Friday, 22 September 2017

                                                   अपरिमेय घनत्व में सम्पुजित परमाणु प्रकाश बिम्ब अपने वर्तुल चक्र परिधि में कब और कैसे महानतम विस्फोट की ऊर्जा पल्लवित कर उठा इसे शायद कोई नहीं जानता | भले ही ब्रम्हाण्ड विद इसकी परस्पर विरोधी व्याख्याओं से जूझते रहे हैं | महाविस्फोट के बाद भी अकल्पनीय विस्तरण की जिस प्रक्रिया का सूत्रपात हुआ उसके विषय में भी कोई निश्चित अवधारणा अभी तक ब्रम्हाण्ड विशेषज्ञों ने नहीं दे पायी है | जिस एक बात पर सभी का मतैक्य है वह है काल की गणितीय परिधि से बाहर कालातीत परिभ्रमण प्रक्रिया में काल का प्रवेश | ब्रम्हाण्ड विस्फोट के साथ ही उसका विस्तारीकरण और उस विस्तारीकरण के साथ ही समय की परिगणना का प्रारंम्भ | आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर हाकिन्स काल गणना की शुरुआत ब्रम्हाण्डीय विस्फोट से जोड़कर देखते हैं | पर यह गणना भी संख्याओं में बंध नहीं पाती उसे प्रतीकात्मक रूप से प्रकाश वर्षों में बांधा जाता है | विज्ञ पाठकों को यह बताने की जरूरत नहीं है कि ग्रहों और सितारों की दूरी प्रकाश वर्षों में भी नापी नहीं जा सकती | काल के इस अनन्त विस्तार में अरबों , करोणों और लाखों वर्षों की दौड़ का भी कोई महत्व नहीं होता |
                                    पर मानव जीवन अपनी उत्पत्ति के साथ ही अपने विनाश की अवधि का मापदण्ड भी लेकर आया था इसलिये मानव जीवन की कालगणना में एक वर्ष का महत्व भी चर्चा का विषय बन जाता है | भारतीय जनतन्त्र में केन्द्र में सत्ता परिवर्तन का समय संवैधानिक आधार पर पांच वर्ष के बाद आता है पर संवैधानिक आधार क्षतिग्रस्त हो जानें पर पांच वर्ष के पहले भी अस्थिरता का आभाष होने लगता है | इन मापदण्डों को आधार मानकर हम इस बात से आश्वस्त हो जाते हैं कि हमनें सभी संकटों से जूझकर 'माटी ' को दस वर्षों तक निरन्तर गतिमान रखा है और अब भी हमारे निश्चय की द्रढ़ता अखण्ड रूप से हमें उद्दीपन भरा शक्ति आसव पिलाती रहती है |
                               इन दस वर्षों में जिन प्रबुद्ध ,लब्ध प्रतिष्ठ और बाजारू संस्कृति से मुक्त कृतिकारों ,आलोचकों ,विम्बधरों और नाभिकीय कल्पना पंखों पर आदर्श आरोहण में रत चिन्तकों और पाठकों ने हमें सहयोग दिया है उनका मैं धन्यवाद तो करता ही हूँ साथ ही  अपना मान और मुखर नमन भी उन्हें समर्पित करता हूँ |
                                   मैं तो अपने में छिंगुनी का बल भी नहीं पाता पर छिंगुनी में यदि पवनपुत्र की कृपा द्रष्टि हो जाय तो उनकी ऊर्जा के अवतरण से वह मुझको उठा भी सकती है | ' माटी ' की निरन्तरता का श्रेय मुझको न जाकर उन सहस्त्रों सहयोगियों को जाता है जिनका समर्थन मुझ जैसे अकिंचन को मिला | मुझ पर चोट करने वाले उनकी सामूहिक ललकार को झेल नहीं सके और उनके बल पर मैं अपने मिशन पर बढ़ता चल रहा हूँ | स्वस्थ्य आलोचना तो मेरे लिये गले का हार है ही पर कटुक्तियों की कंटक माला भी मेरे द्वारा उपेक्षित नहीं होगी | आखिर शिव का साधक गरल को भी कंठ धरकर नीलाभ सुषमा में बदल देता है | ' माटी  'आपसे आशीर्वाद पाकर अपने सामर्थ्य को शताधिक रूप से विस्तारित करना चाहती है | संभावित सुझाव भी प्रकाशन की अधिकार सीमां में आयेंगें | कृपया अपनी सम्मतियाँ ,शुभाशीष और उत्कर्ष की प्रेरणा दायी सूक्तियाँ हमें प्रेषित कर कृतार्थ करें |

Wednesday, 20 September 2017

                          आज सभी यह मान रहे हैं कि सारा विश्व एक ग्राम बन चुका है | वैश्विक चिन्तना का विकास अधुनातन मानव सभ्यता का एक अनिवार्य अंग बन चुका है | ऐसा चिन्तन उचित भी है और मानव सभ्यता के लिये एक अत्यन्त आवश्यक संजीवनी कवच है | पर एकरूपता के इस प्रवल प्रवाह में हमें वैविध्य के आकर्षक और प्राणद सौन्दर्य श्रृंखलाओं का भी ध्यान रखना होगा | मानव जाति की आर्थिक प्रगति ,उसकी दीर्घजीविता और साधनों की विपुलता सारे विश्व के लिये कल्याणकारी है | पर साथ ही उसकी भेष -भूषा ,खान -पान ,आवास प्रक्रिया और परम्परागत उद्दात्त सांस्कृतिक धरोहरों और उत्सवों को भी हमें अक्षुण रखना होगा | विज्ञान की न तो कोई सीमा होती है और न ही वह किसी भौगोलिक परिबन्धन को मानता है | इसलिये विज्ञान और वैज्ञानिक द्रष्टिकोण सार्वभौम है | पर विज्ञान सम्मत होकर भी भौगोलिक और मौसमी विविधताओं के कारण हमारी जातीय परम्परायें अपना विशिष्ट रूप बनाये रखती हैं | भाषा ,सामाजिक संम्बन्ध और जन्म -मरण से संम्बन्धित रीति -रिवाज भिन्न -भिन्न क्षेत्रीय परम्पराओं की मर्यादा से बंधे रहते हैं | इनका परिष्करण तो किया जा सकता है पर इन्हें समूल विनिष्ट करने की प्रक्रिया एक ऐसी एकरूपता को जन्म देगी जो न केवल अशोभन होगी बल्कि सृजन की नैसर्गिक प्रवृत्ति पर भी कुठाराघात करेगी | इसलिये आवश्यक है कि बहुरूपता में समन्वय का  संगीतमय साज रचा जाय | भारत कभी भी किसी काल में भी न तो अमरीका बन सकता है और न योरोप | ठीक इसी प्रकार अमरीका और योरोप भी कभी किसी काल में भारत नहीं बन सकते | ठीक यही बात चीन ,ब्राजील जैसे बड़े देशों और मालद्वीप तथा लंका जैसे छोटे देशों पर भी लागू होती है | विज्ञान की सुविधायें और उसके द्वारा पायी गयी विपुलता और संम्पन्नता सभी देशों में प्रभावी होती है पर सांस्कृतिक विरासत का सौंन्दर्य तो उसके निरालेपन और उसके बहुलवादी स्वरूप में ही होता है | इसलिये भारत की वैश्विक चिन्तना को भारत की सांस्कृतिक जड़ों से अपने संवर्धन और पोषण के लिये पोषक तत्वों की तलाश करनी होगी | यह एक ऐसी राष्ट्रीय द्रष्टि है जो कहीं भी अन्तराष्ट्रीय मानवीय कल्याण भावना से ठुकराने का आग्रह नहीं करती | देखना सिर्फ यह है कि सांस्कृतिक जीवन्त और अविनश्वर तत्व ही आधुनिक सन्दर्भों में नया निखार लेकर पनप सकें | अधिकतर यह देखा गया है कि बाढ़ के प्रवाह में सेतुबन्ध टूट जाते हैं और जल की जीवनदायी शक्ति विनाश का ताण्डव रच देती है | हमें विनाश से बचने के लिये सेतुबन्धों को न केवल सुरक्षित रखना होगा बल्कि उन्हें और अधिक सुद्रढ़ बनाना होगा | हाँ यदि सेतुबन्धों से घिर कर संड़ांध आने लगे तो उसे प्रवाहमान करने का मार्ग भी खोजना होगा | भारतीय मनीषा के आगे आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि किस प्रकार भारतीय संस्कृति की मानवीय मूल्यों से मण्डित परम्पराओं को सुरक्षित रखते हुये वैज्ञानिक विचारधारा और वैश्विक भाई -चारे का ताल मेल किया जाय | स्वतन्त्रता संग्राम में जिस नेतृत्व ने भारत का मार्गदर्शन किया था वह नेतृत्व भारत की सांस्कृतिक विरासत का पारखी और प्रहरी भी था || राजनैतिक चेतना के साथ साथ भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और अभ्युदीयकरण में उसका सशक्त योगदान था |
                                         महात्मा गान्धी , रवीन्द्र नाथ टैगोर ,लोकमान्य तिलक ,मदन मोहन मालवीय ,और मौलाना अबुल कलाम आजाद भारत की प्राचीन और मध्य युगीन संस्कृति के आदर्श रूप थे | आज की राजनैतिक पौध इस परम्परा से कटकर अधकचरी जीवन पद्धत्ति की पैरोकार बन चुकी है | न तो उसमें पश्चिम की शक्ति और अन्वेषक द्रष्टि है और ना ही उनमें पूरब की उद्दात्त दार्शनिकता | भारत का बहुसंख्यक राजनीतिक नेतृत्व सांस्कृतिक द्रष्टि से बौना तो है ही साथ ही आडम्बरों की दम घोंटू बन्दिशों से जकड़ा है | हम 'माटी ' के प्रबुद्ध पाठकों से यह अपेक्षा रखते हैं कि वे अपने आस -पास किशोरों और तरुणों के बीच उन संम्भावनाओं की तलाश करें जो हमें सच्ची भारतीयता को सच्ची वैश्विक विचारधारा से जोड़ने की क्षमता रखती हों | हम जानते हैं कि सारे प्रयास सार्थक नहीं होते पर जहां 'माटी ' है वहां कोई न कोई अंकुर तो जमेगा ही | इसी विश्वास के साथ |
                                                                       गोत्र की तलाश

हर भाषा में कोई न कोई ऐसी कहावत होती है जिससे यह अर्थ निकलता है कि चीजों को उनके बाहरी रूप रंग से ही नहीं परखना चाहिये | बाहर और भीतर में रात और दिन का अन्तर हो सकता है |  पालिशदार पीतल को भूल से सोना समझ लिया जाता है और गन्दगी में पड़े मैले स्वर्ण खण्ड को पीतल समझनें की भूल हो जाती है | जो बात वस्तुओं के संम्बन्ध में ठीक है वही मानव जाति के संम्बन्ध में भी लागू होती है | कुछ ऐसा ही अनुभव पण्डित सूरज बली पाठक को हुआ | नब्बे वर्षीय सूरज बली जी दुर्गा कालोनी के एक मन्दिर में पूजा करते थे | कालोनी में अधिकतर छोटे साधनों के लोग थे इससे चढ़ावे में कोई विशेष आमदनी नहीं होती थी | हाँ साग -सब्जी के पैसे निकल आते थे | पर मन्दिर एक सेठ जी का था जो अब कलकत्ता में रहनें लगे थे | पानीपत के दुर्गा कालोनी के अपने शिवमन्दिर में वे पण्डित जी के लिये 3500 प्रति मांह भेज दिया करते थे | पण्डित जी के दो लड़के संजय कालोनी में रहते थे और मण्डी में सब्जी बेचकर अपना परिवार चलाते थे | नब्बे वर्षीय पण्डित सूरज बली सेठ लोगों के घरों में जाकर पूजा -पाठ भी कर लेते थे | वे गर्व से कहते थे कि वे बनारस से गंगा के किनारे रहनें वाले शुद्ध ब्राम्हणों के परिवार से हैं और उनकी पूजा कभी बेअसर नहीं होती | उन्हें यह भी कहते सुना गया था कि वे हल्के -फुल्के लोगों के यहां पूजा करनें नहीं जाते | हल्के -फुल्के लोगों से उनका क्या मतलब यह कोई -कोई ही जानता था | हम सब जानते हैं कि इस  समय हमारे देश में धर्मगुरुओं की बाढ़ आ गयी है | समाजशास्त्री यह बताते हैं कि भारत का उच्च वर्ग अब बहुत कुछ पश्चिम के रीति -रिवाज अपनानें लग गया है | लेकिन भारत का निचला तपका अब धार्मिक रीति -रिवाजों को ऊँची श्रेणी से कहीं अधिक पुरजोशी के साथ अपना रहा है | दुर्गा कालोनी से एक शाम पण्डित जी के पास एक लम्बा -चौड़ा बलिष्ठ पुरुष मिलनें के लिये आया | उसनें पण्डित जी से कहा कि वह अपने यहां हवन कराना चाहता है और आनें वाले कल सुबह आठ बजे वह घर पर पण्डित जी की उपस्थिति चाहता है | पाठक जी ने अपनी आदत के अनुसार उससे पूछा कि उसका गोत्र क्या है ? उसने बताया कि उसे अपने गोत्र का पता नहीं है | हाँ वह इतना जानता है कि उसके घर के आस -पास सभी जाति के लोग रहते हैं | उनके भी गोत्र उन्हें मालूम नहीं हैं पर किसी को ठाकुर जी कहा जाता है ,किसी को पण्डित जी , किसी को चौधरी जी ,किसी को राय साहब , किसी को राव साहब ,किसी को लाला जी , किसी को मालवीय जी , किसी को सरदार जी और किसी को खान साहब आदि आदि कहकर पुकारा जाता है | पण्डित सूर्य बली पाठक ने कहा कि जबतक किसी के गोत्र का पता न हो वह हवन या पूजा के लिये नहीं जाते | युवक ने कहा , " पण्डित जी मैं एक आदमी हूँ , आपके पास प्रार्थना लेकर आया हूँ ,क्या मेरा आदमी होनां ही काफी नहीं है | पण्डित जी बोले मैं यजुर्वेदी पण्डित हूँ | साठ साल से इस मन्दिर में पूजा कर रहा हूँ | तीस साल का था जब यहां आया था | उसके पहले आठ साल बनारस में था | | बिना गोत्र जानें मैनें कभी पूजा नहीं की है | तुम्हारा कोई न कोई गोत्र तो होगा ही | मैं जाति की बात नहीं करता | गोत्र से पहचान बनाता हूँ | जाओ कल सुबह अपने बड़े -बूढ़ों से पूँछ कर आना | मैं आठ बजे तैय्यार मिलूंगा |
                                        वह नवयुवक नमस्ते करके वहां से चला गया और घर जाकर उसने अपने विरादरी के एक बुजुर्ग से गोत्र की बात पूछी | नवयुवक के माता पिता का निधन हो चुका था | और वह घर में बँगला देश से आयी हुयी लड़की को पत्नी बनाकर रह रहा था | उसके बिरादरी के बुजुर्ग ने बताया कि वे सब खाना बदोश जनजातियों से हैं और उनमें से कुछ इधर -उधर की कालोनियों में अपना उल्टा -सीधा परिवार बनाने लग गये हैं | वह नवयुवक अधिक शिक्षित नहीं था पर उसे हिन्दी का थोड़ा सा ज्ञान था और उसनें किस्से -कहानियां पढ़ी थीं | उसनें अपनी विरादरी के बुजुर्ग से पूछा कि हम लोग राणा प्रताप की विरादरी से तो नहीं हैं ? हल्दी घाटी के युद्ध के बाद उनका साथ जंगली जातियों ने ही दिया था | हम लोग भी उन्हीं जातियों में से होंगें | बुजुर्ग बोला कि वह अपने को बहेलिया जाति का मानता है और बहेलिया ही उसका गोत्र होगा | नवयुवक को बहेलिया शब्द अच्छा नहीं लगा और वह सोचने लगा कि इसके स्थान पर कोई दूसरा शब्द चुना जाये | बहुत सोच विचार कर उसने यह तय किया कि वह अपने गोत्र का नाम " तीरमार " बतायेगा | उसकी बंगलादेशी औरत ने भी उनकी हाँ में हाँ भरी | दोनों बच्चे तो अभी छोटे ही थे उनसे पूछने की जरूरत ही नहीं थी | नवयुवक ने सोचा कि पण्डित जी हमारा गोत्र जानकार हवन करने आ जायेगें और तब वह पड़ोस के सभी लोगों को दौड़- दौड़ कर बुला लायेगा |
                               सवेरे सात बजे वह पण्डित सूर्य बली पाठक के मन्दिर में पहुँच गया | नब्बे वर्षीय पण्डित पाठक जी टट्टी से निकलते हुये अपनी लांग बाँध रहे थे | नवयुवक दूर मन्दिर की फर्श पर बैठ गया और उनका इन्तजार करने लगा | कुछ देर बाद मिट्टी से हाँथ साफ़ कर जब पण्डित जी उसके पास आये तो उसने उन्हें नमस्ते किया | पण्डित जी ने कहा कि तू आठ बजे आने के बजाय सात बजे कैसे आ गया | युवक बोला , " पण्डित जी मैनें अपना गोत्र जानने की बहुत कोशिश की | मैनें तीर , तलवार और भाला सभी के साथ मार जोड़ कर अपने गोत्र की पकड़ करने की कोशिश की | पर अब मुझे एक बहुत अच्छा और खरा गोत्र मिल गया है | पण्डित जी खुश हो गये बोले क्या नाम है तुम्हारे गोत्र का ? युवक बोला महाराज में लांगर गोत्र का हूँ | पण्डित जी ने कहा अरे भाई मैनें जांगड़ और रांगड़ तो सुनें हैं पर लांगर गोत्र कहाँ से निकला है ? नवयुवक ने कहा महाराज लांगड़ गोत्र को मैनें अभी -अभी टट्टी से निकलते देखा है और उसने दस -दस के दो नोट और एक का सिक्का पण्डित जी के पैरों के पास रख दिये , बोला पण्डित जी यह पहली दक्षिणा है बाकी सारा इन्तजाम घर पर किया गया है | मेरी बांग्लादेशी घरवाली भी दो लांग वाली धोती पहनती है | हम एक लांगड़ नहीं दो -दो लांगड़ हैं | पण्डित जी ने कहा चल तैय्यार होता हूँ तेरे से और अधिक नहीं मांगूंगा बस इक्यावन रुपये और दे देना ,हाँ पेट भर हलुआ पूड़ी तो खिलायेगा ही , तू सच्चा आदमी है ,तूने मुझे एक नया ज्ञान दिया है | पूरे यजुर्वेद में लांगड़ गोत्र नहीं है तू उसे कहाँ से खोज लाया | नवयुवक बोला ,"महाराज अब एक लांगड़ मुख्य मन्त्री बनने वाला है | आप राज्य के धर्म गुरु बनाये जायेंगें | चारो वेदों के बाद एक और वेद लिखा जा रहा है | इस वेद में पुराने सारे गोत्र मिलकर गड्डमड्ड हो गये हैं देखते जाइये और कितने नये गोत्र निकल आयेंगे नब्बे वर्षीय पण्डित सूर्य बली पाठक समझ गये कि कलयुग का पूरा प्रकोप हो चुका है और अब गोत्र न पूछकर हवन या पूजा में कितनी रकम मिलेगी यह पूछना ही उचित रहेगा | जय शनिदेव कहकर वह अपना 10 वर्ष से सहेज कर रखा हुआ पण्डितायी वाला कुर्ता पहनने लगे | हवन में सारा मुहल्ला इकठ्ठा हुआ और उस नवयुवक ने घर के द्वार पर बड़े -बड़े नीले अक्षरों में लिखवा दिया लांगड़ भवन पुरोहित पण्डित सूर्य बली पाठक यजुर्वेदी |

Tuesday, 19 September 2017

                                                                     धर्म संकट

                    भारत के प्राचीन महाग्रन्थों में अनेक महानायकों के जीवन में ऐसे क्षण आते रहे हैं जिन्हें धर्मसंकट कहा जा सकता है | महाभारत में भीष्म पितामह , युधिष्ठिर , और कौन्तेय ,अर्जुन  सभी ने कर्म क्षेत्र में धर्मसंकट की इन घड़ियों का अनुभव किया था | रामायण काल में भी अयोध्या नरेश दशरथ जैसे महान व्यक्तित्व ने भी धर्म संकट के अनुभव का प्रहार अन्तिम सांस लेकर झेला था | कहते हैं राष्ट्रपिता महात्मा गान्धी उस समय धर्म संकट की घड़ियों से गुजरे थे जब १९४२ में उनके द्वारा छेड़ा गया भारत छोड़ो आन्दोलन उनके कुछ परमभक्तों द्वारा छुटपुट हिंसाओं में बदलनें लगा था | नोबेल पुरुष्कार से विभूषित महान अर्थशास्त्री अमृत्य सेन ने लिखा है कि गीता में कई स्थलों पर गांडीव धारी अर्जुन के तर्क युगावतारी चक्रधारी श्री कृष्ण के तर्कों पर भारी पड़ते थे | पर ये तो बातें हैं महानायकों की जो भारतीय संस्कृति के आधार स्तंम्भ हैं | पर धर्मसंकट की घड़ियाँ हम सामान्यजनों के जीवन में भी आती रहती हैं  | एक ऐसी ही घड़ी हमारे आदरणीय बड़े भाई सदानन्द पाण्डेय के सामने आ खड़ी हुयी | पिछली बार सोनीपत में उनके निवास पर जब मिलने पहुंचा तो एक अजीब नजारा नजर आया | मैनें पाया कि अपने कमरे में वे १५ -२० व्यक्तियों से घिरे बैठे थे और कुछ तर्क -वितर्क चल रहा था | मुझे देखते ही बोली , " अरे समदर्शी ,दिल्ली आना कैसे हुआ , सब ठीक -ठाक है न ? "फिर अन्दर कमरे की ओर मुंह करके पुकार लगायी , " बहादुर एक कुर्सी और ले आना | मेरा छोटा भाई आया है |"कुर्सी पर बैठकर मैनें कहा ," पाण्डेय जी आप कोई जरूरी मसला हल कर रहे थे , मैनें आप के काम में कोई विघ्न तो नहीं डाला दिया ?" उन्होंने कहा अब तुम आ गये हो तो मिलजुल कर समस्या का समाधान खोजते हैं | मैं तो धर्मसंकट में ही पड़ गया हूँ | पूरी बात सुनने के लिये मैं उत्सुक हो उठा और उन्होंने जो कुछ कहा वह इस प्रकार है |
                                         हिन्दू कालेज सोनीपत से सेवा निवृत्त होने के बाद हमनें यहीं पर बस जानें की योजना बना ली थी | जमीन का एक टुकड़ा टीचिंग काल के दरम्यान ही खरीद लिया था | रिटायरमेन्ट के बाद जोड़तोड़ कर एक मध्य वर्गीय मकान बना लिया और उसी में हम दोनों अब स्थायी रूप से रहने लगे | बच्चे भी दिल्ली में कार्यरत हैं | बच्ची भी दिल्ली में व्याही है | सप्ताहान्त में कोई न कोई आता रहता है | इसलिये अकेलापन महसूस नहीं होता | भाई समदर्शी आप तो जानते ही हैं कि १९६० की दिल्ली और आज की दिल्ली में जमीन -आसमान का अन्तर है | साठ तो साठ ,अस्सी- नब्बे की दिल्ली भी आज के मुकाबले में आधी -तिहायी ही थी | अब तो दिल्ली का मुंह सुरसा की भांति फैलता जा रहा है | महानगरी दिल्ली के आस -पास का क्षेत्र राजधानी क्षेत्र के नाम से जाना जाता है | नेशनल कैपिटल रीजन में जितने भी छोटे -बड़े कस्बे या शहर थे सब के सब दिल्ली का कल्चर एडाप्ट करने लगे हैं | जमीनों के भाव आसमान छूने लगे हैं | मैनें १००/ रुपये वर्ग गज में जो जमीन खरीदी थी वह आज १५०००/ रुपये वर्ग गज में भी मिलना मुश्किल हो रही है | आपनें देखा ही होगा कि जिस जवाहर कालोनी में मेरा मकान है उसमें न जानें कितनी आलीशान बिल्डिंगे बन गयी हैं | दिल्ली में दौलत के बाढ़ बह बहकर सोनीपत आ पहुंची है | इतना तो ठीक था पर इस दौलत के साथ एक सबसे बड़ी चिन्तित करने वाली बुराई भी राजधानी क्षेत्र के इन शहरों में अपनी सम्पूर्ण भयावहता के साथ फैलनें लगी है | यह बुरायी है मदिरा  सेवन की न छूटने वाली लत जो खाते -पीते घरों के तरुण -तरुणियों को अपनी गुंजलक में लपेटकर दम घोंटती जा रही है | इंग्लैण्ड की तरह का पव कल्चर अब भारत में भी सामान्य होता जा रहा है विशेषतः राजधानी क्षेत्र में | हरियाणा राज्य को शराब के ठेकों से जितनी आमदनी हो रही है वह इतनी आकर्षक है कि हर सरकार इन ठेकों को हर गली कूंचों में पहुचानें के लिये प्रयासरत रहती है | अभी तक जवाहर कालोनी के पीने वाले लोग यहां से लगभग आधा किलोमीटर दूर अम्बेडकर कालोनी में पीने -पिलाने के लिये जाते थे | पर इस वर्ष एक ठेका इस कालोनी के नुक्कड़ पर भी खुल गया है और उसके पास शराब पीने का लाइसेन्स शुदा आहता भी मौजूद है | अभी पिछले १५ दिनों से ही यह ठेका अस्तित्व में आया है | नतीजा यह है कि कालोनी के गली ,मुहल्लों में कोई न कोई गुल -गपाड़ा ,रात का शोर या छीना -झपटी की कहानियां सुनने में आ रही हैं | अभी तीन -चार दिन पहले राधाकृष्ण मन्दिर की तरफ जाती हुयी इस कालोनी की कुछ महिलाओं से शराबियों ने कुछ छेड़खानी की थी | मन्दिर के महन्त एक प्रभावशाली व्यक्ति हैं और उन्होंने स्थानीय विधायक को फोन करके कालोनी से ठेका हटवा देने की बात कही थी | विधायक जी ने उन्हें सुझाव दिया कि मुहल्ले की महिलायें और सभ्य शिक्षित नागरिक डी ० सी ० साहब से मिलकर शराब के ठेके को हटाने की मांग पेश करें जरूरत पडी तो वे इस दिशा में कोई कदम उठायेंगें | बीते कल को मुहल्ले  के १० -२० शिक्षित व्यक्ति मेरे पास आये थे | उन्होंने मुझसे अनुरोध किया कि बुजुर्ग होने के नाते और व्यसन मुक्त जीवन जीने के कारण मैं उनके साथ चलकर डी ० सी ० साहब के सामने उनकी बात रख दूँ | मुझे उनकी बातों में कोई खामी नजर नहीं आयी हाँ मैनें यह अवश्य किया कि अपनी एरिया के म्युनिस्पिल वार्ड के चुनें गए जनतान्त्रिक प्रतिनिधि को भी इस डेलिगेशन में शामिल करने का प्रस्ताव रखा |बात मान ली गयी | चूंकि  म्यूनिसपिल काउन्सलर ज्ञान चन्द्र मेरा पुराना विद्यार्थी था इसलिये उसने भी सहज रूप से मेरे साथ जानें की बात मान ली | डी  ० सी ० साहब के साथ मुलाक़ात का समय तय किया गया और मैनें सारी कालोनी की ओर से शराब के ठेकों को वहां से हटा लेने की बात उनके सामनें रखी | डी ० सी ० साहब बोले , " पाण्डेय जी आपनें मुहल्ले के उस मकान मालिक से बात की है जिसनें अपना कमरा और शराब पीने का अहाता शराब के ठेकेदार को किराये पर दिया है ,सच यह था कि मैनें मकान मालिक हरीश कालरा से इस सम्बन्ध में कोई पूछ -तांछ नहीं की पर मेरे साथ गयी महिलाओं में दो एक ने डी ० सी ० साहब को बताया कि उन्होंने कालरा से बात की थी तो वह कहता था कि उसने ६ महीनें का किराया ६०००० /-एडवान्स में ले लिया है | उसने वह पैसे मकान के पिछले हिस्से में एक कमरा और बाथरूम बनाने में लगा दिये हैं आगे उसे और पैसे की जरूरत है | इतना किराया शराब के ठेके के अलावा और कहाँ मिल सकता है ? उसका मकान मुहल्ले के कोनें पर है | जो पीना न चाहे वह ठेके पर न आवे | अगर कोई वारदात होती है तो पुलिस की जिम्मेदारी है कि वारदात को रोके | मेरा मकान है मैं जिसे चाहूँगा किराये पर दूंगा | शराब पीना कोई जुर्म नहीं है | सरकार भी करोङों , अरबों रुपयों का कर शराब के ठेकों से वसूल करती है , फिर मेरे ऊपर बन्दिश क्यों लगायी जा रही है ?
                          यह सुनकर डी ० सी ० साहब ने मुझसे कहा , " प्रोफ़ेसर साहब आप कालरा से बात कर लीजिये | मैं जानता हूँ कि आपकी बात में वजन है | जब पिछले वर्षों में  वहां ठेका  नहीं था तब  फिर वहां ठेका खोलनें की क्या जरूरत पड़ गयी ? फिर पास में ही राधा कृष्ण का मन्दिर है और उसमें पूजा अर्चना के लिये जानें वाला रास्ता ठेके के पास से ही गुजरता है | अब यदि ठेकेदारों को उस जगह से हटाकर कालोनी के किसी दूसरी ओर ले जाया जाय तो भी उचित नहीं होगा क्योंकि ठेका तो कालोनी में मौजूद ही रहेगा | आप अपना लिखित प्रतिवेदन हमें दे दें हम उसपर अपनी सहमति जताकर उसे आबकारी विभाग में भेज देंगें | हो सकता है मामला मन्त्री तक जाय क्योंकि शराब पीने वालों की लॉबी कुछ कमजोर नहीं है |
                     डी ० सी  ० साहब मुझे निश्च्छल और स्पष्टवादी जान पड़े | भारत के बहुत सारे आफीसर्स अब पश्चिमी सभ्यता की पीने -पिलानें वाली आदत को खुले रूप से स्वीकार करने लगे हैं | मुझे लगा कि डी ० सी ० साहब में अभी गान्धी विचारधारा अपनी पूरी जीवन्तता के साथ विद्यमान है |
                           जब मैनें पाण्डेय जी से यह जानना चाहा कि आज उनके पास घेर कर यह लोग क्यों बैठे हैं ? अब पाण्डेय जी ने कहा , "भाई समदर्शी यही तो धर्म संकट आ खड़ा हुआ है | यह सभी व्यक्ति इसी कालोनी या इसके आस -पास के हैं | इनमें से अधिकतर राज , मजदूर ,बिजली या पानी के मिस्त्री हैं ,और कुछ चौथी श्रेणी के कर्मचारी यह सब मुझसे यह आग्रह करने आये हैं कि मैं इस मामले से अपने को हटा लूँ क्योंकि यह मामला राजनीतिक तूल पकड़ता जा रहा है | मैं यह जानता था कि कालरा एक राजनीतिक पार्टी का सदस्य है और उसे अधिक नशीले ड्रग्स लेने के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ता था | मेरा राजनीति से कोई लेना -देना नहीं है पर ये  सब कह रहे हैं कि कालरा कुछ लोगों और कुछ गैर जिम्मेदार औरतों का डेलीगेशन लेकर डी ० सी ०से मिलने की तैय्यारी कर रहा है | एम ० एल ० ए ० साहब पर भी दबाव डाला गया है और वे अब तटस्थ रुख अपना रहे हैं | लगता है कि वो बोट की राजनीति में फंस गये हैं और जानना चाहते हैं कि बहुमत किस ओर है | पाण्डेय जी ने फिर कहा भाई समदर्शी तुम मेरे अनुज तुल्य हो बताओ मुझे कौन सा पक्ष लेना चाहिये ? मैं जनता हूँ कि पीना कोई कानूनी अपराध नहीं है पर पी कर मतवाला होना और दूसरों की जीवन शैली में दखल देना एक अपराध अवश्य है | फिर सड़क पर किया जानें वाला हुड़दंग तो सामाजिक वर्जना की मांग करता ही है | इन लोगों का कहना है कि यदि एक दो व्यक्ति हुल्लड़बाज हैं तो उन्हें दण्डित किया जाय हम सबको ताजगी के लिये एक दो मील दूर जानें के लिये क्यों मजबूर किया जा रहा है | फिर कालरा अपने मकान के कामर्शियल टैक्स भी दे रहा है | उसे अपनी दुकान किराये पर उठाने का पूरा हक़ है | मैं वोटों की गिनती के चक्कर में नहीं पड़ता पर मुझे लग रहा है कि खुल कर पीने वालों और चोरी छिपे पीने वालों की सारी तादाद को मिला दिया जाय तो उनकी संख्या कुछ कम नहीं है और फिर इस संख्या में कुछ निम्न स्तर की स्त्रियां भी शामिल हो जाती हैं | " पाण्डेय जी ने आगे कहा ,"देखो समदर्शी ,यह निम्न और उच्च वर्ग की बातें समाजवादियों को नहीं भाती और  साम्यवादी तो इन बातों के पीछे कुल्हाड़ा लिये पड़े हैं | पर भाई सच तो यही है कि शिक्षित और कुलीन वर्ग यदि पीता भी है तो औरों की शान्ति के लिये कोई मुसीबत खड़ी नहीं करता } हुड़दंग ,छीना -झपटी और नारी उत्पीड़न की बातें अधिकतर आर्थिक रूप से दुर्बल कहे जानें वाले वर्ग से ही उभर कर आती हैं | बोलो समदर्शी ,मुझे कौन सा मार्ग चुनना चाहिये ? घर बैठकर किताबें पढ़ने का या पक्षधर होकर किसी खेमें के साथ जुड़ने का ? और फिर खेमा कौन सा हो इसका निर्णय भी तुम पर छोड़ता हूँ क्योंकि जानता हूँ कि तुम्हारा फैसला विवेक और व्यवहारिक ज्ञान दोनों से ही भरपूर होगा |
                                       पाण्डेय जी की बात सुनकर मैं पेशोपेश में पड़  गया | मैनें अपने मन में सोचा कि गान्धी जी को स्वयं गुजरात ही ठुकरा रहा है | महाराष्ट्र की बम्बई में तो विदेशी मदिरा की नदियाँ बाह रही हैं | फिर गान्धी दर्शन पर जब स्वतन्त्र भारत ही आग्रह नहीं कर रहा है तो सामान्य सुविधा वंचित नागरिकों से गान्धी आचरण की अपेक्षा क्यों की जाय | पर इससे बात तो नहीं बनती | कालोनी की शान्ति के लिये पाण्डेय जी के प्रश्न का कोई न कोई उत्तर देना ही था | शैक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक " बारहवीं रात (Twelth  Night )में सर टोवी के कहे ये शब्द स्मृति में उभर आये | " Dost Thou think that thou art virtuous, so there should be no more caps and ales ."पर सर टोवी को अंग्रेजी राज्य के समाप्ति के साथ ही भूल जाना क्या बेहतर नहीं होगा ? फिर कुछ निश्चय कर मैनें कहा पाण्डेय जी संकट में धर्म का पक्ष ही लेना चाहिये और गृहस्थ का सबसे बड़ा धर्म है गृहस्थी का सुसंचालन | शास्त्रों में तो यह कहा गया है कि गृहस्थ का धर्म सन्यासी के धर्म से भी बड़ा होता है पर जो अच्छा गृहस्थ है वह सच्चा राष्ट्र भक्त है और वही ईश्वर प्राप्ति का सच्चा अधिकारी है | मैं सोचता हूँ कि जब डी ० सी ० साहब ने ठेका हटा देने की अनुशंसा की है तो एम ० एल ० ए ० साहब को उसमें रुकावट डालने की मजबूरी नहीं होगी हाँ यदि आप मुझे इजाजत दें तो मैं यहां उपस्थित इन लोगों से एक प्रश्न पूछूं | प्रो ० सदानन्द पाण्डेय जी बोले , " भाई समदर्शी ,आप जो चाहें वह  प्रश्न इनसे पूछ सकते हैं | यह सब जब होश -हवाश में होते हैं तो इनसे बेहतर इन्सान मिलना मुश्किल होता है | पीने -पिलाने के समय भी इनकी दोस्ती ऊँचें मचानों पर खड़ी होती है पर पी लेने के बाद ये कभी -कभी बहक जाते हैं |"मैनें उपस्थित उन सभी से पूछा कि यदि उन्हें आपत्ति न हो तो मैं प्रोफ़ेसर सदानन्द जी की पत्नी सुशीला के साथ जो मेरी माता तुल्य हैउनके घरों में जाकर उनकी मां ,बहनों और पत्नियों से यह प्रश्न पूछूं कि क्या वे ठेके के हटा लेने के पक्ष में हैं या ठेके को कालोनी में चालू रखने के पक्ष में | माता सुशीला दूसरे कमरे में बैठे सभी बातें सुन रही थीं और मैं जानता था कि वे मेरी चतुरायी को भांप गयी हैं | मेरे प्रश्न के उत्तर में उनमें से कोई कुछ नहीं बोला | सभी के मुंह नीचे झुक गये | मैनें पाण्डेय जी से कहा , "बड़े भाई आपके धर्मसंकट से उबरने का निश्चय इन सभी के मूक शब्दों में मुखर हो रहा है | "समाज का जो कार्य चाहे वह खान -पान हो ,चाहे रहन -सहन ,चाहे विधि -व्यवहार गृहस्थी की सुख -शान्ति छीनता है उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता | सरकार की बात सरकार जानें पर अपने परिवार की बात तो हमें जाननी ही होगी | धीरे -धीरे यदि जुड़ते हुये परिवारों का स्वर बहुमत में बदल जाता है तो सरकार का निर्णय भी बदल जायेगा | आप निशंक होकर आबकारी विभाग के अधिकारियों से शराब के ठेके को हटा देने की बात कहें | महिलाओं की आवाज आज उतनी ही सशक्त है जितनी मनचले पुरुषों की और सच पूछो तो आदर्श मनुष्य तो वही है जो क्षणिक उत्तेजना को त्याग कर टिकाऊ प्रेरणा को पाने  का प्रयास करता है |  रह गयी बात ठेका के हटने की | उसे आबकारी विभाग पर छोड़ दें | कर्म करना ही हमारा कर्तव्य है | वेणु गोपाल की वंशी भी तो यही स्वर  निकालती रहती है | आइये अब हम आप के साथ चलकर कालरा से भी बात कर लेते हैं | हो सकता है वह पैसों के लालच से उठकर कालोनी के बहुमत के साथ जुड़ने का मन बना ले | यदि ऐसा हो जाय तो समस्या का हल अपने आप निकल आयेगा | यदि कालरा सचमुच आर्थिक  परेशानी में है तो हम उसके लिये भी सम्मिलित रूप से सुझाव का कोई मार्ग खोज सकते हैं |
                                 कुछ ही दूर पर कालरा का घर था | फ़ोन पर प्रो ० पाण्डेय ने उसे सूचित किया | मैनें सामने बैठे व्यक्तियों में से कुछ प्रौढ़ और गंम्भीर व्यक्तियों को चुनकर उनसे निवेदन किया कि वे भी हम दोनों के साथ कालरा से मिलने चलें | ऐसा मैनें इसलिये किया क्योंकि मुझे लग रहा था कि कालरा ने उन व्यक्तियों को लालच देकर ही उनके द्वारा यह भीड़ इकठ्ठा करवायी थी और पाण्डेय जी के पास उनसे मिलने भेजा था | कुछ ही देर के बाद हम सब कालरा के साथ उसके ड्राइंग रूम में बातचीत के लिये जा उपस्थित हुये | कालरा के यहां जानें से पहले मैं भीतर के कमरे में पाण्डेय जी की पत्नी माता तुल्य सुशीला जी से यह निवेदन कर आया था कि वे पड़ोस की तीन -चार सम्मानित महिलाओं को अपने यहां बुला लें | यदि आवश्यकता पड़ी तो उन सबको कालरा के घर की महिलाओं से सम्पर्क साधना होगा |
                                  कालरा ने हम सबका  ड्राइंग रूम में आदर भाव से स्वागत किया | बोला  प्रोफ़ेसर पाण्डेय जी मैं तो  आपकी  बड़ी इज्जत करता हूँ | आप लोगों को लेकर डी ० सी ० से मिलने चले गये | राधा कृष्ण मन्दिर के महन्त जी ने भी एम ० एल ० ए ० जी से मेरी शिकायत कर डाली | यह ठीक है कि मैं नशाखोर रहा हूँ पर आप ने आज तक मेरे विषय में कोई बदचलनी की बात सुनी है | कालोनी में किसी ने मेरी तकलीफ जानने की कोशिश की | दुकान और अहाता ६ महीनें से खाली पड़े थे | कोई किराये पर लेने आता तो मेरे निकट  पड़ोस के दो -तीन घर उसे यह कहकर भगा देते कि शराबी है और नशीलची है | क्या पता क्या कर बैठे | हम सबका इसपर विश्वास नहीं है | बात दरअसल यह है कि अपनी सब्जी मण्डी की छोटी -मोटी दुकान से मेहनत करके मैनें इतनी कमायी कर ली है कि पड़ोस के घरों से मेरा घर अच्छा बन गया है | दो -तीन पड़ोसी भीतर ही भीतर मेरे से ईर्ष्या कर रहे हैं | उनकी भी दुकानें सब्जी मण्डी में हैं पर मेरा थोक का काम उनसे ज्यादा होता है क्योंकि मैं मिलनसार हूँ | वे कहते हैं कि शराबी भाई कालरा के साथी हैं और इसप्रकार मुझे बदनाम करते रहते हैं | प्रो ० साहब आप यह तो मानेंगें ही कि मैं कुछ भी खाऊं पीऊं पर मैनें अपने घर की पत्नी और बहू को न तो कभी भला -बुरा कहा है और न हाँथ लगाया है | हाँ मैं बीमार अवश्य पड़ता रहा हूँ | पर अब तो सारे नशे भी छोड़ चुका हूँ | मुझे भी गुस्सा आ गया और मैनें पड़ोसियों के व्यवहार से तंग आकर शराब के एक छोटे ठेकेदार को यह दुकान और अहाता किराये पर दे दिया | यदि आप जैसे लोग मेरे निकट पड़ोस में होते तो ये नौबत क्यों आती | कालरा ने मेरा परिचय जानना चाहा | पाण्डेय जी ने बताया कि यह मेरा छोटा भाई है और स्टेट बैंक की कनाट प्लेस शाखा का मैनेजर है | मैनें कालरा को नमस्ते करते हुये हाँथ जोड़े और कहा , " बड़े भाई आपकी बात सुनकर मेरे मन में प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी | सचमुच आप बहुत  अच्छे इन्सान हैं | सुनते हैं आपनें ६ महीनें का किराया एडवान्स में ले लिया है ,आप पैसे की तंगी से गुजर रहे हैं | मेरे पास बैंक की कुछ स्कीमें हैं यदि चाहें तो मैं बहुत अच्छी शर्तों पर आपको ऋण दिलवा सकता हूँ | कालरा ने हंस कर कहा मैनेजर साहब कालरा बेवकूफ नहीं है | उसे पता है कि वह दुकानों को शराब का अड्डा बनाकर सारे कालोनी की दुश्मनी मोल ले लेगा | मैनें कोई एडवान्स -फेडवान्स नहीं लिया है | सच तो यह है कि मैनें ठेकेदार को यह कहकर फंसाया है कि वह मुझे पूरे एक महीनें के बाद किराया दे दे और वो भी जितना चाहे उतना | ऐसा मैनें इसलिये किया कि कुछ टुच्चे लोग सुबह -शाम मुझे नीचा दिखाने में लगे रहते थे | वे अपने को महात्मा समझते हैं और मुझे शराबी -कबाबी कहकर निन्दित करते हैं | और फिर आप और प्रोफ़ेसर साहब जैसे लोग भी तो कभी मेरे पास बैठकर मुझे बराबरी का मानने को तैय्यार नहीं थे इस बहाने मैनें अपनी इज्जत हासिल की है | मैनेजर साहब कालरा कच्चा खिलाड़ी नहीं है ,वह अपनी मेहनत से पैसे कमाता है और दूसरों की मदद करना जानता है | ठेकेदार ने तो पहले ही एक जगह देख रखी है आज रात ही उसका सब माल वहां पहुँच जायेगा | कल सुबह इस अहाते में कीर्तन का आयोजन होगा | प्रोफ़ेसर साहब भाभी को लेकर अवश्य आइयेगा | फिर उसने ऊंची आवाज में अन्दर के कमरे की ओर मुंह करके कहा अरी भाग्यवान देख तो कौन आया है | कुछ खानें -पीने को नहीं लायेगी | मैनेजर साहब और प्रोफ़ेसर साहब के साथ हमारे तीन आदमी पंचकौड़ी ,महंगू और घसीटा भी मौजूद हैं | इन सबको मैनें ही तो प्रोफ़ेसर साहब के पास भेजा था | तभी बाहर से कुछ लड़कियों की खिलखिलाती हुयी हंसी सुनायी पड़ी | कालरा की पोती मन्जीत बारहवीं में पढ़ती थी | अपनी सहेलियों के साथ स्कूल के  Functionसे लौटकर आयी थी | अन्दर आकर हँसते हुये बोली बाबा देखो मैनें इनाम जीता है | राधाकृष्ण की कांसे की मूर्ति है लो | कालरा ने पूछा किस बात में इनाम जीता है तो मन्जीत बोली एक भाषण प्रतियोगिता का आयोजन था | भाषण प्रतियोगिता का विषय था शराब बन्दी पर राष्ट्र पिता महात्मा गान्धी के विचार | बाबा मैनें खचाखच भरे हाल में भाषण के अन्त में यह बात कह दी थी कि मैं आज ही घर जाकर बाबा को इस बात के लिये राजी कर लूंगी कि कल से ही मेरी दुकानों में शराब की एक छींट भी दिखायी न पड़े | कालरा ने पोती की पीठ सराही और कहा तेरे बाबा कभी तेरी बात से ना  नहीं कर सकते | तेरी हर कही हुयी बात पूरी होगी | फिर उसने राधाकृष्ण की मूर्ति को प्रोफ़ेसर साहब की ओर बढ़ाकर कहा लीजिये इसे मैं आपको सौंपता हूँ | प्रोफ़ेसर सदानन्द पाण्डेय हँसे और बोले मैं राधाकृष्ण मन्दिर के महन्त को आपके घर भेजूंगा उन्हीं के हांथों में आपकी पोती यह मूर्ति दे देगी यह मूर्ति सदैव मन्दिर में सुरक्षित रहेगी | सारी कालोनी की तरफ से मैं आपको बधाई देता हूँ | भाई कालरा तुम तो सचमुच एक अनगढ़ हीरा हो | मन्जीत अन्दर जाकर ट्रे में रखी हुयी शीतपेयों की डाली उठा लायी | उसके साथ उसका छोटा भाई इन्द्रजीत भी था | बाहर आकर मैनें प्रोफ़ेसर साहब से कहा देखिये आपका धर्म संकट टल गया या नहीं | कर्म से विमुख होना ही पराजय है ,सार्थक कर्म के प्रति सदैव प्रयत्नशील रहना ही धर्मसंकटों से मुक्त होने का एक मात्र उपाय है | और फिर मैनें प्रोफ़ेसर पाण्डेय के चरण छूकर विदा मांगीं और गाड़ी का स्टियरिंग व्हील संभ्भाल लिया | 

Sunday, 17 September 2017

                                                                         विजय ध्वज
          जनवरी 2017 के पहले सप्ताह में हरियाणा सिविल सर्विसेज के सफल उम्मीदवारों की सूची अखबारों में प्रकाशित हुयी | अखबार पढनें की आदत तो है ही छपे हुए नामों पर एक नजर डाल ली |  छपे नामों में कई नाम परिचित से लगे | प्रमोद रस्तोगी ,उमा सिंह और दीपका सोलंकी | सोचा शायद यह सफल उम्मीदवार वे विद्यार्थी न हों जो कभी मेरे पास आये थे | नामों की समानता कई बार भ्रामक भी होती है |  एक दो दिन बीत गए और फिर मुंह मीठा कराने के लिये उपरोक्त तीनों तो आये ही और इसके अतिरिक्त और भी कई सफल उम्मीदवारों से मिलकर पुराने परिचय नए हो गए पर इस प्रकार का  औपचारिक मिलना -जुलना तो होता ही  रहता है पर जब उमा सिंह अपने पिता और छोटे भाई के साथ मिलने आयी तो मन में  खुशी के साथ कुछ प्रश्न भी गहरा उठे | दरअसल उमा सिंह के पिता विजय सिंह से मेरा परिचय  आकस्मिक ढंग से हुआ था | मैं एक अत्यन्त आवश्यक कार्य से दिल्ली से गाड़ी पकड़कर रायबरेली जा रहा था | रोहतक से दिल्ली के लिये बस पकड़नी थी ,जो बस जा रही थी उस पर बैठने के लिये कोई स्थान न था | अगली बस आधा घण्टा बाद छूटनी थी | मुझे लगा कि अगली बस का इन्तजार करने तक कहीं विलम्ब न हो जाय और काशी विश्वनाथ दिल्ली से चल पड़े | कालेज प्राध्यापक होने के नाते छत की रेलिंग पकड़कर खड़ा रहना मुझे अच्छा नहीं लगता था पर क्या किया जाय | मजबूरी थी | ड्राइवर ने बस स्टार्ट की ही थी कि विजय सिंह उससे मिलने या उसे कुछ निर्देश देने के लिये ऊपर की मंजिल में स्थित बड़े साहब के दफ्तर से नीचे उतरे | मैं उन्हें नहीं जानता था पर वे  शायद मुझे जानते होंगें | उन्होंने मुझे देखा और कहा , " प्रोफ़ेसर साहब दिल्ली जा रहे हैं ? मैनें सिर हिलाया | उन्होंने ड्राइवर से कुछ कहा ,कंडक्टर भी वहाँ आ गया और ड्राइवर के बगल में लगी सीट पर मेरे बैठने की व्यवस्था हो गयी | रास्ते में कंडक्टर ने मुझे बताया कि विजय सिंह जी बड़े साहब के स्टेनों हैं और बस डिपार्टमेन्ट में उनकी बड़ी कदर है |
                                            इस पहली मुलाक़ात के बाद लगभग छै महीनें बीत गये फिर एक दिन शाम को विजय सिंह मेरे घर का पता लगाकर मिलने आये उन्होंने कहा कि उन्हें और उनके दो साथियों को प्रमोशन के लिये एक इम्तहान पास करना है और उसमें अंग्रेजी भाषा के कुछ प्रश्न पूंछे जाते हैं | उनके दो साथी राजेन्द्र सिंह चौहान और लक्ष्मण दास शर्मा भी स्टेनों हैं और वे भी बस डिपार्टमेन्ट में लगे हैं तीनों ही नवयुवक जुम्मेदारी के पद पर थे और मुझे उनके साथ बैठने में खुशी ही हुयी | मैनें अंग्रेजी भाषा का विशेषतः अंग्रेजी व्याकरण का थोड़ा -बहुत ज्ञान उन्हें करवाया | वे तीनों ही उत्तीर्ण हो गये और ऊँचें वेतनमान के योग्य पाये गये | ऐसा शायद मेरी शिक्षा के कारण नहीं वरन उनके परिश्रम के कारण था | पर फिर भी वे मुझे एक सच्चे गुरू का आदर देने लगे | ऐसा शायद इसलिये भी हो कि जब तक वे मेरे पास आते रहे थे मैनें उनसे उनके आग्रह पर भी कोई आर्थिक लाभ नहीं उठाया था | वर्ष पर वर्ष बीतते चले गये एकाध बार विजयसिंह मेरे घूमने के समय मिल जाते | परिवार की चर्चा होती बताते तीन लडकियां और दो लड़के हैं | सभी पढनें -लिखने में तेज हैं | जीवन चलता रहा ,समय बीतता गया | मैं सेवा निवृत्त गया फिर भी जब कभी विजय सिंह जी मिलते चरण स्पर्श करने के लिये झुकते और मैं प्यार के साथ उनका हाँथ पकड़कर पीठ थपथपा देता | वर्ष पर वर्ष बीतते चले गये | विजय सिंह जी भी सेवा निवृत्त हो गये | मिलते तो बताते तीनों लड़कियों की शादी कर दी है | बड़े बच्चे ने एम ० टेक ० कर लिया है | छोटा बी ० टेक ० में है | सेवा निवृत्ति के बाद उन्हें भी सुबह -शाम घूमने की आदत पड़ गयी थी और मैं तो घुमन्तू नस्लों से ही अपने को सम्बन्धित करता रहा हूँ | एक दिन अपनी बेटी उमा को लेकर आये कहा कि जे ० बी ० टी ० कर चुकी है एक सरकारी परीक्षा में इसे इम्तहान पास करना है | कुछ दिन अपने पास आने की अनुमति दें | उमा पोती बनकर कुछ दिन अंग्रेजी और सामान्य ज्ञान का अध्ययन करती रही फिर जे ० बी ० टी ० लग गयी | उसका व्याह एक ठाकुर परिवार में हुआ था जो पंजाब के सीमा क्षेत्र में स्थापित था | विज्ञ पाठक जानते ही हैं कि पंजाब के विभाजन के बाद बहुत से घर हरियाणा की सीमा रेखा में आ गए और काफी सारे घर पंजाब की सीमा रेखा में स्थित रहे | संस्कृति एक ,भाषा एक ,देश एक पर राज्य अलग -अलग | राजनीति अपना खेल खेलती चलती है ,राज्य की सीमायें भी बनती -बिगडती रहती हैं | आज का आन्ध्र कल का तेलंगाना हो जाय तो क्या पता | वृहद बाम्बे बंटकर गुजरात और महाराष्ट्र में बदल गया | कहते हैं उ ० प्र ० भी तीन राज्यों में बट जानें की सम्भावना छिपाये है | उत्तराखण्ड तो बन ही चुका है | खैर छोड़िये भी इन बातों को |
                                        तो उमा के पति मोहाली में जे ० बी ०  टी ० टीचर थे और उमा पंचकुला में | उमा कुछ दिन मेरे पास बैठी थी और उसकी शिक्षा के दौरान मैनें पाया था कि वह एक मेधावी छात्रा है | विज्ञान ,मैथमेटिक्स ,सामान्य ज्ञान और अंग्रेजी चारों में उसकी मजबूत पकड़ है | ग्रेजुएट तो है ही अगर कम्पटीशन में बैठे तो सिविल सर्विसेज में आ सकती है | जब कभी भी विजय सिंह जी मिलते मैं उनसे कहता कि उमा को कम्पटीशन में बिठा लें | वे कहते कि उसके सास -ससुर कहते हैं कि मास्टरी ही भली | भगवान ने बहुतेरा दिया है | मोहाली और पंचकुला पास -पास हैं | परिवार चल रहा है और किसी नौकरी में जायेगी तो साथ -साथ रहना हो सकेगा या नहीं कौन जानें ? इसी बीच उमा एक पुत्र की मां बन गयी | लगभग दो तीन वर्ष बाद उमा अपने बच्चे को गोद में लेकर मेरी पत्नी से आशीर्वाद लेने आयी | संयोग से मैं घर पर ही था | मैनें उससे पूछा कि वह कम्पटीशन में क्यों नहीं बैठती ? बोली , ' सर परिवार की कितनी जिम्मेदारियाँ हैं ,मास्टरी चलाना ही मुश्किल हो रहा है | कैसे तैय्यारी कर पाऊंगीं  | " मैनें कहा देखो बेटे उमा मैं उम्र के एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा  हूँ जहां से प्रारम्भिक जीवन का चित्र तटस्थ भाव से देखा जा सकता है | मैं अध्यापक रहा हूँ | हजारों विद्यार्थी मेरे सम्पर्क में आये हैं | तुम साहस करो तो हरियाणा सिविल सर्विसेज क्लियर करना तुम्हारे लिये कठिन नहीं होगा | बाकी तुम स्वयं बड़ी हो गयी हो ,निर्णय तुम्हें करना है | कुछ वर्ष बाद ओवर एज हो जाओगी फिर और कुछ करने को शेष नहीं रहेगा |
                                       न जानें क्या बात हुयी कि उमा ने एक द्रढ़ संकल्प ले लिया | और 2017 जनवरी के प्रथम सप्ताह में एक्जीक्यूटिव ब्रान्च में सफल होकर उसने फिर से मुझे एक योग्य अध्यापक की गरिमा से मण्डित कर दिया | यही कारण है कि जब विजय सिंह जी अपनी बेटी उमा के साथ मिठाई का डिब्बा लेकर मुझसे मिलने आये तो मुझे एक अतिरिक्त गौरव का अनुभव हुआ | हंसी -हंसी में मैनें उमा से पूछा कि वह एक आला अफसर बन जायेगी | उसके पति जे ० बी ० टी ० अध्यापक हैं कहीं सम्बन्धों में कोई तनाव तो उत्पन्न नहीं होगा | उमा ने कहा ," गुरुवर नारी तो नारी रहती है अब आप जानें कि पुरुष का अहंकार नारी के आगे बढ़ जानें से क्षुब्ध तो नहीं होता |"फिर उसने कहा कि अभी तो ट्रेनिंग पर जाना होगा फिर इसके बाद पोस्टिंग होगी | देखिये कौन सा स्टेशन मिलता है | मैनें कहा ," बेटे उमा सहस्त्रों वर्षों से भारतीय सन्दर्भ में नारी को पुरुष के पूरक के रूप में लिया गया है |उसके अपने स्वतन्त्र अस्तित्व की पाश्चात्यवादी धारणा अभी तक भारत में अपनी जड़ नहीं जमा पायी है मुझे विश्वास है की तुम अपने आचरण से अपने पति के पुरुष होने के अहम् को ठेस नहीं पहुँचाओगी | " उमा ने मुझसे जो कहा उसमें एक गहरा मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा है | बोली ," दादा जी आज से आधी शताब्दी पूर्व आप जिस काल में तरुण थे उस समय और आज के भारत में जमीन -आसमान का अन्तर है | आज प्रत्येक पढ़ा -लिखा तरुण यह चाहता है कि उसे सुन्दर से सुन्दर पत्नी मिले जो कमाऊ हो ,जो उसे बाप होने का गौरव प्रदान करे ,घर का काम -काज सम्भाल ले और यदि घर में वृद्ध जन  हों तो उनकी सेवा भी करे | यह आपकी तरुणायी के काल में तो सम्भव था पर अब ऐसा होना कठिन लग रहा है |यदि पुरुष चाहता है कि नारी सुन्दर हो,शिक्षित और कमाऊ हो तो नारी भी चाहती है कि पुरुष सुन्दर हो ,शिक्षित हो और कम  से कम उसके जैसा कमाऊ हो | अब आप ही बताइये कि कुछ वर्षों के बाद अगर मैं ए ० डी ० सी ० हो जाती हूँ और मेरे पति जे ० बी ० टी ० टीचर ही बनें रहते हैं तो मेरा पुत्र बड़ा होकर क्या अपने पिता को वही सम्मान दे पायेगा जिसकी अपेक्षा समाज उससे करता है | मैं व्यक्तिगत रूप से आपको विश्वास दिलाती हूँ कि मैं पति की मर्यादा और आफ़ीसरी के बीच पूरा सन्तुलन बनाये रखूंगीं | पर फिर भी मानव प्रकृति के विषय में सुनिश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता | मुझे प्रणाम कर उमा उठने ही वाली थी कि न जानें क्यों मैनें उससे एक प्रश्न पूछ डाला | मैनें कहा ,"उमा तेरे नाम की भारतीय धार्मिक विधि -विधान में क्या सार्थकता है | | " उसने कहा ,"गुरू जी यह प्रश्न क्यों पूछ रहे हैं ?आप तो विज्ञान की बातें पूछा करते थे | " फिर हंसकर बोली उमा तो पार्वती है ,देवाधिदेव शंकर की पत्नी | मैनें बात को आगे बढ़ाया उमा का एक और नाम था याद आता है | उसने कहा गौरी मैनें कहा नहीं मैं अपर्णा की बात करता हूँ | जानती हो उमा का नाम अपर्णा कैसे पड़ा था ,तुलसीदास जी की रामायण पढ़ी है ? पार्वती ने प्रण किया था कि उनके जीवन का एक मात्र संकल्प देवाधिदेव महादेव को पति के रूप में प्राप्त करना है | गिरिराज किशोरी ने बहुत लम्बे काल तक बहुत कठोर तप किया ,अन्न छोड़ा ,फलों पर रहीं ,फिर फल छोड़ पत्तों पर रहीं | पत्त्ते यानि पर्ण फिर पत्ते भी छोड़ दिये तब उनका नाम अपर्णा पड़ गया |
                      " कोटि जनम लगि रगरि हमारी ,
                         वरो शम्भु नतु रहऊँ कुंवारी |"
                      जाते -जाते उमा बोली दादा ,मुझे इतनी कठिन परीक्षा से मत गुजारो इक्कीसवीं शताब्दी का पहला दशक समाप्त हो चुका है | मैं अपर्णा नहीं बन सकती | हाँ यह वादा अवश्य करती हूँ कि मेरी तरफ से पुरुष के अहंकार को चोट पहुंचाने की कोई पहल नहीं होगी पर मैं पत्थर की प्रतिमा नहीं हूँ जो मार पर मार सहती जाऊँ और बहुत मार खानें पर तो पत्थर की प्रतिमा भी टूट जाती है | कभी उनको आप के पास लाऊँगीं उन्हें भी पुराणों की एकाध किस्सा कहानी सुना देना जो नल ने दमयन्ती के साथ किया ,जो युधिष्ठिर ने द्रोपदी के साथ किया ,जो श्री राम ने सीता के साथ किया ,यह सब तो शायद उन्हें मालूम ही है पर जवाहर लाल जी का कमला के प्रति अनुराग ,जै प्रकाश जी का प्रकाशवती के प्रति अनुराग और आचार्य कृपलानी का सुचेता कृपलानी के प्रति अनुराग शायद वे न जानते हों | विदेशों की वे कहानियां जिसमें सम्राटो ने प्यार के लिये अपनी गद्दियां छोड़ीं उनसे भी उन्हें परिचित कराना आप जैसे शिक्षक से ही सम्भव हो सकेगा |
                                              फिर उसने झुककर मेरे चरण छूने चाहे ,मैनें सिर पर हाँथ रखकर  उसे आशीर्वाद दिया बोला रजत को गोद में नहीं लायीं ,उमा ने कहा कि वह नानी के पास है ट्रेनिंग के बाद पोस्टिंग हो जानें पर उसे लेकर दादा -दादी से आशीर्वाद लेने आयेगी |
                                              हमारी इस सारी बात -चीत के बीच विजय सिंह जी मूकद्रष्टा बनकर बैठे रहे | उठते समय बोले यह उमा का छोटा भाई रूद्र सिंह है बी ० टेक ० में फस्ट रैंक मिली है | झुककर रूद्र ने मेरे पैर छुये ,मैनें कहा बेटे जीवन का क्या भरोसा ? आते रहना क्या पता विजय की गौरव गाथा में एक और विजय ध्वज जुड़ जाय |  

Saturday, 16 September 2017

                               गन्ध अपनें में न तो आनन्द देनें का सकारात्मक भाव छिपाये है न नकारात्मक । गन्ध में उपसर्ग जोड़कर ही हम उसे सुरूपता  या कुरूपता  प्रदान करते हैं । गन्ध जब सुगन्ध बन जाती है तब सभी उसकी चाहना करते हैं और गन्ध जब दुर्गन्ध बन जाती है तो उससे दूर हट जानें का प्रयास किया जाता है । पर सुगन्ध और दुर्गन्ध इन दोनों भावों के अतिरिक्त गन्ध की और कोई ऐन्द्रिक अनुभूतियाँ भी न केवल संभ्भव हैं बल्कि चर्चा का ठोस धरातल प्रस्तुत करती हैं । हमारे प्राचीन कथा ग्रंथों में गन्ध मादन पर्वत का अनेक बार उल्लेख हुआ है । गन्ध में मादन जोड़कर एक नये भाव की श्रष्टि की गयी है । मादन में मदमस्त करनें का भाव है ,मदन से सम्बन्धित होनें के कारण मदन काम भावना का उत्प्रेरक  भी है और मादन  में शिथिल ,निष्क्रिय किन्तु आनन्द तरंगायित जीवन जीनें का भाव भी छिपा हुआ है । अंग्रेजी में टेनीसन की प्रसिद्ध कविता ( Lotous Eaters) में जिस खुमार भरी मस्ती को अभिप्रेत बनाया गया है कुछ वैसी ही मनोभूमि गन्ध मादन पर्वत की समतल चट्टानों ,चोटियों और उपत्यकाओं में अनुभूति के स्तर पर जीवन्त होती जान पड़ती हैं । ग्रीष्म की प्राण लेवा गर्मी के बाद जब बादलों की बक पंक्ति पहली तीब्र बौछारें  छोडती है तब नंगीं ,जलती धरती से जो गन्ध निकलती है उसे न तो सुगन्ध कह देनें से सार्थकता मिलती है और दुर्गन्ध कहनें का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता । उस गन्ध को व्यक्त करनें के लिये कौन से अनुप्रास ,विशेषण या लोकभाषा के शब्द लिये जांय इसपर गहरी खोज की आवश्यकता है । 'माटी ' की वह गन्ध सोंधीं है ,हिँगाई है ,अदरखी है ,कसैली है ,नशैली है या निमैली है यह ठीक से नहीं कहा जा सकता । शायद वह यह सब है और इस सबके अतिरिक्त भी और कुछ है । तभी तो 'माटी 'कभी मरती नहीं  जीवन की आदि का प्रतीतात्मक प्रस्तार मानी जाती है । उसके अपार रंग ,रूप और आकार हैं पर वह निराकार भी है क्योंकि उसमें मिलकर सभी आकार निराकार हो जाते हैं । गन्ध मादन पर्वत की गुफाओं में   रहनें वाले मुनि असित अपनें पास ज्ञान पाने की अभिलाषा लेकर आने वाले जिज्ञासुओं को कुछ ऐसा ही उपदेश देते रहते थे । यदि जिज्ञासु जीवन और मरण के प्रश्न पूछते तो  उनका संक्षिप्त उत्तर यही होता था कि 'माटी 'ही जीवन है और 'माटी 'ही मृत्यु है । अभी तक यह मेरा देश है और वह तुम्हारा देश है ऐसा भाव मानव जाति के मन में नहीं आया था । चन्दन है 'माटी ' मेरे  देश की जैसे गीत अभी नहीं लिखे जाते थे क्योंकि पूरी धरती ही अभी सबका देश थी सम्पूर्ण आकाश का प्रस्तार और सम्पूर्ण धरित्री का विस्तार अभी तक मानव जाति की साझा सम्पत्ति थी ।
                                गन्ध मादन की भौगोलिक स्थिति के विषय में सुनिश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता । वह एक स्वतन्त्र पर्वत श्रृंखला थी या किसी पर्वत श्रंखला का कोई विशिष्ट पर्वतीय क्षेत्र था इस विषय में भी परस्पर विरोधी विचार व्यक्त किये गये हैं । मैक्समूलर से लेकर राहुल सांकृत्यायन ,डा ० संकालिया और नयन ज्योति (लाहिरी ) सभी नें पूर्व वैदिक काल में भिन्न -भिन्न नामों से अभिहित भौगोलिक श्रंखलाओं ,क्षेत्रों और स्थानों को कोई ठोस  वैज्ञानिक आधार प्रदान करनें में सफलता नहीं पायी है । क्या पता गन्ध मादन में उन सोम लताओं की महक हो जिनसे रस का पान करना वैदिक आर्यों के लिये अन्तरसुख की पराकाष्ठा मानी जाती थी और क्या पता गन्ध मादन में भी कस्तूरी हिरण फिर रहे हों जो आजकल सिक्किम राज्य के ऊपर हिमालयी क्षेत्रों में मिळते हैं । जो कुछ भी हो  यह तो मान कर चलना ही चाहिये कि गन्ध मादन की ऊँचाइयों पर आस -पास के आदिवासी ग्रामों के युवक और युवतियाँ आनन्दोत्सव मनानें के लिये तो घुमक्कड़ के रूप में आते ही होंगें । असित मुनि नें गन्ध मादन की उपत्यिकाओं में स्थित एक दीर्घाकार गुफा को अपना निवास स्थान  क्यों बनाया इस पर भी कोई बहुत विश्वसनीय तथ्य प्रस्तुत नहीं किये जा सकते । गहरे चिन्तन के बाद भी मैं अभी तक बिल्कुल स्पष्ट ढंग से यह नहीं समझ पाया हूँ कि ऋषियों और मुनियों में क्या अन्तर होता है ?क्या हर ऋषि मुनि भी होता है ?या यों कहें कि क्या हर मुनि ऋषि भी होता है ?मुझे लगता है कि कहीं इस विभाजन के पीछे भी कोई वर्ण व्यवस्था या धर्म सम्प्रदाय व्यवस्था रही होगी । इन दिनों तो जैन सम्प्रदाय में ही मुनियों ,महा मुनियों और परम मुनियों का यशोगान जोर -शोर से सुना जाता है । तो असित मुनि ऋषभ परम्परा में से थे । मृगछाला को अधोवस्त्र के रूप में पहनकर वे कटि से ऊपर का भाग अनावरित ही छोड़ देते थे । वे अभी तरुण ही थे और उनका पुष्ट शरीर और बालों से ढका विशाल वक्ष ,लम्बी केशराशि और श्मश्रु देखनें वाले पर गहरा प्रभाव छोड़ते थे । उनके चेहरे पर तरुणाई और ज्ञान की ज्योति झलकती थी । शरीर का रंग श्यामल होनें के कारण ही उन्हें असित कहा जाने लगा था । जिन दिनों की यह बात है उस काल में संसार छोड़कर परम तत्व की खोज में जंगलों ,पहाड़ों और गुफाओं में पूजा ,याचना और भिन्न -भिन्न यौगिक क्रियायें करना ही जीवन का सर्वोत्तम लक्ष्य माना जाता था । सांसारिकता उपेक्षा की द्रष्टि से देखी जाती थी । ममत्व ,प्यार और लगाव इन सबको बन्धन के रूप में स्वीकृति मिली हुयी थी । मुनि असित भी सारी मोह रज्जुओं को काटकर जीव तत्व को अन्तरिक्ष में मुक्त रूप से भ्रमण करने योग्य बनानें के लिये प्रयत्न रत थे ।
                                                अब गन्ध मादन पर्वत के आस -पास घनें जंगलों में और उसकी निचली ढलानों की घनी सुगन्धित झाड़ियों में न जाने कितनें किस्म के वन्य पशु और पक्षी विचरण करते रहते थे । इनमें से कुछ वन्य पशु मांस जीवी भी होंगें पर अभी तक नर -मांस की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि प्रकृति नें उनके लिये भोले -भाले वन्य प्राणियों के रूप में विपुल सामिग्री जुटा दी थी । मन को मुग्ध करने वाला रूप रंग लेकर हिरणों की न जानें कितनी प्रजातियाँ वन्य क्षेत्रों में घूमा करती थीं । गन्ध मादन के केन्द्र क्षेत्र में कुछ ऐसी मादक वायु चलती थी कि उसके नशे से खिंचकर हिरणों के झुण्ड वहां चले आते थे । हिरणों के एक ऐसे ही झुण्ड में एक गर्भवती हिरणी भा आ गयी और उसी क्षेत्र में उसके प्रसव का समय भी आ गया । पर न जानें कहाँ से 10 -15  श्यामल और सुरमयी आदिवासी युवक -युवतियों की टोली वहां वसन्तोत्सव मनानें के लिये अपनें गीतों को ऊँचें स्वरों में गाती आ पहुंचीं । कइयों के हाथ में पशुओं की सींगों से बनी हुयी तुरहियां थीं ,कइयों के हाथ में पशुओं के खाल से मढ़े हुये डफ और डमरू थे । एक दो तो वक्राकार लकड़ियों को आपस में टकराकर संगीत का कुछ ऐसा ही स्वर निकाल रहे थे जैसे मंजीरों की झंकार से निकलता है । उनको देखते ही हिरणी की टोली भग  खड़ी हुयी । सन्तान को जन्म देनें वाली हिरणी नें आस -पास भयभीत नेत्रों से देखा और पाया कि नवयुवक और नवयुवतियाँ उसे घेरने को बढ़ रहे है । कुछ क्षण वह ठिठकी हो सकता है अपनें प्राणों की बाजी लगाकर वह अपनी सदयजाता सन्तान के पास खड़ी रहना चाहती हो । पर  फिर आत्मरक्षा का भाव सन्तान प्रेम पर प्रबल पड़ा और वह भगकर झाड़ियों की ओट में ओझल हो गयी । तब हिरण शावक पैरों पर उठकर खड़ा होनें की कोशिश कर रहा था । अब मस्त युवक - युवतियों ने उसे चारो ओर से घेर लिया । कहा नहीं जा सकता कि वे क्या करते -उसे उठा ले जाते या उसे वहीं छोड़ देते ताकि उसकी माँ उसे अपनें साथ आकर ले जाय । यह भी हो सकता था कि खिलवाड़ -खिलवाड़ में मृग शावक के प्राणों पर बन आये । वह आदिवासी युवक यदि मांसाहारी रहे  हो तो उस नन्हें मृग शिशु के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी खड़ी हो जाती । पर शायद ऐसा न भी होता क्योंकि उस समय कन्दमूल फल की इतनी प्रचुरता थी कि थोड़े परिश्रम से ही मुमुक्षा की शान्ति हो जाती थी जो भी होता यह सब  अनुमान मात्र ही है पर जो हुआ उसे सुखद ही कहा जायेगा । ठीक इसी समय असित मुनि वहां घूमते आ पहुंचें । उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व नें उस तरुण टोली पर अपना असर छोड़ा । बिना कुछ बोले वे मृग शिशु के पास गये और उसे अपनी गोदी में उठाकर अपनी गुफा की ओर चल पड़े । तरुण -तरुणियों की टोली खिलखिलाती हुयी डफ और तुरही बजाती हुयी दूसरी दिशा में चली गयी ।
                           उत्सव में पागल तरुण -तरुणियों की टोली के हटते ही माँ हिरणी फिर उस स्थल पर आयी । अपने नवजात शिशु को वहां न पाकर उसनें आसपास अपनी भोली सुन्दर आँखों से देखा और फिर न जाने कैसी वह जा गयी कि उसका शिशु किस ओर ले जाया गया है । प्रकृति नें माँ बननें की क्षमता के साथ ही साथ पशुओं और पक्षियों में कुछ ऐसी प्राणशक्तियाँ भी विकसित कर दी हैं जिनके सहारे वे अपनें शिशुओं के स्थान को पहचान लेते हैं  । हिरणी असित मुनि के गुफा के द्वार पर आ गयी । असित मुनि नें उसे देखा और द्वार पर उसके शिशु को ले आये । हिरणी नें शिशु को चाट -पोंछकर और अधिक सुथरा बना दिया यों वह सुन्दर तो थी ही । शिशु स्तन पान में जुट गया । असित मुनि पास खड़े रहे ,माँ हिरणी उनसे तनिक भी भयभीत नहीं हुयी उनकी आँखों में अपार वात्सल्य का भाव था । माँ हिरणी को जैसे एक रक्षक मिल गया हो । स्तनपान करने के बाद जब शिशु हिरणी के पीछे चलनें जाने को हुआ तो उसकी माँ नें अपनें मुंह से शिशु को प्यार भरा धक्का देकर असित मुनि की ओर जाने को प्रेरित किया । मुनि असित हिरणी के मन का भाव समझ गये । उन्होंने आगे बढ़कर हिरणी के पीठ पर भी वात्सल्य भरा हाँथ फेरा । हिरणी उछलती -कूदती दूर चली गयी । असित मुनि को विश्वास हो गया कि अपनें शिशु को संरक्षित पाकर हिरणी निश्चिन्त हो गयी है अब वह गुफा पर थोड़े -थोड़े अन्तराल के बाद आती रहेगी और शिशु को तबतक स्तन पान कराती रहेगी जब तक वह वन में में उग रही घास -पात खाना सीख नहीं जाता ।
                    हिरणी का मातृत्व तो सम्पूर्णतः सफल रहा पर मुनि असित के जीवन में चिन्तन के धरातल पर एक हड़कम्प मच गया । ध्यान करते समय शिशु हिरणी उनके पास बैठी रहती । वह बाहर घूमते तो उनके साथ उनकी टांगों को प्यार भरा स्पर्श देती हुयी साथ -साथ चलती । कुछ दिन बाद जब वह घास -पात खानें लायक हो गयी तो वह माँ हिरणी के साथ बाहर अवश्य जाती पर फिर शाम को माँ हिरणी उसे गुफा के द्वार पर छोड़ जाती और वह सारी रात गुफा में ही असित मुनि के पास गुफा में सोती रहती । शिशु हिरणी की प्यार भरी भोली आँखें ,उसका सुन्दर लचीला शरीर और उसकी मनमोहक उछल -कूंद असित मुनि के मन में एक गहरे लगाव का भाव पैदा करनें लगी । कुछ दिन बाद एक दिन शाम को जब वह माँ हिरणी के साथ कुछ देर में आयी तो उन्हें लगा कि उनकी गुफा में कुछ सूनापन है कि उनका मन ध्यान में नहीं लग रहा है । कि कोई भोला नन्हां प्राणी अब उन्हें एकटक पास बैठा देख नहीं रहा है और यह अनुभूति उनके मन में विचलन पैदा कर रही है । असित मुनि नें ' ओम नमो : अरिहन्त का कई बार पाठ किया । निश्चय किया कि वह मोह से ऊपर उठेंगें और नन्हीं हिरणी जब अपनें पैरों पर खड़ी हो गयी है तो उसे माँ के साथ ही रहनें के लिये विवश करेंगें । वह टोली में रहना सीखे यही हिरण प्रजाति का प्रकृति द्वारा बनाया हुआ भाग्य है । उनके शिकार तो होते ही रहेंगें । क्या किया जा सकता है । अगले दिन जब माँ हिरणी उसे अपने साथ गुफा के द्वार तक लायी तो उन्होंने मुँह दूसरी ओर कर लिया और बेरुखी का भाव दर्शाया पर शिशु हिरणी उनके पीछे खड़ी होकर उनकी टांगों पर अपनें मुँह से प्यार भरा स्पर्श देने लगी । वह हटनें का नाम ही नहीं ले रही थी । माँ हिरणी नें कुछ देर तक प्रतीक्षा की फिर वह छलांगे  लगाकर वन में छिपी अपनी टोली में पहुँच गयी ,शिशु हिरणी वहीं खड़ी रही । असित मुनि का मन मुलायम होने लगा । चलो आज रात रख लेते हैं कल शाम से तो कतई नहीं आने देंगें । अगले दो -तीन दिन तक यही द्रश्य चलता रहा अन्तर इतना था कि हर शाम वह ज्यादा लम्बे समय तक मुँह उल्टा किये खड़े रहते ,धीरे -धीरे मुँह से दोहराते नहीं नहीं माँ के पास जाओ पर शिशु हिरणी थी जो अपने पोषक पिता के पास से जाने का नाम ही नहीं लेती । प्यार किसे कहते हैं इसका अनुभव अभी तक असित मुनि को नहीं हुआ था । इस शिशु हिरणी नें उन्हें सबसे पहली बार प्यार की अनुभूति प्रदान की । असित मुनि हारने लगे । लगभग दस एक दिन के बाद उन्होंने स्वप्न में देखा कि उनके मत के आदि गुरू ऋषभ  मुनि तारा पथ से उतरकर उनकी गुफा में आये और फिर उन्होंने असित मुनि के पास बैठे शिशु हिरणी की पीठ पर वात्सल्य भरा हाँथ रखा । उनकी नीन्द खुल गयी ,उन्होंने फिर दोहराया ॐ नमो अरिहन्त । एक बार फिर सोचा क्या मैं माया में फंस रहा हूँ और तय किया कि वे मोह के रज्जु काट देंगें । कुछ भी हो जाय वे अब शिशु हिरणी को गुफा में नहीं आने देंगें । अगली शाम जब माँ हिरणी उसे छोड़ने आयी तो उन्होंने मुँह तो पीछे किया ही पर बार -बार अपना दायां हाँथ पीछे चलाकर शिशु हिरणी को अपनी माँ के साथ जानें को विवश करते रहे । शिशु हिरणी कभी दूर खड़ी माँ के पास जाती फिर लौटकर उनकी टांगों पर पीछे से मुंह चलाकर प्यार भरा स्पर्श देती । इस प्रकार लगभग आधा पहर बीत गया । अन्धेरा घना होनें लगा । गुफा द्वार असित मुनि नें रोक ही रखा था । उधर माँ हिरणी अन्धेरे के डर से भगकर जाने लगी तो शिशु हिरणी भी उसके पीछे चल पडी । पर अभी कुछ ही समय बीता होगा जंगली कुत्तों के भूकनें की आवाज आयी । असित मुनि ध्यान पर बैठे ही थे कि गुफा के द्वार पर हाँफती भयभीत आँखें लिये और अपने पृष्ठ भाग में रक्त की बूँदें टपकाती उनकी शिशु हिरणी गुफा द्वार पर खड़ी दिखायी दी । जंगली श्वानों का दल इस उपत्यिका में उनके डर से नहीं आता था इसलिये अब शिशु हिरणी को प्राणों का ख़तरा नहीं था । असित मुनि उठकर गुफा द्वार पर आये अपनी हिरण पुत्री की आँखों को देखा । उन आँखों में इतनी अपार करुणा थी कि उनका निश्चय ढीला पड़ गया । जीव रक्षा ही तो अरिहन्त धर्म का सबसे समर्थतम सिद्धान्त है । उस रात स्वप्न में ऋषभ देव नें शिशु हिरणी पर वात्सल्य भरा हाँथ फेरा था । मैनें उसका गलत अर्थ लगाया ,उन्होंने मोह रज्जु काटनें की बात नहीं कही थी उन्होंने मोह रज्जु का सहारा लेकर  ऊपर उठनें की बात कही थी । मोह बांधता ही नहीं मुक्त भी करता है । अपनों के लिये ,अपनी सन्तान के लिये किया हुआ हमारा त्याग हमें उदार बनाता है । हम स्व से उठकर पर के लिये जीना सीखते हैं और उस पर में स्व की झांकी पाते हैं और फिर धीरे -धीरे परिवार का त्याग ही सामाधि ,राष्ट्र और मानवता के लिये त्याग करनें की प्रेरणा देता है । यही तो अरिहन्त दर्शन है । यही तो ऋषभ देव का सन्देश है ,उठकर उन्होंने अपना  वात्सल्य भरा हाँथ शिशु हिरणी की पीठ पर फेरा ,एक छोटा घाव उसकी पूँछ  पर था पर फिर भी वह उछलकर उनके पास आ खड़ी हुयी । असित मुनि के मन में करुणा की गंगा बह उठी । उन्होंने प्यार से शिशु हिरणी को वहीं गुफा में बैठने को कहा और स्वयं गुफा में रखे एक दण्ड को उठाकर बाहर निकल गये । कुछ औषधि गुण से भरी पत्तियाँ लानी होंगीं जिन्हें कुचलकर उस छोटे घाव को भरा जा सकेगा । असित मुनि इस उपचार से प्रभावी रूप से परिचित थे और उन्हें विश्वास था कि उनकी हिरण पुत्री अब एक लम्बा संरक्षित जीवन जियेगी ।
                               जब वे एक लता झालर से पत्तियाँ चुन रहे थे तो उन्होंने देखा कि उनके पास से सुरमयी रंग की एक सलोनी आकर्षक रंग की युवती उनकी ओर प्यार भरी द्रष्टि से देखती हुयी निकल गयी । इस युवती को आस -पास की लताओं के बीच कई बार देखा था पर आज तक उसके आकर्षक नेत्रों नें उनका ध्यान कभी नहीं खींचा था । पर आज इस अँधेरे में भी उस नवयुवती का आकर्षण उन पर जादू कर गया । पहली बार उन्होंने प्यार के कई रूपों की छवियाँ मानस पटल पर देखीं । कौन जाने हिरण पुत्री के लिये किसी मानसी माँ की तलाश शुरू हो जाय ?निर्मल प्यार की नौका पर सवार हुये बिना क्या यह भवसागर पर किया जा सकता है ।










Friday, 15 September 2017

                                                         संस्कृत से दूध जलेबी तक
                 पण्डित दीना नाथ ने संस्कृत साहित्य में डाक्टरेट की | सौभाग्य से उसी समय उ ० प्र ० के रायबरेली के फिरोजगांधी महाविद्यालय में संस्कृत प्रवक्ता की एक पोस्ट खाली हुयी | अपने गुरु और रिसर्च गाइड अंबरीष शास्त्री की सिफारिश के बल पर वे इण्टरव्यूह में सेलेक्ट कर लिये गये | डा ० दीनानाथ का व्याह तो हो चुका था पर अभी तक कोई सन्तान न थी | महाविद्यालय परिसर में क्वार्टर न मिलने के कारण उन्होंने किराये पर एक मकान ले लिया | मध्यम वर्गीय जीवन चल निकला | संस्कृत प्रवक्ताओं को ट्यूशन और कोचिंग से अधिक आमदनी नहीं हो पाती | इसलिये वह विज्ञान और अंग्रेजी के प्राध्यापकों से मन ही मन थोड़ा -बहुत खिन्न रहते हैं | डा ० दीनानाथ भी वेद और शास्त्रों की महिमा और संस्कृत साहित्य के अमर गौरव की बातें करते न थकते थे ,इसमें कोई शक नहीं कि संस्कृत पर इनका अच्छा अधिकार था | पर बोलचाल की भाषा न होने के कारण संस्कृत के विद्वान को   गौरव  गोष्ठियों में ही मिल पाता है | समय पाकर प ० दीनानाथ के दो पुत्र हुये श्री धर बड़ा था और हलधर उससे तीन वर्ष छोटा | बच्चों की मां सद्ग्रहणी थी ,घर के काम -काज और पूजा -पाठ में लगी रहती थी | घर की सफाई के लिये एक अंशकालिक महरी लगा ली गयी थी | श्रीधर जब पांच वर्ष का हुआ तो उसकी शिक्षा -दीक्षा प्रारम्भ हुयी | वह पढनें -लिखने में बहुत तेज था , हर वर्ष अपनी कक्षा में प्रथम आता | इनाम पर इनाम इकठ्ठे होते चले गये | पण्डित दीनानाथ को गर्व था कि उनका लड़का उनकी ख्याति को चतुर्दिक फैला देगा | पर छोटा लड़का हलधर श्रीधर से बिल्कुल उल्टा था बड़ी मेहनत के बाद बस इम्तहान भर पास कर पाता था | समय तो निरन्तर गतिशील है देखते -देखते 10 वर्ष निकल गये | श्रीधर अब कालेज का टॉपमोस्ट विद्यार्थी था और हलधर हाईस्कूल में फेल होकर दुबारा इम्तिहान की तैय्यारी कर रहा था | भगवान् का भी कैसा विचित्र  विधान है दोनों सन्तानें मां बाप के संयोग से जन्मी थीं पर दोनों की प्रतिभा अलग -अलग थी | श्रीधर ऊंची साहित्यिक बातें करता था और हलधर अलग -अलग किस्म की मिठाई खानें में लगा रहता था | कई बार वह अपने एक दोस्त जिसके पिता मिठाई की एक दुकान करते थे के पास चला जाता था और वहां मिठाइयों के सम्बन्ध में जानकारी इकठ्ठा करता और मित्र की मित्रता के बल पर उनका स्वाद भी चखा करता था | अर्ध दशक की कड़ी मेहनत के बाद श्रीधर सबार्डिनेट सर्विसेस का इम्तहान पास कर गया और नायब तहसीलदार के नाते उसकी नियुक्ति हो गयी | डा ० दीनानाथ ने चारो ओर कहना शुरू किया कि थोड़े ही दिनों में श्रीधर तहसीलदार हो जायेगा फिर डिप्टी कलक्टर और उसे कलक्टर बन कर रिटायर होना है | घर में खुशियां फ़ैल गयीं और बड़े -बड़े घरों से सम्बन्ध आने प्रारम्भ हो गये | हलधर दूसरी बार भी हाईस्कूल में गणित में रह गया | पण्डित दीनानाथ बहुत नाराज हुये बोले तू क्या करेगा ,ठेला लगायेगा ,अपने भाई को देख तूने घर की इज्जत चौपट कर दी ,लोग कहते हैं कि प ० दीनानाथ का दूसरा लड़का गुन्डू है | विचारा हलधर बिना बोले सब कुछ सहता रहता | आखिर उसके पिता की बातों में सच्चाई  तो थी ही | क्या करे उसको  गणित भी नहीं आती | दुकान भी कोई खुलवायी जाय तो हिसाब -किताब में गड़बड़ी करेगा | निराशा भरे क्षणों में वह अपने दोस्त श्रीदत्त के पास चला जाता और जब श्री दत्त के पिता घर होते और श्री दत्त मिठाई की दुकान पर होता तो वह मिठाई की दुकान पर भी बैठ जाता | उसके दोस्त ने उसे बताया कि पहले उसकी दुकान का पेड़ा बहुत चलता था पर अब लोग जलेबी ज्यादा खानें लगे हैं पर रायबरेली में अच्छी जलेबी बनाने वाले हैं ही नहीं | लखनऊ के मोटेमल हलवाई की जलेबी जो एक बार खा लेता है जिन्दगी भर नहीं भूलता | उस दिन हलधर जब अपने घर आया  तो वह किसी गहरी सोच में पड़ गया उसने अपने पिता से कहा कि वह लखनऊ जायेगा ,उसके पिता ने उसे डांट लगाई क्या करेगा लखनऊ जाकर ,झाड़ू लगायेगा | मेहनत करके हाई स्कूल पास करे कहीं चपरासी -अपरासी लगा देंगें | हलधर ने अपनी मां के पास रोकर कहा कि उसे 500 रुपये दे वह दो तीन दिन में लखनऊ में नौकरी तलाश करके कोई छोटा -मोटा काम कर लेगा ,यदि न मिला तो वापस आ जायेगा | माँ की ममता तो अपार होती है | वैसे हलधर छोटा होने से मां को अधिक प्यारा था | श्रीधर बड़े भाई में कुछ बड़प्पन का भाव आ गया था | यद्यपि उसके भारतीय संस्कार उसे विनम्र बनाये रखते थे | मां से 500 रुपये लेकर हलधर लखनऊ में मोटामल की दुकान पर  पहुंचा | मोटामल के पास दो -तीन नौकर थे ,पर एक नौकर बड़ा कामचोर था ,कई दिन से काम पर नहीं आ रहा था | कड़ाही पूरी तरह साफ़ नहीं होती थी क्योंकि दूसरे नौकर कड़ाही की सफाई के काम को इतना अच्छा नहीं जानते थे जितना कि वह कामचोर नौकर | मोटामल ने हलधर से कुछ घर की बातें पूछीं जान लिया कि लड़का अच्छे घर का है ,चोरी- चकारी नहीं करेगा | फिर बोला कढ़ाई साफ़ कर लोगे | हलधर सब कुछ करने को तैय्यार था , वह जानता था कि पढ़ाई में अब वह आगे नहीं बढ़ सकता पर जिन्दगी में कुछ करके अवश्य दिखलायेगा | उसने हमीं भरी मोटेमल ने कहा अच्छा ठीक है अन्दर और नौकरों के साथ बैठो शाम को कढ़ाई साफ़ करके दिखाना | उस शाम हलधर कढ़ाई की सफाई में डेढ़ -दो घण्टे लगा रहा | ,वह काफी बड़ी कड़ाही थी वैसे तो और भी कढाइयाँ  थीं पर कई कढ़ाइयों से होकर इस बड़ी कढ़ाई के जलाव में जलेबी को विशेष स्वाद देने के लिये डाला जाता था | मोटामल काम देखकर बहुत खुश हुआ ,शाबासी दी बोला बताओ रहोगे कहाँ | हलधर ने कहा दुकान पर ही सो लेगा और पास के सड़क के ढाबे में खा आया करेगा | मोटामल ने उसे रोज के 100 रुपये और 200 ग्राम जलेबी देने पर नौकर रख लिया |
                                     इधर श्रीधर की शादी तय हो गयी | लड़की अभी एम ० ए ० के फाइनल में थी इसलिये शादी की तिथि फ़ाइनल इम्तहान  होने के बाद की तय की गयी | हलधर को अपने दोस्त के द्वारा सारी सूचना मिल जाती थी | उसके दोस्त नें उससे कहा कि पड़ोस में एक मिठाई की दुकान खाली होनें वाली है उसके पिता उसे खरीदना चाहते हैं | अगर हलधर तबतक काम सीख जाता है वही हमारे पास आकर यहीं रायबरेली में ही अपनी दुकान चला ले | हलधर भले ही हाई स्कूल न कर पाया हो पर अब उसने बड़े गौर से जलेबी बनाने की प्रतिक्रिया को देखनें -समझनें की कोशिश की | किस तरीके से और कितनी देर तक मैदा फेटी जायेगी उसमें और क्या -क्या मिलाया जायेगा | किस ब्राण्ड के शुद्ध घी का इस्तेमाल होगा | कितनी देर तक जलेबी घी कढ़ाई में रहेगी | जलेबी के वर्तुल आकार को किस तरीके से खूबसूरत बनाया जाय | उसके रंग को निखारनें के लिये क्या कुछ और अतिरिक्त समिश्रण की आवश्यकता है | बड़ी कडाही  में जलाव किस मात्रा में और कितनी मिठास का बनेगा और उसमें गर्म शुद्ध घी की महक लिये हुये चक्राकार जलेबी कितनी देर तक भिगो कर रखी जायेगी फिर यदि सारा माल हाथ के हाथ नहीं बिक जाता तो उसका संरक्षण कैसे किया जायेगा ताकि उसके स्वाद में कोई कमी न आये | चार महीनें के कठिन परिश्रम , घोर ईमानदारी और सीखने की तीव्र अन्तर इच्छा ने हलधर को पक्का जलेबी एक्सपर्ट बना दिया | मोटेमल का माल हांथो हाँथ बिक जाता था | जलेबी निकलने से पहले ही ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी | कइयों को लम्बा इन्तजार करना होता था | मोटेमल ने दुकान के पास एक अलग भट्टी पर अपने लड़के सोने लाल को भी गर्म दूध की कडाही के साथ बिठा रखा था | मलाई पड़ा हुआ दूध और मोटेमल की चक्राकार जलेबियाँ सुबह के लिये एक बहुत अच्छा नाश्ता मानी जाती थीं | डा  ० दीनानाथ को हलधर के विषय में जानकारी करने के लिये श्री दत्त के पिता से मिलना पड़ा | यह जानकर कि वह जलेबी की दुकान पर कढ़ाई मांज रहा है डा ० दीनानाथ झल्ला गये | घर आकर हलधर की मां से लड़ाई की बोले तुमनें पैसे देकर लड़के को बर्बाद कर दिया | अब दुनिया कहेगी डा ० दीनानाथ का लड़का हलवाई की दुकान पर कढ़ाई मांजता है | मैं तो मुंह दिखाने लायक नहीं रहा | हलधर की मां ने धीरे से कहा कमा कर खाता है चोरी तो नहीं करता | देख लेना एक दिन हलधर हमारे लिये सहारा बनेगा | कभी -कभी मोटामल जब अस्वस्थ होते तो दुकान में आकर गद्दी पर बैठ जाते और जलेबी बनाने का पूरा काम हलधर करता था और उसकी बनी हुयी जलेबी मोटामल की जलेबी से कम नहीं मानी जाती थी |जैसे -जैसे हलधर का हाँथ साफ़ होता गया वह और बढ़िया कारीगर बनता गया | अब ग्राहक मोटामल की जलेबी पसन्द न करके हलधर के हाँथ की जलेबी मांगनें लगें | मोटेमल ने सोचा कि यह लड़का तो उसे बाजार में नाकामयाब कर देगा | इसलिये उसने हलधर से कहा कि वह अपना और कहीं इन्तजाम कर ले |
                                                हलधर यों तो हाई स्कूल पास नहीं कर पाया था पर उसने अंग्रेजी का एक वाक्य या कहावत सुन रखी थी | " God helps those who helps themselves ." हलधर ने अपने दोस्त श्रीदत्त से मुलाक़ात की जैसा कि पहले कहा जा चुका है पास वाली दुकान को श्रीदत्त के पिता ने खरीद लिया था | श्रीदत्त के पिता जलेबियाँ नहीं बनाते थे बाकी और सब मिठाइयां बनाते थे ,उनका पेड़ा तो सारे शहर में मशहूर था | हलधर ने श्रीदत्त की मदद से पास की दुकान में जलेबी का काम शुरू किया साथ में ताजा दूध मलाई चढ़ाकर जलेबी के साथ लेने के लिये लोगों में नाश्ते की नयी आदत डालने की कोशिश की |  अच्छी और शुद्ध चीज सभी को भा जाती है | हलधर का काम चल निकला ,उसने श्रीदत्त के पिता को जो किराया जो माँगा देना शुरू कर दिया | खर्च निकालकर उसे  शुरू में दो तीन सौ रुपये प्रतिदिन की बचत होने लगी | लखनऊ से कुछ नयी बातें भी सीख आया था | उसने अपनी जलेबी और दूध के प्रचार के लिये पर्चे छपवाये और अखबार के हॉकरों को कुछ पैसे देकर उन पर्चों को घर -घर पहुंचाया | जो भी हलधर के  दुकान की जलेबी खाकर उसका दूध पी गया वह वह फिर हमेशा के लिये हलधर का ही हो जाता था | दुकान पर इतनी भीड़ होने लगी कि उसने सफाई और दूसरे कामों के लिये दो लड़के लगा लिये | अब सारे शहर में हलधर की जलेबी और दूध ,श्रीदत्त का पेड़ा मशहूर हो गया | बड़े भाई श्रीधर की कुल तनख्वाह कुल मिलाकर 2000 रुपये पड़ती थी हलधर ने पाया कि वह नौकरों का खर्च निकालकर 1000 रुपये की आमदनी प्रतिदिन करने लगा | काम बढ़ाने के लिये वह शहर के मुख्य मार्ग पर दुकान की तलाश करने लगा | हर रोज की आमदनी बैंक में जमा करने लगा | डा ० दीनानाथ अभी तक हलधर की दुकान पर नहीं गये थे पर धीरे -धीरे उन्होंने अपने कालेज के साथी प्राध्यापकों से हलधर की जलेबी और दूध की तारीफ़ सुनी पर उनका आभिजात्य का अहंकार अपने बेटे को हलवाई बना देखकर चोटिल हो रहा था | इधर श्रीधर की शादी की तारीख निकट आ रही थी ,चढ़ावे के लिये पूरी उत्तर प्रदेशीय परम्परा में सोने के बनें कुछ गहनें बनवानें आवश्यक होते हैं | सोना 30 -31  हजार 10 ग्राम की ऊंचाई पर चल रहा था , जेवरों की कीमत लाखों में पहुँच रही थी | श्रीधर के पास अभी इतना पैसा नहीं था | डा ० दीनानाथ ने अपने प्रावीडेन्ट फण्ड से लोन लेने के लिए अप्लाई कर दिया | शिवदत्त के द्वारा यह सूचना हलधर को मिली | हलधर उस शाम घर पहुंचा , मां के पास बैठकर डरता -डरता पिता का इन्तजार करने लगा | जब पिता जी आये तो उसने पैर छुये पर डा ०   दीनानाथ ने उससे बातचीत नहीं की | हलधर ने मां को बताया कि पिताजी को लोन लेने की जरूरत नहीं है , जेवरों के लिए जो पैसा लगेगा मैं दूंगा | फिर वह अपनी दुकान पर चला गया | उसकी दुकान पर अब 5 -6 नौकर काम करते थे और सुबह 6 बजे से दिन को 10. 30 बजे तक सड़क पर  भीड़ खड़ी रहती थी | हलधर की मां ने रात को यह बात अपने पति दीनानाथ को बतायी | डा ० दीनानाथ चकित रह गये , हे भगवान् हाई स्कूल पास न करने वाला भोंदू 50000 /-रुपये का आदमी बन गया | मां ने कहा हलधर कहता था कि उसने एक नयी दुकान देखी है वहां पर अपनी नयी ब्रांच खोलेगा | अब नयी प्रकार की मशीन आ गयी है | जिनसे बहुत गोल खूबसूरत जलेबियाँ निकाली जा सकती हैं | जलाव में भी कुछ पौष्टिक रसायन मिलाये जाते हैं | अब पेड़े बर्फी का संसार सूना होने लगा है और जलेबी का संसार बसने लगा है | फिर डा ० दीनानाथ की पत्नी ने कहा देखा मेरा भोंदू हलधर तुम्हारी पंडिताई को मात कर गया | भगवान ने चाहा तो एक दिन आपको हलधर ही गौरव के शिखर पर बिठा  देगा | श्रीधर की अफसरी ससुराल के बंधनों से घिर जायेगी पर हलधर आखरी सांस तक हमारी सेवा करेगा | मैं उसके लिये कोई एम ० ए ० फेमें बहू नहीं लाऊंगी ,बढ़िया भोजन बनाने वाली ,गृहस्थी चलाने वाली सामान्य घर की ब्राम्हण कन्या हमारे घर का श्रृंगार बनेगी | फिर हंसकर बोली पण्डितजी एक काम करो हलधर की दुकान पर जाकर उसे आशीर्वाद दे आओ और कह देना की उसकी मां ने जलेबी और दूध मंगाया है | सारी जिन्दगी बाजी जीतने वाले डा ० दीनानाथ अपने भोंदू लड़के से बाजी हार गये |