Saturday, 17 February 2018

गतांक से आगे -

                                                     आत्मानन्द की पत्नी नें घर जाकर शालिनी के कमरे में पहुँच कर शालिनी को निर्मम वाणों के घाव दिये इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है पर निश्चय ही उसनें यह कहा होगा कि शालिनी को राकेश के पिता के सामनें सारी बातें अगली शाम साढ़े सात बजे बतानी हैं तब शालिनी के मन में एक अत्यन्त गहरे पश्चाताप का भाव उठा होगा | जिस झूठ को डा. वर्मा नें उसे अपनी माँ के सामनें कहनें पर मजबूर किया था उस झूठ को भला वह राकेश के पिता के सामनें कैसे दुहरा सकेगी जब उसनें माँ से डा. वर्मा द्वारा गढ़ी हुयी झूठी कहानी बतायी थी तो क्षण भर को उसे भ्रम हो गया था कि यदि राकेश के पिता राकेश को राजी कर लें और यदि वह हाँ कर दे तो शगुन होनें से पहले ही वह अपनें प्राण त्याग देगी और इस प्रकार राकेश इस दोष से बरी हो जायेगा | पर जब माँ नें उससे कहा कि राकेश उसे अपनी बहिन के रूप में लेता है और जब राकेश के पिता के सामनें उसे वह झूठ कहना होगा जो डा. वर्मा के कुटिल दिमाग से उत्पन्न हुआ था तो वह चेतना शून्य सी हो गयी | उसनें सोचा कि यदि उसके उदर में कोई शिशु आ भी गया हो उस पाप के फल को जीनें का कोई हक़ मिलता है या नहीं ? और फिर वह शिशु डा. वर्मा जैसे कमीनें इन्सान की पौध हो तो उसे पालनें का क्या अर्थ ? पर वह भी तो निर्दोष नहीं है | हाय यह मैनें क्या किया | आगन्तुक शिशु यदि मेरे उदर में है तो अबार्शन द्वारा उसे समाप्त कर देना मल के ढेर में दब जानें जैसा घृणित कार्य है | ऐसा मैं कैसे कर सकती हूँ ? और यदि डा.  वर्मा मौक़ा पाकर अबार्शन करवा भी  दे और मेरा व्याह हो भी जाय तो मैं सदैव के लिये जिसके साथ व्याही जाऊँ उसको धोखा देती रहूँ यह क्या किसी भारतीय नारी के लिये संम्भव हो सकता है | और फिर डा. वर्मा जैसा कुत्ता उसकी प्रारंम्भिक गल्ती का फायदा उठाकर सदैव उसे काटनें दौड़ेगा तो वह उसे कैसे दुत्कार पायेगी ? और यदि दुत्कार भी देती है तो यह इन्सानी दरिन्दा उसे जब चाहे अपमानित कर समाज के लिये घृणा की वस्तु बना सकता है | उस सारी रात अन्तर्मन्थन की इस पीड़ा नें एक पल के लिये  भी शालिनी की पलकें बन्द  नहीं होनें दीं | उसके मानस पटल पर कुछ वर्ष पहले के वह चित्र उभर आये जब वह अपर्णा के साथ हंसती ,खेलती ,दौड़ती रहती थी | हाय राकेश जिसे मैं भाइयों से अधिक आदर और प्यार देती रही हूँ उसे अपनें जाल में फँसानें के लिये मैनें डा. वर्मा का साजिश का हिस्सा बनना क्यों स्वीकार कर लिया ? पर अब माँ के सामनें कैसे बताऊँ कि मैनें जो कुछ कहा वह सब झूठ है | और यदि वह सब झूठ है तो सच क्या है ? सच तो बताना ही पड़ेगा | डा. वर्मा जैसा काइयाँ अपनें को दोष मुक्त करनें के लिये कितनी ही तिकणम भरी चालें खेलेगा | बड़े भाई कहीं खून -खराबा न कर दें | धिक्कार है मेरे जीवन को ,मुझे मृत्यु की गोद में जाना ही चाहिये | वही गोद अब मुझे शान्ति की नीन्द दे सकती है | पर कैसे मरूँ ? कालेज जानें का बहाना करके रेल के नीचे कटना कितना दर्दनाक होगा | फिर क्या करूं ? अरे हाँ , अखबारों में पढ़ा है कि गेंहूं को घुनों और कीटों से सुरक्षित रखनें के लिये सल्फास की जो गोलियां आती हैं उनके खानें से आदमी मर जाता है | हाँ ठीक है अभी कुछ दिन पहले ही तो मैनें गेहूं के बड़े टब में थोड़े गेंहूं हटाकर एक कपड़े में बांधकर सल्फास की गोलियां डाली हैं | स्टूल पर खड़ी होकर मैं टब के सिरे पर पहुँच जाउँगीं और हाँथ से खगाल कर गोलियां निकाल लूंगीं | पानी से गोलियां निगल लेती हूँ | दुनिया वालो मुझे क्षमा करना | माँ बाप से मैं क्या क्षमा माँगूँ ?मेरी जैसी पुत्री से वे सदैव घृणा करते रहें | यही मेरा प्रायश्चित्त होगा | पर कहीं ऐसा न हो कि गोलियों का जहर असरदार साबित न हो | कहीं जिन्दा बच गयी तो कैसी छीछा लेदर होगी | नहीं ,नहीं मैं सारी की सारी गोलियां लील लेती हूँ | हाय नारी जीवन भी कितनी विडम्बना से भरा है | महावीर बाबा , हे महावीर पवन पुत्र मेरे सम्मान की रक्षा करना , मुझे मर जानें देना हाँ इतनी प्रार्थना अवश्य है कि फिर मुझे किसी लड़की के रूप में जन्म न लेना पड़े | मुझे अधिकाँश मनुष्य पशु प्रवृत्ति के ही लगे जिनके लिये नारी केवल भोग्या है | सहचारिणीं नहीं हाँ एक गल्ती हो गयी मरनें से पहले मुझे डा. कुसुम वर्मा को सब कुछ बता देना चाहिये था पर अब क्या हो सकता है गोलियां तो निगल ही ली हैं |
                              लगभग आधा घण्टे बाद शालिनी के कमरे से ओ -ओ की आवाज आनें लगी | माँ नें सुना चिल्लाकर बोली क्या है शालिनी उठी क्यों नहीं ? पर जब ओ ओ करके उल्टी का क्रम शुरू हुआ तो माँ समझ गयी कि कुछ अनहोनी हो गयी है | दौड़कर कमरे में आयी देखा शालिनी के बिस्तरे  पर उल्टियों की गन्दगी बिखरी हैउसके मुंह से झाग निकल रहा है | आँखें फटी -फटी छत की ओर देख रही हैं | वह घबरा कर चिल्लायी रामू के बप्पा शालिनी के कमरे में आओ शालिनी नें सल्फास की गोलियां खा ली हैं | जिस कपड़े में गोलियां बंधी थीं वह वहीं पास ही पड़ा था | सारा घर इकठ्ठा हो गया | पहली पहुँच डा. वर्मा तक की गयी क्योंकि वही सबसे नजदीक रहने वाले डा. थे | वे आये शालिनी को बेहोशी हालत में देखा | बोले मेरे बस  का केश नहीं है | आख़िरी समय है | मेडिकल कालेज ले जाओ | क्या पता कि शायद पुलिस केस बन जाये | शालिनी के पिता और भाइयों नें अत्यन्त शीघ्र व्यवस्था करके शालिनी को मेडिकल कालेज के इमरजेन्सी वार्ड में पहुंचाया | शालिनी की माँ और एक भाभी साथ गयी | डाक्टरी उपचार प्रारंम्भ हुआ | अटेण्ड करनें वाली लेडी डा. नें बताया कि बचनें की पच्चीस प्रतिशत उम्मीद है | विष यदि पूरी तरह सिस्टम से निकल गया तो पांच सात दिनों में स्वस्थ हो जायेगी | पाचन प्रणाली को साफ़ होनें के प्रयत्न होने लगे | पहले पतले दस्त आये फिर न जानें कैसे शौच और मूत्र द्वारों से रक्त आनें लगा | नर्सेज को इनाम देनें की बात कहकर शालिनी के पिता नें उन्हें और अधिक कर्तव्यरत होनें के लिये प्रेरित किया और फिर सहसा शालिनी की पलकें हिलनें लगीं | ऐसा लगा उसको होस आ गया है | लगभग आधा घण्टे बाद उसनें पलकें खोलीं और उठनें का प्रयास किया उसे लगा कि उसकी जननेन्द्रियों से रक्त स्त्राव हो रहा है | उसनें बाथ रूम जानें की बात कही | सीनियर नर्स उसके साथ बाथरूम में गयी | दरअसल अटेन्डेन्ट लेडी डा. और सीनियर नर्स को आभाष हो गया था कि कहीं कुछ अशुभ घटा है और इसीलिये शायद पेशन्ट नें सल्फास की गोलियां खायी हों | बाथ रूम में कमोड पर बैठनें के पहले ही असह्य पीड़ा के कारण शालिनी झुक कर जमीन पर गिर सी गयी | रक्त स्त्राव हुआ और भूमि पर एक मोटे अंगूठे जैसा आकृतिहीन मांस पिण्ड गिर गया | शालिनी अचेत हो गयी | सीनियर नर्स नें दूसरी नर्स को बुलाकर उसकी मदद से शालिनी को उठाकर कमरे में पलंग पर लिटा  दिया | अधोभाग में आवश्यक उपचार व्यवस्थायें की गयीं | लगनें लगा कि शालिनी सो गयी है पर उसकी सांस नियमित होती जा रही है | लगभग आधा घण्टे बाद उसनें फिर आँखें खोलीं और पानी की मांग की | डाक्टरी देख रेख में कोई सुरक्षित पेय उसे दिया गया और शालिनी नें फिर आँखें बन्द कर लीं | लगभग आधा घण्टे बाद उसनें फिर पलकें खोलीं पास बैठी नर्स से पूछा कि वह कहाँ है | नर्स ने बताया कि वह मेडिकल कालेज के इमरजेन्सी वार्ड में है | शालिनी नें माँ से मिलनें की इच्छा जाहिर की | माँ , भाभी , बन्धु ,बान्धव बाहर के बिस्तर बरामदे में बैठे ही थे | नर्स नें बाहर आकर बताया कि शालिनी को होश आ गया है और उसकी माँ उससे मिल सकती है | आँखों में आंसू भरे माँ अन्दर आयी और शालिनी के पलंग के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी | बेटी के सिर पर हाँथ रखा | शालिनी की आँखों से आंसू झर बह रहे थे | पलकें गीली थीं | उसनें अपनें मत्थे पर रखे माँ के हाँथ को हाँथ उठाकर छूने की कोशिश की पर हाँथ पूरी तरह उठ नहीं पाया | नर्स नें कहा बस अब आप बाहर चलिये | अभी यह बहुत कमजोर है | कुछ घण्टे बाद इसके शरीर में कुछ शक्ति आ जायेगी | हम लोग इसकी पूरी तरह से देखभाल करेंगें | फिर नर्स नें धीरे से कहा , " कि क्या आप नहीं जानतीं थीं कि आपकी बेटी को एक -दो महीनें का गर्भ है | " शालिनी से दूर हटकर नर्स नें शालिनी की माँ को अपनें साथ बाथ रूम में ले जाकर आकृति रहित उस मांस पिण्ड को दिखाया जो सात -आठ महीनें के लम्बे दौरान में माँ के पेट में नर या नारी शिशु की पूरी आकृति पा जाता | माँ आश्चर्य में पड़ गयी | यदि ये शिशु राकेश के बिन्दु से जन्मा है और उसके पिता नें संम्बन्ध लेनें से इन्कार कर हमारे परिवार का तिरस्कार किया है तो हम प्रोफ़ेसर साहब को दिन में तारे दिखा देंगें | पर यदि ऐसा होता तो शालिनी क्यों प्रोफ़ेसर साहब के सामनें अपनी बात कहनें की हिम्मत नहीं कर पायी | आखिर यदि उसका दोष है तो राकेश का भी तो दोष है | यदि शालिनी की बात जो उसनें मुझे बतायी है सच है तो प्रोफ़ेसर साहब रिश्ते से इन्कार कैसे कर सकते थे ? उन्हें तो एक आदर्श इन्सान के रूप में देखा जाता है | पर यदि राकेश इन सब घटना काण्ड में शामिल नहीं है तो यह सब कैसे घटित हुआ | शालिनी और कहीं तो आती जाती नहीं थी | हाँ डा. कुसुम वर्मा के साथ वह अवश्य लम्बी बैठकें करती रहती थी | हे भगवान मेरी बेटी को ठीक करके लम्बा जीवन दें | अभी मैं उससे कुछ नहीं पूछूँगीं | कुछ दिन बाद उसके स्वस्थ्य होनें पर ही इन बातों की चर्चा का प्रयास करूँगीं | क्या पता शालिनी स्वयं ही अपनी ओर से सब कुछ बता डाले | शालिनी के पिता को भी अभी इस संम्बन्ध में कुछ बताना न होगा | डा. साहब कहते थे कि शालिनी को पूरा होश आ जानें पर पुलिस इन्सपेक्टर उसका बयान लेंगें क्योंकि यह आत्महत्या का मामला है | आत्महत्या के लिये किसनें उकसाया ? आत्महत्या का प्रयास क्यों किया गया ? यदि शालिनी किसी को दोषी ठहराती है तो न्याय की प्रक्रिया अपनी पूरी जटिलताओं के साथ प्रारंम्भ हो जायेगी और यदि गर्भपात की बात बाहर चली गयी तो परिवार की कितनी बदनामी होगी | लेडी डा. और नर्स को जिस प्रकार हो अपनी ओर मिलाना होगा ताकि गर्भ का संम्बन्ध आत्मघात के प्रयास से न जुड़े |
                              इमरजेन्सी वार्ड में शालिनी को अटेण्ड करनें वाली लेडी डा. एक सुशिक्षित और आदर्श उपचारिका थी | माता होंनें के कारण वह जानती थी कि किसी भी नारी की  सबसे बड़ी शक्ति इस बात से आँकीं जाती है कि व्याह से पहले उसका किसी पुरुष से संम्बन्ध सम्पर्क न हो पर वह यह भी जानती थी कि आज के समाज में बहुत सी युवा होती हुयी लड़कियों के लिये ऐसा संम्भव नहीं हो पाता भूल हो जानें पर एक बार सुधार का मौक़ा मिलना ही चाहिये | क्या पता पतन के बाद का उत्थान इतना महान हो कि दुनिया चमत्कृत रह जाय | उसकी कई सहेलियों के साथ ऐसा ही तो घटा था | पर आज वे कितनी ऊँचाई पर हैं | उसनें  मन ही मन यह निश्चय कर लिया कि वह शालिनी पर अवैध गर्भ धारण करनें का चार्ज नहीं लगनें देगी | एक रात के विश्राम के बाद और ग्लूकोज की कई बोतलें चढ़ जानें के बाद शालिनी संम्भल गयी | ग्लूकोज हट गया अब उसे तरल खान -पान पर डाल दिया गया | पुलिस इन्सपेक्टर बयान लेनें के  पहले भी कई बार आ चुका था | लेडी डा. नें माँ  के से दुलार से शालिनी को बता दिया था कि उसका बयान लिया जायेगा और उससे गोलियां खानें का कारण पूछा जायेगा | वह यदि पुलिस को सच न बताना चाहे तो कोई ठीक लगनें वाला बहाना ढूढ़ ले | शालिनी नें कमजोर धीमी आवाज में अपनें ऊपर कृपा करनें वाली लेडी डा. से पूछा कि वह क्या कहे ? उसनें कहा सच बात तो आप जानती ही हैं | दूर पर मैं उस चरित्रहीन डाक्टर को अपनें जीवन से काटकर फेंक देना चाहती हूँ जिसनें मुझे पथभ्रष्ट किया अब और क्या कारण हो सकता है | लेडी डा. नें पूछा कि वह किस क्लास में पढ़ती है शालिनी नें बताया कि वह बी. एस. सी. सेकेण्ड इयर की विद्यार्थी है | लेडी डा. नें पूछा कि उसकी अर्धवार्षिक परीक्षा के परिणाम कब निकले थे | शालिनी नें बताया कि लगभग एक सप्ताह पहले अर्धवार्षिक परीक्षा का परिणाम क्लास में घोषित किया गया था और वह मैथेमेटिक्स में फेल हो गयी थी | जब वह क्लास में गयी तो उसकी सहेलियों नें उसका मजाक उड़ाया था | लेडी डा. नें कहा कि वह ऐसा ही बयान दे दे पर किसी सहेली का नाम न ले | वह कह दे कि आत्मग्लानि के कारण उसका मन असफल जीवन जीनें के लिये राजी नहीं हुआ और उसनें आत्महत्या करनें की कोशिश की | पुलिस इन्सपेक्टर नें काफी पूँछ तांछ की पर शालिनी के पिता पहुंच वाले आदमी थे सब कुछ शान्त हो गया | पांच दिनों के बाद शालिनी को अस्पताल से छुट्टी मिल गयी | उसे घर लाया गया | अगले दिन राकेश अपनें पिता और माता के साथ शालिनी को देखनें के लिये आत्मानन्द जी के घर आया | जब वह माता पिता के साथ देखकर जानें लगा तो शालिनी नें उसे इशारे से रोककर पास पड़ीकुर्सी पर बैठनें को कहा फिर बोली , " भैय्या अपनी इस गन्दी बहन को माफ़ कर देना | " राकेश ताज्जुब में पड़ गया | बोला , " शालिनी मैनें क्या तुझे कभी अपर्णां से कम समझा है | कौन सी गल्ती की है तूनें जिसके लिये तुझे माफ़ कर दूँ | उतार -चढ़ाव तो आते ही रहते हैं | जीकर जीवट के साथ कुछ करके दिखा दे तेरा भाई राकेश तेरे साथ हर कदम पर खड़ा होगा | " यह कहकर वह तेजी से कमरे से बाहर निकल गया | सभी कोई मिलनें आये | नहीं आये तो डा. वर्मा और उनकी पत्नी कुसुम वर्मा | कुछ दिन बाद शालिनी नें माँ से पूछा क्या कुसुम जी कहीं गयी हुयी हैं | तो उन्होनें बताया कि जिस दिन वह अस्पताल में भर्ती हुयी थी उसी दिन रात को डा. वर्मा और उनकी पत्नी डा. कुसुम में घण्टों तक कहा -सुनी होती रही | कुछ साफ़ तो सुनायी नहीं पड़ा पर रात को दो -तीन बजे जाकर आवाजें बन्द हुयीं | अगले दिन डा. कुसुम वर्मा अपनें दोनों बच्चों को लेकर अपनें पिता के पास फतेहाबाद में चली गयी हैं | और फिर एक दो दिन के बाद डा. वर्मा नें अपना सारा सामान एक ट्रक में लदवाकर किसी दूसरे शहर में रहकर प्रेक्टिस करनें का मन बना लिया है | मकान खाली पड़ा है | हाँ कल शाम को आठ बजे डा. कुसुम वर्मा का सिरसा से फोन आया था वे तुम्हारे विषय में पूछ रही थीं | कहती थीं कि किसी शादी व्याह में उन्हें उस तरफ आना है तब शालिनी से मिल जायेंगीं | उन्होंने तुम्हें छोटी बहन  कहकर आशीर्वाद भी दिया है |
                                  और फिर तीन चार दिन के बाद एक गाड़ी द्वार पर आ खड़ी हुयी | डा. कुसुम वर्मा नें अपनें दोनों बच्चों के साथ घर में प्रवेश किया | शालिनी के माता पिता और भाभियों से मिलकर वह शालिनी के कमरे में आकर बैठ गयी | उसनें इच्छा प्रकट की वह शालिनी से एकान्त में कुछ बात करना चाहती है | घर के और सदस्य अपनें अपनें कमरे में चले गये  और डा. कुसुम वर्मा और शालिनी में क्या बात हुयी इसे मैं पूरी तरह नहीं जानता | हाँ बीच -बीच में शालिनी की दबी सिसकी भी अवश्य सुनायी पड़ जाती थी | वापस जानें से पहले न जानें डा. कुसुम वर्मा के मन में क्या आया कि वह राकेश की माँ से मिलनें मेरे घर में चली आयीं | उससे पहले वे कभी भी मेरे घर में नहीं आयी थीं | संयोग ही था जब वे घर पर आयीं तो अपर्णां की सहेलियां प्रियम्बदा और प्राची भी वहां उपस्थित थीं | डा. कुसुम वर्मा नें राकेश की माँ को प्रणाम करके कहा माता जी चाँद में दाग हो सकता है पर आपका बेटा राकेश सर्वथा निर्दोष है | फिर हंसकर बोलीं ," अपर्णां को संम्भाल कर रखना | इसपर न जानें कितनें भौरें मडरा रहे हैं | | चांदी की घण्टियों की रुनझुन आवाज खिलखिलाहट भरी समवेत हंसी घर में गूँज गयी | अपर्णां की माँ ने डा. कुसुम वर्मा के दोनों बच्चों को कुछ दिया पर क्या दिया यह मैं नहीं जानता पर राकेश की माँ नें जो मुझे बताया उसनें फिर मेरे मन को तमाम प्रश्न चिन्हों से भर दिया | उसनें बताया कि प्रियम्बदा और राकेश का पूरा Dramitic Troupe उत्तरांचल के रामनगर में अंतर्राज्यीय प्रतिस्पर्धा के लिये विश्वविद्यालय की ओर से भेजा जा रहा है ,कि प्रियम्बदा ,अपर्णा के साथ यही बतानें घर आ गयी है और राकेश यूनिवर्सिटी में Youth Welfare डिपार्टमेन्ट में कुछ फाइनेन्स लेनें के लिये रुका हुआ है | और बाद में अपर्णा की माँ नें  धीमें से कहा डा. कुसुम वर्मा आयी थीं और सीढ़ियों पर उतरते समय उन्होंने धीरे से मुझे बताया था कि उन्होंने डा. वर्मा से Divorce लेने के लिये अप्लीकेशन लगा दी है | फिर हंसकर बोली यह Divorce क्या चीज होती है राकेश के पापा ?
(क्रमशः )

Friday, 16 February 2018

गतांक से आगे -

                                      यौवन का उफान जब अपनें जोश पर होता है तब तट की सीमायें ढह जाती हैं | पुराकाल में संयमन की प्रचुर संम्भावनायें थीं क्योंकि इन्द्रिय आकर्षण और वंचक प्रलोभन के उद्दीपनों का लगभग अभाव सा था | अब नगरों की छोटी -छोटी गलियों में भी इन्द्र  सभा सजनें लगी है | दीर्घ या अनन्त जीवन की कामना अपनें पंख समेटकर मस्ती भरी कुछ थिरकनों में अवगुंठित होनें लगी है | क्षण ही सत्य है जो तात्कालिक है , जो प्रवहमान चेतना का स्थिर बिन्दु है वहीं पर टिक जानें और उस अनुभव का भरपूर आस्वादन ही मानव जीवन का लक्ष्य बन गया है | देह का सत्य आत्मा के सत्य को बौना कर नभमापी पैगामें भर रहा है | रंग -बिरंगें अनुभव पानें की ललक अवांछित और मिथकीय कल्पना परियों के सुनहले पंखों पर उड़ान लगानें लगी है | इन्द्रिय प्रलोभन के यह दुर्दमनीय थपेड़े न जानें कितनें स्थिर प्रज्ञों को दोलायित कर देते हैं | कुछ ऐसा ही घटित हुआ था बड़ा बाजार के उस मुहल्ले में जिस किराये के मकान में मेरा उन दिनों निवास हो रहा था उससे सटे दाहिनें ओर के एक घर के बाद एक उच्चकुलीन ब्राम्हण परिवार रह रहा था | परिवार के मुखिया आत्माराम शर्मा चार पुत्रों और एक पुत्री के पिता थे | उनकी पत्नी चन्द्रा देवी अपनें झगड़ालू स्वभाव के कारण सारे मुहल्ले में चर्चा का विषय बनी रहती थी | भारतीय परिवेश में चार पुत्रों की माँ होना गर्व भरे सौभाग्य की बात होती है और सबसे छोटी एक पुत्री चार भाइयों के बीच अत्यन्त  लाड़ -प्यार के साथ पल पोसकर बड़ी हुयी थी | आत्माराम जी के पास काफी पैतृक संम्पत्ति थी | चल और अचल पैतृक संम्पत्ति के मालिक आत्माराम जी साहित्यिक प्रवृत्ति के थे | कई बार अपनी तुकबन्दियों को सुनानें के लिये वे मेरे पास आ जाया करते थे | मैं भी उनकी थोड़ी -बहुत प्रशंसा कर देता था| क्योंकि साहित्य के प्रति अनुराग रखनें वाला कोई भी व्यक्ति मुझे साहित्य का अध्यापक होनें के नाते अपना नजदीकी सा लगता था | आत्माराम जी के दो पुत्रों का व्याह हो चुका था बाकी दोनों पुत्र भी इक्कीस और चौबीस के रेन्ज में थे | लड़की अठ्ठारह की होकर उन्नीसवीं में पड़ी थी | लड़की से बड़े दोनों लड़कों की शादी से पहले वे शालिनी की शादी कर लेना चाहते थे | वर की तलाश जारी थी और अप्रत्यक्ष रूप से कई बार उन्होंने यह कहना चाहा था कि शालिनी को मेरे बड़े पुत्र राकेश की सहगामिनी के रूप में स्वीकृति मिल जाय यद्यपि स्पष्ट कोई बात चीत नहीं हुयी थी  पर हम जानते थे कि राकेश हर द्रष्टि से उन्हें योग्य लगता है | पर अनेक नाटकों का नायक अपनें ख़्वाबों में कितनी ही नायिकाओं की तस्वीर संजोये हुये था और उसे बी. ए. में पढ़ रही शालिनी में कहीं कुछ भी ऐसा नहीं लग रहा था जो उसके जीवन में रंग भर दे | यों शालिनी असाधारण न होकर भी मध्यवर्गीय परिवारों में प्रशंसा पानें लायक रूप रंग रखती थी पर उसमें कलाकार युवतियों की सी भाव भंगिमायें देखनें में नहीं आती थीं | आत्माराम जी के घर से सटे दाहिनें पार्श्व में किन्हीं डा. वर्मा नें पूरा घर किराये पर ले रखा था |  उनकी पत्नी भी बी. ए. एम. एस. थी |  डा. वर्मा एम. बी.बी. एस. थे | निचली मंजिल पर सड़क पर खुलनें वाले कमरे में उन्होंने अपना क्लीनिक खोल लिया था और मुहल्ले में उनकी प्रेक्टिस चल निकली थी | कुसुम वर्मा एक बच्चे की माँ थी | उनकी पुत्री अब चार वर्ष की होने जा रही थी | डा. वर्मा देखनें में एक शोभन नवयुवक थे | और एम. बी. बी. एस. तो वे थे ही | सड़क पर आते -जाते जब वे क्लीनिक से बाहर अपनें स्कूटर पर कहीं जाते हुये मिल जाते तो आपस में नमस्कार हो जाया करता था | कभी -कभी मुझे ऐसा लगता था कि डा. वर्मा की आँखों में अतृप्त वासना की झलकियां दिखायी  पड़  रही हैं | कुसुम वर्मा संम्भवतः दूसरे प्रसव की ओर बढ़ रही थीं और डा. वर्मा के मन में उठी नारी शरीर की सानिध्य लालसा को पूरा नहीं कर पा रही थी | शायद इन्हीं परिस्थितियों  में कुसुम वर्मा के साथ वाले मकान में रहनें वाली आत्माराम की पुत्री शालिनी नें कुसुम वर्मा को बड़ी बहिन के रूप में अपना लिया | रोज का आना -जाना प्रारंम्भ हो गया | आत्माराम जी निश्चिन्त थे क्योंकि पड़ोसी डाक्टरी डिग्रियां पाये हुये थे और वे समाज के लिये  अच्छे आचरण के आदर्श बन जानें की क्षमता रखते थे | पर जैसा कि मैं प्रारंम्भ में कह चुका हूँ वासना का मायाजाल आकर्षण के इतनें जटिल फन्दे  डाल देता है कि उनमें सजग से सजग व्यक्ति को उलझा लेनें की क्षमता रहती है | कुसुम वर्मा के दिन चढ़नें लगे | शालिनी उन्नीस -बीस की हो गयी थी | स्नातक कक्षाओं में प्यार संम्बन्धी कवितायें और कहानियां पढ़ायी ही जाती हैं | चार भाइयों के बीच पली इस लड़की से छेड़ -खान करनें की हिम्मत भला किसको हो सकती थी पर अनुभव के अभाव में शालिनी को भटक जानें का ख़तरा था |आत्माराम जी को शालिनी के भीतर उठते हुये उस वासना चक्र का आभाष नहीं पाया जो कुसुम के पति डा. वर्मा हंस बोलकर अप्रत्यक्ष रूप से कच्ची तरुणायी पाये शालिनी के मानस लोक में जगा रहे थे | जैसे -जैसे प्रसव काल नजदीक आता गया शालिनी डा. कुसुम के घर की कई जिम्मेदारियां संम्भालनें लगी | एकान्त के अवसर मिलनें लगे | पहले अन्जानें बनकर डा. वर्मा नें वक्ष स्पर्शन किया | शर्मीली हंसी जो प्रतिरोध रहित थी नें उनका साहस और बढ़ा दिया | वक्ष से ओष्ठ चुम्बन तक पहुँचना अधिक दुष्कर कार्य न था | एक डा. की झूठी प्यार की बातें जिनमें अपनी डा. पत्नी के प्रति अवज्ञा का भाव भी होता था | शालिनी के मन में वासना के नये आवृत्त रचनें लगी | एकान्त के अवसर थे ही | शारीरिक मिलन निर्वाध गति से चल निकला | शालिनी को लगा कि पुरुष का स्पर्श और डा. पुरुष द्वारा खेली जानें वाली रति क्रीड़ायें स्वर्गिक सुख से भरी हैं | कुसुम वर्मा को अभी तक इस बात का आभाष नहीं हो पाया था कि उनके डा. पति उनके साथ दगाबाजी कर रहा है | दो तीन महीनें बाद डा. कुसुम वर्मा एक पुत्र की माँ बन गयीं | कुछ समय और बीता अब उन्होंने एक पढ़ी लिखी नौकरानी की व्यवस्था कर ली और क्लीनिक में बैठनें लगी | घर में नौकरानी के आ जानें और कुसुम वर्मा के काम संभ्भालनें  के बाद एकान्त के अवसर कम हो गये | डा. वर्मा का रोमान्टिक मिजाज मिलन के मौके तलाश करनें लगा | जिस कालेज में शालिनी पढ़ रही थी उसी के पास के एक पार्क में पूर्व टाइम पर मिलना जुलना प्रारम्भ हुआ | एक दिन भाई के किसी दोस्त नें दोनों को पार्क के बीच बनी लता कुटी में दोनों को हँसते बोलते देखा | खबर घर तक पहुंचीं | आत्माराम जी सजग हो गये | भाइयों नें मुस्तैदी बढ़ा दी | कालेज और घर इसके अतिरिक्त शालिनी का और कहीं आना जाना बन्द हो गया | डा. वर्मा भी आदर्श आचरण का चोंगा पहनकर क्लीनिक पर बैठनें लगे | ऐसा लग रहा था कि सभी कुछ ठीक -ठाक हो जायेगा | पर कहते हैं प्रकृति के कुछ अनिवार्य नियम हैं और वे नियम मनुष्यों की चतुरायी से सोची हुयी सभी योजनाओं को विफल कर देते हैं | एक दो महीनें और बीते और शालिनी को लगा कि शायद वह माँ बननें का पथ पर अग्रसर हो रही है | एक शाम वह किसी बहानें  डा. कुसुम वर्मा के घर गयी और कुछ क्षण का एकान्त पाकर उसनें डा. वर्मा से यह बात बतायी सब सुनकर डा. वर्मा को मानों सांप काट गया | उन्होंने आश्वासन दिया कि वे कुछ इन्तजाम करेंगें | पर अब शालिनी का बाहर आना -जाना बन्द था | क्या किया जाय ? डा. वर्मा का सारा कैरियर दांव पर लग गया | जान जानें का ख़तरा भी मुंह बाये सामनें खड़ा हो गया और जेल के सिकचों के पीछे बन्द होनें की विभीषका भी सामनें खड़ी हो गयी | इन्द्रिय सुख के पिछले कुछ महीनों के उल्लास बिन्दु शूल बनकर अन्तर मन को छेदने लगे | पाप अन्तरात्मा के पश्चाताप में ही धुलकर ही साफ़ हो सकता है | उसे छिपाने के लिये किये गये यत्न न जानें कितनी गलीज गलियों में चक्कर लगवा देते हैं | डा. वर्मा में आत्मा का वह बल कहाँ था कि वह अपनें अपराध को सहज स्वीकार कर अपनी डा. पत्नी से क्षमा माँगते और शालिनी की माँ के सामनें विनय प्रार्थना कर अपनी मुक्ति का कोई समाधान खोजते | फिर एक दिन जब शालिनी का माँ घर में डा. कुसुम के बेटे को गोद में लेनें के लिये आयी तो शालिनी भी उसके साथ आ गयी | | कुसुम कुछ देर के लिये ऊपर चली गयी  और डा. वर्मा को शालिनी से एकान्त में बात करनें का मौक़ा मिल गया  अपनें डा. होनें  का गलत फायदा उठाते हुये कि वह हमेशा के लिये बदनाम हो जायेगी क्योंकि उसनें उनका नाम लिया तो वह साफ़ नकार जायेंगें और उसे दोष देंगें कि अपना पाप छिपानें के लिये वह एक इज्जतदार डाक्टर को फंसाने की कोशिश कर रही है | अनुभवहीन मुसीबत में फंसी कच्ची तरुणायी में फिसल जानें वाली एक लड़की रोनें के अलावा और कर ही क्या सकती है | डा. वर्मा नें धूर्तता की एक और चाल फेंकी बोले देखो शालिनी तुम अपनी माता जी से कहो कि वह जो प्रोफ़ेसर साहब का बड़ा लड़का है तुम उससे प्रेम करती हो और तुम दोनों का शारीरिक मिलन हो गया है यह भी कह देना कि पिछले महीनें तुम्हें मासिक धर्म नहीं हुआ है | पिताजी पर दबाव डालकर तुम्हारी माँ प्रोफ़ेसर साहब के पास शादी का पैगाम भिजवायें जहां तक उम्मीद है वह मान जायेंगें क्योंकि तुम पढ़ी लिखी सुन्दर लड़की हो  , चार भाइयों की बहन हो और तुम्हारे पिता अपनें समाज के खाते -पीते सम्मानित व्यक्ति हैं आगे मैं सब संम्भाल लूंगा | हम दोनों डाक्टर  हैं किसी को कानों कान पता न चल पायेगा | शालिनी रोनें लगी उसनें कहा मैं इतनी झूठी बात कैसे कह दूँ ? मैं जहर खा लूंगीं पर राकेश को इस पाप का दोषी कभी नहीं बनाऊँगीं | डा. वर्मा नें कुटिलता भरी हंसी हंसकर कहा अरे शालिनी पाप वाप  की बातें सभी पुरानी बातें हैं | किसी को क्या पता कि तेरे पेट में बच्चा आ गया है एक दो महीनें तो पहचान होती ही नहीं यदि बाहर मेरे साथ आती -जातीं तो मैं गर्भ पात करवा देता | जो जो मैनेँ कहा है वैसा कर और कोई रास्ता नहीं है | डा. कुसुम ऊपर से नीचे उतर रही थीं पीछे अपनी गोद में अपनें नन्हें मुन्हें  को लिये शालिनी की माँ  भी उतर रही थी | शालिनी उठकर जीनें के नीचे खड़ी हो गयी और अपनी माँ के साथ घर वापस आ गयी |
                                        सारा दिन वह अपनें कमरे में चारपायी पर लेटकर रोती रही | कई बार माँ नें टोंका कि वह कालेज क्यों नहीं गयी क्या तबियत खराब है ? शाम को माँ उसके कमरे में आयी माथे पर हाँथ रखकर कहा बुखार उखार तो नहीं है | शालिनी नें कहा बड़ा दर्द हो रहा है | माँ बोली छूने ऊनें के समय दर्द वर्द तो होता ही रहता है | सब ठीक हो जायेगा अब शालिनी को कुछ हिम्मत हुयी उसनें कहा अम्मा मैं एक बात कहना चाहती हूँ और फिर हांथों से मुँह ढककर रोनें लग गयी | माँ नें बार -बार आग्रह किया कि वह जो कहना चाहे वह कहे रो क्यों रही है और तब धीरे- धीरे रोते सिसकते शालिनी नें धूर्त डा. वर्मा की उन बातों को दोहरा दिया जो डा. वर्मा शालिनी के मुंह से माँ के सामनें कहलवाना चाहते थे | झूठ कितनी ही होशियारी से बोला क्यों न जाय हमेशा लंगड़ा होता है और अपनें पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता पर शालिनी की माँ  को ऐसा लगा कि लड़की बड़ी हो गयी है और क्या पता कि एकाध महीना यदि टल भी गया तो अभी कोई ख़ास बात न हो अगर शादी की बात तय हो जाय तो वह महीनें के भीतर ही शादी कर देंगें | भगवान का दिया हुआ अपनें पास सब कुछ है | लड़की के चार भाई हैं | फ्रोफेसर साहब का घर भर देंगें | उनके पास तो उनका मकान तक नहीं है क्या हुआ उनके बच्चे पढ़ने में काफी तेज और देखनें सुननें में ठीक हैं | हमारे अपनें बच्चे भी तो कुछ कम नहीं हैं और राकेश तो मुझे सदैव माँ कहकर प्रणाम करता ही है | आत्माराम जी तो पहले ही संम्बन्ध के लिये खुलकर बात करनें की योजना बना रहे थे | पत्नी के कहनें पर उन्हें और बल मिल गया और उस दिन शाम को सात -आठ के बीच वह मेरे पास सीढ़िया चढ़कर बैठके में आ गये | विश्वविद्यालय की कई सुन्दर लड़कियों के साथ उठनें -बैठनें और अभिनय करनें वाला राकेश एक छोटे -मोटे हीरो के रूप में अपनी पहचान बना रहा था मैं जानता था कि वह इस प्रस्ताव को कभी स्वीकार नहीं करेगा | पर एक सम्मानित पड़ोसी के प्रस्ताव को तिरस्कार से ठुकरा देना मुझे अच्छा न लगा | मैनें कहा मैं राकेश की माँ से बात करूंगा आप कल शाम को मुझसे मिलना | मैं जानता था कि राकेश की माँ एक कान्यकुब्ज घरानें से आयी हैं और उसकी छोटी -मोटी शिक्षा नें उसे इतनी समझ नहीं दी है कि वह ब्राम्हणों के अनेक खण्डों में बंटे वर्गीकरण को समान रूप से देख सकें | राकेश की माँ के पास रसोईं में बैठकर मैंनें उससे  आत्मानन्द शर्मा द्वारा लाये गये शादी के प्रस्ताव को उसके सामनें स्वीकृति या अस्वीकृति के लिये रखा | छूटते ही वह बोली हम कान्यकुब्ज बीस बिस्वा हैं शर्मा -वर्मा  लोगों के घर से आयी हुयी लड़की को हम अपनी बहू नहीं बनायेंगें | मैनें कहा आत्मानन्द जी खाते -पीते आदमी हैं | लड़की के चार भाई हैं | तुम यहाँ अपनें क्षेत्र से बाहर रह रही हो | रिश्ता हो जाय तो यहां कोई अपना सगा संम्बन्धी तो हो जायेगा | उसनें आगे कहा अपना राकेश हजारों में एक है | शालिनी उसके मुकाबले क्या है ? मैनें हँसते हँसते कहा अरे अपर्णा की माँ कोई रिश्ता थोड़ा  ही लिये ले रहा हूँ | तुम मेरी एक बात मानों आज राकेश जब घर आये तो उसको टटोल कर देखना कि वो अपनी शादी के विषय में क्या विचार रखता है | अगले दिन मेरी पत्नी नें मुझे जो कुछ बताया उसे अपनी स्मृति के आधार पर कुछ इसप्रकार लिखना चाहूंगा |
माँ - बेटा राकेश अब  तुम बड़े हो गये हो | मेरी उमर बढ़ रही है | घर का काम -काज मुझसे नहीं सम्हलता | मुझे एक बहू चाहिये |
राकेश -अम्मा आज तुम ये कैसी उल्टी -सीधी बातें कर रही हो | क्या बात है ? क्या पिताजी से कुछ खटपट हो गयी है ? माँ  माँ उनकी बात छोड़ो वे तो कभी सीधे बात ही नहीं करते | अरे पड़ोस के आत्मानन्द आये थे अपनी लड़की की शगुन की बात कर रहे थे |
राकेश - कौन आत्मानन्द ,शालिनी के पिता | अरे अम्मा शालिनी को तो मैं बहिन के अतिरिक्त और कुछ मानकर चल ही नहीं सकता | अभी मुझे कुछ बन जानें दो | फिर जहां कहोगी वहां से तुम्हारी सेवा के लिये किसी को ला दूंगां | अजीब बात है शालिनी के पिता को यह क्या सूझा ?
माँ - तुम्हारे पिता नें मुझे तुमसे बात करनें के लिये कहा था | क्योंकि आत्मानन्द जी उनपर बहुत दबाव डाल रहे हैं | अब मैं उन्हें स्पष्ट रूप से कहलवा दूंगीं कि वे अपनी लड़की के लिये अन्य कोई वर तलाश कर लें | शालिनी राकेश की बहिन है और बहन बनकर रहेगी | अपर्णा भी तो उसे छोटी बहन सहेली के रूप में ही लेती है |
                      अगले दिन सायंकाल को आत्मानन्द जी और उनकी पत्नी दोनों घर पर आ गये | मैं असमंजस में पड़ गया क्योंकि आत्माराम जी की पत्नी का झगड़ालू स्वभाव मैं कई बार देख चुका था | मैनें राकेश की माँ को आवाज देकर बैठके में बुला लिया | आत्माराम की पत्नी नें कहा मेरे घर में क्या कोई कमी है | शालिनी में क्या दोष है | आप हमारा संम्बन्ध स्वीकार क्यों नहीं कर रही हैं | राकेश की माँ नें कहा कोई जबरजस्ती है आपके पास सब कुछ है पर हम अभी शादी करनें की सोचते ही नहीं | शादी कोई बच्चों का खिलवाड़ है | हमारे बच्चे जब कुछ बन जायेंगें तब शादी की बात सोचेंगें | शालिनी की माँ इस उत्तर के लिये तैय्यार नहीं थी | मैनें शान्ति का पुट देते हुये आत्मानन्द जी से कहा कि वे हमारे सम्मानित पड़ोसी हैं | उन्होंने अपनी लड़की का हाँथ मेरे लड़के को देनें की बात कहकर मेरा सम्मान बढ़ाया है पर राकेश शालिनी को छोटी बहन के रूप में लेता है और यही संम्बन्ध सबसे पवित्र संम्बन्ध होता है | हम आदर्श पड़ोसी बनकर रहेंगें | यह हमारा कमिटमेन्ट है | अब शालिनी की माँ नें कहा कि उसे कल का कुछ समय दिया जाय क्योंकि वह शालिनी को मुझसे मिलवाना चाहती है | राकेश की माँ उस समय उठकर अन्दर चली गयी थी और यह बात मेरे अकेले में शालिनी की माँ नें मुझसे कही | आत्मानन्द जी वहां बैठे थे | उन्होंने शंकालु होकर शालिनी की माँ से पूछा कि शालिनी प्रोफ़ेसर साहब से क्यों मिलना चाहती है | प्रोफ़ेसर साहब हमारे मित्र हैं | मित्र बनकर रहेंगें | हम अपनी लड़की का रिश्ता और कहीं खोज लेंगें | शालिनी इसमें बीच में कहाँ से आ जाती है | शालिनी की माँ नें तेज आवाज में कहा , " तुम तुकबन्दी के अलावा और कुछ करना जानते हो | बाप दादा की सम्पत्ति पर मौज कर रहे हो | अपना कुछ कमाया नहीं | यह तो कहो मेरे दो बड़े बेटे ठेकेदारी का काम करनें लगे हैं तो कोई कमी महसूस नहीं होती शालिनी जो कुछ कहना चाहती है उसे प्रोफ़ेसर साहब के सामनें कहेगी | मैं आपके पास अकेले में उसे लेकर कल शाम साढ़े सात बजे हाजिर हूंगीं | उसकी बात सुन लेना फिर जो फैसला करोगे उस पर विचार किया जायेगा | "
                            शालिनी की माँ के कर्कश स्वर में मुझे कुछ अभद्रता की झलक मिली पर चूंकि मैं समस्या के उलझाव से कतई परिचित ही नहीं था इसलिये मैनें हाँथ जोड़कर नमस्कार किया | वे दोनों सीढ़ियां उतरकर अपनें घर चले गये | घर जाकर शालिनी की माँ नें शालिनी से क्या कहा यह मैं नहीं जानता पर अगले दिन जब मैं कालेज से लौटा तो मुझे मेरी पत्नी नें खबर दी कि शालिनी नें सल्फास की गोलियां खा ली हैं , कि वह जीवन और मरण के बीच में झूल रही है | कि वह मेडिकल के इमरजेन्सी वार्ड में भरती की गयी है , कि अगर भगवान का हाँथ होगा तभी उसके बचनें की उम्मीद है | समस्या से सर्वथा अपरिचित होनें के कारण मेरे दिमाग में शून्यता का बोझ भरा हुआ दबाव बढ़ने लगा | मुझसे मिलनें से पहले ही शालिनी नें यह सब क्यों किया ? क्या राकेश का इस घटना से कोई संम्बन्ध तो नहीं है ? कितना आश्चर्यजनक है यह संसार ? कितनी कुटिल हैं मानव संम्बन्धों की परिभाषायें , वासना के घिनौनें घेरे हमारे किशोरों और तरुणों को कितनी सहजता से अपनेँ घेराबन्दी में ले लेती हैं पर शालिनी तो एक मृदुभाषी सरल स्वभाव की छात्रा लगती है | विवाह के प्रस्ताव और आत्महत्या के प्रयास इन दोनों के बीच के संम्बन्ध की कड़ी कैसे तलाशी जाय ? प्रभु शालिनी के प्राणों की रक्षा करना | शालिनी के मुंह से सब कुछ जाननें का अवसर देना | यदि मेरा रक्त दोषी है तो मैं अपनी जीवन की निरर्थकता का बोझ वहन करते हुये कब तक जी सकूँगां ?
(क्रमशः )

Saturday, 10 February 2018

                      प्रौढ़ि की समाप्ति और वार्धक्य की शुरुआत के बीच एक अगोचर विभाजक रेखा प्रकृति की शाश्वत नियम तालिका में खींच दी गयी है | स्वस्थ रहनें के सारे प्रयासों की बावजूद ऋतु परिवर्तन की सनातन संगीत लहरी में उम्र के विभिन्न सोपानों पर कई उतार -चढ़ाव आते रहते हैं | ' माटी ' के प्रकाशन में विलम्ब होने का कारण भी सम्पादक के स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जा सकता है | मानव शरीर की संरचना इतनी अदभुत और जटिल है कि उसमें आ जानें वाले तनाव बिन्दुओं का कोई सुनिश्चित समाधान मिल ही नहीं पाता | पर अब ' माटी  ' प्रकाशन की नियमित प्रतिबद्धता के प्रति हमें पूरी तरह सचेत रहना होगा | सम्पादक मण्डल के कुछ आदरणीय बन्धुओं के प्यार भरे आग्रह के बल पर स्वास्थ्य संम्बन्धी समस्या खड़ी हो जानें पर सम्पादकीय भार को वहन करनें के लिये सहमत कर लिया गया है |   विश्वास है कि मासिक प्रकाशन का अनावृत क्रम अब अबाधि गति से चलता रहेगा पर दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में कुछ भी तो अबाध नहीं चलता | हर विकासवादी नियम कहीं न कहीं , किसी न किसी स्तर पर ऋजु मार्ग से हटकर वक्रता की तिर्यक रेखायें खींचता दिखायी पड़ता है | विकासवाद के आदि श्रष्टा डार्बिन स्वयं ही Mutation क्यों होता है इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाये हैं | महर्षि अरविन्द नें विकास के इसी पक्ष को लेकर प्रकृति के अनवरत संगीत में किसी श्रष्टा की ध्वनि सुनी है और विश्वास  व्यक्त किया है प्रकृति मानव को महामानव बनानें की ओर चेष्टा रत है | कितनी सहत्राब्दियों के बाद यह चेष्टा सफलीभूत हो सकेगी इसकी झलक दिव्य नेत्र पानें वाले महापुरुष ही पा सकते हैं |
                                     शीत ऋतु समाप्ति की ओर बढ़ रही है ,बढ़ना ही चाहिये | एक की समाप्ति ही दूसरे को अवतरित करनें का सुअवसर प्रदान करती है | अंग्रेजी के शीर्षस्थ गीतकार शैली नें कहा ही है , " If winter comes can spring be far behind. " भारत के राजनैतिक पटल पर जो घट  रहा है उसे 'माटी ' के पाठक देखते , सुनते ही हैं | विश्व के राजनीतिक पटल पर भी द्रुतिगति से द्रश्य परिवर्तित होते रहते हैं पर इन सब परिवर्तनों से भी कहीं अधिक तीव्रता के साथ व्यक्ति की अन्तस चेतना पर भावों और विचारों की चल छवियाँ ज्योतित होती रहती हैं | भारतीय आर्ष परम्परा निर्विकार रूप से अन्तस चेतना को सांसारिकता से अलग हटाकर मानव जीवन जीनें का सन्देश देती है | सुखे दुखे समेकृत्वा , लाभा लाभो जया जयो | हम चाहते हैं कि प्रिन्ट मीडिया में छपी सनसनीखेज खबरों और पाशविक कामुक प्रसंगों से ' माटी  ' के पाठक अपनें को दूर रखनें का प्रयास करें | पढ़ कर विस्मृति कर देना भी एक प्रकार का मानसिक अनुशासन है | गृह सज्जा के लिये स्वच्छता की तलाश करने पर कूड़ा -कचरा तो इकठ्ठा हो ही जाता है | फेंक देनें योग्य उच्छिष्ट को घर से बाहर डाल देना ही उचित होता है | बाजारू खबरें मानसिक स्वास्थ्य के लिये उससे कहीं अधिक गहरा संकट उत्पन्न करती है जो संकट बाजारू खानें से स्वास्थ्य के लिये उत्पन्न होता है |
                              बसन्त के आगमन के साथ ही कलियों का प्रसूनों में परिवर्तन प्रारम्भ हो जायेगा | नव वर्ष के प्रारंम्भ के साथ ही बहुत से नवयुवक और नवयुवतियां 18 वर्ष पूरे कर मतदान की पात्रता पा जायेंगें | मानव शरीर की चेतना प्रणाली को गहन अध्ययन का विषय बनानें वाले मनीषी इस बात से सहमत हैं कि युवा अवस्था चालीस के आस -पास अपनें पूर्ण वेग से प्रभावित होती रहती है | उसके बाद उत्साह का उफान धीमी गति पकड़ लेता है | मार्गदर्शन के लिये प्रौढ़ि और वार्धक्य आदर्श के रूप में लिये जा सकते हैं | पर सक्रियता के लिये साहस और जुझारूपन के लिये तथा आमूल चूल परिवर्तन के लिये युवा शक्ति ही आदर्श बन सकती है | भारत की सभी राजनैतिक पार्टियां इस तथ्य को स्वीकार करती हैं और इसीलिये सभी के अपनें युवा -युवती संगठन हैं | अंग्रेजी का यूथ शब्द नर -नारी दोनों के लिये समान रूप से प्रयोग होता है | और हिन्दी में भी हमें युवा शक्ति का प्रयोग इसी व्यापक सन्दर्भ में करना चाहिये | झरनें वाले पात तो झरेंगें ही | अंकुरित होनें वाले कोपल दल नयी साज -सज्जा के साथ उनका स्थान लेंगें | हाँ डालियों की मेरु रेखा उन दोनों का ही संम्बल बनी रहेंगीं | ठीक इसी प्रकार मानव सभ्यता के हजारों हजार सालों  से पाये हुये संचित ज्ञान के बल पर कुछ श्रेष्ठ विचारधारायें सभ्यता का मेरुदण्ड बनकर उभरी हैं | इन विचारधाराओं को जीवित रखना होगा | पादप दल झरते -उभरते रहेंगें | कलियाँ विकसित और प्रफुल्लित होती रहेंगीं |

Friday, 9 February 2018

गतांक से आगे -

                                           डा. शकुन्तला सिंगला नें तर्क को आगे बढ़ाते हुये कहा ," युग बदल गया है |  अब इस धरती को अधिक नर -नारियों की आवश्यकता नहीं है | जब मानव को अपनें अस्तित्व के  लिये वन्य पशुओं से लड़ाई लड़नी थी | जब प्राकृतिक आपदाओं से मानव जाति का बड़े पैमानें पर विनाश हो जाता था तब माता होनें का गौरव यही माना जाता था कि वह अधिक से अधिक सन्तान पैदा कर सके | उस समय जितनी जनसंख्या थी उससे काफी बड़ी जनसंख्या कृषि की उपज ,वनों और पशुओं की उपज के साथ मिलकर भूख से मुक्त रखी जा सकती थी | जीवन के अन्य साधन भी जुटाये जा सकते थे जैसे गृह ,वस्त्र और ईंधन आदि | आज परिस्थितियां बिल्कुल बदली हुयी हैं | हिन्दुस्तान के सन्दर्भ में तो आज जितनी आबादी है उसमें किसी बढ़ोत्तरी की गुंजाइश नहीं है | पति -पत्नी को एक सन्तान का आदर्श ही रखना चाहिये और यदि पुरानें संस्कार बहुत जोर मारें तो दो सन्तानों का आदर्श तो अनिवार्य ही होना चाहिये |
                                        डा. रजनी कान्त विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े हुये थे | उन्होंने तर्क दिया , " यदि हिन्दू केवल एक या दो सन्तान पैदा करते रहे और अन्य धर्म के माननें वाले मनमानी सन्तानें पैदा करते रहे तो कुछ ही दशकों बाद भारत हिन्दू बाहुल देश नहीं रहेगा और तब यहां पर वही सब कुछ होगा जो पाकिस्तान में हो रहा है | हमें भूलना नहीं चाहिये कि जिसे हम जनतन्त्र डिमोक्रेसी कहते हैं वह तभी इस देश में चल सकती है जब तक यह देश हिन्दू बाहुल रहेगा | अन्यथा हमारी धर्म निरपेक्ष व्यवस्था कूड़े में फेंक दी जायेगी और यहाँ कट्टर पन्थियों की तूती बोलेगी | "
                                      डा. भारद्वाज नें तर्क को एक नयी दिशा दी जब डा. सिंगला यह कह रही हैं कि हमें एक या दो सन्तानों से  आगे नहीं बढ़ना चाहिये तो वे तो न हिन्दुओं की बात कर रही हैं न मुसलमानों की ,न तो सिक्खों की ,न इसाइयों की , न पारसियों की , न पेंड़ पूजकों की | वे तो सारे हिन्दुस्तान में रहनें वाले भाई -बहनों को अपनें तर्क के दायरे में घेर रही हैं | हर धर्म और विश्वास के समझदार लोग उनकी बात का समर्थन करेंगें | मजहब मानव जाति   के कल्याण के लिये होते हैं और जो बात सारे संसार के लिये कल्याणकारी है उसे हर सच्चे इन्सान को स्वीकार करना चाहिये | बात चीत हो रही थी कि सुषुमा, अपर्णा  और प्रियम्बदा के साथ घर में दाखिल हुयी | वे अभी अभी विश्वविद्यालय की किसी बौद्धिक विलास वाले उत्सव से वापस आयी थीं | सुषुमा डा. शकुन्तला सिंगला की बड़ी बेटी थी और अंग्रेजी के एम. ए. फ़ाइनल में थी | प्रियम्बदा उसकी क्लास फैलो थी और मेरी बेटी अपर्णां अभी एम. ए. के प्रथम वर्ष में ही थी पर उसे इन  दोनों Seniors ने अपनें गोल में शामिल कर लिया था | आज सुषुमा का 22 वां जन्म दिन था और इसीलिये हम कई लोग वहां आमन्त्रित किये गये थे | कहना न होगा कि हम सबकी पत्नियां हमारे साथ थीं और वे अन्दर के डाइनिंग रूम में खानें -पीनें की व्यवस्था में लगी थीं | तीनों लडकियां हम सबको वहां बैठा देखकर नमस्कार कर अन्दर जाना चाहती थीं पर मेरा मन हो आया कि कुछ देर के लिये उनको उसी कमरे में रोककर उनके भी विचार जान लिये जांय | आखिर नयी पीढ़ी का तो वे ही प्रतिनिधित्व कर रही हैं | कई खाली पड़ी कुर्सियों की ओर इशारा करते हुये मैनें उनसे बैठनें को कहा और फिर सुषुमा की ओर  देखकर बोला , " बेटी सुषुमा तुम सब अभी अभी विश्वविद्यालय की विचारगोष्ठी से वापस आयी हो बात कुछ अटपटी सी लगेगी पर हम बड़े -बूढ़े यह जानना चाहते हैं कि क्या नव विवाहित दंपत्ति अपनी सन्तानों की सीमा एक या दो तक सुनिश्चित करें या उनकी संख्या पर कोई प्रतिबन्ध न लगाया जाये | डा. रजनीकान्त का मानना है कि ऐसा कर देनें से भारत हिन्दू बहुल देश नहीं रहेगा | हमें सोचना होगा कि क्या हिन्दू धर्म के अतिरिक्त अन्य धर्मों के अनुगामी छोटी सोच को देशव्यापी हित  की सोच में बदल नहीं सकते | बेटी सुषुमा तुम तीनों में सबसे प्रखर बुद्धि वाली और सीनियर हो | तुम अपनी राय दो | सुषुमा बोली , " अंकल आप मुझे अनावश्यक महत्व दे रहे हैं | प्रियम्बदा क्या मेरे से कम  है और अपर्णां तो अपनी झोली में कितनें  मैडल लिये  है | पर आपनें मुझसे कहनें  को कहा है तो मैं अपनें  विचार आप सबके सामनें  रखती हूँ मुझे विश्वास  है कि  प्रियम्बदा और अपर्णां मुझसे सहमत होंगीं | "
                               देखिये एक युग था जब कबीली संघर्षों में लाठी और फिर नुकीले और फिर धातु के और पैनें हथियारों का प्रयोग होता था | जिस कबीले में जितनें  अधिक लड़ाके  हों उतना ही अधिक से अधिक भूमि विस्तार वह कबीला पा जाता था | नारी तो उस समय सन्तान उत्पत्ति के लम्बे कार्य में अधेड़ उम्र तक लगी रहती थी | यही कारण है कि  हमारे संस्कारों में लड़कों का मूल्य लड़कियों से बढ़ गया | अब आप जानते हैं कि  भारत की धरती पर जो जनसंख्या है उससे अधिक का बोझ नहीं उठा सकती | स्वाभाविक है कि  उसे कुछ कम  कर दिया जाये  तो देश में कुछ अधिक खुशहाली हो जायेगी इसलिये मैं तो एक सन्तान  की ही पैरवी करना चाहती हूँ | मैनें कहा शाबास सुषुमा और फिर शकुन्तला सिंगला की ओर देखा उन्होंने सुषुमा से कहा , " अन्दर जा और आंटी लोगों के साथ खानें -पीनें की व्यवस्था देख ,दिल्ली से भी तेरी कुछ सहेलियां आयी हैं | उनसे अन्दर  जा कर मिल | "
                                      ' माटी  ' के पाठक शायद जानना चाहते होंगें कि विशाल राठी के सन्दर्भ में डा. शकुन्तला  सिंगला कहाँ से आ गयीं | महर्षि दयानन्द यूनिवर्सिटी से नगर के जो महाविद्यालय जुड़े हुये  थे उन्हीं में से एक की प्राचार्या डा. शकुन्तला सिंगला भी थीं | वे स्वयं एक विचारशील और सन्तुलित व्यक्तित्व की महिला थीं | उनके पति भारत की विदेश सेवा में थे और इस समय कनाडा में भारत के हाई कमिश्नर के आफिस में ज्वाइन्ट सेक्रेटरी थे | वहीं से उन्होनें पुत्री को शुभकामनायें भेज दी थीं | सुषुमा से जो सहेलियां दिल्ली से आयी थीं उनमें एक थी दक्षिणी दिल्ली के इनकम टैक्स आफीसर की पत्नी जयन्ती | हम बता ही चुके हैं कि  सुनीता का भाई दिल्ली में इनकम टैक्स का  अफसर था | जयन्ती अपनें  साथ सुनीता  और उसके दोनों बच्चों को भी गाड़ी में बिठा लायी  थी | डिनर लेते समय जब सब परिवार इकठ्ठे हुये तो मैनें सुनीता और उसके दोनों बच्चों को देखा वह एक शालीन भारतीय नारी लग रही थी और उसके दोनों स्वस्थ सुन्दर बच्चे उसके माता होनें  के गौरव को बढ़ा रहे थे | मुझे उसमें किसी अहंकार का लेशमात्र भी  नहीं  दिखायी पड़ा फिर विशाल राठी उसे अहंकारी कैसे बता रहा है | कहीं  विशाल राठी स्वयं एक मिथ्या दंम्भ से ग्रसित तो नहीं है ? विशाल कविता -वविता लिखता है कुछ लेख -सेख  भी लिख लेता है | शायद उसे एक श्रेष्ठ साहित्यकार होनें का दंम्भ हो | और फिर पुरुष होने का अभिमान तो होता ही है | पति होनें  के नाते पत्नी को मेरे अनुसार ही चलना चाहिये यह मान्यता अधिकतर भारत के घरों में पायी जाती है | मैं टटोल कर सत्य तक कैसा पहुंचा जाये इसके लिये मौके की तलाश में लग गया | डिनर के बाद तय हुआ कि ड्राइंग  रूम में बैठकर एक -एक कप काफी ले ली जाये | अध्यापिका होनें  के नाते सुनीता भी डा. शकुन्तला सिंगला के साथ बैठक में आ गयी | शकुन्तला  जी नें सुनीता का परिचय हम सबसे सुनीता विशाल राठी के रूप में कराया | मैनें शकुन्तला  जी पूछा , ' विशाल राठी जी यूनिवर्सिटी कालेज के प्रोफ़ेसर हैं न ? उन्होंने स्वीकृति में सिर हिलाया | फिर मैनें सुनीता से पूछा कि विशाल राठी जी क्या कहीं काम में फंस गये हैं जो उनके साथ नहीं आये | सुनीता बोली अंकल सच तो यह है कि हम दोनों में कुछ वर्षों से बातचीत बन्द है | मैनें आश्चर्य से कहा , " आप अपना परिचय सुनीता विशाल राठी के रूप में देती हैं और विशाल राठी जी से आपकी बात चीत तक बन्द है ऐसा क्यों ? सुनीता बोली , " मैं स्वयं नहीं जानती शायद पुरुष होनें का दंभ्भ आड़े आ रहा है | या हो सकता है कि  दामाद होनें पर भारतीय पुरुष जिस अतिरिक्त सत्कार की मांग करता है वह सत्कार विशाल जी को मेरे पिता से न मिल रहा हो | जहां तक मेरे भाई का सवाल है मैंकुछ नहीं कह सकती पर उसकी अपनी अकड़ तो है ही | अब डा. रजनीकान्त बोले , " विशाल जी को मैं जानता हूँ | वे विद्वान पुरुष हैं | आप पिता के यहां से छोड़कर उनके साथ क्यों नहीं रहतीं ? सीता का आदर्श तो राम के साथ रहना ही था | "
                                             मैं चिन्तित  हो उठा सीता जी और मर्यादा पुरुषोत्तम राम को बहस के बीच में खींचकर डा. रजनीकान्त कहीं बात का बवण्डर न बना दें | पर सुनीता नें पूरे आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया , " देखिये आप जो कह रहे हैं वह न जानें किस युग की बात है | फिर मैं दो बच्चों की माँ हूँ कई वर्ष उनके साथ रहकर सहवास का सुख ले लिया है | मेरे दोनों बच्चे बसन्त कुन्ज दिल्ली में दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढ़ रहे हैं | उन दोनों की पढ़ायी  का खर्चा ही इतना है विशाल जी झेल नहीं पायेंगें | मुझे दिल्ली में नौकरी करनें के लिये विवश होना पड़ा है फिर भी पिता जी की मदद के बिना पढ़ाई संम्भव नहीं है | आखिर आजकल हिन्दुस्तान की पढ़ाई जब तक अमेरिका या योरोप से कोई डिग्री न ले ली जाये आदर का पात्र नहीं बनती | सो  कल विदेश भेजनें के लिये  पैसा कहाँ से आयेगा | जहां तक विशाल जी के एक साल विदेश रहनें की बात है जब वे फ्रेन्च में सर्टिफिकेट लेनें  के लिये  गये  थे तो ये भी तो पिताजी के पैसे से ही संम्भव हो सका था | अब उनमें  निरर्थक पुरुष अभिमान क्यों जाग उठा है ? डा. रजनीकान्त बोले , " सुनीता जी आपकी बात में काफी वजन है | पर यदि आपके पिताजी विशाल जी को बुलायेंगें तभी तो वे वहां जा पायेंगें | सुनीता ने उत्तर दिया क्यों ? मैं जब तक उस घर में हूँ विशाल जी को वहां आनें  का पूरा हक़ है | रह गयी बात पिता जी के बुलानें  की सो उन्होनें एक बार फोन पर आनें को  कहा  भी था | सुनना चाहेंगें विशाल जी नें क्या उत्तर दिया ? हम सब चुप रहे शकुन्तला जी ने कहा चलो छोड़ो इन बातों को और सुषुमा को आवाज दी कि वह काफी ड्राइंग रूम में भिजवा दे | सुनीता बोली , " विशाल जी ने कहा , " सुनीता को लाख बार गर्ज हो तो मेरे पास आ जाये | नहीं तो मेरी तरफ से संम्बन्ध समाप्त है | मैं पति बनकर रहूँगा सुनीता का पिछलग्गू बनकर नहीं | "
                              पिता जी नें फोन रख दिया मेरे से बोले इस बूढ़े की इज्जत अब तुम्हारे हाँथ है भगवान नें दो पोते दे दिये हैं | शरीर की भूख को संयम के साथ साध लेना बेटी | इस अभिमानी पुरुष को नारी गौरव का पाठ पढ़ाना ही चाहिये | एक दिन भाई के सामनें भी यह सब बातें जा पहुंचीं | नयी पीढ़ी का प्रतीक मेरा आफीसर भाई मुझे तलाक ले लेनें के लिये मुझसे आग्रह करने लगा | मैनें कहा मैं सुनीता विशाल राठी रही हूँ , हूँ और आगे भी बनी रहूंगीं | उनकी पवित्र स्मृति  के रूप में उनके दो प्रतिनिधि पुत्र मेरे संरक्षण में हैं | कब तक वे मेरे से दूर रह सकेंगें | यदि उन्हें लेखक , विचारक होनें का अभिमान है तो मैं इन दोनों पुत्रों को लव -कुश की भांति बड़ा कर एक दिन उन्हें मातृत्व के महत्व से परिचित करा दूंगीं | तब वे जान जायेंगें कि नारी की देह की भूख माता बननें के लिये प्रकृति प्रदत्त होती है | पुरुष की भांति उत्तरदायित्व हीन इन्द्रिय विलास से उपजी वासना नारी की चेतना को ग्रसित नहीं करती |
                               सुनीता का उत्तर इतना सटीक और सकारात्मक था कि डा. रजनीकान्त को आगे बोलते नहीं बना | मैं मन ही मन सोचनें लगा कि विशाल की सारी सृजन शक्ति इस नारी की तेजस्विता के आगे धीमी पड़ जाती है | मैनें कहा बेटी सुनीता , " विशाल कभी -कभी तुम्हारे इस अंकल के घर आ जाता है | क्या मुझे अधिकार दोगी कि मैं तुम्हारे विषय में विशाल से कुछ बातें कर लूँ | " शकुन्तला जी नें  तुम्हें मेरा परिचय दे ही दिया होगा | सुनीता बोली , " पितृव्य आपकी गौरव गाथा मैं सुन चुकी हूँ | मेरा प्रणाम स्वीकार करें | मैं अपनें पिता जी तक आपका परिचय पहुँचाऊगीं | शीघ्र ही वे आपसे संम्पर्क करेंगें |
                             दो तीन दिन बाद विशाल घर पर आया | मैनें हँसते -हँसते कहा अरे राठी अपनें व्याह में मुझे नहीं बुला रहे हो | राठी बोला , " अग्रज आपके बिना मेरा व्याह हो जाये तो बहू किस घर में आयेगी | ' मैं जान गया कि विशाल नें अपनें नये व्याह की खबर अपनें चारो ओर इसलिये फैलायी है ताकि यह खबर सुनीता के कानों तक पहुँच जाय और सामाजिक  मान्यताओं के दबाव में वह विशाल से फोन पर बातचीत करे ताकि दोनों की सम्वाद शून्यता समाप्त हो जाये | पर इस चाल  में एक गहरा खोखलापन भी झाँक रहा था | मुझे लगा कि  विशाल अब सहन शक्ति की सीमा पार कर गया है | अब या तो वह टूट जायेगा या लचकीला बनकर सुनीता से संवाद साधनें की पहल करेगा | कहीं  ऐसा न हो कि इस दांव में वह स्वयं फंस जाये | मैं जानता था कि एकाध प्रौढ़ शिक्षित अविवाहित अध्यापिकायें उसकी ओर आँख लगाये हैं | विशाल अब यूनिवर्सिटी में एम. ए. के क्लासेज लेने लगा था बोला बड़े भाई , " कल क्लास में सिलविया पाथ  की मिरर शीर्षक कविता पढ़ायी थी | कविता नें मुझे झकझोर दिया | तीस पार करते ही नारी सौन्दर्य नारी देह को छोड़कर भग जानें को तत्पर हो जाता है |"  मैनें कहा विशाल सिलविया अपनें रूप के मोह में ग्रस्त थी | आत्म आसक्ति की यह कुंठा न जानें कितनें अत्यन्त प्रखर प्रतिभा संम्पन्न शिल्पियों , कलाकारों और चित्रकारों को घेर लेती है | हमें सदैव आत्म मंथन करते रहना चाहिये कि कहीं हम अपनी भ्रमित असाधारणता के कारण कोई भूल तो नहीं कर रहे हैं |
                                विशाल राठी नें मेरी ओर काफी देर तक देखकर कहा बड़े भाई आज आप कुछ बदले हुये टोन में बात कर रहे हैं | कहीं सुनीता का जादू तो आप पर चल नहीं गया | सुना है किसी पार्टी में जहां आप गये थे वह भी आयी थी | मैनें कहा विशाल , " she is very cultured lady. "विशाल बोला तो क्या सारा दोष मेरा ही है | मैनें कहा अरे विशाल दोष तुम्हारा नहीं मेरा भी है | हम सभी कवि , लेखक जो दो चार शब्द लिख ,बोल और रच लेते हैं अपनें को असाधारण मान लेते हैं | हम इस भ्रम में डूबे रहते हैं कि हम कालजयी पुरुष हैं और हमें प्यार करने वाली नारी हमारी लातों की मार को अपनी छाती पर पवित्र चिन्ह के रूप में स्वीकार करती चले | इस पौराणिक सन्दर्भ के माध्यम से मैं यह बताना चाहता हूँ कि हमारे पुरुष होनें का पाशविक शक्ति पर आधारित दंम्भ नारी तभी तक झेलेगी जब तक उसके वक्ष पर कोई शिशु नहीं खेलनें लगता | प्रकृति के इस महान कार्य के पूरा होते ही सहगामिनी नारी को एक ऊंचीं सीढ़ी पर खड़ा कर हमें समानता का स्तर देना होगा | जो असाधारण होनें का दावा करते हैं उन्हें जीवन  के सहज मार्ग से हटकर अलग खड़ा होना होगा | वे निरर्थक आत्म हनन को शहादत बनाकर कवितायें और गीत लिखते रहेंगें | जो सामान्य जीवन है वह चलता रहेगा | आँधियों के आवृत्त थोड़े काल के लिये ताण्डवी कोलाहल मचा सकते हैं पर अन्ततः वायु का मन्द संचालन ही सनातन रहेगा | प्रबल वर्षा में टूटी चट्टानें थोड़ा बहुत घिसकर , हटकर फिर कहीं स्थिर होंगीं और उनके ऊपर मार्ग बनते रहेंगें | विशाल मुझे लगता है सुनीता जो जीवन जी रही है वह भारत की सामान्य नारी का आदर्श जीवन है | उसे पौराणिक मिथकों से जोड़कर मत देखो | बाकी यदि तुम्हें अपनें जीनियस होनें का प्रमाण इसी बात में ढूढ़ना है कि तुम अपनें अहंकार में टूटकर रहोगे तो इस स्वतन्त्र निर्णय के लिये तुम स्वयं उत्तरदायी हो | तुमनें Cart sand Burd की कविता पढ़ी पढ़ायी होगी | मैं उसकी पहली कुछ पंक्तियाँ मैं तुम्हारी स्मृति के लिये दोहराता हूँ |
 " The people will live on.
The learning and blundering people will live on.
they will be tricked and sold and again sold
And go back to the nourishing earth for rooth olds,
The people so peculiar in renewal and come back,
You can't  laugh off their capacity to take it.
The man moth rests between his cyclonic dramas."
(क्रमशः )

Thursday, 8 February 2018

गतांक से आगे -

                                          मैं जिस क्षेत्र में शिक्षा जगत से संम्बन्धित रहा हूँ उसमें राठी सरनेम अधिकतर या तो किसान वर्ग से संम्बन्धित है या फिर श्रमिक वर्ग से जुड़ा है | मैं विशाल राठी को भी संम्पन्न कृषक वर्ग से ही आया हुआ समझता था | पर उसनें मुझे बताया कि वह राजस्थान से है और वैश्य है | उसका मूल नाम विशाल बंसल है और वह रथी उपनाम से कविता लिखता रहा है | यूनिवर्सिटी कालेज पहले गवर्नमेन्ट कालेज था | सरकारी शिक्षा अनुभाग में प्रवक्ता के पद पर उसका चयन विशाल बंसल के नाम से ही हुआ है | पर एक लम्बे समय से उसनें अपने नाम के आगे से बंसल हटाकर रथी लिखना शुरू कर दिया है जो अब राठी बन गया है | इस सरनेम के कारण उसकी पहुँच हरियाणा के राजनीतिक क्षेत्रों में सरलता से हो जाती है और रोहतक जिले के कृषक बाहुल क्षेत्र में भी उसकी पहचान कृषक वर्ग में बन जाती है | मैनें पूछा तो तुम्हारा पहला संम्बन्ध वैश्य परिवार से ही हुआ होगा | विशाल नें बताया कि सुनीता गोयल घर की थी | उसके पिता लखपति राय काफी बड़े व्यापारी हैं | उनका तिलहन और दलहन का व्यापार उत्तर भारतीय विस्तार पा चुका है | मैनें बड़े भाई के भाव से उससे जानना चाहा कि संम्बन्ध विच्छेद के क्या कारण थे | उसनें कहा सारे कारणों का एक कारण था सुनीता का अहंकार | करोड़पति बाप की बेटी को अपनें रूप का घमण्ड तो था ही अपनें भाई का भी रौब दिखाती थी जो दक्षिणीं दिल्ली में इनकम टैक्स आफीसर है | मैनें जानना चाहा कि उसकी शादी इतनें बड़े घर में कैसे हो गयी तो उसके स्वाभिमान को चोट लगी | उसनें कहा बड़े भाई , " मैं क्या देखनें सुननें में बुरा हूँ और क्या मेरी नौकरी क्या कोई घटिया नौकरी है | ठीक है मेरे पिताजी कापी , किताबों और स्टेशनरी की छोटी सी दुकान करते थे और मेरी बहिन भी ज्यादा पढ़ी लिखी न होकर साधारण घर में व्याही है पर मैं तो लेखक ,विचारक , प्राध्यापक हूँ | मैं नये विचारों और मानव समानता का समर्थक हूँ | इनकम टैक्स का आफीसर मेरे लिये आदर्श नहीं हो सकता और उसकी पत्नी डिप्टी सुपरिटेन्डेन्ट की बेटी है तो उससे मुझे क्या | मेरी कोई अपराधी पृष्ठ भूमि तो है नहीं | अब सुनीता अगर मुझसे दो पुत्र प्राप्त कर मुझसे एक अलग पहचान बनाना चाहती है तो मैं उससे भिक्षा मांगनें उसके द्वार पर क्यों जाऊं | एक कालेज के प्राध्यापक का जितना बड़ा आर्थिक दायरा होता है उस दायरे में यदि वह रहना चाहती है तो  मेरी आर्थिक कमजोरी की हंसी उड़ाकर बाप के घर क्यों चली जाती | रोटी का जुगाड़ मैं कर सकता हूँ | पांच सितारा होटलों में ठहरानें  और घुमानें की दम मेरे में नहीं है | और मैं इन बातों को मानव जीवन की कोई उपलब्धि भी नहीं मानता | विशाल राठी की इस तार्किक शैली नें मुझे प्रभावित किया | मुझे लगा कि वह एक बेहतर इन्सान है और मित्रता के काबिल है पर उसनें पीनें की जो लत डाल रखी है वह कहीं उसे भीतर से कमजोर न कर दे | मैनें अपनें जीवन के अनुभव से कई बार यह पाया है कि यदि इच्छा शक्ति दुर्बल हो जाती है तो फिर उसे द्रढ़ करनें के लिये गहरे आत्म सयंम की आवश्यकता होती है | आत्मसयंम न होनें पर तमाम प्रकार के नशों के लत टूटे हुये व्यक्तित्व को कुछ समय के लिये तीव्रगामी होनें का भ्रम पैदा करते हैं | पर धीरे धीरे टूटन की निरन्तरता उन्हें उस स्थल पर छोड़ देती है जहां वे निष्क्रिय लोथ के समान दया के पात्र बनकर रह जाते हैं | पर क्या किया जाय | राठी यदि 40 के अन्दर है संसार काफी बड़ा है क्यों न उसके लिये जीवन साथी की तलाश की जाय | कुछ ही वर्षों के बाद वह यौवन की देहरी को पार हो जायेगा और फिर नीरज जी की यह पंक्तियाँ उसके क्षुधित मन पर मरहम का कार्य करनें लगेंगीं |
"और हम खड़े -खड़े मोड़ पर अड़े -अड़े
कारवाँ गुजर गया गुब्बार देखते रहे |"
                                                               पर क्यों न एक बार सुनीता के परिवार वालों से संम्बन्ध साधा जाय | मैनें विशाल से इस संम्बन्ध में बात की | तो उसने कहा बड़े भाई आप सुनीता को नहीं जानते दरअसल जिसे हम अति धनी वर्ग कहते हैं उस वर्ग की सुन्दर स्त्रियों से आपका परिचय न के बराबर है | सुनीता को अब सन्तान की कामना नहीं है | शारीरिक सुखों के लिये उसके पास साधनों की कोई कमी नहीं है और भगवान राम के इस देश का अधिकाँश तरुण वर्ग मुझे उनके मार्ग पर कभी भी चलता नहीं दिखायी पड़ा | पति -पत्नी की जिस आदर्श की बात आप कर रहे हैं वह युग बीत गया | आप मुझे अपनी राह चलनें दें हाँ मैं इतना चाहूंगा कि यदि मेरे विषय में चरित्र स्खलन की कोई शिकायत आप तक पहुंचे तो उसे सच न मान लीजियेगा | मुझसे स्पष्टीकरण मांग लेना |
                                        और फिर एक दिन मैनें सुना कि विशाल राठी एक नया व्याह रचानें जा रहा है | कौन जानता था कि नियति चक्र ब्याह के बहानें विशाल को किस ओर खींचें लिये जा रहा है | जो घटित होना है वह तो घटित होता ही है ऐसा आजीवक मानते थे | जो बुद्ध कालीन विचाधारा से पहले के चिन्तक थे | और ऐसा आज भी माना जाता है भले ही उसे माननें के पीछे अर्ध वैज्ञानिक व्याख्याओं की दीवाल खड़ी कर दी जाय | सुनन्दा के  पिता नें कैमिस्ट्री लैब से कैसे और किस प्रकार अपनें जीवन का अन्त करनें के लिये कोई रासायनिक मिश्रण तैय्यार  किया इसे मैं नहीं जानता जितना जानता हूँ वह यह है कि स्वाभाविक हृदयगति रुकनें से उनकी मृत्यु की बात उजागर हुयी | मेरे अन्दर के किसी बहुत गहरे संजोये कक्ष में उनकी याद आज भी संचित है | सुनन्दा आज दो स्वस्थ्य बच्चों की माँ है पर अभी तक मुझे उसके केशों में चांदी का कोई तार दिखायी  नहीं पड़ता | इधर एकाध वर्ष से बनर्जी की चर्चा भी सुननें में नहीं आयी है | तो क्या कोई नया गुल खिल रहा है | क्या वरिष्ठ डिमांस्ट्रेटर जी के कही हुयी बात सच होकर रहेगी ? अरे मैं कहाँ भटक गया |
                                विशाल राठी से हटकर सुनन्दा तक जा पहुंचा | लगता है स्मृतियाँ अब एक सजी -सजायी कतार में न आकर कट -कट कर खण्ड चित्रों में आनें लगी हैं | जब सुनी -सुनायी विवाह की तिथि का कोई कार्ड मेरे पास नहीं आया तो मैनें विशाल को फोन पर एक दिन घर आनें का बुलावा दिया | जानना चाहा कि धरती का कौन सा नारी रत्न उसकी परख में खरा उतरा है | विशाल बोला , " आदरणीय सर , मैनें बीच में ही टोंक दिया अरे विशाल केवल आदरणीय काफी था या केवल सर ही काफी था दोनों को कैसे जोड़ रहे हो तो बोला बड़े भाई यह हिन्दुस्तानी अंग्रेजी है | Respected Sir का अनुवाद मैनें आगे कहा सर का अनुवाद तो किया नहीं तो बोला जनाब और श्रीमान के झगड़े में मैनें दोनों को छोड़ दिया | सर अपनी जगह पर कायम है | बोला मेरी शादी हो और आप न बुलाये जांयें ऐसा क्या कभी संम्भव हो सकता है | बात कुछ और ही है | फिर बोला गुरूजी अज्ञेय की यह पंक्तियाँ मुझे इन दिनों बहुत अच्छी लग रही हैं |
                                " बंचना है चाँदनीं सित
                                   झूठ यह आकाश का निर्वाधि गहन प्रस्तार
                                   मूत्र सिंचित मृत्तिका के वृत्त में
                                   तीन पैरों पर खड़ा
                                    धैर्य धन गदहा | "
 (क्रमशः )
गतांक से आगे -

                                जीवन मनुष्य को प्रकृति द्वारा या प्रकृति नियन्ता द्वारा दिया गया सबसे बड़ा वरदान है | पर अनेक बार ऐसा देखा गया है  कि उच्च प्रतिभा के धनी नर -नारी भी जीनें की आसक्ति से मुक्त हो जाते हैं | उन्हें जीवन एक असहनीय दारुण यन्त्रणा के अतिरिक्त और कोई सन्देश नहीं भेजता यह तो समझ में आता है कि एक विशेष आयु प्राप्त कर लेनें के पश्चात शारीरिक और मानसिक शक्तियों के नित प्रति क्षरण का अनुभव कर कोई व्यक्ति संसार के विषम माया जाल से मुक्त होनें की सोचे | प्राचीन हिन्दू आश्रम विधान में संन्यास महिमा मण्डित मृत्यु का ही परिवर्तित रूप  माना जाता था | जैन परम्परा में तो वार्धक्य में स्वेच्छा से उपवास कर शरीर त्याग देनें को एक श्रेयष्कर त्याग के रूप में लिया जाता है | अपनें कई सहयोगी , सहकर्मी और सह -शहरी जैन मित्रों के घरों में उनकी दादियों को सन्थारा द्वारा प्राण त्यागनें की बात सुननें में आती रही है | बहुत से धर्म प्राण नर -नारी उनका दर्शन करनें और आशीर्वाद लेनें के लिये जाते रहते थे | जैन परम्परा तो चन्द्रगुप्त मौर्य तथा अन्य कई सम्राटों को सन्थारा के द्वारा प्राण छोड़कर जीवन मुक्ति होनें का गौरव देती है | पर जहां तक मैं समझ पाया हूँ विश्व का सामान्य जनमानस मृत्यु का अधिकार प्रकृति या प्रकृति नियन्ता को ही देता है | जब कभी अन्तिम बुलावा आयेगा तो जाना ही होगा | उस समय जाना एक अनिवार्यता है , लाखों प्रतिरोधों के बावजूद ,अनगिनत उपचारों के बावजूद , अनेक शुभ कामनाओं के बावजूद प्राण पक्षी को असीम में उड़ना ही होगा | हिन्दू परम्परा में तो महाकाल यमराज की डोरी में फंसे प्राण यमलोक में जाकर ही अपनें सुकर्मों और कुकर्मों की तफसील से परिचित होते हैं | प्राकृत के कवि विराट दत्त का यह दोहा कितना सार्थक है |
आस -पास जोधा खड़े ,सबै बजावत गाल |
मांझ भवन से ले गयो ,ऐसा काल कराल ||
                                 तो जब जाना होगा तब तो जाना ही है | हाँ कुछ अन्तः शक्ति संम्पन्न प्रतिभायें असीम से आती पुकारें पहले से ही सुन लेते हैं | विक्टोरियन एज के महाकवि टेनिसन की इन पंक्तियों में यही झलक मिलती है |
" The Sun set and Evening Star
   There is a clear call for me. "
                               पर ऐसा क्यों होता है कि बहुत से शिक्षित और सुद्रढ़ आर्थिक स्थिति के नर -नारी तरुणायीं या प्रौढ़ में ही अपनें द्वारा अपना जीवन समाप्त कर देते हैं ? अंग्रेजी में जिसे सुसाइड और हिन्दी में जिसे आत्महत्या कहा जाता है उसे विश्व के कई देशों में अपराध न माना जानें की मुहिम चल रही है पर अभी तक अधिकाँश विश्व के देश जीवन को स्वतः समाप्त कर देनें की कारगुजारी को दण्ड संहिता के अन्दर ही शामिल करते हैं | संसार के प्रमुख धर्म भी अस्वाभाविक ढंग से जीवन समाप्ति को ईश्वर के सन्देश की अवहेलना मानते हैं | भ्रूण ह्त्या से लेकर आत्महत्या दोनों ही आदर्श जीवन की कर्तव्य सूची में घृणा के अतिरिक्त और कुछ भी अपनें खाते में नहीं डाल सकते | सुनन्दा के पिता नें जो रसायन शास्त्र के वरिष्ठ डिमांस्ट्रेटर थे एक वैज्ञानिक की गहरी सूझ -बूझ के साथ इस संसार से अपनें अन्तिम प्रयाण की तैय्यारी की | अपनें अन्तिम प्रयाण के एक दिन पहले वे मेरे घर आये उन्होंने इतनें सहज सरल भाव से हंस हंस कर बातें कीं कि हमें किंचित आभाष भी नहीं हुआ कि वे आनें वाले कल में इस संसार को छोड़ने का अटल निश्चय कर चुके हैं | उन्होंने सुनन्दा की कई मीठी यादें दोहरायीं और रजत की प्रतिभा और सेवाभाव का भी जिकर किया | पर उन्होनें अपनी दूसरी पत्नी यानि  सुनन्दा की मौसी की कोई चर्चा नहीं की | हम पहले ही बता चुकें हैं कि सुनन्दा की मौसी एक राजकीय महाविद्यालय में प्रवक्ता के पद पर काम करनें लगी थी | एक गहरी बात जिसनें मुझे भीतर तक हिला दिया जीवन के सत्य के विषय में थी | वरिष्ठ डिमांस्ट्रेटर नें चलते -चलते कहा ," बन्धु आप बड़े विद्वान हैं | आपनें बहुत पढ़ा -लिखा है | पर मेरी एक बात गांठ बाँध लेना जब तक चाहा हुआ नहीं मिलता ऐसा लगता है कि उसके मिल जानें पर जीवन सार्थक हो जायेगा | पर जब चाहा हुआ मिल जाता है तब फिर निरर्थकता का आभाष होता है | संसार की कोई भी उपलब्धि मन की लालसा को पूरी तरह शान्त नहीं कर सकती | मित्र , मैं अपनी पुत्री सुनन्दा को जानता हूँ | आज उसे लगता है कि उसे उसकी मन्जिल मिल गयी है | पर आनें वाले कल में क्या पता शायद उसकी भटकन उसे फिर किसी नये अनुभव की ओर लालायित कर दे | और फिर उन्होंने अन्तिम वाक्य कहा | मृत्यु ही मुक्ति की ओर ले जाती है | अपनें इस कुबड़े  अपराध बोध से दबे बड़े भाई को कभी कभी याद कर लिया करना | और वे उठकर द्वार की ओर बढ़े | दरवाजे पर रिक्शे वाला खड़ा था | वह उनका सदैव का रिक्शे वाला था जो उन्हें प्यार से सहारा देकर रिक्शे पर बिठलाता था और गंतव्य पर पहुंचाकर सहारा देकर रिक्शे से उतार देता था | फिर वे धीरे धीरे 100  -50  गज की दूरी चल लेते थे |
                              घटना घट जानें के बाद हम पीछे मुड़कर देखनें की द्रष्टि पा जाते हैं | आज मैं सोचता हूँ कि कि यदि मैनें वरिष्ठ डिमांस्ट्रेटर जिन्होनें अपनें को मेरा बड़ा भाई कहा था उस दिन पूरी तरह समझ लेता तो शायद मैं उनके घर जाकर घण्टे दो घण्टे बैठकर उनसे बात कर ,उनके मन का कुछ बोझ हल्का कर देता क्या पता उनमें जीवन की लालसा फिर जग जाती | पर मेरा ऐसा सोचना क्या बचकानापन नहीं है ? समाचार पत्रों में प्रत्येक दिन आत्महत्या के न जानें कितनें केसेस छपते रहते हैं | इन खबरों में धनें व्यापारियों से लेकर बड़े से बड़े अफसर ,लेखकों और विचारकों के नाम होते हैं | मेडिकल कालेज में मनो जगत पर न जानें कितनें शोध और प्रशिक्षण होते रहे हैं ,हो रहे हैं और होते रहेंगें पर मन का संसार अभी तक कुछ हल्की -फुल्की झांकियां ही मनोविज्ञान के समक्ष पेश कर सका है | अवचेतन का असीम प्रस्तार अभी तक अबूझ पहेलियाँ अपनें में छिपाये है | नये नये नाम आ रहे हैं | कहीं आत्ममोह , कहीं अवसार बोध कहीं अपराध ग्रन्थि और कहीं कामेच्छा आपूर्ति | पर इन नामों की श्रंखला में कहीं कोई ऐसा अचूक निदान देखनें में नहीं आता जो जीवन से निराश व्यक्ति को पुनः जीवन लालसा से संयुक्त कर दे | फिर सहसा मन मुझे सुनन्दा के पिता से दूर खींचकर एक और बहुपठित शोभन व्यक्तित्व की याद तरोताजा कर देता है | कई वर्ष पहले अपनें कमरे में मृत पाये गये यूनिवर्सिटी कालेज के अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर विशाल राठी के घुँघराले बालों से भरा चौड़ा मस्तक मेरी स्मृति में कौंध जाता है | कहा जाता है कि वे भी डिप्रेसन के शिकार थे और मरनें से पहले एकाध वर्ष से निराशा भरी मृत्यु का आवाहन करनें वाली कवितायें पढ़ते ,सुनते थे | विशाल राठी से मेरा संम्पर्क उन दिनों हुआ था जब यूनिवर्सिटी कालेज में यूथ फैस्टिवल के समायोजन के दौरान मैं डिबेट और सिम्पोजियम की प्रतियोगिता में एक निर्णायक के रूप में बुलाया गया था | मुझसे यह भी कहा गया था कि मैं कविता प्रतियोगिता में भी जज की कुर्सी पर बैठ लूँ पर मैनें यह कहकर इन्कार कर दिया था कि चूंकि मेरी पुत्री अपर्णां इस प्रतियोगिता में भाग ले रही है इसलिये मैं कविता प्रतियोगिता के निर्णायकों में शामिल होनां अनैतिक समझता हूँ | विशाल राठी से संम्पर्क बढ़ता गया | और धीरे धीरे मुझे अपनें से बड़ा मानकर वे मेरे प्रशंसक बनते गये | अपर्णां को प्रतियोगिता में इनाम मिला था और उसनें जो कविता पढ़ी थी वह कभी मेरे द्वारा ही लिखी गयी होगी | अपर्णां से यह सब जानकर विशाल राठी मेरे से कविकर्म के संम्बन्ध में भी चर्चा करनें लगे थे | कई बार हम मैथू अर्नाल्ड से लेकर डेरीडा तक की बहस में पड़ जाया करते थे | विशाल राठी एक वर्ष के लिये फ्रेन्च की एक सार्टिफिकेट का कोर्स करने के लिये योरोप हो आये थे और मेरे मुकाबले उनका भौगोलिक एक्सपोजर ज्यादा व्यापक था | पर धीरे धीरे राठी में एक परिवर्तन आ रहा था | उनकी पत्नी न जानें क्यों अपनें दो पुत्रों को साथ लेकर दिल्ली अपनें पिता के घर रहनें लगी थीं | सुननें में आया था कि वह वहां पर एक स्कूल में एक ट्रेन्ड ग्रेजुएट होनें के नाते काम पर गयी थीं | विशाल से उनकी क्यों नहीं पटी इस विषय पर मैनें विशाल से कोई बातचीत नहीं की पर मुझे ऐसा आभाष अवश्य हुआ कि विशाल को कहीं अपमानित होना पड़ा है और वह भीतर ही भीतर किसी मुकाबले की तैय्यारी कर रहा है | 35 -40  के बीच का विशाल शायद किसी नारी मित्र की तलाश में था और अपर्णां की सहेलियों के साथ साहित्यिक चर्चा करनें में उसे रस मिलनें लगा था | उन दिनों महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय के वाइस चान्सलर के रूप में हरद्वारी लाल भी काफी ख्याति अर्जित कर चुके थे | वे कुछ समय के लिये हरियाणा राज्य के मंत्रिमण्डल में भी रहे थे और इन्दिरा गांधी जी के निधन के बाद कांग्रेस के टिकट पर आम चुनाव में रोहतक संसदीय क्षेत्र से विजयी घोषित किये गये थे | हरद्वारी लाल जी क़ानून विशारद तो थे ही पर अंग्रेजी पर भी उनकी गहरी पकड़ थी | कभी कभी वे आत्मश्लघा के अहं भाव से इतनें भर जाते थे कि कुछ हल्की -फुल्की बातें भी कर लेते थे | यूनिवर्सिटी के अंग्रेजी  अध्यापकों के बीच अपनी छवि को और अधिक चमकानें के लिये वे कुछ चुटकुले सुनाते रहते थे जिन पर बाद में कहकहे लगा करते थे |   वे कहा करते थे कि हरियाणा में केवल डेढ़ आदमी हैं जो अंग्रेजी जानते हैं | एक तो मैं हूँ और आधा स्वरूप सिंह है जो दिल्ली यूनिवर्सिटी का वाइस चान्सलर है | डा ० स्वरूप सिंह जी हरियाणा के सांगी ग्राम से थे  और श्री अजीत सिंह जी के पिता कुछ समय के लिये प्रधानमन्त्री रहे चौधरी चरण सिंह जी से उनके पारिवारिक संम्बन्ध थे | हरद्वारी लाल जी का अंग्रेजी के डेढ़ विद्वानों वाला चुटकुला हर कालेज के स्टाफ रूम में सुनाया जाता था | चूंकि विशाल राठी यूनिवर्सिटी कालेज में था और विदेश में भी एक साल रह आया था इसलिये उसे कभी कभी रात्रि के पहले प्रहर में हरद्वारी लाल जी के साथ एकाध पैग लेनें के लिये भी बुला लिया जाता था | यूनिवर्सिटी क्वार्टर्स में वह तो अकेला रहता ही था | मैं नहीं जांनता कि ऐसा क्यों  हुआ कि जब मैं अपनें नये मकान में शिप्ट करके आ गया तो विशाल वहां हर शनिवार या रविवार को मिलनें आ जाता | एक कारण यह भी हो सकता है कि वह यूनिवर्सिटी कालेज की वार्षिक पत्रिका का मुख्य प्राध्यापक सम्पादक चुना गया था पर चूंकि मैं अपनें कालेज में यह कार्य लम्बे समय से कर रहा था इसलिये उसे मेरी राय की आवश्यकता पड़ती हो | उसे पत्रिका के प्रत्येक पृष्ठ पर ऊपर या नीचे विद्वानों के कुछ कथन छापनें का शौक था और शायद मुझसे उसे अच्छे कुटेशन पा जानें की उम्मीद होती थी | पर विशाल राठी जैसा स्थापित व्यक्ति भी भीतर से कहीं टूट रहा था | पत्नी द्वारा छोड़ दिये जानें के कारण अबूझी मनोग्रन्थियाँ उसे विकार ग्रस्त कर रही थीं | उसे लगनें लगा था कि उसका तूफानी जीवट धीरे -धीरे कम हो रहा है | 40 के आस -पास यों तो सभी के साथ ऐसा होता है पर यदि कुछ गहरा झटका लग जाय तो बड़े से बड़े स्तंम्भ को ढहते देर नहीं लगती |
                                           एक दिन वह मेरे पास शैली की मशहूर कविता " Ode to the west wind." को हिन्दी में कविता के रूप में गुम्फित करके ले आया | 'माटी ' के पाठक जानते ही हैं कि " Ode to the west Wind." संसार की महानतम मुक्तक कविताओं में गौरव का पद पा चुकी  है | उसकी कुछ पंक्तियाँ विशाल राठी को इतनी भा गयीं थीं कि वह उन्हें बार -बार दोहराया करता था | संम्भवत: उन पंक्तियों में उसे अपनें जीवन की असली झलक दिखलायी पड़ती थी | ' माटी  ' के विद्वान पाठकों के लिये रसास्वादन हेतु इन पंक्तियों को उद्धत करना आवश्यक सा लगता है |
" O uncontrollable ! If even
I were is in my boyhood, and could be
The comrade of thy wanderings over Heaven,
As then, when to outstrip thy skiey speed
Scarce seemed  vision, I could never have striven
As thus the thee in prayer in my sore need
Oh,left me as a wave ,leaf, i could!
I fall upon the throns of life !i bleed!
A heavy weight of hours has chained and bowed
one too like thee, tameless, and swift and proud."
                                  हे अदमनीय !  पा जाता यदि मैं अपना कैशोर्य ,
                                  आंधी के हिन्डोलों पर झूलता असीम गगन में दे देता मात मैं
                                 प्रकृति के तीव्रतम धावक को |
                                 काश ऐसा हो पाता !
                                 पर आज मैं विवश पराजित हूँ
                                 धराशाही मित्र मुझे दे दो अपनी अबाधि गति का सहारा
                                 दे दो उछाल मुझे जल की तरंग की भांति
                                 उड़ने दो मुझे अपनें प्रवाह में मूलहीन पत्ते सा
                                 गगन की गोद में उद्वेलित उत्तोलित कर दो मुझे
                                 ऐसे जैसे खेलते हैं श्यामल मेघों के धूमिल धवल शावक
                                 दंशित है मेरी देह शत सहस्त्र कंटकों से
                                 रक्त की बूँदें अब मेरी महावर हैं
                                 जीवन का असहनीय अर्थहीन भारी भार
                                 धनुषाकार देता झुकाव मेरी काया को
                                 आह ! तुम जैसा ही एक दिन मैं भी था
                                अपराजेय ऊर्ध्वपथी अप्रतिहत गतिपूर्ण
                                मानव नियति का अभिमानी निर्णायक सा ! "
                                                                   विशाल राठी का हिन्दी अनुवाद शास्त्रीय छन्दों की परम्परा से अलग हटकर भी काफी प्रभावशाली लगा और तब मैनें उससे पूछ ही लिया कि उसके बीते जीवन में ऐसा क्या था जिसके खो जानें से वह अपनें को इतना असमर्थ पा रहा है | और फिर राठी नें मुझसे जो  बताया उससे मुझे भारतीय समाज की जातीय विषमताओं को समझनें की एक नयी द्रष्टि मिली|
क्रमशः         
   

Tuesday, 6 February 2018

गतांक से आगे-

My dearest daughter,

पत्र पढ़कर एक लम्बे समय तक न जानें कहाँ खोया रहा | अपनें को खो देनें की यह प्रक्रिया शायद 10 -15  मिनट ही रही हो पर जब मैं चेतनता के सहज स्तर पर आया तब मुझे लगा कि मैं शताब्दियों की मानसिक दौड़ लगा चुका हूँ | जो कल सच था वह आज भी सच है वैसा निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता पर सभ्य समाज संरचना के कुछ आधार इतनें सुनिश्चित हैं कि उनके बिना किसी सभ्य समाज के अस्तित्व की कल्पना ही नहीं की जा सकती | सनातनता का यह भाव ही भारत की सनातन विचारधारा को अमरता की घूँट पिलाता रहता है | पर जो भारत का सत्य है वह सभी विश्व सभ्यताओं का सत्य हो ऐसा कम से कम अभी तक संम्भव नहीं हो सका है | जीवन शैलियों के प्रयोग और परीक्षा चल रही है और जवानी में अदम्य मनोवेगों से जन्मी अनेक भ्रामक मान्यतायें रुपहली छवियों की श्रष्टि करती चली जा रही हैं | इसे हम अपना दुर्भाग्य ही कहेंगें कि पश्चिम की सुनहली ललक नें हमें तुम्हारी जैसी निराली आत्म शक्ति संम्पन्न बेटी को विदेश भेजनें के लिये बाध्य किया | रोमेन के माँ बाप भले ही भारतीय मूल के हों पर ऐसा लगता है कि वे एक दोगली संस्कृति के गुलाम हो गये हैं | संसार के अधिकाँश व्यक्ति जीवन मूल्यों की स्पष्ट अवधारणायें जान ही नहीं पाते और उनका लचर व्यक्तित्व आस पास के सामयिक प्रभावों से खण्डित -विखण्डित होता रहता है | मेरा यह द्रढ़ विश्वास है कि योरोप और अमरीका में भी बहुसंख्यक नर -नारी वैवाहिक पवित्रता के प्रति प्रतिबद्धित होते हैं | हाँ अत्यन्त धनी और अत्यन्त निम्न स्तर के कुछ लोग समाज की मुख्य धारा से अलग थलग पड़कर उल्टी सीधी जीवन शैलियाँ अपना लेते हैं | इसके दो मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं | किसी देश का एक अत्यन्त छोटा वर्ग नंगी पूंजीवादी व्यवस्था के अतिचार और अनाचार से उत्पन्न अवैध धन संचयन के कारण एक ऐसे मनोरोग से ग्रस्त हो जाता है जिसे पशुत्व आरोपण के रूप में अभिहित किया जा सकता है | केवल जीवन ही सत्य है , केवल यौवन का बन्दन हीन विलास ही जीवन है ,केवल तकनीकी सभ्यता की नयी खोजों से इन्द्रिय उद्दीपन की प्रक्रिया ही जीवन है ऐसा पशु चिन्तना का आरोपण घिनौनें अति धनी समाज को मर्यादाहीन बना देता है | अत्यन्त निम्न स्तर पर सभ्यता की स्वीकृति मार्गों पर चलना संम्भव ही नहीं हो पाता | क्योंकि इस क्षीण दुर्बल वर्ग को जीवन यापन की विवशता , नैतिकता और अनैतिकता के बीच कोई विभाजक रेखा खींचनें ही नहीं देती | शरीर बेचकर पेट भरना और पेट भरकर शरीर बेचना क्रिया - प्रतिक्रिया का यह क्रम अपरिहार्य रूप से इस निम्न स्तरीय समाज में चलता रहता है | इस निम्नतर समाज की विवशता को प्रशासनिक क्षमता के द्वारा या जनतान्त्रिक चेतना के उन्नयन के द्वारा थोड़ा बहुत सुधारा भी जा सकता है | पर अत्यन्त उच्च वर्ग का नंगा भ्रष्टाचार और यौवन कदाचार तो जुगुप्सा के अतिरिक्त और किसी भाव को मन में उपजा ही नहीं सकता | मैं नहीं जानता कि रोमेश के पिता उस अति धनी पथभ्रष्ट समाज में पैसे के बल पर शामिल हो पाये हैं या वे किसी ऐसे मानसिक रोग से ग्रसित हैं जिसके लिये उपचार के यौगिक साधनों के उपचार की तलाश करनी होगी | जो भी हो तुमनें जो देखा -सुना  है वो ठोस जमीनी सत्य है | और इसे क्षणिक प्रवाह कहकर झुठलाया नहीं जा सकता | अब इस सबसे मुक्ति का क्या मार्ग है ? बेटी सुनन्दा सबसे पहले इसको तो तुम्हें अपनें अन्तर में ही तलाशना होगा | हाँ मैं यह  मानता हूँ कि समझौता यदि मूल अस्तित्व पर ही आघात करता है तो समझौते का प्रश्न ही नहीं उठता | कई शताब्दी पहले भारत के महानतम कवि सन्त नें मीरा बाई को जो मार्ग दिखाया था वो मार्ग जहां तक मैं समझता हूँ आज भी चुननें के लायक है |
नाते , नेह राम के मनियत
सुह्रद सुसेक जहां लव
अंजन कहा आँख जो फुटियत
बहुतक कहव कहाँ लौ
           बेटी सुनन्दा अंग्रेजी साहित्य की प्रखर अध्येता होनें के साथ साथ तुमनें हिन्दी के भक्त कवियों का भी गहरा अध्ययन किया है | मुझे याद आता है कि तुमनें एक बार अमेरिका के महाकवि इमरसन की ब्रम्हा शीर्षक कविता को पढ़कर मुझे सुनाया था और कहा था कि इस कविता में उपनिषदों का सार छिपा हुआ है | तो मैं चाहूंगा कि मीराबाई को बतायी गयी राह में ' राम ' शब्द को तुम नारी पवित्रता के साथ संम्बन्धित कर लो अब यदि तुम पत्नी ही नहीं रहीं और तुम्हें नगर वधू बननें पर विवश कर दिया जाय तो जो संम्बन्ध तुम्हें ऐसा करनें के लिये विवश कर रहे हैं उनको एक झटके से तोड़ देना ही उचित रहेगा | रही बात तलाक के लिये रोमेन्द्र के राजी न  होनें की | तो द्रढ़ता के साथ उसे और उसके माता -पिता को स्पष्ट बता दो कि तुम्हें विवश होकर उन  नर पशुओं की सच्चायी कोर्ट कचहरी में बतानी पड़ेगी | द्रढ़ता के साथ और आत्मगौरव से दीपित तुम्हारे शब्दों की झंकार निश्चय ही उन्हें अपनें झूठे गौरव का उजड़ता संसार दिखा देगी और तब शायद आपसी सहमति से तलाक की समस्या का हल निकल आयेगा | बेटी सुनन्दा यह बात ध्यान रखना कि तुमनें पास के जिस कबूतर फ़्लैट में आश्रय लिया है वह भी सुरक्षित नहीं है | तुम तो अभी बहुत छोटी हो तुम क्या जानों की मैनें अपनें कालेज के पढ़ायी के दिनों में अपनें एक मित्र की माँ से लन्दन के अजीबो -गरीब किस्से सुने थे | उनकी बेटी रुपाली तुम्हारी ही तरह रूपवान और प्रतिभा संम्पन्न तथा प्रखर व्यक्तित्व की धनी थी | उन्होंने उसे लन्दन के सुनहले ख़्वाबों की चकाचौंध से प्रेरित होकर वहां बसे एक स्थायी भारतीय परिवार में व्याह दिया था | कुछ महीनों बाद तुम्हारी ही तरह उसके जीवन मूल्य भी वैश्या संस्कृति के बाजारू मूल्यों से टकराने लग गये | उसनें अलग रहनें की सोची | लन्दन के उसके घर में उसके ससुर के भारतीय मूल के एक मित्र जो उसके ससुर से 10 -15 वर्ष बड़े थे आते -जाते थे | उन्हें वह दादा मानकर अपनी मानसिक पीड़ा की बात बताने लगी | उन्होंने पूरी सहानुभूति के साथ रूपाली की मदद करनी चाही | और उसे पड़ोस में स्वतन्त्र रूप से एक कबूतरी फ़्लैट में रहनें को कहा | और आश्वासन दिया कि वह उसके लिये शीघ्र ही कोई अच्छा काम जुटा देंगें | पहली ही रात्रि में नशे में धुत और स्काच की एक बोतल जाकेट के नीचे छिपाये वे लड़खड़ाते कदमों से फ़्लैट के दरवाजे पर खड़े होकर दरवाजा खोलनें की जिद करनें लगे | रूपाली नें कहा Grandpa आप होश में नहीं लगते सुबह आना | बूढ़ा कामुक बोला बड़ी सती साध्वी बनती है मैं तेरे लिये जो कुछ करूंगा उसकी कीमत नहीं चुकायेगी | आखिर रूपाली को शोर -गुल मचाकर उस वृद्ध अन्ध कामुक को फ़्लैट के दरवाजे से खदेड़ना ही पड़ा | यह सब मैं तुम्हें इसलिये लिख रहा हूँ कि तुम भेड़ियों की बस्ती में अकेली पड़ गयी हो | और घिनौनें सैक्स सौदागरों की यह चमक भरी पाश्चात्य बस्तियां कहीं तुम्हें मरण धर्मिता के दर्शन को स्वीकार करनें पर विवश न कर दें | तुम अंग्रेजी साहित्य में प्रथम श्रेणीं में परास्नातक हो | कानूनी व्याह के बल पर तलाक के बाद भी तुम्हें इंग्लैण्ड में रहनें का स्थायी अधिकार मिल सकता है | वहां तुम्हारी जैसी प्रतिभाशाली नारियों के लिये प्रतियोगिता के गुणवत्ता परक मुकाबले में कोई न कोई उपलब्धि हासिल हो जायेगी | हाँ यदि तुम भारत आना चाहती हो तो तुम्हारे पिता का अधिकार तुम पर सबसे पहले है | पर यदि तुम अपनें इस पितृव्य को पिता का स्थान देना चाहो तो यह मेरा गौरव ही होगा | भूलना नहीं कि कोई  दिन ऐसा नहीं होता जब अपर्णां और प्रियम्बदा तुम्हारी बातें न करती हों | लिखती रहना | भारत की अक्षत अस्मिता तुममें प्रतिविम्बित है | ब्रिटेन की सामरिक शक्ति से पराभूत होकर भी भारत की सांस्कृतिक गरिमा अभी तक अपराजेय है और वह दिन दूर नहीं है जब भूला भटका पश्चिम फिर से हमारे द्वार पर शरण पानें के लिये आतुर हो उठेगा |
                     ढेर भर आशीर्वाद भेज रहा हूँ | अंजली में समेट कर रख सकोगी न | पत्र की समाप्ति करते करते रात्रि घनी हो आयी थी | अपर्णा की माँ दूध का ग्लास लिये हुये स्टडी रूम  में आ खड़ी हुयी बोली किसको लिख रहे हो ? अपनी उल्टी सीधी बातों सें हर किसी को न जानें कहाँ भटकाते रहते हो | हंस कर चुप रहनें के अतिरिक्त और मैं कह भी क्या सकता था |
                    महीनें पर महीनें बीतते गये और एक दिन डिमांस्ट्रेटर जी नें मुझे बताया कि सुनन्दा नें रोमेन की सहमति से तलाक पा लिया है | कि उसनें ब्रिटिश एयरलाइन्स में होस्टेस के पद के लिये इन्टरव्यूह दे दिया है | , कि उसका सेलेक्शन हो जायेगा ऐसा उसे पूरी उम्मीद है | कुछ महीनें और बीते उस दिन शायद रविवार था और शायद मैं घर पर ही उपस्थित था | एक बड़ी  चमचमाती गाड़ी दिन के ग्यारह बजे द्वार के सामनें आकर रुकी | सुनन्दा स्वयं ड्राइव कर रही थी और उसकी बगल में एक शोभन , सुसंस्कृत ,शालीन और विचारवान नवयुवक बैठा हुआ था | गाड़ी से उतरकर नवयुवक के साथ अन्दर आकर उन दोनों नें हमें प्रणाम किया | सुनन्दा बोली , " पितृव्य मैं ब्रिटिश एयरलाइन्स में होस्टेस हो गयी हूँ यह हमारी दिल्ली की पहली फ्लाइट थी | दो दिन का ब्रेक है | यह मेरे मित्र अभिनव बनर्जी हैं | ब्रिटिश एयरलाइन्स में ग्राउण्ड इन्जीनियर हैं इनके पिता श्रीकान्त बनर्जी External Affairs Ministry में ज्वाइन्ट सेक्रेटरी हैं | दिल्ली में इनका मकान है | वहीं से ड्राइव करके आ रही हूँ आपका आशीर्वाद लेनें के लिये | और उसनें आवाज लगायी अरी अपर्णां कहाँ है जल्दी आ तुझे अपनें जीजा से मिला दूँ | और फिर अभिनव और सुनन्दा खिलखिलाकर हंस पड़े | शुभ्र उज्ज्वल हंसी , जीवन सहभागिता का सच्चा मैत्री भाव | हे प्रभु भारतीय संस्कृति की अमर प्रेम पर आधारित दाम्पत्य कथायें हर काल ,हर युग में गूंजती रहें |
                                   एक सुखद पटाक्षेप नित परिवर्तित काल की एक संक्षिप्त मुद्रा के रूप में ही लिया जाना चाहिये | दुख की चिन्तन धारा के बीच सुखदायी पटाक्षेप जीवन को असहनीय होनें से बचा लेते तभी तो तीर्थकर गौतम ने कहा था जन्म -मृत्यु की गोद में बैठकर ही आता है | सुनन्दा की सफलता की यह कहानी उसकी मौसी माँ  को कैसी लगी इसे जान पाना मनोविश्लेषकों के लिये भी एक चुनौती है | पर कुछ आरसे के बाद पता लगा कि सुनन्दा नें अपनें भाई रजत को भी इंग्लैण्ड बुलवा भेजा | उसके डिमांस्ट्रेटर पिता के न चाहते हुये भी रजत नें सुनन्दा के पास रहकर ब्रिटेन  में मेडिकल पढ़ाई की योजना बना ली अब जब कभी सुनन्दा के पिता कालेज में मुझसे मिलते तो अपनें अकेलेपन और अपनी मानसिक व्यथा की अभिव्यक्ति में लग जाते थे | कभी -कभी वे चपरासी भेजकर मुझे अपनें कैमेस्ट्री के विभागीय कक्ष में बुला लेते विषेशतः जब वे अकेले होते और मुझसे सुनन्दा और रजत की बातें करते रहते | मुझे लगनें लगा कि कोई गहरा अपराध भाव उनकी चेतना को ग्रसित करता चला जा रहा है | एक दिन उन्होंने बताया कि उन्हें स्वप्न में सुनन्दा और रजत की माँ मिली थी  और उन्हें अपनें पास बुला रही थी | कालेज के पास ही चारो ओर ऊंची चहरदीवारी से घिरा चितास्थल था जहां पर स्वर्ग और नरक के अनेक चित्र प्रस्तर मूर्तियों द्वारा प्रदर्शित किये गये थे | मृत्यु के देवता यमराज की भैंसे पर आरूढ़ एक विशाल आकृति भी वहां मूर्ति कला का एक अनोखा द्रश्य प्रस्तुत करती थी | एक दिन निरुद्देश्य मैं चितास्थल के पास वाली सड़क से गुजर रहा था तो मैनें देखा कि डिमांस्ट्रेटर साहब यमराज की मूर्ति के पास नीचे बैठे आँख बन्द करके न जानें कहाँ खो गये हैं | जैसा कि मैं पहले बता चुका हूँ उनकी पहली पत्नी सुनन्दा की माँ की मृत्यु के समय का शरीर नीला पड़ गया था | लोगों नें  काना फूसी की थी कि शायद उन्हें जहर दिया गया था | तो क्या रसायन शास्त्र का यह वरिष्ठ डिमांस्ट्रेटर किसी अपराध बोध के बोझ से टूट रहा है | सुनन्दा की माँ उसे क्यों बुला रही है | सुनन्दा की मौसी अभी तक किसी सन्तान को जन्म नहीं दे पायी है | सुनन्दा की माँ दो बच्चों की माँ कैसे बनी | क्या इन सब घटनाओं में कोई रहस्य छुपा हुआ है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि डिमांस्ट्रेटर साहब के मन के अन्दर Death Wish पलनें लगी हो | मित्र के नाते मुझे उनसे कुछ बात करनी होगी | शायद मानसिक उथल -पुथल के इन क्षणों में वे मुझे अपनें अन्तर्मन की एक झांकी प्रस्तुत कर दें और हुआ भी ऐसा ही | उस दिन दोपहर बाद तीन बजे से लेकर 6  बजे तक उनके कक्ष में उनसे की गयी बातचीत में पाये गये संकेतों नें मुझे आभाष दे दिया कि कोई दारुण घटना घटनें जा रही है |
क्रमशः