Monday, 18 December 2017

                             योरोपीय सभ्यता प्राचीन यूनानी सभ्यता को अपनें आदि स्रोत के रूप में स्वीकार करती है | निः सन्देह ईसा पूर्व यूनान में विश्व की कुछ महानतम प्रतिभायें देखने को मिलती हैं | सुकरात ,प्लेटो (अफलातून )और अरिस्टोटल (अरस्तू ) का नाम तो शिक्षित समुदाय में सर्व विदित ही है पर बुद्धि परक मीमांसा का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां प्राचीन यूनानी प्रतिभा नें अपनी अमिट छाप न छोड़ी हो | इसी प्राचीन यूनान में स्पार्टा के नगर राज्य में मानव शरीर की प्राकृतिक विषमताओं से लड़नें की आन्तरिक क्षमता को मापनें का एक अदभुत प्रयोग किया था | ऐसा माना जाता है कि स्पार्टा नगर राज्य में जन्म लेनें वाला प्रत्येक शिशु नगर के छोर पर स्थित एक विशाल समतल प्रस्तर पर निर्वस्त्र छोड़ दिया जाता था | दिन रात के चौबीस घण्टे उसे अकेले चीखते ,चिल्लाते ,धूप , छाँह ,प्रकाश ,अन्धकार और कृमि कीटों से उलझते -सुलझते बितानें पड़ते थे | आंधी आ जाय या मूसलाधार वर्षा उसे आठ पहर ममता रहित उस चट्टान पर निर्वस्त्र काटनें ही होते थे | इस दौरान यदि प्रकृति उसका जीवन समाप्त कर दे तो स्पार्टा का प्रशासन उसे मातृ भूमि की माटी में अर्पित कर देता था और यदि वह बच जाय तो उसका हर प्रकार से लालन -पालन कर उसे स्पार्टा नगर राज्य का समर्थ चट्टानी पेशियों वाला जागरूक नागरिक बनाया जाता था | प्राचीन इतिहास के मनीषी पाठक जिन्होनें विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं का गहनतम अध्ययन किया है जानते ही हैं कि स्पार्टा नगर राज्य और एथेन्स के नगर राज्य में बहुत लम्बे समय तक संघर्ष की स्थिति रही थी और अन्ततः अपनी सारी समृद्धि ,वैभव और ज्ञान विपुलता के बावजूद स्पार्टा का पलड़ा भारी रहा था | हमें स्वीकार करना ही होगा कि मरुथल की छाती फोड़कर निकलनें वाला जीवन्त अंकुर किसी सिंचाई की मांग नहीं करता | व्यक्ति का आन्तरिक सामर्थ्य जिसमें शारीरिक और मानसिक क्षमताओं का कांचनमाणि संयोग शामिल है उसे जीवन संग्राम में अपराजेय योद्धा के रूप में प्रतिष्ठित करती है | काया का बाह्य आकार अन्तर की विशालता का प्रतीक नहीं होता | शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता किन्हीं उन आन्तरिक शक्तियों से प्रतिचालित होती है जिन्हें मानव के वरण -अवरण की प्रक्रिया के द्वारा लाखों -लाख वर्षों में पाया है | बौद्धिक कुशाग्रता और जिसे हम प्राण शक्तियां प्राणवत्ता के रूप में जानते हैं वो भी चयन -अचयन की लाखों वर्षों की दीर्घ प्रक्रिया से गुजर कर आयी है | हर श्रेष्ठ मानव सभ्यता प्राचीन या अर्वाचीन इसी विरासत में पायी असाधारण आन्तरिक क्षमता का प्रस्फुटन -पल्लवन का काम करती है | पोषण ,सिंचन और संरक्षण पा कर भी कुछ लता ,पादप -तरु थोड़ा बहुत बढ़कर सीमित विकास को समेटे विलुप्त होनें की सनातन प्रक्रिया का अंश बन जाते हैं |  और कुछ हैं जिन्हें ओक ,बरगद और देवदार बनना होता है | शताब्दियाँ उनको छूकर निकल जाती हैं और वे सिर तानें खड़े रहते हैं पर आकार की विशालता ही श्रेष्ठता का पैमाना नहीं है | राग पेशियों की द्रढ़ता प्रभावित अवश्य करती है पर सनातन नहीं होती | कुछ पैरों से निरन्तर दलित ,मलिन होनें वाली वनस्पति प्रजातियां भी हैं जो काल की कठोर छाती पर अपनीं कील ठोंककर अजेय खड़ी हैं | विनम्र घास और सदाबहारी निरपात और प्रान्तीय लतायें इसी श्रेणीं में आती हैं | सनातन धर्म वाले सनातन भारत का यही सन्देश है कि आन्तरिक ऊर्जा ,दैवी स्फुरण ,प्रज्ञा -पारमिता या समाधिस्थ संचालित जीवन ही काल को जीतकर अकाल पुरुष तक ले जाता है |
                                    व्यक्ति का चाहना या न चाहना निर्मम प्रकृति के विस्मयकारी या अबाधित गतिमयता में कोई परिवर्तन ला पाता है इस पर मुझे सन्देह है पर चाहना का यदि कोई सकारात्मक प्रभाव होता है तो मैं चाहूंगा कि 'माटी ' अपनी अमरता अपनें कलेवर में समेट लेनें वाली मन्त्र -पूत सामग्री से सिंचित करे | निर्वात दीप शिखा की भांति प्रकाश पुंजों की श्रष्टि ही उसके साधन बनें और साध्य भी | आकाश गंगा की तारावलियाँ और ज्योतित पथ उसे अमरत्व का ऊर्ध्वगामी पथ दिखायें | इसी कामना के साथ | 

Sunday, 17 December 2017

                             भारत की सांस्कृतिक परम्परा और धार्मिक प्राणपरता यह मान कर चलती है कि मनुष्य का जीवन प्रभु की एक दुर्लभ देन है | गोस्वामी जी की इस पंक्ति से तो आप हम सब परिचित ही हैं -बड़े भाग्य मानुष तन पावा | प्राकृतिक विज्ञान भी यह मान कर चलता है कि मानव अरबों वर्षों की विकास प्रक्रिया का चरम प्रतिफल है  अब यदि मनुष्य होकर भी हम मात्र अपनें लिये जीते हैं तो इस जीनें में और पशु जीवन में अन्तर ही क्या ? मुझे चार्ल्स डिकन्स की बहुचर्चित कहानी क्रिसमस कैरल की याद आती है जिसमें एब्ने क्रूज को जब उसके मित्र पावल गोन का भूत मिलता है और उससे अपनी आत्मा की दारुण व्यथा की बात करता है तो एब्ने क्रूज उससे कहता है कि तुम तो एक अत्यन्त सफल व्यापारी थे | इस पर ईथर में गूंजता उसके मृत मित्र का उत्तर आता है कैसा व्यापारी ? मैनें मानव जाति के लिये क्या किया ? मैनें अपनें अतिरिक्त दूसरों के लिये क्या कभी त्याग या बलिदान का भाव पाला | कैसा वैभव ? अपनें इन्द्रिय सुख के अतिरिक्त क्या उस वैभव से मैनें वृहत्तर मानव कल्याण की संयोजना की | कुछ इसी प्रकार के प्रश्न और उत्तर मैं 'माटी ' पत्रिका के माध्यम से आप सब लोगों के समक्ष रखना चाहता हूँ |  
                                     बन्धुओ मानव जीवन निश्चय और अनिश्चय का एक ऐसा समुच्चय है जो विज्ञान की सारी चमत्कारी विशेषताओं के बावजूद अनुत्तरित है | निश्चय इसलिये कि जो जन्मा है वह मरेगा अवश्य और अनिश्चय इसलिये कि उस महाप्रयाण की बेला गोधूलकी धुंधलके की भांति झिपी -अनझिपी रहती है | यही कारण है कि न जानें कितनी बार महामानव भी चाहते हुये कल की तलाश में बहुत कुछ नहीं कर पाते | हमें याद रखना है कि हमारे पास समय कम है और हमारे संकल्पों की यात्रा अत्यन्त कठिन और एक प्रकार अन्तहीन है | हमारे रास्ते में कितनें ही मनमोहक पड़ाव आते है जहां रुकनें का मन होता है | हम विचलित होते हैं अपनें लक्ष्य पद से और सुहावन मरीचकाओं में भटकते हैं | हमें राबर्ट फ्रॉस्ट की उन अमर पंक्तियों को कभी नहीं भूलना चाहिये जिन्हें पण्डित जवाहर लाल नेहरू नें अपनी राइटिंग टेबिल ग्लास के नीचे लगा रखा था |
" The woods are lavely dark and deep
   But I have promises to keep
   and miles to go before I sleep
   and miles to go before I sleep ."
   अभी कहाँ आराम बदा ,
   यह मूक निमन्त्रण छलना है |
   अरे अभी तो मीलों मुझको ,
   मीलों मुझको चलना है ||
                                                 मित्रो अपनें को दूसरों से बड़ा माननें का भाव अहंकार से जन्मता है और अहंकार सामाजिक समर्पण के रास्ते में रुकावट बन कर खड़ा हो जाता है इसलिये यह कहना कि हमारा जीवन अन्य लोगों के मुकाबले में कहीं  अधिक स्वच्छ और सुथरा होना चाहिये शायद उपदेश की सी बात लगे पर इसमें दो राय नहीं हैं कि भारतवर्ष का समूचा तन्त्र जाल प्रशासन की भ्रष्ट लाल फीताशाही में फंसा हुआ है | भ्रष्टाचार मिटानें के न जानें कितनें कितनें संकल्प शीर्षस्थ पर बैठे राजनीतिज्ञों नें किये थे और करते जा रहे हैं पर भारत का हर सामान्य नागरिक यह मान कर चल रहा है कि प्रशासन की स्वच्छता एक असम्भव उपलब्धि बनती जा रही है | असंम्भव को संम्भव कर दिखाना असाधारण साहस की मांग करता है | अर्नाल्ड ट्वायनवी नोबेल पुरुष्कार विजेता इतिहासकार कहते हैं कि असाधारण जननायक एक विशिष्ट चेतना से भरी सामाजिक गुणवत्ता की उपज होते हैं | हम इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठा सकते हैं | हमारा आचरण ,हमारी भाषा ,हमारा व्यवहार ,हमारी सेवा वृत्ति और हमारी निर्मलता क्रान्तिकारी चारित्रिक पवित्रता को जन्म दे सकती है | असत्य के खिलाफ भीरू बनकर बैठे रहना ,घोर अनाचार के प्रति उदासीन रहना और ऐन्द्रिक कर्तभ में गले तक डूबे रहना भारतीय समाज का अभिशाप हो चुका है | आइये हम अपनें भीतर वह शक्ति पैदा करें कि हम किसी भी अनुचित दबाव के आगे नो कहनें की हिम्मत रखें | निहारिकाओं से भरा आकाश हमारा लक्ष्य हो | नाबदान की गलीज में बुद बुद करते कीड़ों को मानव जीवन की अस्मिता का ज्ञान नहीं होता | प्रकाश का दिव्य पुंज ,पावनता का दिव्य आलोक हमारे चारो ओर व्याप्त है | यदि हममें आत्ममन्थन कर उसे पानें की शक्ति है | सभी कुछ परिवर्तन शील है | आज का यह कदाचार ,यह तुच्छता ,यह राजनीतिक लम्पटता चिरस्थायी नहीं है | परिवर्तन सनातन है | कविवर पन्त नें परिवर्तन को वर्तुल वासुकिनाद का रूपक देते हुये लिखा है :-
"शत शत फेन्नोच्छासित स्फीत फुत्कार भयंकर
घुमा रहे हैं घनाकार जगती का अम्बर
विश्व तुम्हारा गरल दन्त कंचुक कल्पान्तर
अखिल विश्व ही विवर
वक्र कुण्डल दिग मण्डल
अये वासुकि सहस्त्र फन |"
                                                         मित्रो आप मुझे भले ही अतिरिक्त आशावादी कहें पर मुझे क्षितिज पर नये प्रभात की अरुणिमा का आभाष हो रहा है | 'माटी ' कल के उस प्रभात की अग्र दूत है | घोर जाड़े के बाद भी तो बसन्त का शुभ आगमन होता है |
                                                       " If winter comes can Spring bee for behind."
                    आइये हम नये युग के सार्थवाह बनें | आइये हम मृत्यु को ललकारनें की हिम्मत पा लें ताकि जो अमृत है ,जो सत्य है ,जो सनातन है ऐसा शुद्ध परमार्थ भाव हममें जग सके | मेरा विश्वास है कि 'माटी ' परिवार का हर सदस्य अपनें चरण चिन्हों की ऐसी छाप अपनें भू -क्षेत्र में छोड़ सकेगा जिसका अनुसरण करके मानव जीवन को उद्देश्य प्राप्ति हो सके |
                             " O God !    Illumine What is dark in me ." 
                         
                             हर ऋतु का एक श्रृंगार होता है | वह श्रृंगार हमें मोहक लगे या भयावह ऋतु का इससे कोई सम्बन्ध नहीं होता | प्रकृति की गतिमयता अवाध रूप से प्रवाहित होती रहती है | ब्रम्हाण्ड में तिल जैसा आकार न पानें वाली धरती पर साँसें लेता हुआ मानव समाज अपनें को अनावश्यक महत्व देता रहता है | ब्रम्हाण्ड के अपार विस्तार में हमारी जैसी सहस्रों धरतियां बनती -बिगड़ती रहती हैं | हम अमरीका के चुनाव ,यूरोजोन की आर्थिक विफलता और इस्लामी देशों की मजहबी कट्टरता को लेकर न जानें कितनें वाद -विवाद खड़े करते रहते हैं | साहित्य की कौन सी विचारधारा ,दर्शन की कौन सी चिन्तन प्रणाली ,संगीत की कौन सी रागनी ,शिल्प और हस्तकला की कौन सी विधा सार्थक या निरर्थक है | हम इस पर बहस करके अपनें जीवन का सीमित समय समाप्त करते रहते हैं | प्रकृति का चेतन तत्व न जानें किस अद्रश्य में हमारे इन खिलवाड़ों पर हंसा करता है | पहाड़ झरते रहते हैं ,नदियाँ सूखती रहती हैं ,सागर मरुथल बन जाते हैं और मरुथल में सोते  फूटते रहते हैं | असमर्थ मानव अपनी तकनीकी और प्रोद्योगकीय की शेखचिल्लियाँ उड़ाता रहता है | पर प्रकृति की एक थपेड़ उसे असहाय या पंगु कर देती है | कहीं भूचाल है तो कहीं सुनामी ,कहीं प्रलयंकर आंधी है तो कहीं भयावह हिम स्खलन ,स्पष्ट है कि हमें जीवन के प्रति एक ऐसा द्रष्टिकोण विकसित करना चाहिये जिसमें सहज तटस्थता हो और यह जीवन दर्शन भारत के दार्शनिक चिन्तन की सबसे मूल्यवान धरोहर है जो हम भारतीयों नें पायी है | यह हमारा बचकानापन ही है कि हम जीवन सत्य खोजनें के लिये तथा कथित विकसित देशों की अन्धी गुलामी भी कर रहे हैं | चक्रधारी युग पुरुष नें सहस्त्रों वर्ष पहले जब फल से मुक्त सदाशयी कर्म की स्वतन्त्रता की बात की थी तो उसमें मानव जीवन का अब तक का सबसे बड़ा सत्य उद्घाटित किया था | इसी सत्य को आधार बनाकर भारत की युवा पीढ़ी को अपनें कर्म को उत्कृष्टता की श्रेणी तक निरन्तर गतिमान करना होगा | प्रेरणां के अभाव में आदि कर्म की स्वतन्त्रता उत्कृष्टता की ओर न बढ़कर धरातलीय घाटों पर फिसलनें लगी है और यहीं से आधुनिक भारत के चरित्र पतन का सूत्रपात हो गया है |
                                         तो हम क्या करें ? हाँथ पर हाँथ धरे बैठे रहना ,दूसरों के किये गये अनुचित कार्यों के अपराध बोध से कुण्ठित हो जाना क्या हमारे लिये श्रेयस्कर होगा ? मैं समझता हूँ हमें इस चुनौती को झेलना ही होगा | बिना दो -दो हाँथ किये कोई भी संस्कृति विश्व में अपना वर्चस्व कायम नहीं कर सकती | व्यक्ति से ही समूह का निर्माण होता है | इकाई से शून्य को जब अधिक महत्व दिया गया तो सांख्यकीय नें यही सिद्ध करनें का प्रयास किया था कि अस्तित्वमान इकाई भी अपनें में शक्ति की पराकाष्ठा छिपाये रखती है | महान नायकों से ही महान जागृतियों और महान क्रान्तियों का संचालन होता है | गांधी के आगमन के बिना भारतीय स्वतन्त्रता का स्वप्न सम्भवतः एक मूर्त रूप न ले पाता | बुद्ध के बिना वर्ण व्यवस्था पर आधारित समाज का शुद्ध परिशोधन असम्भव ही होता | मानव जीवन यदि पशु की भांति भोजन ,प्रजनन और शारीरिक संरक्षण में ही बंधा रहे तो उस जीवन का पशु जीवन से अधिक महत्व भी नहीं है | तरुणायी का अर्थ विलास की नयी कलायें सीखनें में नहीं है | तरुणाई का अर्थ असम्भव को संम्भव करना | अपराजेय को पराजित कर सत्य आधारित जीवन मूल्यों को अपराजेय बनाना | यदि हम चाहते हैं कि भारत दलालों का देश न हो ,यदि हम चाहते हैं कि भारत में नारी बिकनें वाली वस्तु न बनें ,यदि हम चाहते हैं कि संयुक्त परिवार वाले छोटे बड़े की आदर व्यवस्था सार्थक बनी रहे ,यदि हम चाहते हैं कि भारत के अति वृद्ध परिजन पुरजन सम्मान पायें तो भारत की तरुणायी को अपनी छाती पर विदेशों से आने वाले आघात झेलकर एक सकारात्मक कर्मशैली का विकास करना ही होगा | न जानें कितनें अन्तराल के बाद आजादी के प्रभात में भारत सो कर जगा था | ऐसा लगता है पिछले कुछ दशकों में वह कुछ नीन्द के झकोरे लेनें लगा है | चिन्तन की छींटों से ही उसका यह अलस भाव दूर किया जा सकता है | हमें  फिर उपनिषदों के व्यवहारिक ज्ञान को आत्मशात करना है | प्रारम्भिक शिक्षा का सबसे बड़ा सूत्र वाक्य सत्यं वद ,धर्मम चर हमारा प्रकाश स्तम्भ होना चाहिये | हमारी जीवन वृत्ति ,हमारे परिश्रम और हमारी ईमानदारी से अर्जित होकर ईश्वरीय अमरत्व के प्रति वन्दनीय बन जाती है | वही जीवन वृत्ति छोटे मोटे गलत कार्यों से शर्मिन्दगी वन जाती है और वही जीवन वृत्ति घोर नकारात्मक कार्यों से गन्दगी बन जाती है | अब हमें वन्दगी ,शर्मिन्दगी और गन्दगी के तीन रास्तों में से किसी एक रास्ते को चुनना है | एक तरफ खंजन नयन सूरदास की चेतावनी है भरि -भरि उदर विषय को धाऊं ऐसो सूकर गामी | एक तरफ कबीर की चुनौती है ,जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ | निराला की ललकार जागो फिर एक बार में सुनी जा सकती है और महामानव गांधी का करो या मरो भी गीता सन्देश का आधुनिक भाष्य ही था | 'माटी ' अपनें क्षींण स्वर में अपनें अस्तित्व का समूचा बल झोंककर आपको जीवन संग्राम में अजेय योद्धा बननें की पुकार लगा रही है | नपुंसकता मानव का श्रृंगार नहीं होती | हम यह मान कर चलते हैं कि 'माटी ' आहुति धर्मा ,सत्य समर्पित ,स्वार्थ रहित ,कर्तव्य निष्ठ ,तरुण पीढ़ी के निर्माण में अपनी भूमिका निभानें में प्रयत्न शील है | समान चिन्तन वाले अपनें साथियों से मैं सार्थक सहयोग की मांग करता हूँ | किसी फिल्म की दो लाइनें स्मृति में उभर आयी हैं | साथी हाँथ बढ़ाना -एक अकेला थक जायेगा मिलकर बोझ उठाना |

Saturday, 16 December 2017

जाग मछन्दर
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निकल भागा ,निकल भागा
डाट खुलते ही
कलूछा
बन्द बोतल का निशाचर |
तमस की उठती घटायें
अग्रजन की धूर्ततायें
भ्रष्ट तन्त्री कुटिलतायें
दे रहीं भय -भूत को
अति प्रस्तरण की संम्भावनायें
बाग़ की हर शाख पर
है लगा उसका ठिकाना
हर भले इन्सान का
अब बन्द है इस राह आना
अब कहाँ जादू मछन्दर
देवता सब भग गये हैं
छोड़ सिंहासन छिपे हैं स्वयं इन्दर
अब कहाँ जादू मछन्दर
बज्र मुष्ठी में पकड़ जो
कैद कर दे फिर गुहा में
अमिट विस्मृति की कुहा  में
भ्रष्टता का यह निशाचर
डर रहे जिससे
दिवाकर और प्रभाकर
उठ मछन्दर जाग
क्यों अब सो रहा है
देख तेरे देश में क्या हो रहा है ?
शब्दकारो उठो ,अब गोरख बनो तुम
सुप्त जनता को मछन्दर सा गुनो तुम
दो उसे ललकार
पावे शक्ति अपनी
दो उसे संज्ञान जानें युक्ति अपनी
वोट का बल
वज्र की ही चोट तो है
है यही जादू मछन्दर
इसी जादू से
सहमकर
भ्रष्टता के कलुष पुतले
फिर घिरेंगें कुहा अन्दर
कुहा का लघु द्वार कसकर बन्द करना
कौन जानें फिर कहीं
सोची गयी हो कुटिल छलना |
नहीं जानता
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ज्यों
नभ -परी नृत्य रत
मुक्त बाल
कब कोई रूपाकृति गढ़ दे
नीलाम्बर का प्रतिबिम्ब
जिसे नित हीरक -हारों से
मढ़ दे
नहीं जानता |
मेरे मन की अगनित
शंका कुल छायायें
तर्क -वितर्को की
दीपित धूमिल सीमायें
नभ गंगा के
परसीमन की
कब कोई नव निष्कृति दे दे
अब तक की सारी परिभाषायें
जहां सकुच सिर झुका खड़ी हों
नहीं जानता |
शरद ,शिशिर ,हेमन्त झेलती
जरा -जीर्ण यह जर्जर काया
अन्तर की किस वज्र चोट से
कण -कण कर दे ममता माया
रज्जु -मुक्तमन लहराता
उत्तुंग लहर पर
देख सके फिर परम तत्व की मनहर अनुकृति
नहीं जानता |
मिल जाये फिर
मुक्ति नटी के
सहज रास में
रस -भागी होनें की स्वीकृति
नहीं जानता |

स्वप्न सुन्दरी
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गढ़ तो चुका हूँ रूप प्रतिमा तुम्हारी मैं
केवल तनिक सी तराश अभी बाकी है
धरती से अम्बर तक सुषुमा बटोरी है
सतरंगी झालर से झूमर चुराये हैं
कंठ में झरती निर्झरिणीं उतारी है
वक्ष -काठिन्य गिरी -श्रंग ले आये हैं
माथे पर चाँद सी बिन्दी सजा दी है
केशों का किन्तु नागपाश अभी बाकी है
गढ़ तो चुका हूँ रूप -प्रतिमा तुम्हारी मैं
केवल तनिक सी तराश अभी बाकी है
चितवन में पहली बरसात सी बरसती है
रूप के सरोवर दो गालों नें पाले हैं
संध्या श्यामलता ले भौहें सजाई हैं
ऊषा अरुणिमा ले होंठ रच डाले हैं
आकुल रसज्ञों की तृष्णा जग आयी है
किन्तु मधु -निमन्त्रण का हास अभी बाकी है
गढ़ तो चुका हूँ रूप -प्रतिमा तुम्हारी मैं
केवल तनिक सी तराश अभी बाकी है
देकर उन्मुक्त चाल हरिणीं शरमाई है
गति में कैश्योर्य का दुलार अभी पलता है
आँखें पर यौवन की भाषा पढ़ लेती हैं
राग -दीप प्राणों में लुक छिप कर जलता है
जीवन हुलास है ,सुरभित निश्वास है
मिलन की नशैली किन्तु प्यास अभी बाकी है
गढ़ तो चुका हूँ रूप -प्रतिमा तुम्हारी मैं
केवल तनिक सी तराश अभी बाकी है
अधर अरुणोर हैं नयन कजरारे हैं
देह -यष्टि सुरभित किरीटी की डाली है
ज्वार संगीत वक्ष -दोलन में बजता है
शिरा शिरा झलक रही जीवन की लाली है
कब से प्रतीक्षा -रत अपलक मैं रूप विद्ध
किन्तु तुम प्रतिमा हो सांस अभी बाकी है |
गढ़ तो चुका हूँ रूप- प्रतिमा तुम्हारी मैं
केवल तनिक सी तराश अभी बाकी है |


मेरे विनाश पर क्या रोना ?
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मेरे विनाश पर क्या रोना ?
जब टूट रहे गिरि  श्रंग सदा से धरती पर
जब खण्ड खण्ड हो शिला रेत बन जाती है
जब कठिन तपस्या से रक्षित मन -रन्ध्रों में
ऐन्द्रिक -ऐष्णा की मादकता छन जाती है
जब बज्र मुष्ठि बजरंग आद्र हो उठते हैं
जब श्रंगी की साधना केश सहलाती है
जब चरम -प्रतिष्ठा पर पहुँचे कवि की कविता
जन श्री से कटकर पद्म श्री बन जाती है
फिर मैं भी कुछ क्षण कहीं अगर सुस्तानें को
सौरभ -बगिया में जा बैठूं तो इसमें क्या विस्मित होना
मेरे विनाश पर क्या रोना ?

जब जननायक  धननायक बन कर भरमाये
जब सेवा का सत्ता से मेल -मिलाप हुआ
जब राह दीप ही घिरे अमा की बाँहों में
वरदान उलट कर मानवता का श्राप हुआ
जब विद्रोही -स्वरगीत -प्रशस्ति लगे रचनें
जब प्रतिभा ठेकेदारों के घर पलती है
जब मन -त्रजुता का अर्थ अनाड़ी से बदला
जब कविता कुछ प्रचलित सांचों में ढलती है
फिर मेरा मन भी भटक जाय यदि कभी
प्रिया के द्वारे तक -तो इसमें क्या विस्मित होना
मेरे विनाश पर क्या रोना ?

जब रूप देह की कान्ति न हो श्रृंगार बना
जब प्यार सिर्फ सुविधाओं के बल पलता है
जब मन की धड़कन नाम नजाकत का पाती
जब हर सीता को सोनें का मृग छलता है
जब मूक हो गये भीष्म पेट की मांगों से
जब सती द्रोपदी पंच -प्रिया बन जाती है
दो बूँद -बूँद सुरा के ले यदि मैं भी बैठा
तन मन की थकन मिटानें को -तो इसमें क्या -विस्मित होना
मेरे विनाश पर क्या रोना ?