........... कट्टर साम्यवादी दर्शन आज के युग में विकलाँग हो गया है क्योंकि मनोविज्ञान और समाज शास्त्र की अधिक ठोस खोजों नें सर्वहारा के सम्पूर्ण अधिपत्य वाले सिद्धान्त को अवैज्ञानिक और अव्यवहारिक साबित कर दिया है । हाँ ऐसी विश्व व्यवस्था बनायी जा सकती है जिसमें धरती का प्रत्येक नर -नारी जीवन यापन के उस निम्नतर स्तर तक लाया जा सके जो उसके युग की विज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों से संभ्भव हो सकेगा । हमारा अनुभव है कि हर सबल ,समर्थ , और सफल उद्योगपति ,व्यापारी ,नेता या हुनरमंद केवल भ्रष्टाचार के बल पर ही ऊंचाई नहीं पाता । बहुत से ऐसे भी हैं जो अपनी भीतरी ताकत और मजबूत इरादों की कुब्बत से आर्थिक दौड़ में आगे निकल जाते हैं । हाँ ऐसे लोग भी बहुत हैं जो भीतर से खोखले हैं लेकिन सम्बन्धों या परिस्थितियों की अनुकूलता उन्हें ऊंचाई पर बिठा देती है । इस संसार का ताना -बाना इतना जटिल है कि कोई भी राजनैतिक व्यवस्था सारी मानव जाति को संतुष्ट कर दे ऐसा संभ्भव ही नहीं है । इतिहास में ऐसे मोड़ भी आते हैं जब चकाचौंध कर देने वाली झूठी विचारधारा किसी राष्ट्र का मन मोह लेती है । आखिरकार हिटलर जर्मनी की जनता की बाँह पकड़ कर ही खड़ा हुआ था । माटी यह नहीं मानती कि संसार में कोई भी रेस ,जाति या देश या क्षेत्र अपनें में सर्व गुण संपन्न है और विधाता नें उसे विशेष ढंग से गढ़ा है । हम असमानता में समानता और समानता में असमानता लाकर एक ऐसे सहनशील समाज का निर्माण करना चाहते हैं जिसमें व्यक्ति की विशेषताओं का सम्मान हो पर सामन्य ,साधारण नागरिक भी सम्मान पूर्वक जीने का अधिकारी हो । घृणा का दर्शन खूनी दरवाजे की ओर ही ले जाता है । जब विश्वाश टूट जाता है तो उसमें मानव मूल्यों का विधान ढीला पड़नें लगता है । घृणा का यह दर्शन यदि बढ़ता चला गया तो कब और कैसे मानव फिर से दो पैरों पर चलनें वाला नर पशु न बन जाय कहा नहीं जा सकता । 'माटी 'तो असीम आकाश की नीलाभ छाया में माँ धरित्री की गोद में पलते हर देश ,हर वर्ग ,हर रंग ,और हर प्रजाति के नर -नारियों को बुद्ध और गाँधी ,महावीर और नानक द्वारा दिया गया प्यार और भाई चारा का सन्देश ही पहुँचाना चाहेगी ।
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