Sunday, 15 July 2018

स्पष्टीकरण 

हो पूछ रही
आधार अस्वीकृति का मेरी
आलेख असंगति का मेरी
मेरे विजड़न का अर्थ
पलायन की गाथा
क्यों आत्म -दैन्य से
झुका रहा मेरा माथा
जो दर्द शब्द से परे
न उसको कहलाओ
जो व्यथा -घाव भर रहा
न उसको सहलाओ
माना रंगणि, स्वीकार न पाया
वह मेँहदी से रचा हाथ
माना मेरे पग विचल  गये
चल सका न तेरे साथ साथ
माना पायल की रुनझुन पर
कल्पना -गीत ,प्रिय , बन न   सका
गोरी चन्दा की किरणें नांची बहुत
मगर हिम -श्वेत चँदोवा तन न सका
इसलिये भीरु ?
स्वीकार तुम्हारा सम्बोधन
गति शील बनूँ ?
स्वीकार तुम्हारा उद्बोधन
हूँ उत्तरदायी
यह समाज का न्यायालय
इसका प्रधान स्वीकार मुझे
इसका विधान स्वीकार मुझे
पर इतना तो अधिकार
मुझे भी दो रूपसि
जड़ -लौह शिलाओं से वन्दित
अभियुक्त सही
जो सत्य -खण्ड मैनें देखा है , जाना है
कह सकूं काव्य के माध्यम से
कुछ क्षण की ही
यह मुक्ति सही |
मैनें सोचा ,
कैसे गुलाब का फूल तोड़  लूँ गमले से
जब कहीं न कोई मेरी अपनी क्यारी है
यह छुई मुई की लता सलोनी संकोची
कैसे छू लूँ
जब मेरा यह स्पर्श काँच सा भारी है
मैनें सोचा
चाँदनी कपासी धरती पर सिर धुन धुन कर पछ्तायेगी
मैनें सोचा
यह कुहकिन ,प्रस्तर पिंजड़े में क्या राग बसन्ती गायेगी ?
ये हाथ
कि जिनमें हीरे नीलम झूलेंगें
हिमदात चन्द्रिका इन्दीवर पर झूल रही
यह रंग रंगीले नाखूनों की नख -साजी
मानों गुलाब की पतली क्यारी फूल रही
मैं कर न सका स्वीकार
सुनहरे हाथ
करूं  दूषित इनको
हल्दी की पीली लाली से
बर्तन की खुरचन काली से |
  माना तुमनें दो बार
मुझे बतलाया था
सीता का पति के साथ साथ
वन को जाना
कुछ याद नहीं
फिर भी  ,शायद , तुमनें मुझको
 समझाया था
युग -पुरुष काल से
सावित्री का टकराना
पर क्षुद्र बुद्धि मैं क्षुद्र प्राण
मैनें सोचा
इच्छित वनवास नहीं मेरा
मैं तो सदैव का वनवासी
चौदह वर्षों की बात नहीं
मैं तो युग युग का अधिवासी
मैं सत्यवान सा गत -वैभव
पर  राजपुत्र हूँ नहीं किसी अधियन्ता का
मैं एक वर्ष से अधिक अवधि का आकांक्षी
क्रम तोड़ न पाओगी तुम किसी नियन्ता का
सब ओर देख मैनें , सोचा
 मेरा दुख दैन्य तुम्हें अभिशप्त न कर जाये
तुम फूल सेज पर पलीं
गर्म धरती पर पड़ कुम्हलाओगी
तुम प्रिया रूप में मधुर
न पर
जीवन -संगिनि बन पाओगी
तुम खिलो किसी की बगिया में
लेटो गुलाब की सेजों पर 
तुम गुलदस्तों का फूल बनों
सज कर कंचन की मेजों पर
इसलिये शुभे
मैं कर न सका स्वीकार  सुनहरे हाथ
करूँ दूषित इनको
हल्दी की पीली लाली से
बर्तन की खुरचन काली से |





समता का जयघोष

शाम का धुंधलका
खण्डित चेतन प्रवाह
उतरी है शीत लहर
सिकुड़े तन ,सिकुड़े मन
कार्य ठप्प ,रुद्ध द्वार
जड़ता जगी ,थकित प्यार
बोला एक नारी स्वर
यह आकाश वाणीं है
पूर्व कम्बोडिया में
फिर से हुयी राज्य- क्रान्ति
भारत की नीति पर
सदा ही रही विश्व -शान्ति
और यही मार्ग
ले आयेगा समाधान
लाल चीन पाकिस्तान
हिंसा में भटके हैं
लक्ष्य से दूर
गलियारों में अटके हैं
उत्तर भारत में शीत लहर आयी है
मौत की उदासी सभी शहरों पर छायी है
भारत की राजधानी
धर्म -नगर दिल्ली में
पन्द्रह व्यक्ति मर गये
निपट -अभागे थे
नगर -निगम के
उन रैन बसेरों में
सारी रात नंगे तन
सिसक सिहर जागे थे
बीती शताब्दियाँ
बीत गये युग -काल
मरते रहे भारत के
सिहर सिहर यों ही लाल
हर वर्ष शीत की लहर
यों ही आती है
मौत का कहर
सब ओर छोड़ जाती है
हर वर्ष मरते
पशु -पक्षी -श्वान
बे घर
वे सहारे इन्सान
सह अस्तित्व शायद यही
सर्वात्म वाद है
यही ठोस सत्य है
शेष सब प्रवाद है
कितना सहयोग है
पशुओं में ,पक्षियों में
साथ साथ जीते हैं
साथ साथ मरते हैं
शास्त्र ही प्रमाण- वाक्य
छोड़ भाव -वारिधि
सदा के लिये तरते हैं |
जन तान्त्रिक समाजवाद
स्वाधीन भारत का नया घोष
दायें का बायें का
मध्य का
मध्य से दायें का
मध्य से बायें का
नारों भरा यही जोश
इस महा यात्रा के
चार चरण पूरे हुये
चांदी के महलों के
कनक- कंगूरे हुये
बेरोजगारी दुगनी हुयी
मंहगायी तिगुनी हुयी
शासक के इंगित पर
व्यापारी दुःशासन
खींच रहा ,जनता पांचाली
का
लज्जा- चीर
कौन यह हरेगा पीर ?
मौन भीष्म
मूक द्रोण ,कृपा चार्य
नत मुख वृहस्पति
उन्नत -मुख शुक्राचार्य
युग कृष्ण अवश
न देख अधिक पायेगा
चक्र ही चलेगा फिर
क्षार क्षार होगा दंम्भ
न्याय -तार दिशा -कोण
फिर से छा जायेगा
पर अभी कुछ विलम्ब है
तभी तो दंम्भ है
लज्जा -चीर लुट रहा
हाय !कुछ शेष नहीं
निपट भिखारी हम
धन से , तन से ,मन से |
टूट गये स्वर्ण -स्वप्न
भारतीय होना भी आज
अभिशाप है
लगता है
देव -भूमि धरती पर
बापू की ह्त्या का
टंगा हुआ शाप है
सड़ती हैं लाशें
कफ़न -हीन
और
मांस -भक्षी गिद्ध शासक
हैं आत्म तुष्ट
कोई पैमाना लो
कोई तराजू लो
पहले से पाओगे
कहीं अधिक हष्ट -पुष्ट
भारत की राजधानी
अब भी रंग -मस्त है
गोरी पिंडलियों की थिरकन
अभी चलती है
रूप की सुराही सिरहाने
सजा रखी है
यौवन की मदिरा
नेत्र -प्याली में ढलती है
हर रोज नयी किसी
विवश बहन का
कम्पित तन
फालों की खुन खुन पर
बिकता है
हर रोज
थुल थुल हाँथ
अस्मत -सौदागर का
उठ रहे कच्चे
उरोजों पर टिकता है
हर रोज नयी युक्ति
हर रोज नयी चाल
बीते आज साठ साल
ओ अन्ध ,पथ भ्रष्ट यौवन
छोड़ अब अन्धी राह
ऐन्द्रिक -बहलाव मात्र
तेरा छलावा है
आत्म -सर्वनाश का
मधु मिश्रित विष -पात्र ,
किसी विष कन्या के
अधरों का बुलावा है
अपनी दिशा को एक गति दें
अपनी कर्मण्यता को
दे दें सार्थकता
अपनें वचन को विश्वास का बल दें
वाणीं को दे दें
एक नयी अर्थवत्ता |
कब तक बिकेगी
माँ ,बहन और पत्नी
कब तक क्षुधातुर  लाल
लक्ष लक्ष तड़पेंगें
शीत से ठिठुरती इन जीवित लाशों को
कब तक भयावह गिद्ध
निर्विघ्न हड़पेंगें
भारत के युवको चुनौती स्वीकार करो
आओ ,मुझे अपनी आस्था का
बल दो
वीर्यवान स्वरों का सरगम दो
अविलम्ब
छिछली भावुकता को गहरा
एक तल दो
बज्र -पाणिं बज्र- मुष्ठि
श्रम की सार्थकता से गूंजेगा
यौवन का समवेत उद्द्घोष
उभरेंगें अंकुर
फिर पनपेगी पौध नयी
गूंजेगी जमती पर
समता का जय घोष |

Saturday, 14 July 2018

जनता पांचाली 
---------------------

शाम का धुँधलका
खण्डित चेतन प्रवाह
उतरी है शीत लहर
सिकुड़े तन सिकुड़े मन
कार्य ठप्प ,रुद्ध द्वार
जड़ता जगी ,थकित प्यार
बोला एक नारी स्वर
यह आकाश वाणी है
पूर्व कम्बोडिया में
फिर से हुयी राज्य- क्रान्ति
भारत की नीति पर
सदा ही रही विश्व -शान्ति
 और यही मार्ग
ले आयेगा समाधान
लाल चीन ,पाकिस्तान
हिंसा में भटके हैं
लक्ष्य से दूर
गलियारों में अटके हैं
उत्तर भारत में शीत लहर आयी है
मौत की उदासी सभी शहरों पर छाई है
भारत की राजधानी
धर्म -नगर दिल्ली में
पन्द्रह व्यक्ति मर गये
निपट -अभागे थे
नगर -निगम के
उन रेन बसेरों में
सारी रात नंगें तन
सिसक सिहर जागे थे
बीती शताब्दियाँ
बीत गये युग -काल
मरते रहे भारत के
सिहर सिहर यों ही लाल
हर वर्ष शीत की लहर
यों ही आती है
मौत का कहर
सब ओर छोड़ जाती है
हर वर्ष मरते
पशु ,पक्षी ,श्वान
बे घर
बे सहारे इन्सान
सह अस्तित्व शायद यही
सर्वात्म वाद है
यही ठोस सत्य है
शेष सब प्रवाद है
कितना सहयोग है
पशुओं में ,पक्षियों में
साथ -साथ जीते हैं
साथ- साथ मरते हैं
शास्त्र ही प्रमाण -वाक्य
छोड़ भाव-वारिधि
सदा के लिये तरते हैं ।
जनतान्त्रिक समाजवाद
स्वाधीन भारत का नया घोष
दायें का बायें का
मध्य का
मध्य से दायें का
मध्य से बायें का
नारों भरा यही जोश
इस महायात्रा के
चार चरण पूरे हुये
चांदी के महलों के
कनक -कंगूरे हुये
बेरोजगारी दुगनी हुयी
महगाई तिगुनी हुयी
शासक के इंगित पर
व्यापारी दुःशासन
खींच रहा ,जनता पांचाली
का
लज्जा चीर
कौन यह हरेगा पीर ?
मौन भीष्म
मूक द्रोण ,कृपाचार्य
नत मुख  वृहस्पति
उन्नत- मुख शुक्राचार्य
युग कृष्ण अवश
 न देख अधिक पायेगा
चक्र ही चलेगा फिर
क्षार -क्षार होगा दंम्भ
न्याय -तार दिशा -कोण
फिर से छा जायेगा
पर अभी कुछ विलम्ब है
तभी तो दंम्भ है
लज्जा- चीर लुट रहा
हाय ! कुछ शेष नहीं
निपट भिखारी हम
धन से , तन से ,मन से ।
टूट गये स्वर्ण -स्वप्न
भारतीय होना भी आज
अभिशाप है
लगता है
देव- भूमि धरती पर
बापू की ह्त्या का
टंगा हुआ शाप है
 सड़ती हैं लाशें
कफ़न -हीन
और
मांस -भक्षी गिद्ध शासक
हैं आत्म तुष्ट
कोई पैमाना लो
कोई तराजू लो
पहले से पाओगे
कहीं अधिक हष्ट -पुष्ट
भारत की राजधानी
अब भी रंग -मस्त है
गोरी पिंडलियों की थिरकन
अभी चलती है
रूप की सुराही सिरहाने
सजा रखी है
यौवन की मदिरा
नेत्र -प्याली में ढलती है
हर रोज किसी
विवश बहन का
कम्पित तन
फालों की खुन -खुन पर
बिकता है हर रोज
थुल -थुल हाथ
अस्मत -सौदागर का
उठ रहे कच्चे
उरोजों पर टिकता है
हर रोज नयी युक्ति
हर रोज नयी चाल
बीते आज साठ साल
ओ अन्ध ,पथ भ्रष्ट यौवन
छोड़ अब अन्धी राह
ऐन्द्रिक- बदलाव मात्र
तेरा छलावा है
आत्म -सर्वनाश का
मधु मिश्रित विष -पात्र ,
किसी विष कन्या के
अधरों का बुलावा है
अपनी दिशा को एक गति दें
अपनी कर्मण्यता को
दे दें सार्थकता
अपने वचन को विश्वास का बल दें
वाणी को दे दें
एक नयी अर्थवत्ता ।
कब तक बिकेगी
माँ ,बहन और पत्नी
कब तक क्षुधातुर लाल
लक्ष -लक्ष तड़पेंगे
शीत से ठिठुरती इन जीवित लाशों को
कब तक भयावह गिद्ध
निर्विघ्न हडपेंगें
भारत के युवको चुनौती स्वीकार करो
आओ ,मुझे अपनी आस्था का
बल दो
वीर्यवान स्वरों का सरगम दो
अविलम्ब
छिछली भावुकता को गहरा
एक तल दो
बज्र -पाणि बज्र मुष्ठि
श्रम की सार्थकता से गूंजेगा
यौवन का समवेत उद्घोष
उभरेंगे अँकुर
फिर पनपेगी पौध नयी
गूंजेगी जमती पर
समता का जयघोष ।




ओ नभचारी उपगुप्त 

उस दिन छत पर लेटे संध्या की द्वाभा में
मैं सोच रहा था कुछ सुख दुःख की बात लिखूँ
स्वर दे दूँ किसी विरहनी की मन पीड़ा को
उसके जलते दिन और तड़फती रात लिखूँ
काजल कोरों से छलक रही जल कणिका का
मैं दर्द भरा इतिहास लिखूँ
या पलक विछाये प्रियतम के पथ पर आतुर
मैं दो नयनों की आस लिखूँ
या मिलन गीत लिख डालूँ किसी मानिनी के
जो रूठ रूठ कर अपना मान बढ़ाती है
यौवन के कुसुमित सुमन प्यार की प्रतिमा पर
जो मुक्त भाव से दोनों हाथ चढ़ाती है
हिमधारा सी कल कल छल छल
तरुणी का मादक हास लिखूँ
जो रन्ध्र रन्ध्र में व्याप्त सहज
प्राणों की अविचल प्यास लिखूँ
अँकित कर दूँ मैं खिली कली से अधर लाल
प्रिय के चुम्बन को आतुर व्यग्र पुकार लिये
या लिखूँ जवानी की उद्धत अंगड़ाई पर
जो लहर लहर में जीवन की ललकार लिये
संध्या की लम्बी छाहों में यों सोच- सोच
मैं मन में अपना  सोया अलख जगाता था
कल्पना -वारि से सींच पौध नव भावों की
मन के आँगन में चुन चुन पड़ा लगाता था ।
पर तभी एक कोने उठ आयी बदली
छा गयी गगन के शून्य नील विस्तारों पर
झुक उमड़ -घुमड़ नीचे को पँख पसार चली
जैसे माटी से प्यार नहीं हो तारो पर
मैं खाट खींच कर छज्जे के नीचे लाया
इसलिये कि नन्ही बूँदों का काफिला उतर कर आया था
जो रिक्त नहीं होते नीचे ही चलते हैं
जाना माना यह स्वर मुझसे टकराया था
थी कितनी भारवान बदली
इसका मुझको तब भान हुआ
फट चलीं नालियाँ पानी से
शीता तिरेक का भान हुआ
रुक गया काम ,थम गया नगर
वर्षा संगीत लगा बजने
श्यामल बदली के आँचल पर
विद्दुत की रेख लगी सजने
फिर हहर घहर तड तडर तडर
मघवा का वज्राघात हुआ
सिय के वियोग में निबल राम का
फिर से कम्पित गात हुआ
तब त्वरित चीरते बूँदों को (भीगे पर से )
गौरैय्या उड़कर एक कहीं से आयी थी
पैरों की पाटी पर निशंक होकर बैठी
फड़फड़ा पंख तन में भर ली गरमाई थी
रोमांचित से नन्हें तन का निचला हिस्सा
भूरी चादर से ढका ढका सा लगता था
उसके पैरों की फुदक बताती थी अबतक
दिल में कोई भारी सा खटका जगता था
भोली  आँखें भी घूम घूम
अन्दाज ले रही थीं सारा
कोई बन्धन तो नहीं कहीं
हो पड़ा न कोई हत्यारा ।
मैं निश्चल होकर पड़ा रहा
मन में करुणा का भाव लिये
विश्वास खो चुके मानव का
अभिशाप लिये उर -घाव लिये
मन में वात्सल्य उमड़ आया
नन्हें प्राणों पर छाँह करूँ
भोले निरीह लघु जीवन पर
अपनी रक्षा की बाँह धरूँ
अपनी गुड़िया सा उठा गोद में ले बैठूँ
मन में विश्वास जगाने को
 फिर ढकूँ शाल से  बेटी मैं
जाड़े की लहर भगाने को
निः सीम प्राण भेदी करुणा
थी रोम -रोम में व्याप्त हुयी
हलकी सी झलक आदि कवि के
अनुभव की मुझको प्राप्त हुयी ।
क्षण के शतांश  में भेद गया
स्थावर जंगम का अन्तर
खुल गया पृष्ठ पर लिखित लेख सा
मानव मन का अभ्यन्तर
हम सभी प्रकृति के पुत्र
तीन चौथाई धरती पानी है
फिर क्या मानव को सदा
रक्त से अपनी प्यास बुझानी है
अम्बर से झरते झरने सा
जलधर झरता ही जाता था
नन्हें पक्षी का नन्हा दिल
भय से भरता ही जाता था
पैरों का हल्का सा कम्पन (था मुझे पता )
पक्षी को दूर भगायेगा
बूँदों की बौछारों से विंध
किस ओर कहाँ वह जायेगा
इसलिये पड़ा था मैं निश्चल
जीवन का भान न हो पाये
निर्जीव काठ सा पड़ा रहूँ
मानव का -भान न हो पाये
जो अनाहूत लघु अतिथि
आज मेरी पाटी पर आया है
भारत के उस स्वर्णिम अतीत का
मूक सन्देशा लाया है
ओ नभचरी उपगुप्त
तुम्हारे लिये ह्रदय में उठा प्यार
निस्पन्द मौन मैं पड़ा रहा
मन ही मन करता नमस्कार
हँसने दो  भावना -शून्य जड़ आलोचक
जो बहती नदी सुखाकर रेत बनाते हैं
जो जीवांकुर को देख उभरता माटी से
 विष बुझी कुदालें  ले जड़ से खुदवाते हैं
हँसने दो उन पाषाण ह्रदय इन्सानों को
जिनकी छाती ने प्यार नहीं जाना साथी
जो लाशों की दीवारों पर घर पाट रहे
जिनको न प्रेम की राह कभी आना साथी
लो नील गगन का वह कोना
धुल पुँछ कर साफ़ निखर आया
बदली का सरस कलेवर भी
रिस रिस कर तनिक निखर आया
हो गयीं फुहारें भी धीमी
पंखों पर तोल लगा तुलने
आशा की दीप्ति -दिवाली में
भय का तम -तोम लगा घुलने
जा अतिथि, पवन का देश
कहीं तेरा प्रिय तुझे बुलाता है
कुसमय की बेला चली टली
गा गा कर विगत भुलाता है
यह एक घड़ी का साथ
बड़े साथों में माना जायेगा
मेरे जीवन के महत क्षणों में
यह क्षण जाना जायेगा
ओ देवदूत ,बनकर उतरा
तू मेरे लिये सितारा है
निश्चल क्षण भर का साथ
मुझे सारे साथों से प्यारा है
उस घड़ी जिया मैं जो जीवन
उसमें मानव की आशा थी
उस मूक क्षणों में मुखर
 गांधी की ईसा  की  भाषा थी
जब कभी सबल का निर्बल पर
नंगा भाला उठ जायेगा
दो क्षण का दैवी साथ ,मित्र
मेरी स्मृति पर छायेगा । 

Thursday, 12 July 2018

स्वेद जन्मा 

कर बोली देना बन्द अगति के व्यापारी
यह गीत बिकाऊ नहीं स्वेद का जाया है
 यह गीत समर्पित है खेतों खलिहानों को
यह गीत धान की पौद रोपने आया है
यह गीत गरम लोहे पर सरगम बन गिरता
यह गीत क्रान्ति -सिंहासन का द्रढ़ पाया है
यह गीत तुम्हारी माया का मुहताज नहीं
यह गीत श्रमिक के ओठों  पर लहरायेगा
यह गीत पहाड़ों की छाती को चीर फाड़
मरुथल में जल की प्रबल लहर  ले आयेगा
यह कौन्ध समेटे है प्रताप के भाले की
यह दस्तावेज न बिकनें वाली वाणीं का
है आगत की अँगड़ाई का यह सूर्य नाद
प्रज्वलित भाल यह रक्तिम क्रान्ति -भवानी का
यह गीत तुला पर तुलनें को बेताब नहीं
यह खनक न बननें आया  है मधुप्यालों की
इसमें झाँसी की आन ,ताँत्या का तेवर
हुँकार यहां  फाँसी पर झूले लालों की
यह गीत स्वर्ण की भष्म न खाकर पलता  है
यह गणिका का स्वर नहीं , काल की  छाया है
कर बोली देना बन्द -------------------------
तुमनें खरीद डाले हैं कितनें ही बजार
कितनें उस्तादों का कल  तुमनें मोल लिया
मदिरा की छीटें डाल स्वर्ण की झझरी से
कितनी कलियों का घूँघट तुमनें खोल लिया
कितनें वाणीं के पुत्र तिजोरी में धांधे
कितनी वीणां बिक गयीं खनक दूकानों  में
कितनें कत्थक कोठों में बँधकर सिसक रहे
चांदी के घुँघरू बाँध दिये हैं गानों में
तुमनें फसलों को पुखराजी रँग दे डाला
तुमनें ऊषा को स्वर्ण पिटारी पहनायी
रजनी को हीरक -हार भेंट दे आये तुम
कुदरत सब की सब सिमट तिजोरी में आयी
तुम समझ रहे सारी कुदरत बाजारू है
हर  स्वर महफ़िल में नापा तोला  जाता है
हर चन्द्र -बदन सोनें के घूँघट से ढकता
हर घूंघट मोती देकर खोला जाता है
हाड़ी रानी की भेंट मगर क्या भूल गये
जीजाबाई का धर्म कभी क्या जाना है
आजाद ,भगत,विस्मिल  को नारी ने जन्मा
लपटों से झुलसा पड़ा राजपूताना है
कुछ नर कुबेर का घेर तोड़ने आते हैं
यह गीत उन्हीं नर सिंहों की हम साया है
कर बोली देना बन्द ------------------------
यह गीत पुत्र बन वृद्धा के घर सोयेगा
यह गीत पिता बन कन्यादान करायेगा
यह गीत दिवाली को दुखिया का घर जगमग
करने को नभ से नखत -दीप ले आयेगा
इसका है मूल्य हँसी शिशु की भोली -भाली
इसका है मूल्य श्रमित शिक्षक का खिल जाना
यह बिना मूल्य ही द्वार दीन के जाता है
पर दुःख में इसका मूल्य व्यथा से हिल जाना
यह बिन पैसे का है गुलाम उन लालों का
जो लिये हंथेली पर सिर अपना घूम रहे
जिनको सुकराती रोग लग गया है अविकल
विष -कंठ बनें जो गरल सुधा पी झूम रहे
यह जलती जेठ -दुपहरी में तरु तल बैठे
चरवाहों के श्रम - थकित गात सहलायेगा
यह दही -विलोती जसुदा के होठों पर पल
हलधर के हल में नयी शक्ति भर लायेगा
चण्डी के मन में अमर प्यास की चाह जगा
यह 'छिओ  राम 'कह जग का कलुष मिटायेगा
रैदास भगत के चरण चूम  कर प्रात ,रात
यह बाल्मीक को पालागन कर आयेगा
इसको खरीद सकते हैं सर -फरोश फक्कड़
यह नयी सृष्टि के बीज सजाकर लाया है
कर बोली देना बन्द ----------------------------
आलोक वृत्त 

वृत्त यह आलोक का तुमको समर्पित
तुम दिपो , मैं दीप्ति का दर्शक
तुम्हारे अनुगतों की पंक्ति का सीमान्त
बन कर ही सहज हूँ |
कोण की निरपेक्षता से मैं सहज ही देख लूँगा
रूप अन्तस का तुम्हारे
जो प्रभा के पुंज से मण्डित सभी को कौंधता है
किन्तु जो
व्यक्तित्व से निः सृत न होकर आवरण है
और तुमको - हाँ तुम्ही को
बोझ  बनकर रौंदता है |
शीघ्र ही -------विश्वास मुझको -------
चेतना तुमको झटक कर त्रास देगी
और आरोपित प्रभा का पुंज , विषधर सा
उठा फन यदि गरल का डंक मारे
तो उठा कर द्रष्टि अपनेँ अनुगतों की
पंक्ति के अन्तिम सिरे पर देख लेना
मैं अहं की भष्म का शीतल प्रलेपन
दे तुम्हें विष -मुक्ति दूँगा ----- और
फिर से पंक्ति के अन्तिम सिरे पर जा
प्रतीक्षा -रत रहूँगा
कब स्वयं दो डग उठा तुम पास मेरे आ सकोगी |

निर्णय की बेला 

युग भार तुम्हारे कन्धों पर रे तरुण आज
निर्माण हेतु संहार करो संहार करो
पत्थर पानी की आड़ी सीधी रेखायें
मानवता का इतिहास बनाती रहीं सदा
ये बड़ी बोलियाँ नेताओं की सच मानों
जीवित मानव को लाश बनाती रहीं सदा
जब सिसक सिसक दम तोड़ रहे लाखों नन्हें
बेबस ममता की भूखी निर्बल बाहों में
तब जवानी भारत की कब तक भटके
छल भरी राजनीति की निष्फल अन्धी राहों में
निर्णय की बेला आ  पहुंचीं रे तरुण आज
मर मिटनें वाला सृजन शील तुम प्यार करो
युग भार ----------------------------
जो तरुणाईं वह कहाँ लीक की मर्यादा पर चलती है
जो ज्वार किसी के काबू में कब आता है
आँधियाँ तोड़ती चलती हैं अवरोधों को
हिम -खण्ड पिघल जल धारा में बह  जाता है
कल की दुनियां उन हांथों से बन पायेगी
जो हाँथ आज का अनगढ़ महल ढहा देंगें
कल के विशाल भू खण्ड तभी बन पायेंगें
जब हिम नद मग के प्रस्तर खण्ड बहा देंगें
इतिहास चुनौती लिये खड़ा दोराहे पर
नर नाहर बन ओ युवक उसे स्वीकार करो
युग भार ----------------------------------
फिर चाँद किसी का बन न जाय कल उपनिवेश
परसों मंगल पर कहीं न कोई हावी हो
होकर रक्तिम फिर बहे न सरिता का पानी
चाहे दजला फरात हो चाहे रावी हो
फिर प्रजातन्त्र की रक्षा का देकर नारा
घुस जाये न घर में कोई नीच दुराचारी
मदमत्त विदेशी अफसर की सगीनों से
छिद जाये न शत  शत हाय कहीं फिर नर नारी 
सैरान्ध्रों की द्रावक पुकार अब व्यर्थ न हो
युग भीम उठो फिर कीचक का संहार करो
युग भार ------------------------------






Wednesday, 11 July 2018

कहाँ से लाऊँ  ?

सब धर्म -कौम घुल मिल हों हिन्दुस्तानी
 वह प्यार कहाँ से लाऊँ
हो जहां न पंडा -मुल्ला की नादानी
संसार कहाँ से लाऊँ
मेरी बाणीं का बल सीमित है साथी
प्रतिरोधों की दीवाल बहुत भारी है
दो चार बूँद मधु गिरनें से  क्या होता
सारा समुद्र जब नफ़रत से खारी है
बँट  गया देश छोटे छोटे टुकड़ों में
हर ओर फूट  की बेल फैलती जाती
सिंचित हो हिंसा की छीटों से निशदिन
हर घर आँगन में और छैलती जाती
जो सुखा  सके विष -बेल  देश के घर घर से
वह क्षार कहाँ से लाऊँ
हो जहां न पंडा- मुल्ला की नादानी
संसार कहाँ से लाऊँ |
हर ओर अँगारे दहक़  रहे हैं लाल लाल
जल रही मनुजता की घर -घर में होली
है लाज बिक रही खुले आम चौराहों पर
लग रही सड़क पर माँ बहनों की बोली
भाई भाई को काट रहा पागलपन में
सीमा के अन्दर खड़ा शत्रु मुस्काता
मजहब के नारे लगा लगा जोरों से
अपनों से अपनों को ही है कटवाता
बह  जाय देश का यह गलीज क्षणभर में
वह ज्वार कहाँ से लाऊँ ?
हो जहां न पंडा - मुल्ला की नादानी
संसार कहाँ से लाऊँ ?
इस धरती से पल रही सभी की काया
है इस धरती की हवा इसी का पानी
इस धरती की सीमायेँ छू अंगों से
खिल उठी धूप  सी आशा भरी जवानी
इस धरती की ही गोद सभी हम खेले
इस धरती की ही गोद हमें है सोना
हर धर्म -कौम हर जाति -नस्ल है पीछे
पहले माटी में प्यार -बीज है बोना
माँ की गोदी के सभी फूल जिसमें गुम्फित
वह हार कहाँ से लाऊँ ?
हो जहां न पंडा -मुल्ला की नादानी
संसार कहाँ से लाऊँ ?
कह दो मजहब से अभी रुके कुछ देर और
पहले माता का प्यार चुकानें जाना है
कह दो मन्दिर से और संवर ले तनिक देर
सीमाओं से सन्देश अभी तो आना है
जिस मिट्टी पानी से है तेरी बनी देह
उस माटी को झुक कर बन्दे कर ले सलाम
है देश -प्रेम सारे धर्मों से बड़ा धर्म
माँ के चरणों में अर्पित कर अपने प्रणाम
हो रस्म -रूढ़ि से जो बिल्कुल  आजाद
कहो अभिसार कहाँ से लाऊं !
हर धर्म -कौम घुलमिल हों हिन्दुस्तानी
रस -सार कहाँ से लाऊँ ?
वह प्यार कहाँ से लाऊँ
हो जहां न पंडा -मुल्ला की नादानी
संसार कहाँ से लाऊँ ?