Tuesday, 22 May 2018

टिमटिमाती शाम 

कट गया मैं हट गया मैं
खेत से खलिहान   से
ओस भीगी दूब  से
हँसिया , कुदाली , धान से
इसलिये जो लिख रहा हूँ
सिर्फ उनके ही लिये  है
जो बहुत पढ़ते पढ़ाते हैं -किताबी जीव हैं |
गीत मेरे अब न मिट्टी के सहोदर मीत हैं |
शोध में जन्में पले हैं ज्ञान -गर्भ अधीत हैं |
शीत की लम्बी सिहरती रात में
प्यार  ( पयार  ) भर कर टाट में जब ठाठ से
बैठती थी गाँव गवंई की सभा
तब सुनाये गीत जो मटियार थे
डाल  से टपके गुलाबी आम से
धूल लोटी टिमटिमाती शाम से
पक  रहे रस की गुड़ाही बास से
कथा के निरबंसिया की आस से
श्याम  धौरी गाय से गाभियार थे
तब सुनाये गीत जो मटियार थे
अस्मिता का अब मुझे विस्मय - जनक अहसास है
मूल्य आयातित सभी हैं , प्लवन कारी प्यास है
हाइकू जापान से , सानेट समन्दर पार से
स्वर्ण- केशी कल्पना पुलकित हशिश के भार से
हाय गँवई गाँव का गायक कहाँ है
हाय लक्षमन , राम का शायक कहाँ है
प्रमुथ्य - पाट्रा अब हमारे पात्र हैं
ऋषि कथायें तो बहाना मात्र हैं
 हैं न वे हरिताभ कोपल मरण धर्मा पीत हैं
गीत मेरे अब न  मिट्टी के सहोदर मीत हैं |
मोतिया झालर -सजी बरसात में
रस बहाती नम भदली रात में
टाप पर आल्हा लहर कर गूँजता
बुर्ज पर घोड़ा बुन्देला कूंदता
कौन सा अल्हैत देखो दे रहा ललकार
रक्त पीकर ही पला  है क्षत्रियों का प्यार
मान खोकर आयु का हर वर्ष बनता भार
( वर्ष अठारह क्षत्रिय जीवे -आगे
जीवे को धिक्कार )
थी हँसी उन्मुक्त , था निर्वैर भाव -प्रसार
सामूहिक छल से न मन बैठा थका था हार
तब लिखे जो गीत वे अगियार थे
जोत की आशा लिये सफला सुहागन नार थे
कट गया मैं हट गया मैं
खेत से खलिहान से
ओस भीगी दूब  से
हँसिया कुदाली , धान से
इसलिये जो लिख रहा हूँ - सिर्फ उनके ही लिये  है
जो बहुत पढ़ते पढ़ाते हैं किताबी जीव हैं
गीत मेरे अब न मिट्टी के सहोदर मीत हैं
शोध में जन्में पले  हैं , ज्ञान - गर्भ अधीत हैं |

Sunday, 20 May 2018

अनासक्त काल - बिन्दु 

जिन्दगी
जन्म -मृत्यु खूँटों पर लटकी हुयी डोरी है
आशा है , पिपाशा  है
अर्थ हींन भाषा है
तार - तार हो रही सड़ी हुयी बोरी है
तार जो कटकर स्वतन्त्र है
मुक्त लहराने को
किन्तु जो
अपनी निरन्तरता में विवश है
जाल बन जाने को |
सांस का नियमित क्रमबद्ध व्यापार
निद्रा है
शीत में भू - गर्भित सरीसृप जीवन -----------
इसीलिये दीर्घ साँस
आगत विगत से अनासक्त काल -बिन्दु
स्फुरित द्योतित क्षण
जीवन  की साध है
कवि का आराध्य है |



ललकार लगा मेरी वाणी 

सारे जीवन की असफलता स्वीकार मुझे
अभिशापित जीवन ही मैं जीता जाऊँगा
है शपथ त्रसित मानवता की मुझको साथी
हर घूँट गरल का हँस  हँस पीता  जाऊँगा
जब तक शरीर में साँस , साँस में दम बाकी
नीलाम नहीं होनें दूँगा अपनी वाणीं
बाजारी मोल तोल से हो आजाद सदा
गाती  जायेगी मेरी कविता कल्याणीं |
माना कि अकेला  स्वर मेरा
सब पर अधिकार न पायेगा
बिक चुकी आज की दुनिया में
थोड़ा सा प्यार न पायेगा
पर सत्य पनपता नहीं अन्धेरे खेतों में
सोनें की खाद  न कोई फसल उगाती है
चाँदी की हँसिया बोझ गले का बन जाये
पर उससे  कोई फसल न काटी  जाती है |
बिकनें वाले बिकते ही हैं
पर कहीं -कहीं धन झुकता है 
हहराते नद का मद प्रवाह
 पर्वत से टकरा रुकता है
वाणीं बिकनें को नहीं
मिली जन - मन की कथा सुनाने को
वाणीं झुकने को नहीं
मिली गिरतों का भाग्य जगानें को |
वाणीं का बल पा न्याय -भाव
मद - सत्ता से टकराता है
वाणीं के हाँथों संवर रोष
विद्रोही  स्वर बन जाता है |
वाणीं ने राज्य उलट डाले
वाणीं ने सृष्टि सजायी  है
फणधर के नाथ लगानें  को
वाणीं ने वेणु बजायी है |
इसलिये , लिये  वाणीं का बल
मैं विघटन से टकराऊँगा
स्वर की लयता से गूंथ बाँध
मैं भाव -सृष्टि रच जाऊँगा |
हो प्रखर मुक्त मेरी वाणीं
साहस बटोर कर लायेगी
घुन - खायी अर्थ - व्यवस्था से
गज -बल लेकर टकरायेगी |
दो चार स्वरों के साथ
नकारेगी बहुमत का रूढ़ि - जाल
गौरव द्विति से मण्डित होगा
मानवता का माथा विशाल |
ललकार लगा मेरी वाणीं
भारत की सड़ी जवानी को
ललकार लगा मेरी वाणीं
मरदानी झाँसी  रानी को |
ललकार लगा , हुँकार उठे
फिर तरुण रक्त की लाली में
ललकार लगा - सुषुप्ति भगे
सो रहे देश के माली में |
वाणीं के पुत्रो , उठो
छोड़ दो मुसाहिबों की बातें
पायल की रुनझुन , लालपरी
मतवाली पागल रातें |
सोनें - चाँदी की होड़ छोड़
अब भेरी नाद बजाओ
अभिनन्दन गीत समाप्त करो
विप्लव के गीत सजाओ |
हर एक दिशा से फहराता
आ रहा प्रलय का पानी
फिर नयी सृष्टि रचनें को
कोई तो नाव बचानी |
आने वाले सैलाब शपथ है
मुझे तुम्हारे पानी की
कल के भविष्य है शपथ मुझे
फिर उठती हुयी जवानी की |
वाणीं का लेकर खड्ग
काट दूँगा धोखे का स्वर्ण जाल
वाणीं का लेकर वज्र
चूर्ण हो वृत्रासुर का लाल भाल |
अस्सी घावों को लिये अडिग
हांथों में लोच न आयेगी
ध्रुव से ध्रुव तक लूँ माप
मगर पैरों में मोच न आयेगी |
जनता की थाती वाणीं है
विश्वासघात , मर जाना है
घावों को लेकर कर्मभूमि में
गिरना भी तर जाना है
जब तक शरीर में सांस सांस में दम बाकी
नीलाम नहीं होने दूंगा अपनी वाणीं |
सारे जीवन की असफलता स्वीकार मुझे  ----------------








Saturday, 19 May 2018

चिरन्तन फाग 

लड़खड़ाते हैं कदम जब , बाँह देते हो मगर मैं 
बाँह लेकर क्या करूँगा 
बाँह है करुणां मगर सहमति नहीं है 
बाँह मानवता मगर सहगति नहीं है 
यदि संभल जाऊँ अकेला छोड़ दोगे 
राह का सम्बन्ध भी तो तोड़ दोगे 
तड़फड़ाते प्राण हैं जब छाँह देते हो , मगर मैं 
छाँह लेकर क्या करूँगा 
छाँह संगम तो नहीं भ्रम - मात्र है 
छाँह छलती  धूप का क्रम -मात्र है 
यदि तड़प टूटी , न शीतल छाँह दोगे 
यदि कदम संभले , न गोरी बाँह दोगे 
घेरता वैराग्य है जब , चाह देते हो , मगर मैं 
चाह लेकर क्या करूँगा 
चाह तो मन की धधकती आग है 
रास का सुख तो चिरन्तन फाग है 
तुम बुलाकर दूर हट  जाते मगर 
कौन चलता प्यार की सूनी डगर ? 
टेरता है प्राण - पिक जब , राह देते हो , मगर मैं 
राह लेकर क्या करूँगा 
राह भटकन जो न तुम तक जा सके 
राह निष्फल जो न तुमको पा सके 
पर झलक देकर न मिलते तुम कभी 
निठुर होते क्या तुम्हीं से प्रिय सभी ? 
टेरनें दो प्राण पिक , लड़खड़ाने दो कदम 
पर न प्रिय तुम बांह देना 
पर न प्रिय तुम छाँह देना 
हाँ तनिक ,केवल तनिक सी चाह देना | 

सहमार्गी 

कैसा आश्चर्य है -------------
कल तक दुर्लध्य गौरीशंकर चोटी  पर 
पदाघात करनें की मेरी अभीप्सा का 
प्रेरक भाव , मात्र तुम्हारी दिल -पोशी थी 
और आज चाह कर भी -----------------
बिल्कुल ईमानदारी से कहता हूँ 
मनः शक्ति स्फुरित करनें की कामना 
तुम तक जा 
पीछे सर पटक लौट आती है 
तो क्या मेरी चाहना असम्पूर्ण है 
याकि तुम काल के उस क्षण को 
पीछे छोड़ आयी हो 
जब तुम मेरे लिये , पुरुष मात्र के लिये 
उत्प्रेरक ऊर्जा का अक्षय दिखने वाला 
संचित भण्डार थीं | 
आज तुम प्रेरणां नहीं केवल सहगामिनी हो 
पर तुम्हें नास्टेलजिया से झटक कर 
हटाने का मेरा दुः साहस 
शायद खतरनाक है | 
इसलिये तुम्हें हक़ है कि तुम सत्य 
को झुठला कर विगत में जिओं 
और मैं -------------
मैं सत्य को वाणीं देकर अपनी अनुभूति 
का सहमार्गी 
खोजूँगा | 



पतन 

मेरे विनाश पर क्या रोना
जब टूट रहे गिरि  श्रंग सदा से धरती पर
जब खण्ड खण्ड  हो शिला रेत बन जाती है
जब कठिन तपस्या से रक्षित मन - रन्ध्रों में
ऐन्द्रिक - ऐष्णा की मादकता छन जाती है
जब बज्र- मुष्ठि बजरंग आद्र हो उठते हैं
जब श्रंगी की साधना केश सहलाती है
जब चरम- प्रतिष्ठा पर पहुँचे कवि की कविता
जन  श्री से कटकर पद्म -श्री बन जाती है
फिर मैं भी कुछ क्षण कहीं अगर सुस्ताने को
सौरभ बगिया में जा बैठूँ - तो इसमें क्या विस्मित होना
मेरे विनाश पर क्या रोना |
जब जन नायक धन नायक बनकर भरमाये
जब सेवा का सत्ता से मेल -मिलाप हुआ
जब राह -दीप ही घिरे अमाँ की बाँहों में
वरदान उलटकर मानवता का श्राप हुआ
जब विद्रोही -स्वर गीत -प्रशस्ति लगे रचनें
जब प्रतिभा ठेकेदारों के घर पलती  है
जब मन -ऋजुता का अर्थ अनाड़ी में बदला
जब कविता कुछ प्रचलित साँचों में ढलती है
फिर मेरा मन भी भटक जाय यदि कभी
प्रिया के द्वारे तक , तो इसमें क्या विस्मित होना
मेरे विनाश पर क्या रोना |
जब रूप , देह की कान्ति न हो , श्रंगार बना
जब प्यार सिर्फ सुविधाओं के बल पलता  है
जब मन की धड़कन नाम नजाकत का पाती
जब हर सीता को सोनें का मृग छलता  है
जब मूक हो गये भीष्म पेट की मांगों से
जब सती द्रोपदी पंच - प्रिया बन जाती है
जब धर्म , रक्त की छींटें पाकर बढ़ता है
जब कुल -कन्या अनव्याहे सुत  जन  जाती है
दो बूँद  सुरा के ले यदि मैं भी बैठ गया
तन -मन की थकन मिटानें को - तो इसमें क्या विस्मित होना
मेरे विनाश पर क्या रोना |

एकतानता 

अष्टमार्ग , अनेकान्त क्षणवाद ,अनस्तित्व
समाधान कहीं नहीं -अन्तहीन भटकन
सत्यान्वेषण की दारुण यंत्रणां -------------
रुकना पर काम्य नहीं ---चरैवैति चरैवैति
शुभ्र -श्मश्रु से घिरा स्वर कहता है
बँधना आमंत्रणहै मृत्यु की सड़ांध का
निर्मल स्वर साधु और सलिल सदा बहता है
ब्रम्ह में अहं  का विसर्जन अन्तिम लक्ष्य
पैंट की मोहरी फिर चौड़ी करवानी है
चौड़ी फिर सकरी फिर चौड़ी बेल -बोटम
अहं ब्रम्हास्मि भटक कर फिर से मुझे अपनें
तक आना है |
नियम एकतानता , मोड़ -हींन जीवन मार्ग
झेलना है दुष्कर यह मरुथल का प्रस्तार
इसलिये बदलते मौसम के साथ साथ
कमरे की दीवारों पर रंग बदलवाता हूँ
इसी नयेपन की मरीचका में मोह - ग्रस्त
हर साल  नया टी सेट ले आता हूँ
वस्त्र फर्नीचर सब बदल मैनें डाले हैं
कौन यह कहता है मैं अर्थ - हींन  जीता हूँ
हररोज बोतल की डिजाइन बदलता
हूँ और फिर ------वही मृदुपेय मैं
पीता हूँ |


टटकापन 

कल की उन पंक्तियों में मैं ही था
आज इन पंक्तियों में उससे भिन्न मैं ही हूँ
अन्तर्विरोध जिसे छिद्र -बुद्धि कहती है
मेरी जिजीविषा उसी से सनाथ है ---------
जैविक -स्फुरण से अधुनातन चेतना तक
अपरिहार्य मानव -नियति अन्तर्विरोध है
आग्नेय चट्टान बन नहीं पाया मैं
अन्यथा
बनता अकाल लेख काल की छाती पर |
अन्तर्विरोध पुष्ट भास्वर प्राण दीप्ति है
गिरगिटी चोला मात्र आरोपित त्वचा- भ्रम
इसीलिये बहुसँख्यक गिरगिट समाज -सेवी
या कि पर - चिन्तनोपजीवीं -------------
दाहक दीप्ति चिन्तन अंगारों की न झेल पाते
मेरा आज सच्चा है , गत और आगत कल
सच्चा था , होगा
पर मैं संम्पूर्ण न तो कल में था न आज में
हूँ -------हाँ जितना जो कुछ हूँ
टटका था , ताजा हूँ ------और
हर वासी वास जल में सड़ी मछली सी
मेंरी  जिजीविषा को दूषित कर
जाती है  |


ध्वंस -कारी बिजलियाँ 


सत्य प्राणों का प्रणय ही , तो शुभे !
सच बताना शपथ यौवन - ज्वार की
देह का व्यापार फिर क्या झूठ है ?
संस्कृति की शाल से चेतन ढका है
पर अचेतन देह का भूखा अभी है
पार के इतिहास के जो लहर  आती गन्ध - वही
स्रोत उस सुख -सुरभि का अब तक
भला सूखा कभी है ?
सत्य है पंचाग्नि की ज्वाला मुखी लौ
कौन जानें ------------------
किन्तु बाँहों में बँधीं
अर्पित पिया  के भाल पर
माँग के सीमान्त पर , कम्पित पलक पर
गाल पर
पड़ रही जो अधर की बौछार
 वह क्या झूठ है ?
आज भी कल की तरह
सैकत -तटी  पर खिलखिलाती
शारदीया चन्द्रिका सी
घेरनें लोनी लुनाई
नीन्द में अनजान बाँहें फड़कती हैं
साधना के शून्य में
है आदि मानव जागता जब
ध्वंसकारी बिजलियाँ , अणु के किसी संघर्ष से
तब कड़कती हैं |
प्राण ! प्राणों का प्रणय भी
देह ही तो साधती है
मिलन से संन्यास कैसा
झुकी ग्रीवा , झुकी पलकें
बिखरने दे नींल अलकें
उठ रहा जो वक्ष में तूफ़ान री
वह झूठ है क्या ?



































    

Friday, 11 May 2018

                                                                         कवि उवाच 

बड़बोलापन न कहा जाये तो कहूँ कि इस संग्रह की कवितायें ऐसे पाठकों की मांग करती हैं जो विकासक्रम में चिन्तन के एक विशिष्ट आधार पर आ खड़े हुये हैं | आभिजात्य की यह विकासवादी संकल्पना वर्ग या समूह से मुक्त मानवता के सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में की जा रही है | ऐसा नहीं है कि इन कविताओं में अन्तर्निहित चिन्तन सर्वथा अनूठा है या कि इनकी देहयष्टि सर्वथा निराले सांचों में ढली है पर इतना तो है ही कि इनमें कहीं कुछ ऐसा है जो इन्हें भीड़ से अलग एक इकाई के रूप में प्रतिष्ठित करता है | आपकी नजर का पैनापन इन कविताओं के बाँकपन को पकड़ सके इसके लिये धैर्य की अपेक्षा होगी | विचार सूत्र की एकतानता यदि खोजनें पर भी न मिले तो कवि को इससे सन्तोष ही होगा | उधार लिया हुआ कोई भी क्षण कम  से कम चेतन धरातल पर --कवि के जीवन में सार्थक नहीं रहा है और ऐसा होते हुये भी यदि कोई संश्लिष्ट बिम्ब कविताओं के माध्यम से आप तक नहीं उभरता तो इसे कवि मानस का बिखराव ही मानना होगा | जिसे स्वीकार करनें में कवि कोई हेठी नहीं समझता | जो कुछ लिखा गया है उससे अच्छा क्यों नहीं लिखा गया या कब लिखा जा सकेगा आदि प्रश्न प्रबुद्ध पाठकों के लिये सुरक्षित हैं और कवि इनमें दखलन्दाजी न करने का मुखर आश्वासन देता है | पढ़कर आप जो भी कहेंगें सुननें के योग्य होगा पर बिना पढ़े कुछ कहनें का अधिकार राजनीति आप को दे तो दे पर साहित्य तो देता नहीं | कुछ डिगरीधारी आलोचकों नें संग्रह में आत्मकेन्द्रित एकोन्मुखी जीवन दर्शन पाने का दावा किया है | उनसे मेरा निवेदन है कि ' वासुकि वीणां ' की कवितायें अस्मिता का अहसास तो कराती हैं पर यह अहसास मरणोन्मुखी व्यक्तिवादी चिन्तन का भाग बनकर नहीं वरन समग्र मानव जाति के कालातीत चिन्तन  का भाग बनकर ही उभरा है |
               संग्रह की अनेक रचनायें पत्र  -पत्रिकाओं तथा आकाशवाणीं द्वारा एक काफी बड़े वर्ग तक पहुँच चुकी हैं पर ' वासुकि वीणां ' में काफी कुछ ऐसा भी है जो आप तक पहली बार पहुंच रहा है | कहते हैं श्रष्टा का अहंकार नभ -चुम्बी होता है  और इसीलिये कवि किसी से कभी कुछ माँगता नहीं पर यदि आप दे सकें तो कवि को वाद - मुक्त लेखन का अधिकार अवश्य दीजियेगा |

                                                                                                      विष्णु नारायण अवस्थी
                                                                                                          
                                                                                                   
चाँद की मिट्टी 

अविश्लेष्य , संज्ञाहीन
उमड़ा है कोई भाव
आबद्ध मन - प्राण
अननुभूत , आह्लादक
एल.  एस. डी. तरंग
मारिजुआना किक
समवेत कीर्तन- स्वर
रति की चरमोपलब्धि
सभी साम्य झूठे हैं
शब्द अभी रूठे हैं |
दुहराये शब्दों को
क्षीण - प्राण काया में
बीता युग सिमटा है |
अन्धी सहस्त्राब्दियाँ
मर्दित - मानव मूल्य
नयी संवेदनायें , नव्यतर युग -मूल्य
चाँद की मिट्टी में अब उग आये हैं |
नया मन जन्मा है
टटकी सुवास लिये
ग्रीष्म की प्यास लिये
भावों की ताजी पौद फिर पनप आयी है |
हरी हरी घास की बिछावन सी
ईख की बाढ़ सी
बदली अषाढ़ सी
साहचर्य अतिरिक्त प्रणय की कल्पना
प्राण पर छायी है |
नयी संवेदना की पुलक तरंगों को
मन के हर कोनें से
बह -बह  कर आनें दो
सुरसरि बन जाने दो |