हाँ परिवार को आप न भी लिखें तो भी मैं बता ही दूंगा | मुझे अपनी गल्ती की गंभ्भीरता  का अहसास है | मैनें लड़की की गरीबी का नाजायज फायदा उठाना चाहा | अपनी पत्नी की आँखों में मैं कीड़े से बढ़कर और क्या लगूंगा | हाँ आप मुझे डी. कमीशन करना चाहें तो करवा दें | मैं एन ० सी ० सी ० आफीसर के लायक नहीं रहा | मैनें कहा भाई जी. राम सजा का अन्तिम निर्णय ब्रिगेडियर देसाई करेंगें | मैं तो बीच की एक कड़ी मात्र हूँ | फिर भी मैं प्रयास करता हूँ कि तुम्हारा जीवन नष्ट न हो और तुम एक बेहतर इन्सान बन जाओ |  तुम्हारे बच्चे बड़े होकर तुम्हें घृणा से न देखें अब  मैं जा रहा हूँ और कुछ देर के बाद कमाण्डेन्ट साहब तुमको  बुलाकर दण्ड के संम्बन्ध में अन्तिम निर्णय सुनायेंगें | हो सकता है कि मराठा दम्पति भी उस समय बुला लिया जाय | फिर मैं बैरक में आया और मैनें अपनें दो अन्य वरिष्ठ साथी कैप्टन देवेन्द्र सिंह और  कैप्टन पुणताम्बर से काफी देर तक विचार -विमर्श किया | हम तीनों ने तय किया कि लेफ्टीनेन्ट जी. राम का अपराध क्षमा के योग्य नहीं है पर उसका दण्ड भी ऐसा हो जिससे उसका सम्पूर्ण जीवन नष्ट न हो जाये  | क्षमा यदि कोई कर सकता है तो मराठा दम्पति और उनकी पुत्री ही इसका अधिकार रखती है | हाँ यदि कर्नल राम सिंह नहीं मानते हैं तो डी. कमीशन की बात पर विचार किया जा सकता है | पर अच्छा यही होगा कि उसे इस कोर्स से वापस लौटा दिया जाये | ऐसा करने के लिये उसे लिये जानें वाले टेस्ट में फेल हो जानें की वजह बतायी जा सकती है | हम सौ से ऊपर एन.सी . सी. आफीसर यही चाहते हैं बाकी कमाण्डेन्ट साहब यदि और दण्ड देना चाहें तो हम उस पर सोच विचार कर सकते हैं | करीब एक घण्टे बाद मैनें अर्दली को इस निवेदन के साथ अन्दर कमाण्डेन्ट के पास भेजा कि मैं उनसे मिलना चाहता हूँ | बुलावा आ गया | अन्दर ब्रिगेडियर साहब और कर्नल साहब विचार - मशिवरा कर रहे थे | मैं समझता हूँ कि रामाबाई और फूलमती भी घर के भीतर ब्रिगेडियर साहब की पत्नी और लड़कियों के बीच बैठी हुयी थी | कमाण्डेन्ट साहब नें पूछा कि वह कुत्ते का बच्चा क्या चाहता है | मैनें कहा , " सर वह फिर से इन्सान बनना चाहता है | " वह चाहता है कि आप उसे एक नया जीवन जीनें की इजाजत दें | -साफ़ सुथरा अध्यापक का जीवन | उसकी प्रार्थना है कि आप उसके इस अपराध की सूचना उसके कालेज को न भेंजें | | उसनें वादा किया है कि वह अपनें इस अपराध को अपनी पत्नी से स्वयं ही बता देगा और उनसे क्षमा मांगेगा | हाँ वह एन.सी. सी. अफसर होनें के लायक नहीं है इसलिये यदि हम उसे डी ० कमीशन्ड करना चाहें तो तो उसे वह स्वीकार कर लेगा | साथ ही उसनें कहा है कि वह फुल परेड के सामनें मराठा दम्पति के पैरों पर गिरकर क्षमा की याचना कर सकता है | और उनकी बेटी से राखी बंधवा कर उसे जीवन भर पवित्र प्यार और गौरव दे सकता है | मैंनें अपनें दोनों वरिष्ठ साथियों से बातचीत कर ली है | सारे के सारे एन. सी.सी. आफीसर इस फैसले में हमारे साथ खड़े होंगें |
                           जी. राम को पूना स्टेशन से गाड़ी में बिठा दिया जाय और वह पटना पहुँच जायेगा | कमाण्डेन्ट साहब  हँसे और  उन्होंने कहा मेजर अवस्थी मैं तुम्हारी बातों से काफी कुछ सहमत हूँ | रामाबाई और उसकी बेटी यहीं पर है उस गधे के बच्चे को बुलाओ | वह उनसे मांफी मांगें | वह जैसा कहेगी  वैसा हम  कर देंगें | जी. राम को बुलाया गया | वह कांपते हुये अन्दर आया और देसाई साहब के पैरों पर गिर पड़ा | कमाण्डर साहब ने कहा , " अबे गधे के बच्चे मेरे पैरों पर मत पड़ अन्दर जा जहां रामाबाई और उसकी बेटी मेरी पत्नी और बच्चियों के साथ बैठी है  उनके पैरों पर गिर माफी मांग | वे माफ़ कर देंगीं तो हम भी माफ़ कर देंगें | ब्रिगेडियर साहब नें मुझे भी जी. राम  के साथ अन्दर जानें का आदेश दिया | जी. राम अन्दर जाते ही पहले ब्रिगेडियर साहब की पत्नी के पैरों पर लोट गया और फिर रामाबाई के पैरों पर सिर रखकर रोनें लगा | उसनें कहा माता जी मेरे सिर पर आप हजार बार जूते मारिये मैं गन्दी नाली के कीड़े से भी बद्तर हूँ | मैनें अपनी बहिन की इज्जत से खिलवाड़ किया | माँ मुझे माफ़ करो | रामाबाई गरीब अवश्य थी पर ओजस्वी मराठा जाति की चरित्रवान नारी थी उसनें कहा तुमनें मेरी बेटी को बहन कह कर पुकारा है जीवन भर अपनी पत्नी के अतिरिक्त सभी नारियों को माँ ,बहिन और बेटी के भाव से देखना | जा माँ भवानी तुझे माफ़ कर देंगीं | मैं ब्रिगेडियर साहब से कह दूंगीं के वे तेरा कोई नुकसान न करें | मैनें जी. राम की पीठ पर हाँथ रखकर उसे उठाया वह रोता -रोता बैठके में आकर ब्रिगेडियर साहब के पैरों के पास बैठ गया | कमाण्डेन्ट साहब नें कहा तू है तो गधे का बच्चा पर आज तूनें मराठा नारी के पैरों में सिर रखकर और उसे माँ कहकर एक कसम खायी है कि तू एक अच्छा इन्सान बनेगा | जा हम तुझे माफ़ करते हैं | मेजर अवस्थी का जीवन भर अहसान मानना जिनकी समझदारी से तेरा जीवन नष्ट होनें से बच गया | हम तुझे डी कमीशन भी नहीं करेंगें केवल कल सुबह जीप से पूना स्टेशन पहुंचाकर  बिहार के लिये गाड़ी में बिठा देंगें | तुम एक  अप्लीकेशन लिख कर छोड़ जाना कि तुझे एक बहुत जरूरी काम से प्रशिक्षण कोर्स छोड़कर घर जाना पड़ेगा | बाद में घर पहुंचकर तार भेज देना कि किसी ख़ास वजह से तुम यह कोर्स अटेण्ड नहीं कर पाओगे और तुम्हें अगले वर्षों में प्रशिक्षण के लिये भेजा जाय | ध्यान रहे यह सब उन एन. सी. सी. आफीसर्स की इज्जत के लिये किया जा रहा है जिनके नाम पर तुम्हारी यह गल्ती कलंक का न मिटनें वाला धब्बा लगा देती | Be a man still there is a chance.और यह कहकर उन्होंनें अर्दली को बुलाकर हुक्म दिया कि जी. राम को वापस बैरक में पहुंचा दिया जाय | कर्नल राम सिंह से उन्होनें कहा कि कल सुबह जवानों से सुरक्षित जीप में जी. राम को पूना  ले  जाकर बिहार वाली गाड़ी में बिठा दिया जाय | कर्नल राम सिंह यस सर कहकर बाहर चले गये | ब्रिगेडियर देसाई मुझे अपने छोटे भाई के रूप में लेते थे उन्होनें मुझसे कहा अवस्थी बैठे रहो | मिसेज देसाई और उनकी दो किशोर बेटियां सुप्रभा और सुकन्या रामाबाई और फूलमती के साथ बैठके में आ गयीं | रामाबाई ने कहा हुजूर हमें आपके फैसले से पूरा सन्तोष है|  हम मराठा नारियां किसी का जीवन बर्बाद करना नहीं चाहतीं | अपनें हमारे गौरव की पूरी रक्षा की है , आप जैसा न्याय और कहाँ मिल सकता था | मैनें ब्रिगेडियर साहब की ओर मुखातिब होकर कहा , " सर मुझे जानें की इजाजत दीजिये | "कमाण्डर साहब नें मेरी तरफ मिलानें के लिये  हाँथ बढ़ाते हुये कहा , "  Well done Awasthi !N.C.C.is proud of officers like you. "
( क्रमशः )

Sunday, 14 January 2018

(गतांक से आगे )

                                         तो चलूँ बचपन की ओर ,मातृ शक्ति की तलाश में जो क्षीण हो रही जीवन ऊर्जा को स्फुरित कर नया आवेग दे सके | पर मातृ शक्ति भी तो मूलतः नारी शक्ति ही है | वात्सल्य संरक्षण का ज्योतिर्मय आँचल प्रसरण | दार्शनिक बर्टेन्ड रसल के इस कथन में कितनी बड़ी सच्चायी है कि मानव जाति के कुछ महामानव सभ्यता के पिछले छह हजार वर्षों में नैतिक ऊंचाई का इतना बड़ा कद  पा गये हैं कि सितारे भी उनके आगे बौनें लगते हैं | पर फिर भी विश्व के बहुसंख्यक मनुष्य अभी भी कृमि कीटों भरी सड़ांध में गोते लगा रहे हैं | ऐसा ही तो कुछ हुआ था पुरुन्दर की उस पहाड़ी पर एक मास के सामरिक प्रशिक्षण के दौरान | स्वास्थ्य की कुछ समस्याओं के बावजूद मेरा उस प्रशिक्षण में जाना अति आवश्यक हो गया था | क्योंकि बटालियन कमाण्ड करनें की पात्रता उस प्रशिक्षण के बाद ही स्वीकृत हो पाती थी | मेरा शरीर उन दिनों अधिक शारीरिक श्रम वहन करनें योग्य नहीं लग रहा था | क्योंकि वायरल अटैक  के एक लम्बे दौर से पायी क्षीणता से वह अभी तक मुक्त नहीं हुआ था पर प्रशिक्षण के पहले ही दिन आयोजित एक सामरिक शैक्षिक परिचर्चा में मेरा योगदान सराहना के योग्य माना गया | और ब्रिगेडियर देसाई नें मुझे ऊषा पूर्व होनें वाली शारीरिक ड्रिल से मुक्त कर दिया | इस छूट के साथ ही मैं तीन प्रशिक्षुओं की एक कमेटी का संयोजक भी बना दिया गया | जो सौ से भी अधिक आये कॉलेजों के एन ० सी ० सी ० पदाधिकारियों का प्रशिक्षण प्रवास सुखद बना सकें | रविवार के दिन अवकाश रहता था और जैसा कि मैं अपनें पहले प्रशिक्षण प्रयासों में किया करता था वैसा ही फिर से पहाड़ी की ऊंची चोटी पर बनें नन्दी आरोहित देवाधिदेव शिव के मन्दिर जाकर सायंकाल का समय व्यतीत करने लगा | मेरी कल्पना द्रुति गामी अश्व पर सवार शिवा राजे उस मन्दिर में पूजा अर्चना कर पहाड़ी के ऊबड़ -खाबड़ चक्करदार मार्गों से उतरते हुये नीचे के ग्राम आंचलों की ओर जाते दिखायी पड़ते थे | महाराष्ट्र के इस महान योद्धा और महामानव नें किस प्रकार दिल्ली की अविजेय कही जानें वाली मुगुल सेना के छक्के छुड़ा दिये थे ये सोच -सोच कर मुझे रोमांच हो आता था | कुछ वरिष्ठ प्रशिक्षु मेरी तरह पहाड़ी की चोटी पर आकर आस -पास का सौन्दर्य निहारा करते थे | | पर अधिकाँश तरुण आफीसर्स जिनके लिये प्रशिक्षण का यह पहला दौर था पहाड़ी से नीचे उतरकर राम पेट होते हुये टैक्सी लेकर पूना चले जाते थे | रात्रि को नौ बजे से पहले वापस आनें की सीमारेखा कितनें ही ऐसे अफसरों द्वारा तोड़ दी जाती थी और मुझे संचालन कमेटी का Co-Ordinator होनें के नाते कई बार उन्हें सावधान भी करना होता था | कुछ प्रशिक्षु रामपेट गाँव के आस -पास चहलकदमी करते थे  और स्थानीय छोटी -मोटी दुकानों से कुछ खरीद -फरोख्त भी कर लेते थे | वैसे पुरुन्दर ट्रेनिंग अकादमी की अपनी शाप तो है ही | पत्रिका के अधिकाँश पाठक शायद महाराष्ट्र की इन पहाड़ियों के आँचल में बसे ग्रामवासियों से परिचित न हों इसलिये मैं बताना चाहूंगा कि इनमें से अधिकाँश मराठी लोग हैं जिन्हें अपनी वीरता ,अपनी पारिवारिक पवित्रता , और भारत के महाकाव्यीय गौरव पर अभिमान है | औद्योगिक द्रष्टि  से महाराष्ट्र एक विकसित प्रदेश है | बम्बई और उसके आस -पास भारत के सबसे धनी लोग और सबसे बड़े यद्योगपति पाये जा सकते हैं पर पहाड़ियों के बसे आँचल में आज से लगभग 50 वर्ष पहले घोर गरीबी थी और जहां तक मैं समझता हूँ शायद आज भी उस गरीबी का उन्मूलन न हो पाया हो | तो रामपेट गाँव के अधिकाँश पुरुष आफीसर्स की बैरकों में हेल्पर्स का काम करते थे उन्हें अंग्रेजी में बैरे या Bearer कहा जाता है | जूते पालिश करना ,पेटियां रंगना या चमकाना , सफाई करना या बिस्तरे लगाना आदि काम उनके द्वारा किये जाते थे और छोटी -मोटी तनख्वाह के साथ उन्हें बख्शीश भी मिल जाया करती थी | सभी प्रशिक्षु कॉलेजों के प्राध्यापक थे और सभी अच्छी  आर्थिक स्थिति के थे | नीचे के गाँव से जरूरत की छोटी -मोटी चीजें भी ये बैरे लाकर दे देते थे | पहाड़ी के ऊपर उगने वाले पेंड़ पौधे , झाड़ -झंखारों की सूखी डालियाँ इनके घरों की औरतें इकठ्ठा कर लेती थीं जिनसे सर्दी के दिनों में ठंड से बचने में मदद मिलती थी | झाड़ -झंखारों को काट -काट ये उनके स्थानों पर डाल देती थीं और जब ये सूख जाते तो इन्हें इकठ्ठा कर लेती थीं | संम्भवतः घर में खाना बनानें के लिये भी वे लकड़ियों का प्रयोग करती होंगीं | भारत के भिन्न -भिन्न शहरों से आये हुये हम लोग नीचे से ऊपर की चढ़ायी एक बार कर लेने पर दुबारा उतरनें की हिम्मत नहीं करते थे पर ये औरतें दिन में न जानें कितनी बार ऊपर नीचे आया -जाया करती थीं | रविवार के दिन बैरों की भी छुट्टी होती थी और इसलिये अधिकतर औरतें घर पर ही रहती थीं पर एकाध बार जरूरत पड़ने पर वह ईंधन इकठ्ठा करनें के लिये तीन चार किलोमीटर के दायरे में फ़ैली पुरुन्दर की पहाड़ी चट्टानों पर भी चक्कर लगा लेती थीं |
                                उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक और पूर्व में आसाम से लेकर पश्चिम में वारमेड़ ( राजस्थान ) की सीमाओं तक एन ० सी ० सी ० का प्रशिक्षण रक्षा मन्त्रालय की देख -रेख में सुनिश्चित किया गया है | भारत के सभी भागों में प्रोफ़ेसर प्रशिक्षु जिन्होनें एन ० सी ० सी ० में कमीशन लिया था इस प्रशिक्षण शिविर में आये थे उन दिनों राष्ट्रपति से पाये  हुये कमीशन को वही सम्मान मिलता था जो आजकल आई ० ए ० एस ० आफीसर को मिलता है | तो प्रशिक्षण के दूसरे  रविवार की एक घटना मुझे संचालन कमेटी के संयोजक होनें के नाते एक गहरे सशोपंत में डाल दिया | बात कुछ यों  थी शाम को पांच बजे रामपेट गाँव का एक अधेड़ मराठा और उसकी पत्नी रामाबाई अकेडमी के कमाण्डेन्ट ब्रिगेडियर देसाई से मिलनें के लिये आये | ब्रिगेडियर देसाई उस समय एक जरूरी काम में व्यस्त थे | इसलिये उन्होंने उन्हें अगले दिन आनें के लिये कहलवा भेजा पर दामोदर शिन्दे और रामाबाई मिलनें के लिये जिद्द करने लगे और कहा कि उन्हें एक बहुत जरूरी बात कहनी है कल तक कुछ भी हो सकता है | ब्रिगेडियर देसाई कर्नल राम सिंह को लेकर बाहर कमरे में बैठे मराठा दम्पति को मिलनें आ गये  और पूछा कि कौन सी ऐसी जरूरी बात है जिसे उन्हें तुरन्त बताना है | शिन्दे चुप रहा पर रामाबाई नें मराठी में कुछ कहना शुरू किया | देसाई गुजरात से थे और उन्हें मराठी का भी बहुत अच्छा ज्ञान था | कर्नल राम सिंह भी महाराष्ट्र में ही बहुत दिनों से थे और अच्छी मराठी बोल लेते थे | मैनेँ रामबाई की बात -चीत तो नहीं सुनी  पर ब्रिगेडियर देसाई नें मुझे जो बताया उसका सारांश कुछ इस प्रकार था | रामाबाई का कहना है कि उसकी लड़की जो कि करीब चौदह पन्द्रह साल की है आज शाम  चार बजे लकड़ियां इकठ्ठी करने के लिये पहाड़ी पर आयी थी | जिस जगह वह लकड़ियां इकठ्ठी कर रही थी उसी के  पास से होकर जीप वाली चक्कर दार सड़क गुजरती है | शाम को चार बजे के करीब तीन चार अफसर नीचे से ऊपर की ओर जा रहे थे वे शायद पूना से वापस आये होंगें उनमें से तीन तो ऊपर चले गये पर एक वहीं कहीं चट्टानों पर बैठा रहा | मेरी लड़की चोली और घाघरा पहनें थी | जब वह लकड़ी का गठ्ठर बांधकर सिर पर रखनें लगी तो भरे बदन का अफसर जिसका रंग सांवला है उसके पास आकर उसकी चोली में हाँथ डालनें लगा और जेब से कुछ नोट  निकालकर उसकी ओर बढ़ाये लड़की चिल्लानें लगी और गठ्ठर फेंककर नीचे की ओर भागी | वह गुण्डा दौड़कर वहां से ऊपर की ओर भाग गया | वह जरूर इन्हीं किन्हीं बैरकों में होगा | | लड़की नें मुझे सब बात बतायी | हमारी बिरादरी नें तय किया है कि हम आप से मिलकर सब बात बता दें | हम सब तलाश में हैं ज्यों ही वह गुण्डा हमें दिखायी पड़ा हम उसकी बोटी -बोटी काटकर कुत्तों के आगे फेंक देंगें | कुत्ते खायेंगें या नहीं खायेंगें यह माँ भवानी जानें | आप अगर कोई कदम नहीं उठाते तो कल सुबह से कोई बैरा इन बैरकों  में काम करने नहीं आयेगा |
                                           ब्रिगेडियर देसाई नें सूबेदार धर्म पाल को भेजकर तुरन्त मुझे बुलानें के लिए कहा और उस मराठा दम्पत्ति को बाहर बैठकर थोड़ी देर इन्तजार करनें की बात कही | मैं घबराया हुआ ब्रिगेडियर साहब के पास गया और सेल्यूट कर उनसे बुलानें का कारण पूछा | ब्रिगेडियर साहब तो चुप रहे पर कर्नल राम सिंह नें मुझे पूरी स्थित समझायी | और पूछा कि अब क्या किया जाय | मैं सौ से अधिक कालेज प्रोफेसरों का प्रतिनिधि था और वे जानते थे कि अगर वे स्वयं कोई दण्ड निर्धारित करेंगें तो एन ० सी ० सी ० आफीसर्स और रेगुलर आर्मी आफीसर्स के बीच में एक दरार पैदा हो सकती है |मुझे अन्तर्मन में विश्वास था कि माँ भवानी की शपथ खानें वाले मराठे झूठ नहीं बोलते और मराठा दंपत्ति नें जो कुछ कहा है उसमें निसंदेह सच्चायी है  पर आफीसर को काट कर फेंक देनें में उनकी योजना मुझमें घबराहट पैदा कर  रही थी | पर दण्ड तो देना ही था | क्या किया जाय ?कैसे किया जाय ? कुछ सोचकर  मैं अंग्रेजी में इस प्रकार बोला सर यह बहुत संगीन मामला है | पहले तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि वह गुण्डा हमारे इस आफीसर्स बैच का ही आदमी है या बाहर का कोई व्यक्ति | पहचान हो जानें के बाद ही हम दण्ड का निर्धारण कर सकेंगें | इस बीच मैं अपनें पैनल के दो अन्य सदस्यों से भी विचार विमर्श कर लूंगा | इस वख्त अन्धेरा होने वाला है वैसे भी रविवार है रात्रि नौ बजे तक आनें की छूट है बहुत से आफीसर्स अभी तक नहीं आये होंगें , कल सुबह ऊषा पूर्व पी ० टी ० के दौरान जब सभी आफीसर्स फाल इन हों तो तो उस समय आप इस मराठा दम्पति को इनकी लड़की के साथ बुला लीजिये | पी ० टी ० में आफीसर्स जंगल हैट नहीं लगाये होंगें और वह लड़की आसानी से उस गुण्डा आफीसर को पहचान लेगी | इसके बाद दण्ड का निर्णय हम आप की राय को सर्वोपरि मानते हुये ले लेंगें और सभी एन ० सी ०सी ० आफीसर्स उस निर्णय से पूरी सहमति जतायेंगें | ब्रिगेडियर देसाई नें मेरे सुझाव के औचित्य को मान लिया | उन्होंने मराठा दम्पत्ति को यह बात समझायी | रामाबाई ने कहा , " बिटिया के बापू को तो कल सुबह काम पर जाना है वो तो नहीं आ पायेगा पर मैं और मेरी बेटी सबेरे पांच बजे आपके पास हाजिर होंगें ,आप हमारे माई -बाप हैं जो फैसला करेंगें  हम मान लेंगें तबतक हम अपनी बिरादरी के लोगों को कुछ न करने की बात पर राजी कर लेंगें |
                                             वो रात मेरे लिये काटनी काफी कठिन हो गयी मैनें अपनें दोनों साथी कैप्टन देवेन्द्र सिंह और कैप्टन पुणताम्बार को विश्वास में लिया दोनों ही वरिष्ठ एन ० सी ० आफीसर्स तो थे ही पर साथ ही दोनों अपनें -अपनें विषय के उदभट विद्वान भी थे | हमनें आपस में यह तय किया कि एन ० सी ० सी ० आफीसर्स की लाज बचाने के लिये पहचानें गये इस गुण्डा आफीसर को किसी तरह यहां से निकालकर इसे अपनें कालेज में भेजना होगा | पर अगर ब्रिगेडियर देसाई ने कहीं उसे मराठा दम्पति के हवाले कर दिया तो क्या होगा | तय हुआ कि सूझ बूझ कर हर कदम उठाया जाय और किसी न किसी प्रकार रेगुलर आर्मी आफीसर्स को अपने साथ रखा जाय | हमें ट्रेनिंग देनें वाले बहुत से सूबेदार और हवलदार मराठा थे और उनकी सहानुभूति स्वाभाविक रूप से उस पीड़ित परिवार के साथ थी | वैसे भी एन ० सी ० सी ० आफीसर्स के पूरे ग्रुप को बदनामी की चादर में लपेट देनें में उन्हें छुपा आनन्द मिल रहा था क्योंकि कमीशन्ड अफसर और नान कमीशन्ड आफीसर्स के बीच काम्प्लैक्सेस पलते रहते हैं | हम तीनों के अतिरिक्त और किसी एन ० सी ० सी ० आफीसर को कानों कान यह खबर नहीं मिली कि कल सुबह एक आइडेंटिटी परेड हो रही है जिसमें गुंडई का ताज किसी के सिर पर रखा जायेगा | किस प्रदेश से आया है यह गुण्डा प्रोफ़ेसर आफीसर ,किस कालेज की शान बना फिरता है यह नीच व्यभिचारी | किस माँ -बाप की औरस सन्तान है यह नाली का कीड़ा जैसा मैं पहले कह चुका हूँ मुझे पी ० टी ० पर जानें की छूट मिल चुकी थी पर उस सुबह मैं सीटी लगनें के पहले ही पी ० टी  ग्राउण्ड पर खड़ा था | सूबेदार जोगेन्दर सिंह नें सीटी मुंह में लगानें से पहले पूछा मेजर साहब आज इधर कैसे ? मैनें कहा सर सोचा आज आपसे शरीर विकास की कुछ नयी तकनीकें सीख लूँ सीटी बजाइये और एक के बाद एक और एक के बाद एक सफ़ेद टी शर्ट और सफ़ेद हाफ पैन्ट पहनें प्रोफ़ेसर आफीसर्स पी ० टी ० मैदान में सीधी पंक्ति में खड़े होने लगे | उस दिन पहली बार ब्रिगेडियर देसाई पी ० टी ० ड्रेस में आ उपस्थित हुये | सूबेदार जोगेन्दर सिंह घबरा गये कि कमाण्डेन्ट साहब इंस्पेक्शन पर क्यों आये तभी कर्नल राम सिंह और उनके पीछे रामाबाई और उनकी किशोरी बेटी फूलमती आती दिखायी पड़ी | एक छरहरी मझोले कद की सांवली सलोनी बालिका किशोरी | मैं भी जाकर पंक्ति के प्रथम सिरे पर खड़ा हो गया | कमाण्डेन्ट साहब नें सूबेदार जोगेन्दर सिंह को काशन देने के लिये कहा एक सौ तीन आफीसरों वाली वह पंक्ति सावधान मुद्रा में खड़ी हो गयी | कमाण्डेन्ट साहब , कर्नल साहब ,रामाबाई और फूलमती मेरे पास से होते हुये एक एक आफीसर्स के चेहरे को देखते हुये आगे बढ़ने लगे | दो तीन आफीसरों के बाद ब्रिगेडियर साहब नें मुझे लाइन से हटकर अपनें पास बुला लिया और साथ साथ चलने को कहा | मैं 96  तक गिनती कर चुका था और मेरा मन अत्यन्त हर्षित था कि शायद वह नीच गुण्डा हममें से नहीं है तभी सत्तानवे आफीसर के बाद जाकर  वह लड़की रुक गयी यूनिफार्म में न होनें के कारण उसका नाम मैं उस समय न जान पाया | ब्रिगेडियर साहब नें फूलमती से मराठी में कहा ठीक से देख लिया | फूलमती नें स्वीकृति में सिर हिलाया | ब्रिगेडियर साहब नें उस गुण्डा आफीसर से कहा फाल आउट और उनके इशारे पर दो हवलदारों ने दायीं  और बायीं ओर से उसका एक एक हाँथ पकड़ लिया और उसे खींचकर हेड क्वार्टर की ओर ले चले | कमाण्डर साहब ने मुझसे कहा मेजर अवस्थी , " Accompany me to my office , let us take a decision." सारी पी ० टी ० परेड पर मौत का सा सन्नाटा छा गया | क्या बात है , क्या होने वाला है ? बिहार राज्य के सासाराम चुनाव क्षेत्र से आने वाला यहएन ० सी ० सी ० आफीसर कैद में क्यों ले लिया गया ? सासाराम तो बाबू जगजीवन राम का चुनाव क्षेत्र है , यह मराठा लड़की यहाँ क्यों आयी ? न जानें कितनें प्रश्न हर दिमाग में उछलकर उत्तर मांगनें लगे |
(क्रमशः ) 

Saturday, 13 January 2018

(गतांक से आगे )
                                        
                                               एलोरा की गुफाओं में घूमते समय पथरीले मार्गों के किसी एकान्त कोनें पर नताशा द्वारा कहा हुआ वाक्य मुझे स्मरण हो आया | अंग्रेजी में उसनें कहा था , " Sir,in India love becomes sacred in spiritual context,but why the vitol urges of human body are considered simful."मैं उसके इस प्रश्न का ठीक उत्तर नहीं दे पाया था | जहाँ तक मुझे याद है मैनें यह कहकर प्रश्न को टाल दिया था कि केवल भारत ही नहीं विश्व के प्रत्येक देश में शारीरिक प्यार आत्मिक प्यार से निचले स्तर का माना गया है | Christianity भी तो Adam और Eve के दैहिक आकर्षण को एक Sin ( अपराध ) मानती है और शायद इसीलिये अंग्रेजी का यह वाक्य बार -बार दोहराया जाता है , " Man was born in sin." नताशा मुस्कराकर चुप रह गयी थी पर मैं जानता हूँ कि उसकी आँखें मेरी पौरषीय भीरुता का उपहास कर रही थीं | रविवार की  शाम जब मैं अपर्णां और उसकी माँ के साथ डा ० ऊषा कालिया के घर पहुंचा तो वहां हंसती -खिलखिलाती किशोर -किशोरियों और तरुणियों का जमघट नजर आया | ऊषा की पुत्री अपनी ही यूनिवर्सिटी की एक छात्रा सखी पमेला को साथ ले आयी थी | पमेला टूरिस्ट विजा पर एक पखवारे में उसके साथ रहकर भारत के वैविध्य का आनन्द लेना चाहती थी | ऊषा कालिया की बेटी संयोगिता बचपन से ही मुझे जानती थी और मुझे Great Uncle कहकर पुकारती थी | अपर्णा की माँ उसके लिये बड़ी मम्मी थी और अपर्णां उसकी छोटी बहन | अपर्णां की माँ अपनें संकोच के  बावजूद मेरे अधिक आग्रह करनें पर मेरे साथ चली अवश्य जाती थी पर वह बात -चीत में हिस्सा न लेकर खाने -पीने की चीजों की व्यवस्था में लग जाया करती थी | Winsconsin यूनिवर्सिटी में अपनी थीसिस जमा करने के बाद लौटी संयोगिता  को मैनें काफी कुछ बदला हुआ पाया | उसकी चंचलता गंभीरता में बदल गयी थी और आधुनिक साज- सज्जा में भी मुझे ऐसा लगा कि वह भारतीय संस्कृति की नारी गरिमा को अधिक महत्व देने लगी है | अमेरिका जानें से पहले विश्वविद्यालय की वाद -विवाद प्रतियोगिताओं में वह भारतीय नारी  के जीवन पद्धति पर कड़े व्यंग्य किया करती थी और तलाक लेने वाली अपनी माँ को आदर्श के धरातल पर स्थापित करती थी | वह नारी स्वतन्त्रता की पूर्ण हामीं थी और यह मान कर चलती थी कि सामाजिक विकास के क्रम में भारतीय नीतिशास्त्र मध्य युग से आगे नहीं बढ़ सका है | पर अब मुझे ऐसा लगा कि कहीं बहुत अधिक गहरे में संयोगिता वैचारिक परिवर्तन के दौर में गुजर रही है | मुझे ऐसा लगा कि अमेरिका के प्रवास के दौरान उसके जीवन में शायद ऐसा कुछ घटा है जिसनें उसे नये सिरे से सोचनें के लिये बाध्य किया है | उसकी अमेरिकन सहेली पमेला उन्मुक्त स्वभाव की छरहरे और सुन्दर आकृति की एक मनभावन तरुणीं थी और वह टूटी -फूटी हिन्दी में बोल लेती थी | मेरी बेटी अपर्णां तरुणायी की ओर बढ़ रही थी और संयोगिता से बहुत पहले से ही प्यार पाने के कारण वह निः संकोच उस जमघट में शामिल हो गयी और भारतीय सन्दर्भों में नये उभरते जीवन मूल्यों की परिचर्चा में रस लेने लगी | मुझे इस बात की खुशी थी कि अपर्णां हिन्दी , अंग्रेजी और थोड़ा बहुत पंजाबी में भी अपनी बात सशक्त ढंग से कह सकती थी और उसकी तर्कशैली उसे मंच पर कई सफलतायें दे चुकी थी | संयोगिता उसे किसी भी बहस में बराबर का हकदार माननें लग गयी थी और कई बार मुझसे कह चुकी थी Great Uncle देखना अपर्णां गौरीशंकर की चोटी छुयेगी , मैं मुस्कराकर अपनी मूक स्वीकृति देता रहता था | अपर्णां की माँ कुछ अन्य गृहणियों के साथ खान पान की व्यवस्था में लग गयी | मैनें ऊषा जी से यह जानना चाहा कि संगीता डॉक्टरेट पाने के बाद क्या फिर यू ० एस ० ए ० जानें का विचार कर रही है तो उन्होंने बताया कि अभी इस दिशा में कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है | हो सकता है कि संयोगिता भारत में ही किसी अच्छे करियर की तलाश करे | डा ० ऊषा कालिया का अपना जीवन आर्थिक द्रष्टि से एक सफल -शिक्षित नारी का जीवन तो था पर प्रेम , विवाह , सन्तानोंत्पत्ति और फिर तलाक इन सबकी चाटक धूमिल रेखायें उनके चेहरे पर प्रतिबिम्बित होनें लगी थीं | निश्चय ही वह यह नहीं चाहती होंगीं कि संयोगिता के जीवन में वह सब घटित हो जो उनके जीवन में हुआ था | अटूट प्रेम की जीवन भर चलने वाली महाकाव्यीय गाथाओं से संयोगिता भली -भांति परिचित थी और उसे यद्यपि अपनें पिता से मिले हुये काफी समय हो गया था | फिर भी शायद वह अपने पिता को अपनें मन में किसी हीन धरातल पर खड़ा नहीं कर पा रही थी | डा ० ऊषा कालिया के तलाक की कहानी और उनके पति के पुनर्विवाह की चर्चा अन्य सन्दर्भों में की जाती रहेगी | यहाँ इतना कहना ही आवश्यक है कि संयोगिता के जीवन मूल्य अपनी माँ के जीवन मूल्यों से सम्पूर्णताः मेल नहीं खाते थे और वह अपने जीवन पथ के लिये मानव संम्बन्धों के आदर्श आयामों को छू रही थी | लगभग दो- ढाई घण्टे बाद जब हम आने के लिये प्रस्तुत हो रहे थे तो बाहर एक गाड़ी रुकी और एक अत्यन्त सुन्दर नवयुवती अंग्रेजी वेशभूषा में सिर पर Felt Cap  लगाये हुये अन्दर आयी | उसनें ऊषा जी से कहा , " Sorry aunty, I am too let . I was busy in the reheasal .और यह कहकर वह संयोगिता की ओर मुड़ी और हाँथ मिलाते हुये बोली , " How do you do  Sonyoo,you had a long stay abroad. संयोगिता नें उससे पूछा कहाँ से आ रही है  यह क्या पहन रखा है | आनें वाली सुन्दरी नें उसे बताया कि विश्वविद्यालय में शैक्सपियर की कमेडी "Twlth Night "मंच पर अभिनीत होनें जा रही है और मैं उसमें Oliya का रोल अदा कर रही हूँ | सीधे रिहर्सल से तुम्हारे पास आयी हूँ | मुझे दरवाजे तक गाडी में बैठानें के लिये डा ० ऊषा कालिया बाहर आयीं और जब अपर्णां की मां गाड़ी में बैठ गयी तो मुझसे धीरे से बोलीं , " प्रोफ़ेसर साहब यह जो लड़की अन्दर आयी है यही प्रियम्वदा है कैप्टन जबर सिंह की पुत्री | आपका बेटा राकेश इसी के साथ हीरो का रोल अदा कर रहा है | आपकी बेटी अपर्णां प्रियम्बदा से परिचित है | सुनकर मैं अपनें भीतर कहीं शंकाओं के गहरे अन्धेरे में डूब गया | हे भगवान् ! यह नाटक ,यह मंच , यह सिनेमायी चित्रण ,यह नारी मुक्ति आन्दोलन , यह सौन्दर्य प्रतियोगितायें और यह वस्त्र प्रदर्शनियाँ क्या हमारे घरों की मर्यादाओं को सुरक्षित रहनें देंगीं | पर क्या किया जाये ? बदलते समय को मुठ्ठी में बांधकर नहीं रखा जा  सकता पर क्या पता कहीं इस उथल -पुथल में समुद्र के अन्तः स्थल में पड़े गहरे मोती भी निकल आयें ? घर वापस आकर भी मेरा मन शंकाओं से घिरा रहा | अपर्णां बड़ी हो गयी है | उसके नख -शिख भी लुभावने हैं , उसकी प्रतिभा भी प्रभावी असर छोड़ती है | युवक उसकी ओर आकर्षित होनें लगे हैं | उसे  अच्छे -बुरे की निर्णय क्षमता कैसे मिल पायेगी | ऐसा कुछ किया जाये  कि Post Graduation के लिये उसे विदेश में जानें की व्यवस्था हो सके | उसे किसी Scholarship के लिये तैय्यार करना होगा अब वह युग नहीं रहा जब माँ -बाप की जिम्मेदारी लड़की की शादी कर देनें के बाद समाप्त हो जाती थी | लड़का भले ही आर्थिक द्रष्टि से सुद्रढ़ न हो पावे | पर लड़की को तो अपनें पैरों पर खड़ा करनें योग्य बनाना ही होगा | पलंग पर लेटे -लेटे न जानें कब झपकी आ गयी  और तन्द्रिल अवस्था में मन कई दशक पहले बचपन में देखे गये उन द्रश्यों को दोहराने लगा जो मेरे स्व ० पिता के अन्तिम प्रयाण के समय के थे | पिताजी के देहान्त के बाद मेरी माँ द्वारा किया हुआ अटूट संघर्ष और उनके अजेय जीवट की कथा मेरे उपचेतन से उभरकर अन्तर चक्षुओं के सामनें झलकने लगी | तीन -तीन अबोध बच्चों को छोड़कर परलोक सिधारे हुये पिता के गौरव को अक्षुण रखनें और बच्चों को पाल -पोषकर समर्थ बनानें की जिस जुझारू जीवन्तता नें माँ का निर्माण किया था उस निर्माण का थोड़ा -बहुत अंश तो उनकी सन्तानों में होना ही चाहिये | | हाँ हाँ मैं अपर्णा को समर्थ बनाऊंगा  ओक के उस वृक्ष की भांति जो पहाड़ों की सीधी खड़ी कटानों पर  भी सिर ऊँचा किये खड़ा रहता है | अन्तर चक्षुओं के आगे घूम गया गाँव के घर बाहरी दालान का वह द्रश्य जहां एक आठ वर्ष की बालिका और उसके दो छोटे भाई रोती सिसकती माँ की छाती में सिर छिपोये पड़े हों और उनका मृत प्राय पिता काष्ठ की पट्टिकाओं पर अन्तिम साँसे ले रहा हो | पर यहीं से तो शुरू होती है उस अदम्य जीवट की कहानी जिसनें एक नया इतिहास रच डाला | इतिहास में वर्णित रानियों की वीरता गाथायें हम सभी पढ़ते रहते हैं पर कुछ ऐसी गाथायें हैं जिन्हें हम कभी नहीं पढ़ते पर जो अपने साहस ,वीरता और अपनें परिवार की आन पर मर मिटनें की संकल्प द्रढ़ता से भरी पुरी है | उन्हीं गाथाओं में से एक है अपर्णा की दादी की कथा | अपने यत्न से आर्थिक स्वतन्त्रता पाकर भारत के नारी संसार के समक्ष नये मूल्यों की स्थापना और उन्हें ठोस व्यवहारिक धरातल पर मूर्तवान  करना | अपर्णा क्या उस विरासत के योग्य बन सकेगी ? वह संघर्षों की आग से नहीं गुजरी है | कंचन में मिला हुआ खोट अभी जलकर नष्ट नहीं हुआ है | बिना तप किये हुये कोई श्रेष्ठ उपलब्धि नहीं हो पाती | पर यह क्या ? यह कैसी स्वप्निल झांकी है ,यह तो स्वामी वृन्दावन पुरी जी हैं जो मेरी माँ के पैर छू रहे हैं | नहीं ,नहीं सन्त तो किसी के पैर नहीं छूते | मेरी माँ बताया करती थीं कि यदि पुत्र भी सन्त या सन्यासी हो जाय तो उसके पैर छुये जाते हैं क्योंकि उसमें ईश्वरत्व का अंश आ जाता है | मानवीय काया के सारे लगाव सन्त होते ही समाप्त हो जाते हैं | फिर वृन्दावन पुरी जी जिनकी यशोगाथा चारो ओर फ़ैली है मेरी माता जी के पैर क्यों छू रहे हैं ? इस रहस्य को तो खोलना ही होगा | तभी अपर्णां की माँ की आवाज सुनायी पड़ी , " उठो सुबह हो गयी ,मैं बेड टी बनाकर ले आयी हूँ | "
                                              आँखें मलते हुये मैं उठ बैठा | दीवाल घड़ी पर नजर पडी तो देखा कि सुबह के छः  बज चुके हैं | अरे भाई , जल्दी ही तैय्यार होना होगा | प्रातः नौ बजे कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डा ० खण्डेलवाल का व्याख्यान होना है | विषय है " भारत के महाकाव्यों में नारीपात्र " अंग्रेजी का प्रवक्ता होनें पर भी मेरे ऊपर ही मंच संचालन की जिम्मेदरी सौंपी गयी है | मानवकीय संकाय में किसी विभाग में भी Extension लेक्चर होना हो तो मुझे ही मंच संचालन करना पड़ता था | मंच संचालक को कुछ समय पहले पहुँच कर अपनें को आश्वस्त करना पड़ता है कि सबकुछ ठीकठाक है | कि श्रोता समय के पहले बैठ गये हैं | कि शान्ति बनाये रखनें की पूरी व्यवस्था हो गयी है और कि मंच पर किस किस को लाकर बिठाना है | लेक्चर के बाद प्रश्न पूछनें का भी सुअवसर श्रोताओं को दिया जाता था | जिज्ञासु श्रोता अपना कोई एक प्रश्न विद्वान वक्ता से पूछते थे और इस प्रकार विद्वान वक्ता की जीवन द्रष्टि के कुछ सशक्त पहलू उजागर हो जाते थे | हिन्दी साहित्य के फाइनल इयर के दो प्रतिभाशील विद्यार्थी मेरे सम्पर्क में आये थे | एक को मैनें यह प्रश्न पूछनें को कहा था , क्या दशरथ पुत्र राम को अपनी पत्नी जनक पुत्री सीता को परित्याग करने का कोई सामाजिक ,नैतिक या वैधिक अधिकार था ?उनका यह कार्य सामाजिक उन्नयन की दिशा में कितना सार्थक माना जा सकता है ? दूसरे विद्यार्थी को मैनें यह प्रश्न लिखवाया था ,क्या पांचाल के राजा द्रुपद की पुत्री द्रोपदी का पांच पाण्डव पतियों को समान भाव से शरीर समर्पण करनें का विधान एक सोची समझी राजघरानें की कूटनीतिक चाल थी या पाण्डवों द्वारा अपनी माता कुन्ती के आदेश का पालन मात्र ? मैं जनता था कि इन प्रश्नों पर डा ० खण्डेलवाल को काफी गहरायी से सोच -विचारकर उत्तर देना होगा और उन्हें अपनें पाण्डित्य ,अपने भाषाधिकार और अपनी सामाजिक सूझ -बूझ दर्शानें का पूरा समय मिल जायेगा | विद्यार्थियों से यह कह दिया गया था कि डा ० साहब जो भी कहें उसे सुन लेनें के बाद उसपर आगे तर्क -वितर्क करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इन प्रश्नों का उत्तर गणितीय परिधियों में नहीं घेरा जा सकता | यह प्रश्न हजारों वर्षों से अनुत्तरित रहे हैं और प्रत्येक बदलते सामाजिक सन्दर्भों में इनकी नयी -नयी व्याख्यायें होती रहेंगीं | लेक्चर समाप्ति और चाय पान के बाद प्राचार्य कक्ष में बैठकर डा ० खण्डेलवाल नें मुझसे पूछा क्या मैं हिन्दी और अंग्रेजी के महाकाव्यों के तुलनात्मक अध्ययन में कोई  रूचि रखता हूँ और मेरे हाँ कहनें पर उन्होंने मुझे कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित होनें वाली हिन्दी प्रोफेसरों की गोष्ठी में आनें के लिये आमन्त्रित किया | उन्होंने यह भी जानना चाहा कि क्या हिन्दी में अंग्रेजी महाकाव्य BEUWOLF (वियो उल्फ ) और PARADISE LOSTके मानक हिन्दी अनुवाद प्राप्य हैं और मैनें अपनी जानकारी में आये हुये कुछ नाम उन्हें सुझाये | उन्हें विदा करनें के बाद स्टाफ रूम में उनकी कही हुयी बातों पर गरमागरम चर्चा होनें लगी | हिन्दी की प्राध्यापिका डा ० स्नेह लता बंसल डा ० खण्डेलवाल को पुरुष की पशु शक्ति का प्रचारक कहकर छोटा करनें लगीं जबकि डा ० ए ० सी ० कम्बोज उन्हें स्वस्थ्य जीवन दर्शन के प्रभावी वक्ता के रूप में प्रशंसित करनें लगे | पर यह तो सब होता ही है अकेडमिक सर्किल में | ध्यान आ गया कि अपर्णां की माँ नें आते समय कहा था कि भोला पंसारी से पांच शेर शुद्ध सरसों के तेल के लिये बोल देना | सोचा लौटते समय रास्ते में उसी मार्ग में रहने वाली कपिला बुधराजा से मिलता चलूँगा वे राजनीति शास्त्र में रिसर्च कर रही हैं और कई बार अपनी थीसिस " The political affiliation of scheduled caste voters in shora kothi" पर परिचर्चा के लिये मुझसे मिल चुकी हैं | घर पहुंचने पर पत्नी नें बताया कि गाँव के मुन्ना बाबा का एक पत्र आया है जिसमें उन्होंने खेतों को बेच देनें की बात लिखी है | अरे भाई इस जीवन में कितना झंझट झमेला है | किन किन मोर्चों पर आदमी लड़ने जाय ?  पर जूझना तो होगा ही ,निराला की पंक्तियाँ मन में उभर आयीं | " करना होगा यह समर पार ,झेलना सांस का दुसह भार " पर संघर्ष की शक्ति कहाँ से लाऊँ ? लौटता हूँ फिर अपनेँ बचपन की ओर माँ की गोद में बैठे हुये एक अबोध चार पांच वर्ष के बालक के रूप में ,वही तो है वह स्थान ,वह शक्तिस्थल जहां से पुनर्जीवन देनें  वाली संजीवनी मुझे मिल जाया करती है |
(क्रमशः ) 

Friday, 12 January 2018

(गतांक से आगे )
                                  
                                      दक्षिण भारत भ्रमण पर निकली नताशा नें अपनें मोहक व्यक्तित्व से मेरे साथ चल रहे सभी तरुण विद्यार्थियों का मन मोह लिया और वे सब उसे अपनें मित्र के रूप में स्वीकारनें लगे | नताशा ने उनसे पूछा कि वे सब अब आगे किस टूरिस्ट स्पॉट की ओर  जायेंगें तो उन्होंने बताया कि वे औरंगाबाद होते हुये अजंता और एलोरा की गुफाओं का चित्रांकन और गुफा संभरण देखेंगें | ऐसा ही प्रोफ़ेसर साहब का पूर्ण नियोजित प्लान है | उसनें विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वह भी उनके साथ अजंता एलोरा चलना चाहेगी | मैं इसके लिये सहमत नहीं था पर विद्यार्थियों के सामूहिक अनुरोध प्रक्रिया में बार -बार मेरे विरोध को संयमित करने का काम किया और अन्ततः मुझे इस बात के लिये सहमत हो जाना पड़ा कि वह हम लोगों के साथ औरंगाबाद होते हुये अजंता, एलोरा तक चले | आगे की व्यवस्था जिसमेँ मीनाक्षी और रामेश्वरम की विजिट शामिल थी बाद में देखी जायेगी | उस रूसी तरुणीं में जिसे हम नताशा के नाम से जानते हैं गजब का जीवट था | उसनें जर्मन लेडी टूरिस्ट से याचना  की और उन्हें बताया कि वह उनका साथ छोड़कर अब हम सबके साथ अजंता एलोरा देखनें जायेगी | जर्मन लेडी टूरिस्ट का आग्रह नकारकर वह हमारे साथ औरंगाबाद के लिये चल पड़ी | रूस से अकेले चलनें का साहस जुटा पानें वाली यह तरुणीं एक क्वालीफाइड आर्कीटेक्ट थी | अपनी अर्जित कमायी से ही वह दक्षिण भारत भ्रमण पर निकली थी | अपनें माता -पिता की सहमति लेकर वह दक्षिण भारत की गुफाओं , मन्दिरों और शिल्प आकृतियों का कलात्मक अध्ययन करना चाहती थी | आर्कीटेक्ट होनें के नाते उसे दक्षिण भारत के मन्दिर और बलीपुरम के रथ टंकन आकर्षित कर रहे थे | अजंता और एलोरा की गुफायें तो विदेशी पर्यटकों के लिये सदैव अटूट आकर्षण का सोर्स रही है | दरअसल मैं नहीं चाहता था कि नताशा हमारे साथ चले क्योंकि मैं भीतर से आशंकित था कि मेरे विद्यार्थियों में से  कहीं कोई अभद्र व्यवहार न कर बैठे | यद्यपि मैं जानता था  वे विद्यार्थी अत्यन्त सुसंस्कृत परिवारों से हैं | और उनका व्यवहार कभी भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर सकता फिर भी एक विदेशी सुन्दरी तरुणीं का सामीप्य मुझसे अतिरिक्त सावधानी की मांग करता था | कहना न होगा कि मेरे साथ के विद्यार्थी रिजर्वेशन चार्ट में बिल्कुल पास -पास बिठाये गये थे जबकि मैं उसी डिब्बे में उनसे कुछ दूर हटकर रिजर्वेशन पा सका था | महाविद्यालय के नियमों के मुताबिक़ मैं इस रेल यात्रा में उच्चतम श्रेणीं का हकदार था पर मैनें जानबूझकर इस स्लीपर क्लास में ही अपनी बर्थ रिजर्व करवायी थी | ऐसा अनुशासन और व्यक्तिगत देख -रेख के लिये आवश्यक भी था | और ऐसा करने से मैं उन विद्यार्थियों के और नजदीक आ गया था|  एलफेण्टा केव से औरंगाबाद की यात्रा अधिक लम्बी नहीं है और नताशा कभी विद्यार्थियों के पास और कभी मेरे पास सहज भाव से आकर बैठती रही | औरंगाबाद में उसनें अपनें रात्रि विश्राम के लिये हम जिस टूरिस्ट रिजॉर्ट्स में ठहर रहे थे उससे सटे हुये एक दूसरे टूरिस्ट रिजॉर्ट्स में एकल कक्ष का प्रबन्ध किया था | आज दो हजार अठारह में भारत की तरुण नारियां काफी कुछ स्वतन्त्र जीवन जीनें में स्वतन्त्र हैं पर आज से पचपन साठ वर्ष पहले भारत की कोई शिक्षित तरुण सुन्दरी अकेले अपरिचित युवकों के साथ पर्यटन पर निकलनें का साहस जुटा पाती ऐसा मानना मेरे लिये संम्भव नहीं हो पाता | पर रूस के स्त्री -पुरुष समानतावादी संस्कृति नें नताशा को सशक्त जीवन मूल्य प्रदान किये थे | और उसमें इतना आत्म बल था कि उसका निर्णय अपनी स्वतन्त्र मान्यताओं पर आधारित होकर किसी पारम्परिक नीति शास्त्र से बंधा नहीं था | उसका हमारे साथ चलने का एक कारण सम्भवतः यह भी रहा होगा कि भारत की ललित कलाओं की मेरी थोड़ी बहुत जानकारी उसे थोड़ी बहुत प्रभावित कर गयी होगी | प्रस्तर मूर्तियों के निर्माण में प्राचीन भारतीय शिल्पियों की त्रिकालजयी प्रतिमा सारे विश्व में सराही गयी है | गुफा भित्त -चित्र के रूप में अजन्ता के चित्र आज भी विश्व में आश्चर्य का विषय बनें हैं और इन सब विस्मयों से बड़ा विस्मय है विशाल भारत की हैरतगंज विविधता | खान -पान ,पहनाव , भेष -भूषा , भौगोलिक परिवेश ,रंग ,कद और कटान की आश्चर्यजनक विविधता भारत को विश्व के सभी देशों से अलग खड़ा कर देती है | विदेशी टूरिस्टों के लिये तो इसका एक निराला आकर्षण ही होता है | पूजा -पाठ , धार्मिक मान्यतायें और मजहबी अनुष्ठानों के अनगिनत स्वरुप भी विदेशी टूरिस्टों को गहन दार्शनिक उलझनों में डाल देते हैं | क्वालीफाइड आर्कीटेक्ट होनें के नाते नताशा को आकृतियों के कटाव और स्थापत्य कला के जटिल आयामों का पूरा ज्ञान था और वह उन्हें अत्यन्त गहराई से खोजती मापती थी | साथ ही वह यह चाहती थी कि आकृतियों , मन्दिरों और चित्र वीथियों से जुड़े हुये पौराणिक और धार्मिक प्रसंगों से वह पूरी तरह अवगत हो जाये ताकि ललित कला को समूचे सन्दर्भों में व्याख्यायित किया जा सके | अब यदि सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के जीवन की महत जीवन घटनाओं का ज्ञान ही न हो या जातक या बोधिसत्व परम्परा से कोई कभी न जुड़ा हो तो उसे अजन्ता के भित्त चित्रों का पूरा आनन्द मिल ही नहीं पायेगा | इसी प्रकार एलोरा गुफाओं में पहाड़ों पर काट कर बनाये गये रथ और दशानन की बाहु शक्ति का प्रदर्शन तभी पूरी तरह समझ में आ पायेगा जबकि भारत की महाकाव्यीय परम्परा से पर्यटक को थोड़ा -बहुत परिचित करा दिया जाये | सामान्य गाइड्स के मुकाबले नताशा नें मुझमें  शायद ऐसी ही कोई संम्भावना देखी होगी इसीलिये उसने मनोवैज्ञानिक ढंग से विद्यार्थियों को अपना मित्र बनाकर उनके सामूहिक आग्रह द्वारा मेरे सम्पर्क में रहनें का मार्ग खोज लिया था | निश्चय ही इसमें नताशा की विशुद्ध जिज्ञासावृत्ति और ज्ञान पिपासा ही थी पर गहरे कलात्मक ज्ञान से अनिभिज्ञ विद्यार्थी उसके साथ को एक विदेशी नारी के रोमांचक सामीप्य के रूप में ले रहे थे | मेरे पास बैठने  पर और औरंगाबाद में पर्यटन कक्ष में मेरे साथ कुछ देर बैठकर उसनें विश्व के महान मूर्तिकारों और चित्रकारों जैसे माइकल एंजोलो ,लियो - लार्डो व विन्सी तथा आधुनिक काल के बहुचर्चित चित्रकार पिकासो के सम्बन्ध में जो बात -चीत की उसनें मुझे उसका प्रशंसक बना दिया उसका अंग्रेजी ज्ञान बहुत अधिक सुद्रढ़ नहीं था पर कला की गहरायी में पैठनें की उसकी शक्ति निश्चय ही प्रशंसा के योग्य थी | पर वह सुन्दरी तो थी ही और तरुण भी तथा मुक्त जीवन शैली की पथगामी | स्वाभाविक था कि उसका सहचर्य मुझे भी सुखद लगनें लगा और मुझे लगा कि निश्चय ही नताशा का साथ प्रेरणादायक और उन्नयनकारी हो सकता है | शाम को पहुंचकर हम सबनें औरंगाबाद के किले को उसके प्रकाशमान और अँधेरी चक्रव्यूही वीथियों में गुजरकर देखा और हमें लगा कि मुगलकाल में भी युद्ध और सुरक्षा के जिन प्रकारों को हिन्दुस्तान नें तलाशा था वे अपनें युग में निश्चय ही अद्वितीय रहे होंगें | प्रातः  औरंगाबाद से चलकर टूरिस्ट बसों में अजन्ता ,एलोरा तक पहुंचने की व्यवस्था थी | रात को गुड नाइट कहकर नताशा जब समीप के पर्यटन कक्ष में जानें लगी तो मुझे ऐसा लगा कि उसकी आँखों में कोई मूक निमन्त्रण है | आज मैं जानता हूँ कि शायद ,यह एक भ्रम ही था पर उमर के उस दौर में मैं काफी देर तक मानसिक रोमान्स की पैंगें लगाता रहा | उन दिनों U.S.S.R.विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्रों में से एक था और United States  Of America को सीधी टक्कर देने की हिम्मत केवल वही कर सकता था | साम्यवादी व्यवस्था का सबसे सुद्रढ़ गढ़ होने के नाते और अन्तरिक्ष अनुसन्धान का प्रथम पहरुआ होनें के नाते उसकी धाक प्रत्येक देश में मानी जाती थी | भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री प ० जवाहर लाल नेहरू कम्युनिष्ट व्यवस्था को सर्वथा न स्वीकार करते हुये भी समाजवादी व्यवस्था के पोषक थे | भारत और रूस की मित्रता एक आदर्श के रूप में ली जाती थी | और संकट की प्रत्येक घड़ी में सोवियत संघ भारत के साथ खड़ा होता था | शीत युद्ध के उस दौरान में नेहरू जी ,मिश्र के नासिर जी और युगोस्लाविया के टीटो जी नान एलाइन्स मूवमेन्ट के प्रबल समर्थक थे और उसके संस्थापक भी | भारत के पढ़े लिखे अधिकाँश लोगों का मत था कि सोवियत संघ की नारी ही आज विश्व में सच्ची स्वतन्त्रता की अधिकारिणीं है और वह तन सुख को भी नीति विरोधी या हेय क्रियाओं में नहीं मानती | हो सकता है सोवियत संघ की यह विचारधारा अति शिक्षित और अति स्वतन्त्र तथा आर्थिक द्रष्टि से आत्मनिर्भर नताशा के विचार तन्त्र को प्रभावित कर रही हो पर मुझे तो भारत  का सहस्त्रों वर्ष पुराना नीति  विधान जकड़े हुये था और मैं देहरी पर खड़ा होकर भी उसको पार करनें की हिम्मत नहीं कर सकता था | पर आज मैं सोचता हूँ कि ऐसा होना ही शायद उचित था | यही तो मार्ग हैं जिसनें भारतीय संस्कृति को आज भी एक पावन सुहावन आरक्षण दे रखा है | पर उस रात के कुछ घण्टे मुझे महर्षि पाराशर और विश्वामित्र की याद दिलाते रहे और इन पौराणिक कथाओं का रहस्य भी तभी मेरी समझ में आया | मैनें मन ही मन इन ऋषियों को उनकी हिम्मत पर दाद दी और अपनी कायरता के सुखद -दुखद अनुभव का अहसास भी किया | एकाध बार मुझे लगा कि कुछ विद्यार्थी अपनें विश्राम कक्षों से बाहर आकर यह देख रहे हैं कि उनके प्रोफ़ेसर साहब अपनें कमरे में हैं या नहीं | और हल्की खांसी के साथ मैनें उन्हें यह अहसास कराया कि मैं इन्द्रियजयी हूँ और स्थित प्रज्ञ मुद्रा मेँ विश्राम कर रहा हूँ | हल्के धुंधलके में ही नताशा तैय्यार होकर मेरे कक्ष के द्वार पर आ गयी | और उसकी उनीदीं आँखें उसके रात भर जगने का अहसास करा रही थीं पर अभी तो हमारा साथ शेष ही था | अजन्ता और एलोरा की उन गुफाओं में भी तो हम अपनें हावभाव और मूक संवाद से आपनें आत्मिक लगाव को व्यक्त कर सकते थे और एलोरा की गुफाओं की ओर बढ़ते हुये एक सूनसान पगडण्डी के वर्तुल कोनें पर कुछ ऐसा हुआ भी | पर छोड़ो विगत की उन बातों को | त्रिपुरारी शिव नें तीसरी आँख खोलकर कामदेव को सदेह भष्म कर दिया पर उसका सूक्ष्म रूप  तो अब  भी संसार की मानवता को पीड़ित कर रहा है | मुझे यदि कुछ क्षणों के लिये उसनें अपनी दबोच में ले लिया तो इसमें इतनें विस्मय की कौन बात ? और फिर वीथिका के उस सूनसान कोनें का वह क्षणिक संवाद और दैहिक सानिध्य क्या किसी मानें में स्वर्गीय अनुभूति से कम था ? अरे ,यह क्या क्षण के सतांश में मैं कितनी लम्बी मानसिक यात्रा पर निकल पड़ा | हरवंश राय बच्चन ने ठीक ही तो गाया है , " जो बीत गयी सो बात गयी | " न तो आज वह सोवियत संघ है और न ही शायद नताशा का वह रूप रंग रहा हो पर मेरे मन में तो Keats के Grecian Urn की तरह निरन्तर उसकी वही सौन्दर्य मूर्ति मानस में अंकित रहेगी और मेरी चाहत भरी निगाहें उसे अपनें आलिंगन में घेरती रहेंगीं | पर अरे यह तो घर आ गया था | डा०  उषा कालिया ने कहा , " प्रोफ़ेसर साहब कहाँ खो गये थे ? मैं कुछ कहती रही पर आपनें सुन कर भी अनसुना कर दिया | " आप जानते ही हैं कि अनिल तिर्खा नें एक ड्रैमेटिक क्लब की स्थापना की है और उसके सचिव के रूप में आपका बड़ा बेटा राकेश मनोनीत किया गया है और कैप्टन जबर सिंह की बेटी प्रियम्बदा उसकी ज्वाइन्ट सेक्रेटरी है | गाड़ी द्वार पर रोक  कर मेरे कुछ देर ठहरने के आग्रह को नकारते हुये उन्होंने Good Bye की और आगे बढ़ गयीं | जाते -जाते बोलीं आपनें प्रियंबदा को देखा है उसे आने वाली फिल्म हरियाणा की छोरी में नायिका के रूप में चुना गया है | तो क्या मुझे कैप्टन जबर सिंह से टकराना होगा  या अपनेँ बेटे राकेश से  ,या अपनी समाज व्यवस्था से , पर अब न तो मन प्राण में वह शक्ति है और न सामाजिक अमूल चूल परिवर्तन की वह दुर्दम्य अभिलाषा परास्त मन यह विचार  करने पर मजबूर हो रहा है कि मनुष्य के सारे प्रयत्न निरर्थक हैं | घटनाओं पर किसी का एकाधिकार नहीं हैं | अपनी सारी मित्रता के बाद भी और अपनें सारे प्रभाव को इस्तेमाल करने के बाद भी पण्डितजी रक्षा मन्त्री कृष्णा मेनन को बचा नहीं पाये | अरे अभी कुछ महीनें पहले की ही बात है जब हम डा ० गोपाल सिंह के माध्यम से कृष्णा मेनन से मिले थे और हमें उनके हाथों से बनी हरी चाय की पत्तियों से बनी छनकर आने वाली चाय का आनन्द मिला था | भाषा का इतना समर्थ व्यक्तित्व रक्षा प्रबन्धन के मामले में कितना निक्कमा साबित हुआ यह सोचकर मैं विस्मित रह गया | मेरा सारा भाषा ज्ञान और तर्क क्षमता परिवार प्रबन्धन को संम्भालनें में असमर्थ हो रही है | नहीं मुझे अपनें मूल्य निर्धारित करने हैं | | यदि जाति व्यवस्था निरर्थक है और समाज का बोझ है तो उसको तोड़ देने की हिम्मत मैं क्यों नहीं कर पा रहा हूँ | पर हर जाति की अपनी कुछ पारम्परिक जीवन यापन शैलियाँ हैं उस जीवन शैली में विजातीय सम्बन्ध कुछ अटपटापन तो नहीं ला देंगें | मान लो मैं हिम्मत करता और नताशा दैहिक रूप से मेरे सम्पर्क में आ जाती तो क्या यह मिलन अपावन होता | स्वेच्छा से किया हुआ मिलन किन सन्दर्भों में पावन है और कब अपावन बन जाता है इस पर एक ठोस निर्णय तक तो पहुंचना ही होगा | पर इन पारिवारिक झमेलों से ऊपर का भी तो एक संसार है | हम अपनें राष्ट्रीय हर्ष और उल्लास को अपनें व्यक्तिगत सुख दुख से ऊपर मानकर एक वृहद मानव समाज से सम्बन्धित हो सकते हैं | चीन के हांथों मिली हुयी हमारी सामरिक पराजय स्वतन्त्र भारत के माथे पर एक कलंक है | सहस्त्रों वर्ग मील भारतीय भूमि पर अपना दावा बताकर कब्जा कर लेना विश्वासघात का सबसे घृणित दांव -पेंच है | पर क्या किया जाय ? दस हजार भारत के शूर वीर सैनिकों का ब्रिगेडियर होशियार सिंह के नेतृत्व में बलिदान होनें की रोमांचक गाथा क्या हमें Heroic ऊंचाइयों तक नहीं ले जाती | धन्य हैं माँ भारती के इन शूरवीरों को | फाहियान और ह्वेनसांग स्वतन्त्र ने जिस भारत के स्वर्णिंम अतीत का चित्रण किया हो और जहां से गौतम बुद्ध का दर्शन शिष्य बनकर लिया गया हो उसी मित्र देश के साथ इतना जघन्य विश्वासघात | भारत को इसका प्रतिकार करना ही होगा | पर क्या हमारे राजनेता इतनी दूर द्रष्टि से सम्पन्न हैं कि वे  हमें  विजय शिखर पर पहुंचा सकेंगें | इन समस्याओं में अपनें परिवार का छोटा -मोटा सुख --दुःख ही यदि हमें बांधकर रखे तो क्या यह प्रबुद्ध नागरिक के लिये उचित होगा | अभी कुछ ही महीनें पहले तो कृष्णा मेनन नें कहा था कि चीन पर उनका अटूट विश्वास है और हिन्दी -चीनी भाई -भाई का नारा इतिहास के पन्नों पर अमिट सत्य के रूप में उभरेगा | कितनें बड़े भ्रम के जाल में फंसा था यह मनीषी मार्क्सवादी चिन्तक ? चीन के विश्वासघात ने ही युग पुरुष नेहरू को भी एकाध वर्ष बाद हमसे विलग कर दिया | तो क्या किसी राष्ट्र द्वारा घोषित की जाने वाली बातें केवल शब्द जाल ही होती हैं | व्यक्तिगत जीवन में भी तो ऐसा ही दिखायी पड़ रहा है | राकेश कहता है कि प्रियम्बदा उसकी बहन है और मंच की हर नारी कलाकार उसकी बहन बनकर उभर रही है | पर एक तरुण युवक कहीं इस बहनापे के भाव के पीछे रोमांचक अनुभूतियों की क्यारी तो नहीं सजा रहा है | पर होने दो जो कुछ भी हो रहा है | डा ० ऊषा कालिया की लड़की Winsconsin विश्वविद्यालय में अपनी थीसिस सबमिट कर कुछ दिनों के लिये भारत वापस आ रही है  | बड़े आग्रह से उन्होंने अगले रविवार मुझे और राकेश की माँ को घर पर बुलाया है | पर राकेश की मां तो जानें को तैय्यार नहीं | कहती है अंग्रेजीदां औरतों से मेरी नहीं बनती | तुम्हीं जाओ इन बलकटी जनानियों के बीच | नहीं नहीं समय के साथ -साथ राकेश की माँ को बदलना होगा | नारी सौन्दर्य तो उसका किसी से काम नहीं पर अंग्रेजी भाषा के ज्ञान का अभाव उसमें क्यों हीन ग्रन्थि पैदा कर रहा है | समाज में फ़ैली इस मानसिक दासता से भी दो दो हाँथ करने पड़ेंगें | पर मैं स्वयं भी तो अंग्रेजी लिखनें बोलनें को हिन्दी लिखनें बोलनें से श्रेष्ठ कार्य समझता हूँ | अपनी मातृ भाषा की उपेक्षा और पराये देश की मातृ भाषा की उपासना | प्रतिश्रुत होता हूँ आज से मैं हिन्दी में लिखनें बोलनें के लिये | अभ्यास में थोड़ा समय तो अवश्य लगेगा पर द्रढ़ निश्चय ही तो लक्ष्य प्राप्ति का कारगर हथियार है | भारतेन्दु जी की पंक्ति मन में उभर आयी , " निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति कर मूल ,बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय का शूल , "
                                 पर अगले रविवार की शाम डा ० ऊषा कालिया के घर अमरीका से आयी उनकी पुत्री और उसकी सहेली और सहेलियां क्या मातृ भाषा में किये गये मेरे वार्तालाप का पूरा आनन्द ले पायेंगी ?
( क्रमशः )

Monday, 8 January 2018

( गतांक से आगे )
                                     सोने जाने से पहले अपर्णा नें मुझे बता दिया था कि ऊषा आंटी का फोन आया था | उन्होंने सुबह ठीक सात बजे तैय्यार रहने को कहा है | मैनें उससे पीताम्बर बंसल का नम्बर मिलाने को कहा और उन्हें बता दिया कि मैं ऊषा जी के साथ आ रहा हूँ गाड़ी भेजने की आवश्यकता नहीं है |
                                       डा ० ऊषा कालिया का भी अपना एक इतिहास है | इतिहास तो हर व्यक्ति का होता है पर सामान्य से अलग हटकर प्रयोगात्मक जीवन जीने वाले कुछ व्यक्तियों का इतिहास सामाजिक मूल्यों को कई नये संकुचन और विस्तार प्रदान करता है | डा ० ऊषा कालिया उन दिनों केवल ऊषा ही थीं | पच्चीस  वर्ष पहले कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के एम ०  ए ० अंग्रेजी की छात्रा ऊषा यूनिवर्सिटी की ब्यूटी क़्वीन चुनी गयी थीं | | टेलीविजन का अभी सूत्रपात ही हुआ था  और रेडियो पर उनके गीत और गजलों की धूम मची रहती थी | उनकी मनमोहक अदायें यूनिवर्सिटी के तरुण छात्रों पर रोमांस के अनेकानेक सुनहरे सपनें बिखेरा करती थीं | कैसे वह मिसेज कालिया बनीं | एक कन्या की माँ बनीं और फिर व्यक्तित्व की टकराहट से पति -पत्नी नें सम्बन्ध विच्छेद करने का निर्णय किया | तलाक के बाद उन्होनें डाक्ट्रेट की ,सरकारी कालेज में नौकरी प्राप्त की ,और इन दिनों एक डिग्री कालेज में प्राचार्या के पद पर रहकर ख्याति के नये कीर्तिमान अर्जित किये | इस सबकी कहानी फिर कहीं कहनी होगी | फिलहाल तो इतना ही कहना है कि अब पचास वर्ष की आयु में भी ऊषा जी एक सुहावने व्यक्तित्व की धनी हैं | उनका आकर्षण अब भी नारी सौन्दर्य के पारखियों को अपनी ओर खींचता है | उनकी पुत्री अमेरिका के Wisconsin यूनिवर्सिटी में जीव विज्ञान में डॉक्टरेट कर रही है |
                                पौने सात बजे ऊषा जी की गाड़ी दरवाजे पर आ खड़ी हुयी | गाड़ी वे स्वयं ही ड्राइव करती हैं ड्राइवर का कोई झंझट नहीं | मैं तैय्यार था ही आग्रह करने पर उन्होनें ड्राइंग रूम में बैठकर एक चाय का प्याला लिया और फिर मुझे लेकर वे झझ्झर गर्ल्स कालेज की ओर चल पड़ीं | रोहतक से झझ्झर लगभग घण्टे सवा घण्टे का ड्राइव वे है | मैं अगली सीट पर था और ऊषा जी के गाड़ी ड्राइव करने के आत्म विश्वास से प्रभावित हो रहा था | रास्ते में अधिक बात -चीत न हो सकी | उन्होंने यह अवश्य पूछा  कि क्या मैं ड्राइव कर लेता हूँ और मेरे नहीं कहने पर जोर देकर यह कहा कि मुझे ड्राइव करना सीखना चाहिये क्योंकि आने वाले कल में यह एक बाध्यता बन जायेगी | गाड़ी लेना सरल होगा पर ड्राइवर रखना कठिन | उन्होंने यह भी कहा कि सेल्फ ड्राइव का अपना एक अलग आनन्द है | मैं देखनें सुननें में अधेड़ लग रहा था और ऊषा जी मुझसे एक दो वर्ष छोटे होने पर भी बिल्कुल नवयुवती सी दिखायी पड़ रही थीं | उनके साथ बैठनें में मुझे एक सुखद अनुभूति हुयी | मैनें अनुभव किया कि सौन्दर्य का सामीप्य नर चेतना में एक उर्ध्वगामी चेतना का संचार करता है | शारीरिक सम्बन्धों की परिभाषा में इस स्फूर्ति का कोई योगदान नहीं होता पर अन्तर की प्राणवान सृजन शक्ति को विकसित करने में यह स्फूर्ति बहुत सहायक होती है | शायद इसीलिये महान से महानतम कवियों , कथाकारों , चित्रकारों ,शिल्पियों और कला सृष्टाओं की प्रेरणा के मूल में कोई न कोई नारी उपस्थित रहती है | जैविक देह धारण की सारी अपवित्रता अपना फूहड़पन खोकर आदि शक्ति नारी के भव्य काल्पनिक रूप में कलाकार के जीवन में एक दैवी प्रेरणां बनकर उभर आती है | ठीक आठ बजे हम झझ्झर गर्ल्स कालेज के द्वार पर पहुंच गये | डा ० आर ० एन ० शर्मा वहां पहले से ही उपस्थित थे और पीताम्बर जी नें बताया कि चण्डीगढ़ से आने वाले डा ० भांभरी लगभग दस मिनट की दूरी पर हैं | मैं पीताम्बर जी से कालेज के सम्बन्ध में जानकारी इकठ्ठा करने लगा | ऊषा जी और डा ० शर्मा एक दूसरे से शिक्षा विभाग की नीति सम्बन्धी जटिलताओं पर बातचीत पर लग गये | पीताम्बर जी ने बताया कि कालेज पिछले दस वर्ष से चल रहा है ,कि कालेज में लगभग तीन सौ छात्रायें हैं ,कि कालेज में अभी विज्ञान संकाय नहीं है और स्टाफ में तीस के करीब अध्यापक हैं | इसी बीच डा ० भांभरी हमारे बीच आ पहुंचें | पीताम्बर जी नें आग्रह किया कि हम सब कुछ जलपान कर लें  क्योंकि लगभग बीस के आस -पास कण्डीडेट्स उपस्थित हो चुके हैं | और हमें काफी देर तक इन्टरव्यूह में बिजी रहना पड़ेगा | पूंछने पर उन्होंने बताया कि कालेज की प्राचार्या शकुन्तला गोयल पुस्तकालय से लगे एक कक्ष में चाय -पानी की व्यवस्था कर रही हैं | | हम सब जलपान के लिये उस कक्ष में ले जाये गये | शकुन्तला जी पैतालिस  पचास के बीच रही होंगीं और भरे शरीर की संभ्रान्त घर की महिला जैसी दिख रही थीं | मेरा अपना अनुभव था कि अग्रवाल घरों की नारियां अपनी सारी ऊंची शिक्षा के बावजूद भारतीय परम्परा के प्रचलित जीवन मूल्यों को आदर्श मानकर अपना जीवन संजोती हैं और उनका यह आचरण उन्हें आधुनिक जीवन शैली से भले ही अलग कर दे पर उन्हें नारित्व का एक मर्यादा भरा गौरव प्रदान करता है | शकुन्तला जी को देखने पर एक सहजता का भाव मन में उभर आता था मुझे लगा कि वह प्राचार्या पद के गौरव को संभ्भालनें में पूरी तरह समर्थ हैं | अग्रवाल बिरादरी का खान -पान शुद्ध घी से बने मिष्ठानों और सूखी मेवा तथा ताजे फलों से भरा पुरा रहता है | गर्मी के दिनों में शुद्ध विलोये दूध की लस्सी भारतीयता का रंग और स्वाद का अनोखापन दोनों को साथ लेकर मन को उल्लासित कर देती है | नाश्ते के समय बंसल जी नें बताया कि झझ्झर के बलवान हलवाई की खोये की मिठाई सारे हरियाणां में प्रसिद्ध हैऔर दिल्ली के भी न जानें कितनें धनिक उसके यहां से कलाकन्द मंगवाते रहते हैं | मुझे खुशी हुयी यह सोचकर कि आधुनिक विज्ञापनों से दूर बलवान हलवाई को एक ऐसा प्रशंसक मिल चुका है जिसकी बात सत्य से बहुत दूर नहीं होगी | मैं जान गया कि लौटते समय ऊषा जी बलराम हलवाई की दुकान से अवश्य निकलेंगीं |
                                     साक्षात्कार के लिये हम सब महाविद्यालय के दाहिने पार्श्व में बनें मैनेजमेन्ट कक्ष में पहुँच गये | पास के एक कमरे में बीस से ऊपर नवयुवक खड़े बैठे आपस की बातचीत में लगे हुये थे | यहां मैं यह बता देना चाहूंगा कि उन दिनों सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त महाविद्यालयों में प्रवक्ताओं की नियुक्ति के लिये कुछ विशेष प्रावधान किये गये थे | सेलेक्शन कमेटी का चेयरमैन कालेज की मैनेजिंग कमेटी का प्रधान होता था | चार सदस्य और होते थे | जिनमें एक सबजेक्ट एक्सपर्ट ,एक उपकुलपति का नामिनी ,एक डायरेक्टर आफ हायर एजूकेशन का मनोनीत प्रतिनिधि और एक महाविद्यालय का प्राचार्य या प्राचार्या होता था | समझा यह जाता था कि पाँचों एक मत होकर दो नाम नियुक्ति के लिये उपकुलपति के पास प्रस्तावित करेंगें | उपकुलपति की स्वीकृति मिलनें पर पहले स्थान पर चयनित प्रत्याशी को नियुक्ति पत्र दिया जायेगा | यदि किसी कारणवश वह उसे स्वीकार नहीं करता तो दूसरा प्रत्याशी नियुक्ति पत्र का अधिकारी होगा | पर कई बार ऐसा भी हुआ था कि सेलेक्शन बोर्ड के पाँचों मेम्बर्स किसी एक नाम पर सहमत न हों | और तब बहुमत का फैसला उपकुलपति की स्वीकृति के लिये भेजा जाता था | सहमति न होनें वाले सेलेक्शन पैनल के सदस्य अपना -अपना स्पष्टीकरण अलग से अंकित कर देते थे | यह उपकुलपति पर निर्भर था कि वह बहुमत का फैसला मानें या फिर दुबारा चयन प्रक्रिया को गतिशील करे | सेलेक्शन कमेटी का चेयरमैन होनें पर भी मैनेजिंग कमेटी के प्रधान को कोई वीटो पावर नहीं था हाँ , इतना अवश्य था कि यह मान लिया जाता था कि महाविद्यालय का प्राचार्य या प्राचार्या चेयरमैन की राय से अलग जानें का साहस नहीं जुटा पायेंगें | पर दो के मुकाबले तीन भारी पड़ते थे | सब्जेक्ट एक्सपर्ट ,बी ० सी ० नामनी और डी ० एच ० ई ० नामनी मैनेजमेंट से अलग पक्ष मुक्त निर्णय लेनें में समर्थ थे और कई बार उन्हें प्रधान की स्वार्थ प्रेरित चयन प्रक्रिया को चुनौती देनी पड़ जाती थी | मैं जानता था कि झझ्झर कन्या महाविद्यालय में यह स्थिति खड़ी हो सकती है | अग्रवाल बिरादरी के प्रमुखतम महाविद्यालय का प्राचार्य होनें के नाते मैं इस बात से अवगत था कि चयन प्रक्रिया में बिरादरी का थोड़ा -बहुत पक्षपात तो होना ही है | आप जानना चाहेंगें मैं कैसे किसी अग्रवाल कालेज के प्राचार्य पद पर पहुंचा तो इसका श्रेय मैं भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू को देना चाहूंगा | और फिर मैं तो सम्मिलित पंजाब में पंजाब विश्वविद्यालय की नीतियों के मातहत नियुक्ति पा सका था | पर इस सब की  बात और कहीं उचित सन्दर्भ में समावेषित की जायेगी | यहां तो झझ्झर  कन्या महाविद्यालय में चल रही चयन प्रक्रिया का लेखा -जोखा विचारणीय है | दफ्तर के बड़े बाबू ओम प्रकाश गुप्ता कन्डीडेट्स की लिस्ट लेकर अंदर आये | पच्चीस अप्लीकेंट्स में चार कन्डीडेट्स उपस्थित नहीं हो पाये थे | 21 के दस्तखत लिस्ट पर मौजूद थे | बड़े बाबू को थोड़ी दूर हटकर कक्ष में ही बैठा लिया गया ताकि वह हर कण्डीडेट्स को कक्ष में बुलानें से पहले उसके Resume की एक -एक कॉपी सेलेक्शन कमेटी के प्रत्येक मेम्बर के सामनें प्रस्तुत कर दें | बायोडाटा और अकेडमिक Achivment पर एक नजर डाल लेने के  बाद ही कन्डीडेट से पूछना -जांचना अधिक सार्थक बन पड़ता है | तय किया गया कि हर प्रत्याशी को लगभग पन्द्रह मिनट दिये जायें | इस सारी प्रक्रिया में लगभग साढ़े पांच घण्टे लगने थे | पैनल का प्रत्येक मेम्बर तीन तीन मिनट तक अपनें पश्न पूछेगा और कन्डीडेटके पाजटिव और निगेटिव रिसपान्स को नोट करेगा | पैनल का प्रत्येक मेम्बर कन्डीडेट्स के परफारमेंस को अपनी सम्पूर्णताः ABCDचार ग्रुपों में श्रेणीबद्ध करेगा | पांच A पाने वाला प्रथम , और चार A और एक B पाने वाला द्वितीय स्थान पर रहेगा | यदि इससे फैसला न हो सके तो  A के 75 अंक B के 60 अंक ,C के 50 अंक और D के  40 अंक मानकर टोटल कर लिया जायेगा और अंकों के आधार पर प्रथम और द्वितीय स्थान तय किया जायेगा | 21  प्रत्याशियों में से 12  P.H.D. होल्डर थे | चार के पास M. Phil.डिग्री थी और पांच नें यू० जी ० सी ० का टेस्ट पास कर रखा था | सभी प्रत्याशी प्रवक्ता होनें की न्यूनतम अकेडमिक क्वालीफिकेशन पूरी करते थे | 6 घण्टे चले इस इंटरव्यूह में क्या पूछा गया और क्या उत्तर मिले , क्या घटित हुआ और क्या घटित होनें से रह गया इस सबका पूरा विवरण कई सौ पृष्ठों की पुस्तक का आधार बन सकता है | ऐसा करना विषय वस्तु को अनावश्यक विस्तार देना होगा | यहाँ तो इतना बताना ही उचित है कि इक्कीस प्रत्याशियों में से 6 महिलायें अग्रवाल परिवारों से सम्बन्ध रखती थीं और इन 6 में से ही प्रथम और द्वितीय स्थान को भरना होगा ऐसा मानकर ही सेलेक्शन पैनल के सभी सदस्य चल रहे थे | फिर भी संम्भावना यह थी कि कोई प्रत्याशी अग्रवाल न होकर भी कहीं इतना ब्राइट न हो कि अग्रवाल होनें की विशेषता पर ग्रहण लग जाये | अच्छा ही हुआ कि ऐसा कोई प्रत्यासी द्रष्टि में नहीं आया | सभी का मानसिक Level और भाषा ज्ञान उन्नीस बीस एक जैसा ही लगा | बल्कि सच तो यह है कि भाषा ज्ञान का कड़ा मुकाबला उन 6  अग्रवाल महिलाओं में ही था | प्रश्न यह था कि प्रथम स्थान पर कौन रखा जाय और द्वितीय स्थान पर किसे रख दिया जाये | यह सुनिश्चित था कि जिसे भी प्रथम स्थान पर रखा जायेगा वही महाविद्यालय में आकर ज्वाइन कर लेगा | चूंकि महाविद्यालय के प्रवक्ता की नौकरी अग्रवाल परिवार के गौरव मापदण्डों के अनुकूल ही होती है | 6  महिलाओं में से सीधा मुकाबला चित्रलेखा और चित्रकला के बीच ही था | मुझे सबसे बड़ा हर्ष यह था कि इन सारे कण्डीडेट्स में लालिमा भारद्वाज नहीं थी | उसने अप्लीकेशन तो डाली थी पर साक्षात्कार में वह उपस्थित नहीं हुयी | निश्चय ही वह अंग्रेजी साहित्य के क्षितिज पर एक उगता हुआ सितारा है | सम्भवतः उसनें चण्डीगढ़ ,रोहतक ,फरीदाबाद या गुड़गांव के अतिरिक्त किन्हीं छोटे शहरों में न जानें का निर्णय ले लिया हो | पर यदि कहीं वह इंटरव्यूह में आयी होती तो हमारे बीच खींच तान का का एक नया अध्याय जोड़ जाती | पर अब तो चित्रकला और चित्रलेखा को लेकर निर्णय करना था | दोनों नें P.H.D.कर राखी थी | चित्रलेखा नें डी ० एच ० लारेन्स पर अनुसन्धान किया था जबकि चित्रकला नें समरसेट माम पर | चित्रलेखा एक बड़े यद्योगपति की लड़की थी जबकि चित्रकला के मामा सांसद थे और एक बहुत बड़े तरुण नेता के नजदीकी विश्वास पात्रों में माने जाते थे | जहां तक मेरा प्रश्न था मैं इन दोनों में प्रतिभा के धरातल पर कोई विशेष अन्तर नहीं कर पाया था हाँ चित्रकला के समरसेट माम के प्रसिद्ध उपन्यास द रेजर्स यज पर कुछ प्रश्न किये तो उसके उत्तर कुछ लड़खड़ाये से लगे | पर मैं उसे कुछ नर्वस नहीं करना चाहता था | मैनें उससे समरसेट माम की प्रसिद्ध कहानी मि० नोआल के तथ्य के बारे में पूछा तो उसनें कहानी के सम्बन्ध में अपनी अनिभिज्ञता प्रकट की | अन्त में मैनें  पूछा कि माम के अतिरिक्त और किसी उपन्यासकार का साहित्य पढ़ा है तो उसनें बताया कि उसनें थामस हार्डी की दो रचनायें पढ़ी हैं | जब उससे पूछा गया कि क्या वह हार्डी के फारमर ओक नाम के किसी एक चरित्र से परिचित है तो उसने स्वीकृति में सिर हिलाया और बताया कि अब वह उस औपनास्यिक कृति का स्मरण नहीं कर पा रही है | चित्रलेखा से भी मैनें डी ० एच ० लारेन्स के सम्बन्ध में कुछ प्रश्न पूछे | सन्स एण्ड लवर्स पर कुछ उसके उत्तर ठीक लगे यद्यपि उनमें मौलिक कुछ भी नहीं था | | यह पूछे जाने पर कि हिन्दी साहित्य के चित्रलेखा नाम की नारी पात्र से उसका कोई परिचय है या नहीं तो उसनें चुप्पी साधकर यह जाहिर किया कि वह कोर्स की किताबों के अतिरिक्त साहित्य की विपुलता के बारे में अधिक रूचि नहीं रखती | हाँ उसका अंग्रेजी उच्चारण अपेक्षाकृत अधिक शुद्ध था | यह पूछे जाने पर कि Indict का क्या उच्चारण होगा या Situation का क्या उच्चारण होगा उसनें ब्रिटिश उच्चारण पर आधारित सही जवाब दिये | मेरी समीक्षा में चित्रलेखा और चित्रकला बराबर के स्थान पर खड़ी थीं | ऊषा जी मेरी ही तरह समान स्तर पर दोनों को रेखांकित कर चुकी थीं | D.H.E. नामनी और V.C. नामनी विल्कुल तटस्थ लग रहे थे | अब रह गये मैनेजिंग कमेटी के प्रधान पीताम्बर बंसल जी और उनके कालेज की प्राचार्या शकुन्तला गोयल जी | इन दोनों में प्राथमिकता की सहमति नहीं बन पा रही थी | शकुन्तला जी चित्रकला को वरीयता दे रहीं थी , जबकि पीताम्बर जी चित्रलेखा को प्रथम स्थान पर रख रहे थे | सभी प्रत्याशियों को सूचित कर दिया गया कि निर्णय एक सप्ताह के बाद उन तक पहुंचा दिया जायेगा और पीताम्बर जी नें उन सबको एक समोसा खिलाकर और एक चाय का  प्याला पिलाकर विदा कर दिया | बाद में ऊषा जी नें मुझे बताया कि आपसी असहमति का मूल कारण यह था कि जब शकुन्तला जी की नियुक्ति हुयी थी उस समय पीताम्बर जी का विरोधी ग्रुप अध्य्क्ष पद पर काबिज था | पूर्व अध्यक्ष अब भी राजनीति की एक मानी हुयी हस्ती हैं | और चित्रकला उन्हीं से समर्थित हैं शकुन्तला जी इसीलिये उसे प्राथमिकता दे रही हैं | पर पीताम्बर जी भी दांव पेंच के मानें हुये खिलाड़ी हैं | वे  चित्रकला को दूसरे स्थान पर रखवा कर अपनी वरिष्ठता तो सिद्ध कर ही पायेंगें साथ ही विरोधियों को यह भी बता देंगें कि वे क्या करें पैनल में आये सब्जेक्ट एक्सपर्ट नें चित्रलेखा को प्रथम स्थान दे दिया | मैनें सोचा कि यह दोष तो मुझ पर मढ़ा ही जाना है दोनों ही तरुणियाँ पढ़ी -लिखी सुशिक्षित , सुशील हैं और मेरी पुत्रियों के समान हैं | आज नहीं तो कल दोनों ही इस अग्रवाल कालेज में कहीं न कहीं अपना स्थान बना ही लेंगीं | मैनें शकुन्तला जी को प्रधान जी से अलग ले जाकर बात करने की सलाह दी | और बताया कि हम तीनों उनकी सहमति को सहर्ष स्वीकार कर लेंगें | आखिरकार कालेज उन्हें मिलकर चलाना है और नारी शिक्षा के उच्च अभियान में उन्हें हरियाणा राज्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है | पीताम्बर जी और शकुन्तला जी प्राचार्य कक्ष में जाकर कुछ देर बातचीत करते रहे | वहां क्या हुआ मैं नहीं कह सकता | संम्भवतः उन्होंने अन्य किसी से भी सीधे या परोक्ष रूप में सम्पर्क किया हो पर जब वे आये तो वे दोनों इस बात पर सहमत थे कि चित्रलेखा को प्रथम और चित्रकला को द्वितीय स्थान पर रख दिया जाय और अपनी अनुशंसा के साथ सेलेक्शन पैनल इन नामों को डीन ऑफ कॉलेज्स के पास विश्वविद्यालीय स्वीकृति के लिये भेज दें | आपसी टकराव का यह सौहार्दपूर्ण समझौता हम सबके मन को भा गया और फिर देर से प्रतीक्षित तीन बजे का लंच मधुर और मित्रतापूर्ण संवादों ,चुटकुलों और छोटे -मोटे व्यक्तिगत प्रसंगों के बीच काफी रुचिकर लगा | चलते समय पीताम्बर जी नें बलवान हलवायी की दुकान से मगाये हुये कलाकन्द के एक -एक किलो के पैकेट स्मृति स्वरूप भेंट किये और विनम्रता पूर्वक आग्रह किया कि हम इन्कार न करें | यह अग्रवाल कालेज की परम्परा है  | प्राचार्या शकुन्तला जी नें हमें महाविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य के सीखनें -समझनें की सूझ देने के लिये आमन्त्रित करने का प्रस्ताव दिया | इतनी सब औपचारिकताओं के बाद ऊषा जी नें हमें घर पर छोड़नें के बात कहकर गाड़ी में बैठनें के लिये आमन्त्रित किया | यद्यपि पीताम्बर जी आग्रह कर रहे थे कि वे अपने ड्राइवर के साथ मुझे घर पर छुड़वा देंगें | पर मैं जिसके साथ आया था और जिसका साथ मुझे सुखद लगा था उस सानिध्य को थोड़ी देर और पा लेने का मोह मुझमें जग आया | पीताम्बर जी को धन्यवाद देते हुये और शकुन्तला जी का आग्रह स्वीकार करते हुये हम रोहतक की ओर चल पड़े | रास्ते में डा ० ऊषा कालिया नें मुझे बताया कि आपका बड़ा बेटा राकेश इन दिनों मंच पर अभिनीत नाटकों में हीरो का पार्ट लेकर काफी चर्चित हो रहा है और तो और उसके साथ की कई मंचीय कलानेत्रियाँ उसके साथ घूमती -फिरती देखी गयी हैं | उन्होंने बातों ही बातों में यह भी बताया कि एकाध जगह जातीय समीकरण न मिलने के कारण कहीं संघर्ष की नौबत न आ जाये | दूसरा बेटा सन्दीप भी वेट लिफ्टिंग और वाक्सिग चैम्पियन होने के नाते कई परिवारों की निगाह में है | उन्होंने स्वयं एक दिन सन्दीप को किसी डान्स क्लब में एक मोहक पार्टनर के साथ थिरकते देखा था | मैं शंकित हो उठा | पर ये तो होना ही है तरुणायी यदि बिना  किसी घटना के घाट जाये तो क्या उसे तरुणायी कहा जा सकता है और फिर उच्च शिक्षित युवक -युवतियां यदि जीवन में प्रयोग नहीं करेंगें तो नयी मंजिलों की तलाश कैसे हो पायेगी | नहीं नहीं मुझे घबराना नहीं चाहिये | अपनी निम्न मध्य वर्गीय मानसिकता से ऊपर उठकर हमें आने वाली चुनौतियों को स्वीकार करना होगा | निरन्तर बच कर चलते रहना कायरता को बुलावा देना है | मनुष्य का मनुष्य होना ही काफी है | नारी की भी क्या कोई जाति होती है | यह तो वैसे ही हुआ जैसे कोई राजनीतिज्ञ एक तिहायी नारी आरक्षण को लेकर यह कह रहे हैं कि नारियों में भी जाति के आधार पर आरक्षण होना चाहिये | पर आने वाला कल का संसार अनुमान के बल पर गढ़ा नहीं जा सकता काल की अप्रतिहत गति उसे अपने चरण तालों पर स्वयं ही नचा देगी | क्या मेरे जीवन में भी ऐसा नहीं घटा है | क्या रूस की उस  स्वस्थ्य  तरुण युवती ने मुझे अपनी ओर पूरे वेग से नहीं खींच लिया था जब मैं उसे बाम्बे में Elephanta Caves के भ्रमण के दौरान मिला था पर यह तो बहुत पुरानी बात है उस समय मैं था ही क्या 27 -28 वर्ष का तरुण ,पुष्ट वक्षस्थल ,मछली वाली बाहें ,गहरे घने बाल और ज्योतित आभा वाला विशाल माथा | और जिन 11 लड़कों की टीम का मैं प्रोफ़ेसर इन्चार्ज था वे भी तो यह माननें पर विवश हो गये कि रूस की उस सुन्दरी नें उनके उस प्रोफ़ेसर को अपनें प्रेम पाश में जकड़ लिया है | पर सचमुच क्या ऐसा ही था ? क्या यह भ्रम मात्र ही नहीं था और मैं न जानें अवचेतन की किस लहर के आवर्त में घिरकर दशकों पहले Elephanta Caves में होनें वाले उस परिचय वीथिका में विचरण करने लगा जहां हमें उन जर्मन लेडी टूरिस्ट से मुलाक़ात हुयी थी जिनके साथ वह रूसी बाला दक्षिण भारत की यात्रा पर चल निकली थी | दरअसल वह बाला रूस से तो  अकेली ही निकली थी पर दिल्ली आकर वह जरमन लेडी टूरिस्ट के साथ वह उनकी गाड़ी में हो ली थी क्योंकि उसे जर्मन भाषा का भी ज्ञान था जिसका टूटा -फूटा अनुवाद वह अंग्रेजी में कर लेती थी | दक्षिण भारत की यात्रा पर बम्बई होकर जानें वाले लगभग सभी पर्यटक Elephanta Caves न देखें ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता | Ferry से समुद्र की छाती चीरकर जब हम टापू में बनें ElephantaCaves की कलात्मक प्रस्तर मूर्तियों पर पहुंचे तो उनके सौन्दर्य को देखकर अवाक रह गये | अनगढ़ पत्थर को काटकर सौन्दर्य और भब्यता का इतना पावन और सुहावन मूर्ति रूप दर्शक को अवाक कर देता है | भगवान् शिव और जगदम्बा पार्वती की पत्थर काटकर गढ़ी हुयी प्रतिमायें अपनी भव्यता में अदभुत हैं और उनके ऊपर अपनी कान्ति बिखेरता हुआ नवोदित चन्द्रमा | जब मैं वहां पहुँचा तो लगभग 10 जर्मन लेडीज अपने साथ लाई हुयी उस रूसी बाला से यह पूछ रहीं थीं कि वे प्रस्तर प्रतिमायें किसकी हैं और उनके ऊपर चाँद क्यों टिका हुआ है | रूसी बाला अपनी टूटी -फूटी अंग्रेजी में यह बात वहां खड़े एक लोकल गाइड से पूछ रही थी और वह गाइड उसे अपनी उल्टी -सीधी अंग्रेजी में समुद्र मन्थन और उस मन्थन से निकले विष ,अमृत , लक्ष्मी ,ऐरावत , और उच्चश्रवा की बातें बता रहा था | जर्मन लेडी टूरिस्ट यह जानना चाहती थीं कि चन्द्रमा का उन प्रस्तर प्रतिमाओं से क्या सम्बन्ध है और गाइड उन्हें यह बता रहा था कि शिव जी नें विष पी लिया था इसलिये चन्द्रमा उन्हें शीतलता प्रदान कर रहा है | भारतीय परम्परा के अनुसार यह उत्तर ठीक ही कहा जायेगा पर वह रूसी बाला इससे सन्तुष्ट नहीं थी | और न ही सन्तुष्ट थीं वे जर्मन बालायें | कुछ बहस मुवाहियासा चल रहा था और ठीक उसी समय मैं वहां जा पहुंचा | मेरे साथ के विद्यार्थी थोड़ा पीछे कुछ इधर -उधर देखा -दाखी कर रहे थे | मैनेँ गाइड और लेडीज के उस पौराणिक वाद -विवाद को कुछ हल्का करने के लिये हास्य का पुट देकर कहा कि भगवान् शिव और जगदम्बा पार्वती अभी -अभी प्रणय के स्थायी सूत्र में बंध गये हैं और पास -पास बैठे हुये हैं और आने वाले सुखद क्षणों की कल्पना कर रहे हैं | उनके ऊपर चमकता चाँद उसी कल्पना का द्रश्य रूप है | आप जानती ही हैं कि मैरिज के बाद हनीमून मनाया जाता है और भगवान् शिव और माता पार्वती के ऊपर चन्द्रमा का यह टंकन उसी हनीमून का प्रतीक है | इस बात से उन नवयुवतियों में हर्ष की लहर दौड़ गयी और वे ताली बजा -बजा कर तथा अंग थिरकाकर अपनी खुशी व्यक्त करने लगीं | रूसी बाला नें मेरी और देखा ,धन्यवाद किया और क्षण के सतांश में ही अपनी आँखों में न जानें क्या कह डाला इसी बीच मेरे विद्यार्थी मेरे पास आ गये और मुझे उन तरुण सुन्दरियों से घिरा देखकर भौचक्के रह गये |
(क्रमशः )

Sunday, 7 January 2018

( गतांक से आगे )
                                          पिछले वर्ष जब मैं 26 जनवरी को एन ० सी ० सी ० परेड  से Best Turn out का इनाम लेकर लौटी थी तब मैनें तुम्हें बताया था कि मनोज यादव जो मेरठ कालेज से आये थे को Best all round कैडेट आफीसर का इनाम मिला था | और जब तुमनें हंसकर पूछा था कि कहीं दिल तो नहीं लगा बैठीं तो मैनें सिर्फ मुस्करा दिया था | पर तेरी बात नें मुझे कहीं बहुत गहरे छू लिया था | मनोज का लम्बा छरहरा शरीर उसका आकर्षक व्यक्तित्व और उसकी प्राणवान गंभ्भीरता मुझे अपनी ओर खींच रही थी | मुझे ऐसा भी लगा था कि मनोज मुझसे भी प्रभावित हुये थे और निकटता पाने की चाह करने लगे थे | इस दिशा में फिर मेरी तेरी कोई बात आगे नहीं बढ़ी थी क्योंकि तू अपने कालेज की गतिविधियों में खो गयी और मैं अपनें सपनों के संसार में | एक बात और थी कि तुम्हारे पिताजी के दबंग व्यक्तित्व नें मुझे डरा रखा था और मैं यह हिम्मत नहीं कर सकी कि तुम्हें मैं अपनी प्रेम कहानी का साझीदार बना लूँ | तुम्हारी माँ से मुझे तुम्हारे पिता जी के जीवन मूल्यों का पूरा परिचय मिल गया था और मैं जानती थी कि वे अपनी सारी मंचीय उदारता के बावजूद परम्परा से आती जाति मर्यादाओं का उल्लंघन स्वीकार  नहीं कर पायेंगें | तू भी तो अपने पिता पर ही पड़ी है | कितना गजब का सयंम है तुझमें | पर यारां , मैं तो चाहत की बाढ़ में मूल- हीन लता की भांति बह चली | मनोज अच्छे खासे जमींदार घर का लड़का है और वह चाहे तो उसे सेना में कमीशन भी मिल सकता है | पर उसे तो भौतिकी का विद्वान बनने का नशा चढ़ा हुआ है | बी० एस  ० सी ० में 80 प्रतिशत से अधिक अंक  पाकर उसका उत्साह और बढ़ गया और उसने एम  ० डी  ० यूनिवर्सिटी में सम्भवतः मेरे ही कारण एम  ० एस ० सी ० में प्रवेश लिया | मैं बी ० ए ० के अन्तिम वर्ष में पहुँच ही चुकी थी | हम  कई बार Lake  पर मिलने लगे | पर हमारा मिलन सदैव शारीरिक मर्यादाओं के अनुशासन में ही रहता रहा | मनोज होस्टल में ही रहता था | और यदा -कदा मानसरोवर पार्क में शाम के समय आ जाता था जहां मेरे पिताजी वाक (Walk ) पर जाते थे | धीरे -धीरे अपने आप आदर पूर्व व्यवहार से उसने मेरे पिताजी का विश्वास प्राप्त कर लिया और जब पिता जी ने रिपब्लिक डे परेड में उसके Best officer की बात जानी तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुये | साथ ही अस्सी प्रतिशत से अधिक का उसका Academic Career और उसका आकर्षक व्यक्तित्व भी उनके मन को भा गया | एन  ० सी ० सी ० की कैडिट होनें के नाते पिताजी नें एकाध बार मुझसे पूछा क्या मनोज नाम का नवयुवक रिपब्लिक डे परेड में Best Cadet Officer चुना गया था तो मैनें उन्हें प्रशंसा पूर्ण शब्दों में उसके चुने जाने के बात बतायी | उन्हें यह पता नहीं था कि मैं और मनोज एक दूसरे से मिल -जुल रहे हैं | अगले दिन जब वे अपने वाक से वापस लौटे तो मनोज को भी साथ लेते आये | ड्राइंग रूम से उन्होंने आवाज दी , " अरी बेटे सुनैना ,देखना कि मेरे साथ कौन आया है | " मैं मनोज द्वारा इस आने वाले घटनाक्रम से पहले ही परिचित करा दी गयी थी | और ड्राइंग रूम में घुसते ही मैनें नमस्ते करके नाटकीय ढंग से पूछा , " क्या आप एन ० सी० सी ० कैडेट आफीसर मनोज कुमार हैं |  आपको तो रिपब्लिक डे परेड पर Best cadet Officer चुना गया था | आप तो मेरठ से हैं | रोहतक कैसे आना हुआ | पापा से कैसे मिले | " मनोज नें आश्चर्य प्रकट करते हुये कहा अरे आप सुनैना हैं | आपको तो Best turn out गर्ल कैडेट आफीसर का इनाम मिला था | कितना सुखद संयोग है कि आपके पिताजी अपने साथ मुझे घर पर ले आये | उन्होंने मुझे यह नहीं बताया कि उनकी बेटी आने वाले कल में भारतीय सेना में एक सक्षम भूमिका निभायेगी | उन्होंने मुझसे सिर्फ यही बताया कि उनकी बड़ी बेटी बी ० ए ०  के अन्तिम वर्ष की छात्रा है और उसका छोटा भाई जीव विज्ञान के साथ बारहवीं कक्षा में पढ़ाई कर रहा है | आप शायद नहीं जानतीं कि मैनें एम ० डी ० यूनिवर्सिटी में एम ० एस ० सी ० भौतिकी में प्रवेश ले लिया है | और यूनिवर्सिटी के होस्टल में रह रहा हूँ | चलिये रोहतक में मुझे अपना एक घर मिल गया जहां मुझे अभिभावक के रूप में माता -पिता का आशीर्वाद मिलता रहेगा | माता जी से मिलाइये उनके चरण छूकर आशीर्वाद प्राप्त करूँ क्योंकि मुझे 10 बजे से पहले होस्टल पहुंचना है | विश्वविद्यालय की नियम संहिता का यह एक अनिवार्य अंग है | याराँ जैसा मैं पहले कह चुकी हूँ मनोज की बातचीत का अन्दाज निराला है और उसकी नाटकीयता इतनी स्वाभाविक है कि बड़े से बड़ा विद्वान उसकी बातों की सच्चायी पर विश्वास कर लेता है | माता जी से मिलकर उनके पास बैठकर और जाते समय उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद पाकर मनोज नें अपने लिये मेरे घर आने का रास्ता बना लिया | माँ उसे मेरे बड़े भाई के रूप में लेने लगी और कई बार मेरा छोटा भाई भी हम दोनों के साथ विश्वविद्यालय परिसर में घूमने -फिरने जाने लगा | मनोज नें अपने घर का पूरा परिचय मेरी माँ को दिया उसकी बहन मेरठ में बी ० एस ० सी ० के दूसरे वर्ष में थी  और एक छोटा भाई अभी आठवीं कक्षा में पढ़ रहा था | | पिता जी सेना में सूबेदार के पद से सेवा निवृत्त होकर मेरठ शहर में आ गये थे जहां उन्होंनें अपना मकान बनवा लिया था | पास ही बीस किलोमीटर की दूरी पर करौंथा ग्राम में उनका एक पैतृक घर था और करीब बारह एकड़ खेती की जमीन थी | वे अपनें पिता के अकेले पुत्र थे | खेती करने के लिये उन्होंने दो स्थायी नौकर रख रखे थे जो उनके पैतृक घर में सपरिवार रहते थे | घर में ट्रैक्टर था और दूसरे खेती के आवश्यक संसाधन | सिंचाई के लिये नहरी पानी के अलावा ट्यूब बेल भी था | पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सम्पन्न किसानों का भरापुरा जीवन और साथ में सूबेदारी की ठसक और अच्छी खासी पेन्शन | मनोज हर द्रष्टि से स्वतन्त्र भारत का एक आदर्श तरुण कहा जा सकता था पर हिन्दू समाज की परम्परायें कई बातों में श्रंखला बनकर उसका मार्ग अवरुद्ध कर रही थीं | अपने बी ० ए ० के अन्तिम वर्ष में मैनें सभी कविताओं और कहानियों में तथा सामाजिक और शारीरिक विज्ञान की किताबों में यही लिखा हुआ पाया कि जाति गत भेदों का कोई ईश्वरीय रूप नहीं है | यह सारे भेद मानव की संकीर्ण सोच से उपजे हैं और जैसे -जैसे शिक्षा के साथ वैश्विक चेतना का विकास होगा यह सारे भेद नष्ट हो जायेंगें | परीक्षा  का समय निकट आने के कारण मैं लगभग दो महीनों से मिल नहीं पायी थी | और वो भी अपनी तैय्यारी और प्रेक्टिकल्स में उलझा हुआ था | | जिस दिन मेरा अन्तिम प्रश्नपत्र समाप्त हुआ मनोज कालेज के गेट पर मेरी प्रतीक्षा कर रहा था | मैनें अपनी स्कूटी निकाली और गेट पर आ गयी | द्वार पर मनोज नें मुझे पीछे बैठने को बोला और स्वयं स्कूटी चलाकर लेक (Lake )की ओर चल पड़ा | परीक्षायें लगभग समाप्त हो चुकी थीं | और लेक पर तरुण -तरुणियों की हंसती खिलखिलाती टोलियां नजर आ रही थीं | स्टैण्ड पर स्कूटी खड़ा कर हम दोनों लेक की ओर बढ़े | लेक पर नौकायें किराये पर लेकर स्वीमिंग की सुविधा उपलब्ध रहती है यह तो तुम भलीभांति जानती ही हो | कितनी बार तुम्हें भी तो मैंने अपनें भाई भाभी के साथ नौका विहार करते देखा है | | अरे यारां तेरी भाभी भी तो  किसी ब्यूटी क्वीन से कम नहीं | बहना ,सच मानना उस समय तक यद्यपि मेरा मन मनोज की तरफ आकर्षित था , फिर भी यदि मेरे माता -पिता कहते तो मैं अपनें सम्बन्ध को भाई बहन के रूप में ही सीमित रखती पर उस दिन कुछ ऐसा घटा जिसनें मेरे निर्णय को एक गहरे झटके के साथ नयी दिशा दे दी |
                                                       नौकायन के लिये कुछ सीमित संख्या में ही लेक के घाट पर नाव की उपलब्धि है | परीक्षा से मुक्ति पाकर न जानें कितने तरुण सैलानी नांव पर बैठे चक्कर लगा रहे थे | कहना न होगा लड़के -लड़कियों के मिले -जुले झुण्ड अपनी अदाकारियों से तरुणायी भरे रोमांस की नयी श्रष्टि रच रहे थे | हम दोनों नें पूरे पैसे देकर चार व्यक्तियों के बैठने वाली एक नौका अपने लिये तय कर ली | ज्यों ही हम नौका पर बैठने वाले थे दो नवयुवक हमारी ओर आये और उन्होनें कहा कि उन्हें भी नौका सन्तरण की तीब्र इच्छा है पर नौकायें मिल नहीं रही हैं | यदि आप दोनों हम दोनों को इस नौका में बैठने दें तो हमें अत्यन्त खुशी होगी | | हम आधा किराया दे देंगें | हम दोनों चंडीगढ़ से आये हैं और रोहतक की इस लेक में सैर करने का हमारा बड़ा मन है | मैंने मनोज से इशारे से उन्हें न ले चलने की बात की | | अच्छी भाषा के बावजूद वे दोनों नवयुवक मुझे मनचले आवारा से लग रहे थे |और उनकी आँखों में मुझे नशे का रंग दिखायी पड़ रहा था  पर अपनी सज्जनता में मनोज नें उनकी बात मान ली ,हांलाकि उसने जोर देकर यह कहा कि वह पैसे नहीं लेगा | परन्तु मानवता के नाते उनके अनुरोध को स्वीकार करेगा | नाव चल पड़ी और मनोज बल्लियां खेने लगा | बहना , तुम तो जानती ही हो कि कुछ नावें यन्त्र संचालित हैं और कुछ बल्लियों वाली | यह नांव भी बल्लियों से चलती थी | अपनी पुष्ट और छरहरी बाँहों से मनोज नें नांव खेना शुरू किया | मैं सरककर आगे उसके पास चली गयी | वे दोनों नवयुवक एक दूसरे पर हाँथ नीचे कर झील से पानी लेकर छींटाकशी करने लगे | एक नें दूसरे से कहा अबे कोई गाना सुना दे | फड़कती हुयी कोई चीज | दूसरे नें अपनें फटे बांस जैसे स्वर में सिनेमा की एक पंक्ति दोहरायी , " एक तरफ तेरा घर ,एक तरफ मैकदां ,होता नहीं फैसला | "
                  मैनें मनोज की ओर देखा पर वह नांव खेने में व्यस्त था और अपनी नांव को और कई नावों से आगे निकालना चाहता था | मुझसे बात किये बिना भी मेरे पास बैठने मात्र से उसका मन खुशी से झूम रहा था | इस बीच उस फटे बांस के स्वर वाले नवयुवक नें कुछ खिसक कर मेरे पैर पर अपना पैर रखनें की कोशिश की | मैं खिसक कर मनोज से सट गयी | फटा बांस बोला , " अरी जानां हम क्या पराये हैं ,नोटों की गड्डी निछावर कर दूंगा | " मनोज नें यह वाक्य सुन लिया बल्ली रोककर उसनें क्रोध भरी आँखों से उन दोनों की ओर देखा और बोला , " बद्त्तमीजी बन्द करो , Behave Like Gentlemen ."
                               फटे बांस का साथी बोला , " अरे यह तो अंग्रेजी बोले से , दो धक्का साले को पानी में डूबेगा हम परी के साथ सैर करेंगें | इतना सुनना था कि मनोज नें बल्ली छोड़ दी और एक भरापुरा तमाचा उसके गूलर गालों पर जड़ दिया | तमाचे के आघात से उसका सिर झुका , नांव लड़खड़ाई और वह पानी में गिर पड़ा | पर नांव के उलटनें के पहले ही मनोज नें बल्ली थाम ली और नांव संम्भल गयी | फटे बांस का साथी गहरे पानी में हाँथ पैर मारने लगा | शायद उसे ठीक से तैरना नहीं आता था | फटा बांस खड़ा हो गया और उसनें अपनी जाकेट के नीचे से एक बटनदार चाकू निकाली और उसका ग्यारह इंची ब्लेड खड़ा कर दिया | मनोज नांव संम्भालनें में मुंह दूसरी ओर किये था | मैं चिल्लायी पर इससे पहले कि मनोज देख पाता फटे बांस नें अपनी चाकू उसके गर्दन की ओर फेंकनें की कोशिश की | यारां , न जानें मुझे उस समय क्या हो गया बिजली की तेजी से मैनें उसके पंजे में अपनें दांत गड़ा दिये | चाकू अपना लक्ष्य चूक गया और पानी में जा गिरा | गर्दन फेरते ही मनोज सब कुछ समझ गया ,उसने लात के एक आघात से फटे बांस को अपनें साथी के पास गहरे पानी में डुबकी लगानें के लिये भेज दिया | पर रक्षा के इस प्रयास में नाँव का सन्तुलन बिगड़ गया और मैं गहरे पानी में जा पड़ी | एन ० सी ० सी ० में होते हुये भी मुझे अफ़सोस है कि मैं तैराकी नहीं सीख पायी हूँ और मुझे लगा कि जल शैय्या ही मुझे शायद अपनी गोद में हमेशा के लिये सुला लेगी | पानी मेरे मुंह नांक से होकर अन्दर भर गया और मैं चेतना शून्य हो गयी | मैं नहीं जानती कि उसके बाद क्या हुआ पर जब मेरी आँख खुली तो मैनें अपनें को लेक के किनारे कई युवक -युवतियों से घिरा हुआ पाया | मैं एक पेंड़ के नीचे घास पर चित्त पड़ी थी और मनोज मेरे पास ही बैठा था | यह तरुण और तरुणियाँ मनोज के क्लास फैलो थे जो संयोग से लेक पर भ्रमण करने आ गये थे | फर्स्ट एड का पूरा ज्ञान रखनें के कारण मनोज नें किस प्रकार मेरे पेट का पानी निकाल कर मेरी श्वांस को संचालित किया यह मैं ठीक से नहीं जानती पर हाँ मैं इतना अवश्य जानती हूँ कि ऐसा करनें में मनोज को मेरे उस अर्धमृतक शरीर को कई बार स्पर्श अवश्य करना पड़ा होगा | होश में रहकर चाह कर भी जो मैं कभी नहीं कर सकी प्रकृति नें उसे एक अत्यन्त निराले ढंग से पूरा करवा लिया | प्यारी सखी , तुझे क्या बताऊँ होश आते ही न जानें कितनें मिले जुले भाव मेरे मन पर छा गये ग्लानि भी हुयी ,हर्ष भी हुआ और चिन्ता भी | सामाजिक डर की दुखदायी छायायें मेरे मन को घेरनें लगीं | हाय जब यह शरीर अर्धचेतन अवस्था में मनोज का हो गया तो जिसनें उसे जीवन दिया है उसी को क्यों न सौंप दिया जाय पर मेरे माता -पिता क्या इसे स्वीकार करेंगें | सैकड़ों अनुभागों में बटा ब्राम्हण समाज क्या इसे स्वीकार करेगा और फिर मनोज के माता -पिता | उनकी सहमति असहमति का पता भी तो लगाना होगा बाद में ठीक हो जानें मुझे पता लगा कि उन दोनों मनचले अवारों को पुलिस नें बेहोशी की दशा में झील से निकाल कर पी ० जी ० आई ० में भरती कराया था जहां से होश आनें पर वे डिस्चार्ज कर दिये गये थे क्योंकि हमारी तरफ से उनके खिलाफ कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई गयी थी | | मनोज नहीं चाहता था कि हमारे नौकायन की बात परिवार वालों तक पहुचें | कैसे नया सूट खरीदनें का बहाना करके मैं उस दिन अंधेरा होनें के बाद घर पहुँची और किस प्रकार अतिरिक्त प्यार में डूबे मेरे माता पिता नें मेरी बातों में विश्वास कर लिया यह भी मैं नहीं जानती | पर आने वाला प्रभात मेरे जीवन की परीक्षा का प्रभात है यह मैं निश्चित रूप से  जानती थी क्योंकि मनोज नें कहा था कि कल वह घर जा रहा है और फिर वहां से उसे States में जानें का प्रबन्ध हो चुका है United States of America के Texas में उसके मामा एक मैनेजेरियल पोस्ट पर हैं और वहीं पर वह अपनें आगे के अध्ययन और Career की तलाश करेगा | रोहतक में अब उसका आना न हो सकेगा | | मैं चाहूँ तो उसके साथ चल सकती हूँ | उसके माता -पिता और सगे सम्बन्धी मुझे पाकर न केवल हर्षित होंगें बल्कि गौरव का अनुभव करेंगें | उसनें कहा कि सुनैना ,अन्तिम फैसला तुम्हें करना है | मैं तो जीवन और मरण दोनों में तुम्हारा अटूट साथी हूँ | प्रिये मैं यादव हूँ पर मैं क्या हूँ इसपर मेरा कोई वश तो नहीं है | सामाजिक विधान नें तो मुझे यादव बना दिया है और तुम्हें शर्मा | मैं नहीं जानता कौन बड़ा है और कौन छोटा | मैं इतना जानता हूँ कि मैं इक्कीसवीं शताब्दी का एक तरुण हूँ और तुम एक तरुणीं | मैं इतना जानता हूँ कि मंगल ग्रह के आगे शुक्र तक मंगल यान पहुँच चुका है | और कल्पना चावला तथा सुनीता विलियम्स अन्तरिक्ष में परिभ्रमण कर चुकी हैं | प्रिये मैं यह तो नहीं कहता कि तुम्हारी न पर मैं आत्महत्या कर लूंगा पर इतना अवश्य कह सकता हूँ कि तुम्हारी न पर जो मैं जीवन जियूँगा वह मुर्दे से बत्तर होगा | पिताजी ने तुम्हें लेने के लिये मेरठ से एक सजी -बजी गाड़ी भेजी है | रात्रि बारह बजे मानसरोवर पार्क के गेट  पर मैं उस गाड़ी के पास खड़ा प्रतीक्षारत रहूँगा | तुम्हारे घर से वहां तक आनें में पांच दस मिनट ही तो लगते हैं | निर्णय के लिये तुम स्वतन्त्र हो | क्या एक चुम्बन की भीख दोगी | और हल्के से मेरे होठों पर होंठ रखकर वह अश्रुपूरित आँखों से मुझसे विदा हो गया | मेरी बहना ,उस रात मैनें बातों ही बातों में खाना खाने के बाद पिताजी से जाति मुक्त व्याह सम्बन्धों के औचित्य के बारे में पूछा | उन्होंने उन्हीं पुरानी बातों को दोहराते हुये कहा कि उन्हें मरना पसन्द है पर अपने ब्राम्हण होनें की शाख पर आंच आनें की कोई विचारधारा स्वीकार नहीं है | गांधी ,नेहरू ,विवेकानन्द ,टालस्टाय ,और अटल अपनी जगह पर हैं पर वे अपनी जगह पर हैं क्योंकि परम्परा उनके साथ है और शास्त्र उनके साथ हैं | मेरी माँ को तो तुम जानती ही हो वे तो भोली गाय हैं | लाख चाहनें पर भी वे पिताजी की  किसी बात का विरोध नहीं कर सकतीं | तू ही बता अपर्णा मेरा फैसला क्या होना चाहिये था | क्या तुझे अपनी सखी के फैसले पर शर्म से सिर झुकाना तो नहीं पड़ रहा है | अपनें पिताजी से मेरी ओर से मांफी मांग लेना पर बहना ,यह विश्वास  तो मैं तुझे गंगाजल हाँथ में लेकर दिलाती हूँ कि मैं और मनोज शारीरिक रूप से अपना दाम्पत्य जीवन तभी प्रारम्भ करेंगें जब हमें अपनें मां -बाप और अपनें गुरुजनों का आशीर्वाद मिल जायेगा | हम दोनों का जीवन इक्कीसवीं शताब्दी के बदलते परिवेशों में मानव स्वतन्त्रता की कुर्बानी की एक नयी मिशाल पेश करेगा | क्या पता बहना ,नयी पीढ़ी हमें तिरस्कार के योग्य न समझे और आदर्श के रूप में स्वीकार कर ले | बड़े जनों को मेरा प्रणाम देना और माँ के चरणों पर मेरा नतमस्तक होना स्वीकार करवाना | मुझे विश्वास है कि तुम अपने मित्र को घृणां के योग्य नहीं समझोगी | अपर्णा एक दिन तुम बहुत अच्छी जगह पर होगी वहां जहां मैं शायद पहुंच भी न सकूं पर तब क्या तुम मुझे याद रख सकोगी | तुम जिसे मैं अपनें अन्तर्मन का साथी मानती हूँ | अच्छा तो विदा अपर्णां देखें नियति चक्र में मेरे लिये और कौन से अध्याय खुलते हैं | तुम्हारी लांक्षित सहेली -सुनैना शर्मा |
                                 पत्र पढ़कर मुझे अपनी परम्परा आधारित चिन्तन पद्धति की समीचीनता पर शंका करने पर बाध्य होना पड़ा | तो क्या सुनैना भविष्य के समाज की अग्रदूतिका है ? तो क्या अपर्णां भी इसी भांति सोचती है ? तो क्या राकेश ,सन्दीप और सुधीर भी इसी चिन्तन के पोषक हैं ? तो क्या नयी पीढ़ी के लक्ष्य लक्ष्य तरुण और तरुणियाँ जाति दुराग्रह से मुक्त होकर मानव मूल्य आधारित समाज की संरचना में विश्वास रखते हैं ? तो क्या मैं ,सुनैना के पिता और नयी पीढ़ी के अन्य सभी अधेड़ और बृद्ध युग सत्य से कटकर अलग -थलग पड़ गये हैं | अपर्णां अभी तक मेरे पास खड़ी थी मैनें उससे कहा बेटे , " जा अपनी मां से कह एक कप चाय बना दे| "  उसके जानें पर  मैं सोचने लगा कि हमारा अन्तिम सत्य जान लेने का अभिमान एक दंम्भ मात्र ही तो है जिसे हम अन्तस -चेतना कहते हैं ,जो दार्शनिक Kant का Categorical Impertive है वो कहीं हमारे लक्ष लक्ष वर्षों की विकास प्रक्रिया द्वारा सहेजी गयी पूंजी ही तो नहीं है | उसमें कितना कुछ ईश्वरीय है इसका निर्णय तो अभी तक हो ही नहीं पाया पर इतना तो सच ही  है कि ग्रहों के आर -पार सितारों तक लगने वाली मानव छलांगें और उड़ानें तुच्छ सीमाओं को तोड़ फोड़कर धरती का सम्पूर्ण विस्तार तो देंगीं ही यह रंग का अभिमान ,यह  प्रजाति का गर्व ,यह जाति का वर्चस्व ,यह संस्कृति का आरोपित अभिमान सभी कुछ तो विश्लेषण पर मनमोहक मिथक से बढ़कर और कुछ साबित नहीं हो पाता पर हिन्दुस्तान की  जमीनी सच्चायी अभी जाति आधारित संकीर्ण चिन्तन और कबीला परस्ती से ऊपर उठ ही कहाँ पायी है | दिमाग में कौंध जाता है भारत के प्रथम प्रधान मन्त्री प ० जवाहर लाल नेहरू से विद्यार्थियों के एक डेलीगेशन के साथ 1960 के आस -पास मुलाकात का वह क्षण | उनके सचिव नें जब उन्हें बताया विद्यार्थियों का यह डेलीगेशन रोहतक के मल्टीफैकल्टी वैश्य कालेज से है तो उन्होंने कहा , " Why name institutes of higher learning after cast names? Is it not funny that you have vaish college,Jot college , kaanykubj college ,Raajput college and what not?" पण्डित जी का चिन्तन अपनी विशालता में शिक्षा के जातिगत विभाजनों को हास्यास्पद बना देता था पर उन जैसे महान पुरुषों के सारे प्रयासों के बाद भी आज की सभी राजनैतिक पार्टियां जाति समीकरणों के जोड़तोड़ पर ही राज्य सत्ता का सुख भोगनें का स्वप्न देखती हैं | और शिक्षा संस्थाओं में तो इस दिशा में अन्धेर ही हो रहा है | अरे हाँ , याद आया कालेज Women Wing में एक अंग्रेजी के लेडी प्राध्यापक की नियुक्ति होनी थी | शायद कल ही तो इंटरव्यूह हुआ था | अनजातुल्य श्यामा जी ही तो अंग्रेजी की विभागाध्यक्ष हैं | उनसे पूछ लिया जाय कि लालिमा भारद्वाज को Appointmentमिला कि नहीं  क्योंकि वह यूनिवर्सिटी की टॉपर हैं और डी ० एच ० लारेन्स पर किये गये अपनें शोध प्रबन्ध को डाक्ट्रेट के लिये सबमिट भी कर चुकीं हैं | मैनें ऊंची आवाज में कहा ," बेटे ,अपर्णा तनिक श्यामाजी का फोन मिलाना ,देखें किस नाम पर सहमति बन पायी है | हेलो ,This is Awasthi on this side of the line.दूसरी तरफ से आवाज आयी प्रणाम बड़े भाई ,आपनें तो सब सुन ही लिया होगा | " No ,I have just come back fron official duty.I was checking at Rewari as convenor ." भाई साहब लालिमा नहीं लग पायी | प्रधान जी शकुन्तला मित्तल में Interested थे | कहते थे विरादरी की लड़की ही बनिया कालेज में लगेगी | पर उसका Performence जीरो था | वैसे भी वह Ordinary 2nd क्लास है | सब्जेक्ट एक्सपर्ट और डी ० एच ० ई ० नामनी लालिमा के Performance से सन्तुष्ट थे और उसकी नियुक्ति चाहते थे | झगड़ा खड़ा हो गया और इन्टरव्यूह पोस्टपोन्ड हो गया | अब Re-Advertisement होकर दुबारा डेट फिक्स की जायेगी | "  O God, now cast rules supreme in Inda.Thank You Shyaamaa ,for the Information . " और यह कहकर मैनें फोन नीचे रख दिया | 
                                अपर्णां की माँ चाय का प्याला मेज पर रखकर सामनें की कुर्सी पर बैठ चुकी थी और मैं उसके शान्त चेहरे को देखकर अपनी मानसिक अशान्ति पर क्षोभ से भर पड़ा पर अशान्ति से मुक्ति कहाँ | मुझे भी तो अगले हफ्ते झझ्झर गर्ल्स कालेज में Subject Expert बनकर जाना है | विश्वविद्यालय के कुलपति विवेश शर्मा का पत्र तो मुझे मिल ही चुका है और फिर चित्रलेखा सिंहल के पिता भी तो अपनी लड़की की सिफारिश के लिये दो एक दिन पहले किसी को साथ लेकर मुझसे मिलनें आये थे | वे एक प्रसिद्ध उद्योगपति हैं और उनकी बेटी को लगा लेने से किसी भी कालेज को काफी बड़े डोनेशन मिलनें की संम्भावना वास्तविकता बन सकती है | पर चित्रलेखा को यह तो बताना ही होगा कि उसके पिता नें उसका नाम चित्रलेखा क्यों रखा ? क्या इस नाम के कोई सांस्कृतिक पौराणिक और साहित्यिक सन्दर्भ भी हैं | और अंग्रेजी साहित्य से इस नाम का सन्दर्भ कहाँ और कैसे जोड़ा जा सकता है | और अगर वह न बता पायी तो उसकी नियुक्ति क्या संम्भव हो पायेगी | | मैनेजिंग कमेटी के प्रधान से हर बार झगड़ पड़ना भी तो ठीक नहीं पड़ेगा | लोग न जानें इसका क्या अर्थ लगायें | याद आ गया वो  दिन जब एक कालेज में एक शहर में नियुक्त नायब तहसीलदार क़ानून की परीक्षा  में बैठकर नक़ल कर रहे थे और मैनें उनका केस बनाकर विश्वविद्यालय भेजा था |  अपनें ऊपर पड़ने वाले न जानें कितनें राजनीतिक दबावों के बावजूद मैनें उन्हें कठोर दण्ड देने की बात कही थी | पर हुआ क्या उल्टा मुझपर ही मुकदमा चलाया गया कि मैनें एक परीक्षार्थी को ख़ाहमखांह हैरस किया | नक़ल का पेपर यूनिवर्सिटी के दफ्तर में बदल दिया गया और उसके स्थान पर गणेश बन्दना का एक पेज लगा दिया गया | कोर्ट में नायब तहसीलदार जी नें कहा कि वे पेपर देनें से पहले गणेश वन्दना का पाठ कर रहे थे | संविधान उन्हें किसी भी देवी -देवता की मदद मांगनें का पूरा अधिकार देता है | खैर , इस केस को मैं कैसे जीत पाया इसकी चर्चा उचित सन्दर्भ में की जायेगी अभी तो झझ्झर गर्ल्स कालेज में Subject expert  के नाते अपनें कर्तव्य का दायित्व करना होगा | क्या वहां भी लालिमा भारद्वाज नें अप्लीकेशन लगायी है ? यह तो इन्टरव्यूह के कुछ समय पहले ही लिस्ट देखनें पर पता लगेगा पर कहीं ऐसा तो नहीं कि जन्म से ब्राम्हण होनें के नाते मैं भारद्वाज के प्रति कुछ अधिक उदार होनें लगा हूँ | नहीं नहीं हर भारतवासी मेरे लिये समान  है | विक्रमादित्य की न्याय की कहानियां अब तक मेरे अवचेतन में ,कौंधती रहती हैं | न्याय का उतना बड़ा सिंहासन तो मेरे पास नहीं है पर जो भी टूटी -फूटी मचिया मुझे बैठने को मिली है उस पर बैठकर मैं न्याय ही करूंगा |  Justice Nothing but sheer justice ,un alloyed and pure. पर क्या मैं अपने को ठीक तरह से जानता हूँ | वाल्टेयर की कुछ पंक्तियाँ दिमाग में गूँज उठती हैं |
Man is a stranger to his own research ,
he knows not whence he comes ,not with her  goes ,
Tormented atoms in a bed of mud ,
Devoured by beath , a monckery of fate,
But thinking atoms, whose far-seeing eyes,
Guided by thoughts ,have measured the faint stars.
                        झझ्झर में होने दो शब्द शराघात | डा ० आर ० एन ० शर्मा , डा ० ऊषा कालिया ,डा ० भांभरी जैसे दिग्गज पैनल में हैं | और हैं पीताम्बर बंसल प्रधान जी ,पीताम्बर जी नें गाड़ी भेजनें को कहा है | यह क्या ऊषा जी का Pick offer ज्यादा ठीक नहीं रहेगा |
(क्रमशः )