मोर चाल
कैसे कहूँ
जो कुछ है सब का सब बिल्कुल स्वदेशी है
जब कि वातायन मन -कक्ष की प्रतीक्षा रत
अनुदिन अगवानी करते हैं मुक्त वायु की
कैसे कहूँ
तट पर ठिठक कर रुकेगी बुद्धि
जब कि अनुक्षण है रहस्य कहीं खुल रहा
व्यर्थ हो न जाये कहीं घड़ियाँ इस आयु की |
मृत्तिका पिण्ड ---भूमण्डल जिसे कहते हैं
साँझी विरासत है गोरों की कालों की
पीताभ गालों की , घुँघराले बालों की
चित्रित दीवारें गिरि -खोहों की साक्षी हैं
कारा -बद्ध मानव मन अति मुक्ति - कामी था
पितर हमारे भूगोल गढ़ते थे नया
सीमा - तोड़ आदि पुरुष यायावर नामी था
क्षितिज के पार झाँक पानें की जिज्ञासा
धरती से मंगल तक उड़ कर क्या हारी है ?
तुमको मुबारक हो ' स्वास्तिक ' की परम्परा
मेरी तो धरती यह सारी की सारी है |
मेरा स्वदेशीपन मात्र एक चाप -खण्ड
विश्व- मानवता का वृत्त भर देने को
मात्र एक पद - टेक , सजी बजी सिद्धि - सीढ़ी
जिस पर खड़ा हो नील नभ मुझे छूना है |
तुम मुझे तल की ओर
बीते हुये कल की ओर
शीर्षासन करनें को स्वधर्म बतलाते हो
मैं इसे राष्ट्र - घाती पशुवृत्ति कहता हूँ
दभ्भ कोलाहल मेँ मोर चाल चल लो तुम
निर्णय पर मेरा भविष्य के हाथ है |
कैसे कहूँ
जो कुछ है सब का सब बिल्कुल स्वदेशी है
जब कि वातायन मन -कक्ष की प्रतीक्षा रत
अनुदिन अगवानी करते हैं मुक्त वायु की
कैसे कहूँ
तट पर ठिठक कर रुकेगी बुद्धि
जब कि अनुक्षण है रहस्य कहीं खुल रहा
व्यर्थ हो न जाये कहीं घड़ियाँ इस आयु की |
मृत्तिका पिण्ड ---भूमण्डल जिसे कहते हैं
साँझी विरासत है गोरों की कालों की
पीताभ गालों की , घुँघराले बालों की
चित्रित दीवारें गिरि -खोहों की साक्षी हैं
कारा -बद्ध मानव मन अति मुक्ति - कामी था
पितर हमारे भूगोल गढ़ते थे नया
सीमा - तोड़ आदि पुरुष यायावर नामी था
क्षितिज के पार झाँक पानें की जिज्ञासा
धरती से मंगल तक उड़ कर क्या हारी है ?
तुमको मुबारक हो ' स्वास्तिक ' की परम्परा
मेरी तो धरती यह सारी की सारी है |
मेरा स्वदेशीपन मात्र एक चाप -खण्ड
विश्व- मानवता का वृत्त भर देने को
मात्र एक पद - टेक , सजी बजी सिद्धि - सीढ़ी
जिस पर खड़ा हो नील नभ मुझे छूना है |
तुम मुझे तल की ओर
बीते हुये कल की ओर
शीर्षासन करनें को स्वधर्म बतलाते हो
मैं इसे राष्ट्र - घाती पशुवृत्ति कहता हूँ
दभ्भ कोलाहल मेँ मोर चाल चल लो तुम
निर्णय पर मेरा भविष्य के हाथ है |
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