Saturday, 18 November 2017

सागर माथा से 

कंचन जंगा के शिखर बैठ मैनें देखा
दायें बायें
धूसर विराट
भारत माँ का भुज युग प्रसार
है शिरा जाल सी सींच रही
गिरिषुता जिसे हिम काट -काट |
पग तल घेरे योजन हजार
कीर्तन रत सागर महाकार
माँ के चरणों को चूम -चूम
मंजीर झांझ झंझा झंकार | |
हे विपुल रूप हे महाप्राण
हे कालजयी हे सहस नाम
शतकोटि स्वरों को स्वीकारो
अर्चना- दीप्त सुरभित प्रणाम |
माँ क्षमां करो उन भ्रमित पतित सन्तानों को
पीली माया के बस होकर जो बिके विदेशी टोलों में
निज जननी का करने जो बैठे अंग -भंग
माला के मनके बदल दिये हथगोलों में
माँ क्षमा करो उन क्रूर कुचाली सन्तों को
जो ह्त्या करनें पूजा घर में जाते हैं
जो लाशों की दीवाल बैठ ऊँचें बनते
जो मुंह में राम बगल में छूरी लाते हैं
इतिहास नहीं जाना उन अन्ध मसीहों नें
जो धर्म कौम का अर्थ राष्ट्र बतलाते हैं
वे जान नहीं पाये सावन के श्यामल घन
मणिपुर से लेकर सिन्धु देश तक जाते हैं
 इतिहास नहीं जाना उन दस्यु लुटेरों नें
जो शरण मांगते आज शत्रु की बाँहों में
है यीशु रो रहा फूट -फूट ज्योतिर्मग में
हाँ बाल वृद्ध वनिता की ह्त्या राहों में |
जो भटक गये हैं अन्ध बन्द गलियारों में
लेकर विवेक की किरण वहां पर जाना है
है घृणां नहीं संस्कृति का मूलाधार यहां
नानक , कबीर का प्यार उन्हें पहुंचाना है |
गूंजी रवीन्द्र की बाणीं मेरे कानों में
सामासिक स्वर ले लहर उठी उल्लसित बीन
सब घुले -मिले ' हेथाय आर्य  ' हेथा अनार्य
सब एक हुये  'हे थाय ' द्राविणों चीन |
इकबाल गवाही है , अब तक हस्ती की धाक हमारी है |
सब लुंज -पुंज हो गये मिश्र ,यूनान , रोम ,
अपनें नाम पर जो चमक रहे हैं सरस नखत
उनसे घिर कर द्युतिमान हुआ भारती सोम |
यह धरती विपुला है इसमें हर पत्र पुष्प
हंस ,लहर , सरस निर्विघ्न चिरंजी होता है
माँ गंगा से नभ- गंगा तक हर हिन्दी नित
सोते जगते बस प्यार बीज ही बोता है
विघटन का दर्शन थोथा है ,हिंसा डाइन हत्यारी है |
'माटी ' के पूतो उठो विगत ललकार रहा
देखो कलिंग से बोल रहा है फिर अशोक
बापू का दर्शन फिर से हमें पुकार रहा |
' होकर अनेक भी एक अमर संस्कृति धारा '
है गूँज रही जगजयी जवाहर की वाणीं
यह भगत सिंह मरदाना फांसी झूल रहा
इतिहास नया रच गयी यहां झांसी रानी
यह छुआ छूत यह जाति पाँति यह वर्ग भेद
यह तंग दायरों में उलझा काला जाला
है गुफा -मनुज के चिन्ह छोड़ बासी केंचुल
सबको निसर्ग नें एक मृत्तिका में ढाला
हम हिन्दू मुसलिम पारसीक
हम सिख ,यहूदी , ईसाई
यह भेद भाव में आते हैं
पहले हम सब हिन्दी भाई
जीवन्त राष्ट्र की पुष्ट जड़ें
गहरी मिट्टी में जाती हैं
शाखें ,पल्लव ,कोपल कलगी
हो भिन्न रूप लहराती हैं
हम कल की उपज नहीं साथी
इतिहास हमारा अनुचर है
कांक्षा -विहीन हम कर्म निरत
सदधर्म हमारा सहचर है
गौरी शंकर है भाल , विन्ध्य कटि -तट प्रदेश
हम सहस रूप ,हम लक्ष वेष
 हम आदि सभ्यता के श्रष्टा
हम आगत के द्रष्टा विशेष
हम महाकाव्य ,हम जाति मुक्त
हम सर्व -धर्म समभाव देश
मानव भविष्य के सूत्र -धार
है कालजयी गांधी विचार
सवन्ति ला रही अणु -संध्या
माँ की रज से माथा संवार
कंचन जंगा के शिखर बैठ मैनें देखा
दायें बायें -----------------


निष्फल फुत्कार 

यदि ( रामानुज सा ) मैं भी ब्रम्हाण्ड उठा लेता साथी
तो अग्रज आदेश न मेरा सयंम बनता
युग करतल में दबा तोड़ सौ टुकड़े करता
ताकि न मिलकर एक कभी फिर वे हो पायें
पर निष्फल फुत्कार लिये मैं घूम रहा हूँ
वीर्य हींन  कह मुझे जनक दुत्कार दे रहे
मन वेदी से कुंठा धनुष  न है उठ पाता
जयमाला के पुष्प सूख कर सभी झड़ गये
स्वर्ण -धूल से रंगीं देह वाले विदेह कुछ
नव पीढ़ी को क्षीण -वीर्य का पुरुष बताते
मरे हुये विश्वासों की लाशों पर बैठे
अन्वेषण की भटकन को निस्सार कह रहे
मैं भी अन्धे तहखानें में लिये हथौड़ा
खट खट करके किसी सन्धि खोज कर रहा
हँसते बन्दी देख रोष उठ आता मन में
युग -करतल में दबा तोड़ देता दीवारें
ईंट कहीं से सरक गिरेगी यह निश्चय है
मेरे जैसे और बहुत से जुटे काम में
पर जिनका विश्वास बुझ चुका अन्धकार में
उनको , केवल किरण सहारा दे पायेगी
कभी किन्हीं सन्देह -क्षणों में मन में जन्मा
मेरे यह विश्वास अन्धेरा ही सच्चा है
मुक्ति कामना क्रिया न होकर प्रतिक्रिया है
मुक्त - सृष्टि तो स्वयं न विश्वामित्र रच सके
मुक्त कहाँ धरती होती अपनें बन्धन से
कोटि वर्ष से घूम रही निश्चित राहों में
मुक्त न ज्योति पिण्ड हो पाते बंधी नियति से
फिर मानव की मुक्ति कहाँ से आ पायेगी
तब कुंठा का नाग लोटता मन वेदी पर
शिव -धनु की प्रत्यंचा सा मैं खींच न पाता
जहरीली फुत्कारें मन में आती जातीं
भींच -भींच मुठ्ठी में सिर के बाल नोचता
उस क्षण यदि सौमित्र सरीखा बल पा जाऊँ
तो भूगोल उठा कर मसलूँ मैं मुठ्ठी में
तार -तार कर उसे फेंक दूँ शून्य विजन में
आक -रुई सा बीज समेटे नयी श्रष्टि का |





Thursday, 16 November 2017

विकट संघर्ष 

चार पंक्तियाँ लिखूं याकि दो पौदे रोपूँ
मन का यह संघर्ष विकट है
परवाना आ गया निकट है
मूल्यों की पहचान अभी तक रही अधूरी
सदा पकड़नें को दौड़ा मैं झूठी काया
आत्म केन्द्रित दर्शन की वर्तुल राहों में
अहंकार का अश्व घूमकर वापस आया
भाषण दूँ या दरी बिछाऊँ
मन का यह संघर्ष विकट है
परवाना आ गया निकट है
क्या थोथा क्या भरा न अब तक जान सका हूँ
शोध -साध डाले अनेक रस रूप रिसाले
दर्शन की छेनी से संवरी सिम सिम खुलनी
खोल न पायी कुहा -गुहा के काले ताले
थन से गिरते दुग्ध -धार की छनक सुनूं
या छनक छनक मंचों का पायल राग सुनाऊँ ,
मन का यह संघर्ष विकट है
परवाना आ गया निकट है |
पढ़ डाला भूगोल विश्व का जान न पाया
चण्डीगढ़ किसको मिलना है ,पानी किसका सीमा वासी
लड़ डाला चिटगांव युद्ध बन्दी सहस्त्र शत ,
बिंधी पड़ी है किन्तु अयोध्या मथुरा काशी
घासी की शव -यात्रा में कुछ हाँथ बटाऊँ
या सत्ता -स्वागत का तोरण -द्वार सजाऊँ ,
मन का यह संघर्ष विकट है
परवाना आ गया निकट है |
कस्तूरी मृग की तलाश में भटका गिरी वन
स्वेद सुवासित देह श्रमिक की दी न दिखाई
राजभोग की मध्ययुगीन ललक में लपका
हेय समझता रहा कृषक की खांड मिठाई
कवि सम्मलेन जाऊँ करतल ध्वनि अपनानें
या श्यामा के बोझ वहन में हाँथ बटाऊँ ,
मन का यह संघर्ष विकट है
परवाना आ गया निकट है |
कौन भान पा बुद्ध गगन की ज्योति बन गये
कौन भान गांधी को गोली तक ले आया
धूमदास का प्रेत पूछ्ता मुझसे प्रति निशि
पत्थर की खानों नें सोना कैसे पाया
प्रेक्षागृह में जाऊँ मन्द भूख उकसानें
या अभाव के द्वार प्यार की धाप लगाऊँ ,
मन का यह सघर्ष विकट है
परवाना आ गया निकट है ||


सांध्य -बेला 

एक सांझ ढल गयी किसी का दुःख न बांटा |
दीप्ति घड़ी टल गयी व्याप्त नीरव सन्नाटा ||
एक कदम उठ गया मौत की मंजिल पानें |
एक लहार उठ चली काल की प्यास बुझानें ||
एक पृष्ठ बह गया प्रलय की जलधारा में |
एक गीत घिर गया गद्य की घनकारा में ||
त्याग पुष्प झड़ गया शेष ममता का कांटा |
एक सांझ ढल गयी किसी का दुःख न बांटा ||
जीवन सरिता नित प्रति बहती ही रहती है |
स्वत्व -समर्पण की गाथा कहती रहती है ||
पर आकंठ समर्पण -सुरसरि वही नहाते |
आत्माहुति दे जीवन न्यौछावर कर जाते ||
भाष्कर का क्या अर्थ न यदि घन दुःख ,तम छांटा |
एक सांझ ढल गयी किसी का दुःख न बांटा ||
ज़रा मरण का चक्र सनातन ही चलता है |
प्राण -दीप पर सदा मृत्यु -मुख में पलता है ||
कुछ पैरों में थिरकन लाओ ,अधरों पर मुस्कानें |
कुछ आँखों से आंसू तोड़ो स्वर में भर दो गानें ||
युग वरेण्यं नर -पुंगव जिसनें जन मन अंतर पाटा |
एक सांझ ढल गयी किसी का दुःख न बांटा ||
प्रति पल प्रति क्षण बाहु युग्म में भर -भर तमस हटाओ |
मृत्युंजय बन हंसो मृत्यु पर जीवन सुरभि लुटाओ ||
हर प्रभात होली बन जाये ,हर संध्या दीवाली |
हर धमनी में मुखर हो उठे स्वस्थ रक्त की लाली ||
सोंधी महक लिये माटी की फैले बेल विराटा |
एक सांझ ढल गयी किसी का दुःख न बांटा ||
 दीप्ति काल टल गया व्याप्त नीरव सन्नाटा ||

 
कुंम्भकरण

क्या सचमुच चाह रहे साथी ?
हर भेद -भाव हर ऊँच -नीच
उठ जाय देश की धरती से
सोनें की फसलें उमग उठें
हर बंजर से हर परती से
जो जाति- पांति शोषक -शोषित
की भेद भरी दीवारें हैं
भाई -भाई को मिटा रहीं
जो जहर भरी फुंकारें हैं
इन फुंकारों का मारक विष
जिससे दूषित जल- वायु हुयी -मिट जाय देश की धरती से          
क्या सचमुच चाह रहे साथी ?
राजाओं का यह ताम -झाम ,हांथी हौदे
भिक्षुणियों के हांथों में भिक्षा की प्याली
मजबूर किशोरी की आँखों में दया -भीख
लोलुप हिंसक के आँखों में मद की लाली
बाजार भोग का सात समन्दर पार बसा
स्वीकृत के बन्धन बिना लटकती दोनाली
जनमत की छाती पर होकर बेडर सवार
दे रहे प्रगति की प्रतिगामी मोहरें गाली
यह मुर्दाघर से आनें वाली आवाजें
हर बढ़ता कदम अँधेरे में जो खींच रहीं ,
मिट जाय देश की धरती से
क्या सचमुच चाह रहे साथी ?
ये गली -गली में अस्मत के होते सौदे
चेहरे की कीमत जहां लगायी जाती है
हिन्दू ,मुस्लिम ,ईसाई के सब भेद- छोड़
तन बेच -बेच कर रोटी खाई जाती है
जो रहे नोचते अपनी बहू -बेटियों को
फिर वही दरिन्दे नंगा खेल दिखाते हैं
मजहब खतरे में ' धर्म गया 'चिल्ला -चिल्ला
इतिहासों के काले पन्नें लिखवाते हैं
फिर से न अहमदाबाद जले -शैतानों की यह विष लपटें
बुझ जांय देश की धरती से
क्या सचमुच चाह रहे साथी ?
हर बार फसल कटने पर कीमत का गिरना
सोनें के काले ईंटों की करतूत रही
दो मास बाद छू लेते मूल्य सितारों को
है यही व्यवस्था सदा देश में पूत रही
श्रम से सहेज सम्पदा उठ रहे स्वर्ण सौंध
श्रमिकों के सर पर छत न अभी पड़ पायी है
सीमा पर दो बार उठी तलवार मगर
अब तक न देश की ग़ुरबत से लड़पायी है
मन्त्री के स्वागत में आयोजित महा भोज
पर जुटनें वाली जूठन -भोगी करुण -पंक्ति
मिट जाय देश की धरती से
क्या सचमुच चाह रहे साथी ?
मन प्राणों से फिर शपथ उठाओ अभी आज
तज कर सत्ता का सेज धरा पर सोऊँगा
टोली -बाजी को छोड़ उठूंगा निजता से
जन -जन के मन में प्यार बीज मैं बोऊंगा
जो काले धन पर चमक रहे थूको उन पर
बस खून -पसीनें की ही एक कमाई है
मेहनत की रोटी भली पाप की रबड़ी  से
सन्देश यही तो आजादी ले आयी है
सिर तान न चल पावें व्यभिचारी ,कामचोर
क्षण भर में सब कुछ खानें वाला कुंभ्भकरण
उठ जाय देश की धरती से
क्या सचमुच चाह रहे साथी ?



 


Wednesday, 15 November 2017

' रुलाई क्यों रह -रह कर आती है ?'

क्या कहा मर्द हूँ मैं ,  फौलादी छाती है ,
फिर मुझे रुलाई क्यों रह -रह कर आती है ?

इसलिये कि मैनें साथ सत्य का लिया सदा ,
पर पाया जग का सत्य सबल की माया है |
नैतिकता ताकत के पिंजड़े में पलती  है ,
आदर्श छलावे की सम्मोहक छाया है |

मैं बुद्ध गाँधी को पढ़ गलती कर बैठा
सोचा दरिद्र नारायण हैं ,पग पूजूंगा |
अपनी मछली वाली चट्टानी बाहों में ,
ले खड्ग सत्य का अनाचार से जूझूँगा |

थे कई साथ जो उठा बांह चिल्लाते थे ,
समता का सच्चा स्वर्ग धरा पर लाना है |
सोपान नये जय -यात्रा के रचने होंगें ,
गाँधी दर्शन का लक्ष्य मनुज को पाना है |

पर चिल्लाकर हो गया बन्द उन सबका मुख ,
इसलिये कि उनके मुंह को दूजा काम मिला |
हलवा -पूड़ी के बाद , पान से शोभित मुख ,
दैनिक पत्रों में छपा झूठ का नाम मिला |

वे कहते अब भारत से हटी गरीबी है ,
रंगीन चित्र अब अन्तरिक्ष से आयेंगें |
अब उदर -गुहा में दौड़ न पायेंगें चूहे ,
भू कक्षा में वे लम्बी दौड़ लगायेंगें |

वे कहते बहुतायत की आज समस्या है ,
भंडार न मिल पाते भरनें को अब अनाज |
सब भूमि -पुत्र लक्ष्मी -सुत बनकर फूल गये ,
दारिद्र्य अकड़ कर बैठ गया है पहन ताज |

छह एकड़ का आवास उन्हें अब भाता है ,
गृह- सज्जा लाखों की लकीर खा जाती है |
हरिजन -उद्धार मंच से अब भी होता है ,
हाँ बीच -बीच में अपच जँभाई आती है |

मैं आस -पास गिरते खण्डहर हूँ देख रहा ,
सैय्यद चाचा का कर्जा बढ़ता जाता है |
प्रहलाद शुकुल ने खेत लिख दिये मुखिया को ,
धनवानों का सूरज नित चढ़ता जाता है |

चतुरी की बेटी अभी व्याहनें को बैठी ,
पोखरमल के घर रोज कोकिला गाती है |
क्या कहा मर्द हूँ मैं फौलादी छाती है ,
फिर मुझे रुलाई क्यों रह -रहकर आती है |

कल के जो बन्धु -बान्धव थे ,थे सहकर्मी ,
सत्ता का देनें साथ द्रोण बन भटक गये |
है उदर -धर्म पर बिका धर्म मानवता का ,
सच्चाई के स्वर विवश गले में अटक गये  |

युग-  पार्थ मोह से ग्रस्त खड़ा है धर्म -क्षेत्र ,
है उसका क्या कर्तव्य न अब तक भान हुआ |
गाण्डीव शिथिल सो रहा पार्श्व में अलसाया ,
चुप है विवेक का कृष्ण न गीता ज्ञान हुआ |

ताली पर देकर ताल थिरकते हैं जनखे ,
सत्ता कीर्तन अब अमर काव्य कहलाता है |
भाषा भूसा बन गयी ,बीन भैंसें सुनतीं ,
हर क्षीण -वौर्य गजलें गा मन बहलाता है |

व्रण -युक्त देह सतरंगीं साड़ी से ढककर ,
कविता कामाक्षी कृमि बटोर कर लाती है |
क्या कहा मर्द हूँ मैं फौलादी छाती है ,
फिर मुझे रुलाई क्यों रह -रहकर आती है |


Monday, 13 November 2017

                                                         नया प्रबन्धन आयाम 

                                    दिल्ली जाना हुआ तो मन में आया कि गुड़गांव जाकर गुरुवर को प्रणाम कर आऊँ | दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज से सेवानिवृत्त हो जानें के बाद प्रोफ़ेसर राजशेखर जी गुङगांव  में बस गये हैं | बड़ी लड़की पति के साथ अमरीका में रह रही है ,उससे छोटा लड़का भी इन्जीनियर होकर कम्पनी की तरफ से सिंगापुर ट्रेनिंग के लिये गया हुआ है | राजशेखर जी और उनकी पत्नी गुङगांव के फ़्लैट में इन दिनों अकेले रह रहे हैं | अंग्रेजी भाषा के सबसे प्रिय अध्यापकों में होनें के कारण मैं उन्हें पितृ तुल्य आदर देता था , और वे भी मुझे बेटे जैसा स्नेह ही देते रहे हैं | दिल्ली में काम -काज में लगा रहा ,गुड़गांव में उनके फ़्लैट में पहुंचने में शाम हो गयी | सोचा था मिलकर दिल्ली लौट जाऊँगा और रात्रि शयन वहीं करूँगा | पर दूसरी मंजिल की फ़्लैट की बालकनी पर खड़े होनें के कारण उन्होंने ज्यों ही मुझे आते देखा तो कहा गाड़ी लॉक करके आना , उसमें कोई जरूरी सामान हो तो साथ लेकर आओ ,अब सुबह ही वापस जानें दूंगा | माता जी को जब तुम्हारे आने का फोन मिला था तब से वे बेचैन हैं कि आनें में इतनी देर कैसे हुयी | कह रहीं थीं कि अजय भी अब बहुधन्धी हो गया है | पैसा कमानें में लगा है | मैनें बताया कि वह अब समदर्शी नाम से कुछ लिखता -विखता है | मैटीरियल इकठ्ठा करता रहता है | कहता है हिन्दी में उच्च स्तरीय रचनाओं की कमी है | जो हिन्दुस्तानी अंग्रेजी में लिख रहे हैं ,उनमें एक ठसका है कि वे बड़े लेखक हैं | जो लिखते हैं उसमें पश्चिमी देशों का सांस्कृतिक कूड़ा -कचरा खरीदनें वाले भी बहुत हो गये हैं और लगभग सभी कबाड़ी पैसे वाले हो गये हैं , इसलिये उनका माल बिकता रहता है | हिन्दी का शब्दकार अभी भी अपनी रोजी -रोटी का जुगाड़ लेखन के अतिरिक्त अन्य साधनों से जुटा रहा है |
                                      मैं जब ऊपर फ़्लैट में हाँथ में अपना हल्का बैग लिये हुये पहुंचा तो पाया कि गुरु माता नें खानें का सामान मेज पर लगा दिया है और चाय की केतली गैस पर चढ़ चुकी है | एक दो बिस्कुट के साथ चाय लेने के बाद मैनें गुरु शेखर जी से वार्धक्य के दौर में बच्चों से अलग जीवन जीनें के अनुभवों के बारे में जानना चाहा | उन्होंने कहा समदर्शी सभी कुछ तो अखबारों में पढ़ते रहते होंगे | हम दोनों का अकेलापन कोई निराला तो है नहीं | अधिकतर बुद्धिजीवी अपना बुढ़ापा अब इसी प्रकार काटते हैं | अब यह संख्या निरन्तर बढ़ती ही जायेगी | क्योंकि बुद्धिजीवियों के पास जीविका के लिये कोई खेत -खलिहान ,आढ़त -गद्दी ,दुकान -गोदाम ,या फैक्ट्री -एजेन्सी तो होती नहीं ,उनके बच्चे देश -विदेश में जहां इज्जत की रोटी कमानें का मौक़ा पायेंगें ,चले जायेंगें | वहीं उनका परिवार होगा और वहीं उनका क्षेत्र होगा | आर्थिक रूप से समर्थ भारत में बुद्धिजीवियों का यही भविष्य हमें दिखायी पड़ता है |
                                अब मैं सीढ़ियों से ऊपर  चढ़कर  आया था तो मैनें देखा कि उस Enclave के निचले साझी ग्राउण्ड में तम्बू लगे थे | ग्राउण्ड लेबल पर काफी खुली जमीन थी और सम्भवतः वहीं फ़्लैट में रहनें वालों के आयोजन और उत्सव तथा शादी- व्याह की रस्में पूरी की जाती होंगीं | मैनें शेखर जी से जानना चाहा कि क्या नीचे कोई लग्नोत्सव है | तो उन्होंने बताया कि किसी फ़्लैट में एक बुजुर्गवार के घर पोते का जन्म हुआ है ,खुशी में जगराते का आयोजन किया गया है | सारी रात गीत ,भजन ,गजल होते रहेंगें | धम -धम मचा रहेगा | फिर हंस कर बोले आज रात तुझे इसलिये रोका है कि अगर धम -धम की वजह से मुझे नींद न आये तो सारी रात तुम्हें भी जगाकर गपशप करता रहूंगा | मैनें कहा माता जी तो जागरण में जाना ही चाहेंगी तो उन्होंने कहा यह बात माता जी से तुम स्वयं पूछ लो | उनकी अपनी सोच है | मैं उसमें दखल नहीं देता | जहां तक मेरा सम्बन्ध है मैं रतजगों को शोरगुल मचानें के एक धार्मिक आडम्बर के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानता | दरअसल अर्थ उपार्जन के जो नये -नये तरीके ईजाद किये जा रहे हैं उन्हीं में से एक तरीका रतजगा में चीखनें चिल्लानें वाले गायकों और ठुमका और झुमका बजानें वाले वादकों का भी है | दो चार  बूढ़े व्यापारी मर्दों के अलावा वहां 90 प्रतिशत से अधिक स्त्रियां ही होती हैं | अभी तक रतजगा के गीत अधिकतर पुरुष की टोलियां ही गा  रही हैं | पर धीरे -धीरे संगीत प्रिय नारियां भी इस क्षेत्र में प्रवेश करती जा रही हैं | फिर बोले बेटे समदर्शी कल की दुनिया केवल चमक -दमक ,मनोरंजन और इन्द्रिय विलास की दुनिया होगी | सुन्दर कुशल तथा नृत्य और गायन में प्रवीण नारियां उसका प्रमुख भाग होंगीं | चलो छोड़ो इन बातों को | बताओ इनकम टैक्स बचाने के लिये कैसे इन्वेस्टमेन्ट किया जाय |
                                                                     मेरे पास जो कुछ छोटा -मोटा ज्ञान था उससे मैनें उन्हें परिचित कराया और बताया कि अब एक लाख से ऊपर २0 ,000 का अतिरिक्त इन्वेस्टमेन्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड्स में कर सकते हैं | कहना न होगा कि वह स्वयं इन सब बातों से परिचित थे | सम्भवतः उन्होंने विषयान्तर करने के लिये ही बातचीत को एक मोड़ दिया था | गुरु माता के कमरे में प्रविष्ट होते ही बातचीत इन्वेस्टमेन्ट से हटकर गृहस्थी के आस -पास घूमनें लगी | उन्होंने मेरी पत्नी और बेटी की कुशल मंगल के विषय में प्रथम सूचना हासिल की फिर पूछा कि दिल्ली कैसे आना हुआ | मैनें बताया कि एक अगले प्रमोशन के चान्सेज टटोलनें के लिये दिल्ली के कुछ सूत्रों से सम्पर्क करना था फिर मैनें उनसे सिंगापुर में प्रशिक्षण ले रहे उनके बेटे के विषय में पूछा | उन्होनें बताया कि सर्वेश को अभी हिन्दुस्तान वापस आने में तीन चार महीनें लगेंगें | प्रशिक्षण के बाद कम्पनी उसे एक पायदान और ऊँचा उठा देगी | शादी की बातें चल रही हैं | मैनें एक लड़की देखी है | एम ० बी ० ए  ० है | तीस चालीस हजार ले रही है | पर तुम्हारे गुरू जी का कहना है कि सर्वेश की शादी की बात सर्वेश जानें | वह अपना चयन स्वयं करेगा | और क्या पता उसने पहले से ही कोई लड़की देख रखी हो | शादी सर्वेश को करनी है | मुझको तो करनी नहीं | मेरी तकदीर में तुम बदी  थीं सो आ गयीं | तुम्हारे आते ही मेरी तकदीर का दरवाजा बन्द हो गया | गुरु माता जी की बातें सुनकर मैं थोड़ा मुस्करानें लगा | मैं पहले से ही जानता था कि गुरू जी और गुरु  माता जी में कई बार मीठी -मीठी झड़पें होती रहती थीं और मैं इस सच्चायी से भी परिचित था कि उन्होंने एक दूसरे के साथ भरपूर आनन्द का जीवन जिया है | दरअसल अब 50 के आस -पास पहुंचने के कारण मैं स्वयं यह जान गया था कि बिना छोटी -मोटी मिठास भरी झड़प के अटूट प्यार अपनी चमक खोने लगता है | माता जी ने फिर कहा कि साढ़े आठ नौ बजे हम दोनों को भोजन करा वे रतजगा में चली जायेंगीं | मेरे आ जानें से वे और निश्चिन्त हो गयी थीं कि गुरू जी अकेले नहीं रहेंगें | और वे अपनें वे सिर पैर की बातें मुझे सुनाते रहेंगें | जाते -जाते गुरू जी नें एक ठिठौली की बोले तुम अकेले जा रही हो या और भी औरतें वहां जायेंगीं | गुरु माता ने कहा सभी जा रही हैं | गुरू जी ने कहा सभी कौन ज़रा नाम तो बताओ | गुरु पत्नी कुछ नाराज सी हो गयीं बोलीं सुनोगे नाम तो सुनों -विनोदनी ,सुरुधुनी ,रामी ,वामी ,श्यामी ,कामिनी ,रमणीं ,शारदा ,प्रमदा ,सुखदा ,वरदा ,कमला ,विमला ,शीतला ,निर्मला फिर सांस लेकर -मधू , निधू ,विधू ,तारणीं ,बीन तारणीं ,भवतारणीं ,सुरबाला ,गिरिवाला ,ब्रजबाला ,शैल बाला , गुरू जी घबड़ा गये हाँथ जोड़कर बोले हार मान ली | आज तुमनें मेरा अहंकार चूर -चूर कर दिया | मैं भ्रम में था कि मैं ही भाषा का पण्डित हूँ | तुमनें तो मुझे पूरी पटकी लगा दी | मैनें प्रशंसा भरी आँखों से गुरुमाता की ओर देखा | मैं जानता था कि हिन्दी के शब्द गठन और शब्द चयन में मुश्किल से ही कोई उनके मुकाबले खड़ा हो सकता था | हंसी भरी इस नोक -झोंक की समाप्ति के बाद भोजन और फिर रतजगे का कार्यक्रम | गुरुमाता भजन -कीर्तन सुननें चली गयीं और हम गुरु शिष्य एक ही कमरे में दो बिस्तरे लगाकर आराम करने की सोचने लगे पर धमाधम ,ठक -ठक ,झन -झन के बीच कई बार किसी भजन के मार्मिक शब्द  पर अधिकतर भड़ैती से भरे सिनेमायी आलाप निद्रा देवी को हमारे पास आनें ही नहीं दे रहे थे | बातचीत का सिलसिला  फिर शुरू करना पड़ा क्योंकि गुरू जी नें कुछ सुझाव देनें प्रारम्भ कर दिये |
बोले अजय -हम जब विद्यार्थी थे तब भले घर की लड़कियों को सेज पर आकर नाचना और गाना एक निन्दा की बात मानी जाती थी ,आज बिना नाचनें गानें के किसी लड़की की कदर और कीमत ही नहीं होती | युवक भी मुकाबले में जनानी अदाओं के एक्सपर्ट हो गये हैं | अब न तो उदयशंकर के नृत्य हैं न श्री कृष्ण राधा के पवित्र रास | भरत नाट्यम ,कत्थक ,कथकली ,मणिपुरम ,उडसी ,डुण्डवा ,भंगड़ा ,मंगड़ा ,सभी एक हो गए हैं | किसी में एक तरफ का कूल्हा मटकाया जाता है , किसी में दोनों तरफ का | किसी में पाँचों उँगलियों की मुद्रायें बनायी जाती हैं किसी में दो या तीन , पर सबसे अधिक तालियां तब बजती हैं जब नर्तकी और नर्तक कमर के झटके लगाते हैं | पहले ठाकुर जमींदारों की बारातों में तवाइफें नचायी जाती थीं | अब चित्रपटों की तारिकायें लाखों लाख में घण्टे आध घण्टे मुजरा कहो या पश्चिमी लटके -झटके वहां  पेश करती हैं | वर के साथ आलिंगन मुद्रा में फोटो खिंचवाती हैं | और उच्च वर्ग उन्हें घर में प्रदर्शन के लिये सहेज कर रखता है | कहते हैं हिन्दुस्तान की तरक्की दुनिया में बेजोड़ है | सारी जिन्दगी अंग्रेजी पढ़ाता रहा हूँ पर तरक्की का मतलब केवल सेक्स की अपील को सार्वभौमिक बनाना है यह कभी समझ में नहीं आया | समदर्शी क्या चायना में भी ऐसा हो रहा है ? कहते हैं चायना भी तरक्की के नये पैगाम भर रहा है | गुरू जी की बात का मैं कोई उचित उत्तर खोजने में असमर्थ था शायद वह उत्तर चाहते भी नहीं थे क्योंकि वे जानते थे कि मैं चीन होकर नहीं आया हूँ और मेरी थोड़ी बहुत जानकारी अखबारों से ही है | अखबारी जानकारी में वे स्वयं मुझसे कहीं आगे थे | हाँ इतना मैनें अवश्य कहा गुरू जी जहां तक मैं समझता हूँ चीन में भ्रष्टाचार बहुत कम है क्योंकि वहां भ्रष्टाचारी को फांसी पर लटका दिया जाता है और मैं समझता हूँ कि सेक्सुअल अपील को बेचकर पूंजी इकट्ठा करने की प्रवृत्ति को भी साम्यवादी व्यवस्था बढ़ावा नहीं देती | इसलिये शायद वहां इतना नंगापन न हो | पर गुरू जी इतना तो आप मानेंगें ही कि जहां गलत ढंग से पैसा आता है वहां गलत ढंग से जाना भी प्रारम्भ हो जाता है | भारत के कर्म सिद्धान्त की प्राचीन धारणां आज के बदले सन्दर्भों में नये तरीके से व्याख्यायित की जा सकती है |
                                      इस बीच नीचे से गानें -चिल्लानें की आवाजें ऊपर उठ -उठ कर और तेज होती गयीं | गुरू जी कुछ देर चुप रहे फिर बोले देखो समदर्शी बुरा न मानों तो एक बात कहूँ फिर बिना  मेरा उत्तर पाये बोले सुना  है तुम एक बहुत अच्छे  करियर कन्सल्टेन्ट मानें जाते हो मैं तुम्हें एक राय देता हूँ तुम्हारे सम्पर्क में जो भी सुन्दर ,सुशिक्षित और ललित कलाओं में रूचि लेनें वाली तरुणियां हों और यदि वो ऊँची नौकरियों की तलाश में हों तो उन्हें सुझाव देना कि वे नाच -गानें का करियर एडाप्ट करें | सिनेमा और टेलीविजन तक यदि नहीं भी पहुँच सकेगीं तो अब उनके लिये और भी अनेक अवसर उपलब्ध हैं | शादी -व्याह में अब सुन्दर मन को आवेग में भर देनें वाले नारी नृत्य की आवश्यकता होती है | घरेलू स्त्रियां अपना फूहर शरीर लेकर अच्छा प्रदर्शन नहीं करतीं | इसके लिये प्रशिक्षित तरुणियों की टोली बनायी जा सकती है | उस टोली की आमदनीं किसी भी नौकरी से अधिक हो सकती है |
                                      एकल नृत्य और गायन भी धार्मिक आयोजनों में चार चाँद जोड़ देता है | सुन्दर तरुणीं की नारी देंह नृत्य और गायन की कुशलता पाकर ऐसे धार्मिक आयोजन में एक दिन में जितना कमा लेंगीं उतना साल भर की नौकरी में नहीं मिलेगा | और तो और आज जो नीचे रतजगे में गाये जानें वाले बेसुरे अलाप सुन रहे हैं उन्हें यदि उच्च शिक्षित नारियां कुछ प्रशिक्षण लेकर अपने सुरीले स्वर में प्रस्तुत करें तो उससे शायद थोड़ा बहुत भावोत्कर्ष भी हो सके | और यदि गायन के साथ आकर्षित नारी देह कुछ भाव मुद्रायें भी नाटकीय ढंग से पेश करें या खड़ी होकर संचलित पद संचालन  करें तो इन रतजगों का आकर्षण कई गुना बढ़ जायेगा | हम पढ़े लिखे वृद्ध तो शायद तब  भी इस चक्र में न फंसें पर तुम्हारे जैसे प्रौढ़ तो निश्चय ही इस भंवर जाल में फंस जायेंगें | कुछ और बातें हुंयीं | रात ढलने  लगी ,गुरू जी ने एक शेर सुनाया | 
                                " नींद किसी नाजनीन से कम तो नहीं |
                                   ठहर -ठहर कर सहर तक आयेगी | "
               सुबह (सहर ) से कुछ पहले ही निद्रा रानी की कृपा हुयी ,जगा तब तक सूर्य की पहली किरणें निकल आयीं थीं | नीचे से , ' मैय्या तोरी आरतिया ' की आवाज आ रही थी | मन उत्फुल हुआ कि झमेला ख़त्म हुआ | प्रातः कालीन अनिवार्य क्रिया कलापों से निवृत्त होकर वापस जानें के लिये अनुमति मांगनीं चाही | जाते समय उन्होंने एक छोटे कागज़ के लिफ़ाफ़े में ऊपर से लाल कपड़ा लपेट कर डोरी से बांधकर मुझे जगराता का प्रसाद दिया | बोलीं मधू को मेरा आशीर्वाद देनां साथ में यह प्रसाद | तुम भी कुछ प्रसाद अवश्य ले लेना | इनकी तरह जिद्द मत करना ये तो सठिया गये हैं | गुरू जी हँसे बोले , 'सर्वेश की माँ सत्तर की तो तुम हो गयी हो | मैं तो पचहत्तर से ऊपर का हूँ | साठ तक तो तुम्हारे कब्जे में था | अब मुझे अपने विचारों के साथ बाकी जीवन तो जी लेने दो | मैनें दोनों के चरण छुये |  गुरू जी मुझे गाड़ी तक छोडनें आये | गुरुमाता बालकनी पर खड़े सप्रेम नेत्रों से मुझे देखती रहीं | ड्राइव करनें से पहले मैनें गुरू जी को एक बार फिर प्रणाम किया उन्होंने कहा समदर्शी मैनेजमेन्ट में जिस नये करियर की मैनें बात की है उसको जरूर शामिल कर लेना | विपुल अर्थ उपार्जन का यह एक नया प्रबन्धन आयाम है | 

Sunday, 12 November 2017

                                                             काम से राम तक 

                        अर्ध रात्रि का गहन अन्धकार | मेघाच्छादित गगन ,हल्की फुहारों की अविरल वृष्टि | एक दुमंजिले मकान की बाहरी दीवार से ऊपर चढ़ते किसी पुष्ट व्यक्ति की धुंधली झलक | एक उछाल के साथ छज्जा लांघकर अन्तर प्रविष्टि | छज्जे की ओर खुलते एक कक्ष  के काष्ठ द्वार पर हल्की सी थपक | भीतर से किसी नारी कंठ का मधुर स्वर | कौन है ? बासन्ती है क्या ? अभी तक सोयी नहीं |
                         उत्तर में धीमी दबी हुयी आवाज में हुआ एक पुरुष स्वर | मैं हूँ रत्नें ! रामबोला | काष्ठ पट खुल जाते हैं | नवयुवक पति को द्वार पर देखकर रत्नावली विस्मित हो जाती है | आप अर्ध रात्रि को जी ,भयावह वर्षा के बीच | बिना पूर्व सूचना के | हाय किसी नें देख तो नहीं लिया |
युवा तुलसी :-रत्नें मैं तुम्हारा पति हूँ ,किसी ने देख भी लिया हो तो क्या ? मैं तुम्हारा वियोग सहन नहीं कर सका | तुम बिना बताये भाई के साथ अपनें घर चली आयीं | मैं जब हाट से पाक सामग्री लेकर गृह वापस पहुंचा तो द्वार अर्गला वद्ध था | पड़ोसी रामनयन नें बताया कि तुम भाई के साथ पितृ गृह चली गयी हो और कह गयी हो कि वापस आने मेँ कुछ दिन लग जायेंगें |
रत्ना :- तो आपनें मेरे पितृ गृह में आनें को सहज भाव से क्यों नहीं लिया | इतनी उतावली कैसे कर डाली ? लाज ,मर्यादा भी तो कोई चीज होती है | आखिर घर में भाई -भाभी और बच्चे हैं ,और छोटी ननद बासन्ती है | आज बड़ी देर रात तक मेरे ही पास तो बैठी थी | उसका पाणिग्रहण सुनिश्चित हो गया है | इसी सम्बन्ध में मेरे अग्रज प्रियम्वद मुझे ले आये हैं | मैं तो समझी थी वासन्ती ही दुबारा फिर से मेरे कक्ष में आना चाहती है | भविष्य की अनदेखी झाकियां उसके मस्तिष्क में अशान्ति पैदा कर रही हैं |
युवा तुलसी : - प्रातः वासन्ती से भी मिलूँगा और प्रियम्वद जी को भी प्रणाम करूँगां | अब तो मुझे अन्दर कक्ष में बैठनें की आज्ञा दो | तुम नहीं जानतीं मैं कैसे उफनती हुयी जलधाराओं को चीर  कर सर्पिल रज्जु के सहारे दीवार लांघकर तुम तक आया हूँ |
रत्ना : - न जानें क्यों ,आपके इस समय अनाहूत आ जानें से मेरे हृदय में प्रसन्नता का भाव नहीं उठ रहा है | आप मेरी शैय्या पर बैठ लें ,मैं भूमि पर आसनी लगाकर बैठ लेती हूँ | दीप  की बाती को उकसा कर फिर से प्रज्वलित कर लेती हूँ | अभी -अभी ही तो लौ को आँचल से बुझाया था |
युवा तुलसी : - प्रिये ,अब दीप प्रज्वलित करनें की क्या आवश्यकता है | आओ हम दोनों शैय्या पर बैठ -लेट कर प्रेमालाप करें | दीप का धीमा प्रकाश भी नीचे के कक्ष तक मेरे आने की सूचना पहुंचा देगा और बगल के कमरे में वासन्ती तो अभी जग ही रही होगी | अन्धकार का आवरण ओढ़कर हम दोनों प्रेमी युगल शैय्या पर विश्राम करें यही इस समय उचित होगा | रत्नें मेरी उतावली के लिये मुझे क्षमा नहीं करोगी ?
रत्नावली :-   आपको अपनें जीवन में पाकर मैं धन्य हो गयी थी | आपकी विद्वता की चर्चा आस -पास के किस घर तक नहीं पहुँची है , पर हे प्रिय आज मुझे लग रहा है कि जैसे आपकी सारी विद्वता जैसे निरर्थक है | मानव सभ्यता इसीलिये संम्भव हो सकी है कि मानव नें अपनी वासनाओं पर सयंम करना सीखा है | शैय्या पर रमण केलि करनें की आपकी आकांक्षा पशुवृत्ति से परिचालित है | मुझे बाती उकसा कर प्रज्वलित करनें दीजिये , जो कोई आयेगा आ जायेगा | ससुर गृह में आपका मर्यादा के अनुसार स्वागत सत्कार होना ही चाहिये |
युवा तुलसी :- प्रिये , मैं किसी स्वागत ,सत्कार के लिये नहीं आया हूँ | तुम्हारे विक्षोह में न जानें क्यों अपना सारा जीवन निरर्थक लगता है | तुम मेरे पास होती हो तो वायु सुगन्ध से भर जाती है | तुम्हें अपनी बाँहों में भरकर मुझे ब्रम्ह सुख का अनुभव होता है | तुम्हारे नयन तारों में मुझे अगणित आकाश गंगाओं का प्रकाश झलकता दिखायी पड़ता है | मेरी सारी विद्वता तुम्हारे रूप के द्वार पर सिर मार -मार कर पछाड़ जाती है |
                                       इस बीच रत्ना बाती को उकेर कर प्रकाशवान कर देती है | हल्का सा प्रकाश काष्ठ पटों की सन्धि से बाहर झलकनें लगता है | बगल में बनें सटे कक्ष से शैय्या से उठकर बैठनें और फिर पट खोलकर बाहर आनें की क्रिया में उत्पन्न वायु ध्वनियाँ रत्ना तक पहुँचती हैं | युवा तुलसी को वह सचेत करती है |
रत्ना : - वासन्ती आ रही है | सहज हो जाइये | अपनी प्रगल्भता पर सयंम करिये | मैं कहीं भगी नहीं जा रही हूँ | सदैव आपके पास ही रहूंगीं | मैं जानती हूँ कि आप मुझे उतनी ही तीव्रता से प्यार करते हैं जितनी तीव्रता से श्री राम जनक पुत्री को चाहते थे |
                                       वासन्ती द्वार पर थपकी देती है | हल्के धक्के से द्वार खुल जाता है | धीमें प्रकाश में युवा  तुलसी को शैय्या पर बैठते  देखती है | बहन रत्ना नीचे आसनी पर द्वार की ओर मुख किये बैठी है |
वासन्ती :-अरे वाह जीजा जी आप ,इतनी रात को !क्या पुष्पक विमान से आ गये | बूँदें गिर रही हैं ,हाँथ को हाँथ नहीं सूझता ,सरितायें उफन रही हैं | भूगर्भ में रहनें वाले सरीसृप घबड़ा कर इधर -उधर तरंगायित हैं और आप हैं कि एक सेवायोजन तय करके बहिना के द्वार पर आ पहुंचे | बैठिये जीजा जी मैं भाभी को खबर दे आती हूँ ,आपके खान -पान की कुछ व्यवस्था हो जाय |
युवा तुलसी :-अरे वासन्ती रहनें दे ,प्रियम्बद को कष्ट मत दे | पति -पत्नी और दोनों बच्चे अपनें कक्ष में होंगें | इतनी रात को उनकी नीन्द उच्चाट करना अशोभन होगा |
वासन्ती :- जीजा जी जब आप आये हैं तो आपका सम्मान तो करना ही है | और फिर आप बड़ी बहिना के यहां आ जानें के कारण कुछ पकाकर उदर में पायन के लिये कुछ डाल भी तो नहीं आये होंगें | घर आया जमाई भूखा सो जाये ऐसा क्या कभी हो सकता है ? रत्ना कुछ नहीं बोलती |
                             वासन्ती समझ लेती है कि रत्ना की सहमति है और भाई -भाभी को सूचना देनें के लिये सीढ़ियां उतरकर नीचे कक्ष में जाती है |
युवा तुलसी :- देख रत्ना ,एक झंझट खड़ा हो गया | प्रियम्बद जी एक शास्त्री पुरुष हैं | पूर्व सूचना दिये बिना इस भयानक अर्ध रात्रि में मेरा यहां चले आना उनकी शास्त्रीय परम्परा में स्वीकृत नहीं होगा | इस समय उनके विश्राम में विघ्न उपस्थित कर शायद मैनें अच्छा नहीं किया | रत्नें मुझे बताओ मैं तुम्हारे प्रति अपनी आसक्ति को संयमित क्यों नहीं कर पाता हूँ | रत्ना चुप रहती है | सीढ़ियों पर पग चापों का स्पन्दन | एक थाल में कुछ फल और हाँथ में गौ पेय से भरा एक ग्लास लिये वासन्ती ऊपर आती है | पीछे -पीछे उसकी भाभी भी कक्ष में प्रवेश करती है | प्रियम्बद की पत्नी रत्ना की भाभी नीलाम्बरा युवा तुलसी को प्रणाम करती है |
वासन्ती :- लीजिये जीजा जी कुछ खा -पी लीजिये, फिर हम लोग आपको इस कक्ष में बड़ी बहिना के साथ अकेले छोड़ देंगें | अभी तो काफी रात पड़ी है | युवा तुलसी कुछ संकुचित हो जाते हैं | कदली फल का एकाध ग्रास मुंह में डालकर पय पान कर लेते हैं | नीलाम्बरा और वासन्ती वापस जानें को होती हैं | इसी बीच नीचे से एक शिशु के रोनें की आवाज आती है | गोद में दो वर्ष के एक  बालक को उठाये प्रियम्बद जी ऊपर आ जाते हैं | नीलाम्बरा उनसे पूछती है कि उनकी छह वर्षीय पुत्री सुनामा तो नहीं जग गयी | प्रियम्बद जी सिर हिलाकर बताते हैं कि सुनामा नहीं जगी है | नीलाम्बरा छोटे बच्चे को गोद में ले लेती है | वासन्ती दूध का खाली गिलास और थाल में बाकी बचे फल हाँथ में लिये खड़ी है | युवा तुलसी उठकर प्रियम्बद को प्रणाम करते हैं | प्रियम्बद स्वास्ति का हाँथ उठाते हैं पर  फिर उनमें हल्का क्रोध का भाव उभरता दिखायी पड़ता है |
प्रियम्बद :- क्यों रत्ना तूनें हम लोगों को बताया भी नहीं कि राम बोला जी को आज ही हमारे घर आना है | मेरे साथ आते समय तुम पड़ोसियों को बोल तो आयी थीं हम कुछ दिनों बाद तुम्हें वापस भेज जायेंगें | चलो राम बोला का प्यार भी आस -पास के पड़ोस के लिये किस्सा कहानी बन जायेगा |
रत्ना :- बड़े भइया मेरा इसमें कोई दोष नहीं है | मैं तो स्पष्ट निर्देश दे आयी थी कि इन्हें यहां आनें की आवश्यकता नहीं है पर शायद प्रेम की अतिशयताः के कारण ऐसा हो गया होगा |
प्रियम्बद :- आस -पास के पड़ोसी जब सुनेंगें तो क्या कहेंगें ? रत्ना अभी तेरी छोटी बहन का पाणिग्रहण संस्कार होना है ,कुछ ही दिन शेष हैं | हम लोग शास्त्री पण्डित हैं , सयंम हमारा धर्म है ,और आचरण हमारा गौरव है | नारी के प्रति किया गया प्यार ईश्वरीय भक्ति भरे प्यार जैसा नहीं होता | उसमें सदैव वासना की गन्ध होती है , और जो वासना का गुलाम है उसे विद्वान माननें का मेरा मन नहीं करता | अब प्रियम्बद वासन्ती को अपनें कमरे में जानें का निर्देश करते हैं , स्वयं कक्ष से बाहर निकल जाते हैं | नीलाम्बरा उनके पीछे बच्चे को गोद में लेकर चल पड़ती है | जाते -जाते कहती है पट बन्द कर ले रत्ना ,अब कोई नहीं आयेगा |
                                    रत्ना न जानें क्यों अपनें को अपमानित महसूस करती है | शायद बड़े भाई की बातों नें उसके मन को चोंट पहुंचायी है | रत्ना जानती है कि उसके पति वेद शास्त्रों के ज्ञाता ,जन  भाषाओं के शीर्षस्थ अधिकारी विद्वान और हीरक उज्वल चरित्र के धनी हैं | अपनें बड़े भाई द्वारा अपनें पति की विद्वता का किया गया उपहास उसकी छाती पर शूल सा गड़ता है |
                                   युवा तुलसी उठकर दीप बुझाना चाहते हैं और पट बन्द कर रात्रि शयन की सोच रहे हैं | पर वे जैसे ही दीप बुझानें के लिये उठते हैं ,रत्नावली का मुंह तमतमा जाता है | तमतमाये चेहरे से युवा तुलसी की ओर देखते हुये वह तुलसी से कहती हैं |
रत्ना :- सुन लिया धिक्कार आपनें अपनी विद्वता का | कितना बड़ा गौरव आज की रात आपनें मुझ पर लाद दिया है ?
युवा तुलसी :- रत्नें मेरी ओर एक बार प्यार की द्रष्टि से देख लो | मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा | तुम्हारे प्यार से मुझे अन्तः शक्ति मिलती है |
रत्ना :- हे विद्वद श्रेष्ठ मेरे प्रति तुम्हारा प्यार एक प्रवंचना है | वासना के जिस गुवार को तुम प्यार की संज्ञा दे रहे हो वह मनोवेगों का एक क्षणिक उफान मात्र है | यदि मेरे प्रति तुम्हारा प्यार चिरस्थायी है तो इस प्यार को भगवान् राम और भगवती सीता के प्यार में बदल कर दिखाओ | मैं आजीवन तुम्हें मन -प्राणों से प्यार करूँगीं | पर रत्ना का किया गया आज का अपमान इतिहास की एक महान उपलब्धि में बदल दो | कर सकोगे क्या ऐसा ,मेरे जीवन धन ,मेरे प्राण ,मेरे सर्वस्व ,मेरे भविष्य |
                              सहसा पीछे से महाकवि निराला के अमर पंक्तियों की गूँज |
                               धिक्, धाये तुम यों अनाहूत
                               खो दिया धर्म ,कुल धाम धूत
                                रे नहीं राम के अरे काम के सुत कहलाये |
              और फिर इसके बाद स्वर और तीब्र हो जाता है | जैसे कोई मन्त्रोचार हो रहा हो |
                                जागा -जागा संस्कार प्रबल
                                रे गया काम तत्क्षण वह जल
                                देखा वामा वह न थी ,अनल प्रतिमा वह
               युवा तुलसी रत्ना की ओर देखते हैं | एक अन्तिम द्रष्टि ,जिसमें पहले प्यार झलकता है फिर तटस्थता और फिर विराग | पट की ओर वहिर्गमन करनें से पहले कहते सुनें जाते हैं , 'रत्ना तुम्हारा प्यार भरा तिरस्कार मेरे जीवन की सबसे बड़ी बहुमूल्य पूंजी है | भारत का इतिहास इस पूंजी के काव्य निवेश से सज संवर कर हिन्दू जाति के उत्थान का अप्रतिम सोपान बन जायेगा | 'हिन्दू जाति '  शब्द युग्म को मैं सम्पूर्ण विश्व मानव धर्मिता के समानार्थी छवि चित्रों में मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ | मेरी ओर से यह अन्तिम मिलन है रत्ना | इस मिलन की याद को धूमिल मत होनें देना | पट खोलकर ,छज्जा लांघकर युवा तुलसी दीवार के सहारे शरीर सन्तुलन की असाधारण कुशलता दिखाते हुये नीचे उतरनें लगते हैं | आतुर रत्नावली छज्जे पर खड़े होकर उनकी ओर देखती है | जिसे कौन जानें तुलसी सुन पाते हैं या नहीं ?
                        " मेरे आराध्य ,मेरे पूज्य ,मेरे प्रातः स्मरणीय अपनी दासी रत्ना को जीवन में एक बार मिलने का अवसर और देना | गगन से एक स्वर गूंजता है | "
                        'एव अस्तु ,एव अस्तु ,लम्बी प्रतीक्षा करनी होगी रत्ना '

    (उपर्लिखित मानस चक्षु विम्ब अपनी पूरी नाटकीयता के साथ गहरी नींद  में न जानें कहाँ से उभर कर लेखक की चेतना को रंजित कर गया | जगनें पर उसनें इस नाटकीय विम्ब के मूल श्रोत को आलोचनात्मक ढंग से टटोला तो उसे लगा कि वह महाकवि निराला की अमर कविता 'तुलीदास ' की प्रथम दो तीन पंक्तियाँ पढ़ने के बाद दिन भर की थकान के कारण कविता संग्रह को अपनें बगल में रखकर निद्रा की गोद में चला गया था | कविता की प्रारम्भ की वह पंक्तियाँ ही शायद स्वप्न जाल को बुननें का आधार बन गयी हों | )
"भारत के नभ का प्रभा सूर्य अस्तमित आज सांस्कृतिक सूर्य है ,तमस तूर्य दिग्मण्डल "