Friday, 29 November 2019

                    बुढ़ापे की ललकार 

शाम को या यों कहो शाम होने के आसार होते ही मेरा मन भ्रमण के लिये मचल उठता है | प्रातः ऊषा पूर्व घूम आने का सुख स्वास्थ्य सुधार के साथ भी जोड़ दिया गया है इसलिये सेवावृत्ति से अपनी रोटी जुटाने वाले बुद्धिजीवियों के लिये वह एक अनिवार्यता ही है | पर शाम के भ्रमण का सुख सभी नहीं उठा पाते | मैं भी सेवानिवृत्ति के बाद ही इस सुख का अधिकारी बन पाया हूँ | दिल्ली जैसे बड़े शहरों में तो घूमने के लिये बड़े -बड़े पार्कों की व्यवस्था है | हौज ख़ास में रहते हुये मैं  अक्सर रोज गार्डेन या डियर पार्क की ओर निकल जाय करता था | हाँ , कभी -कभी पंचशील पार्क के ऊँचे नीचे रास्ते भी मुझसे पददलित होते रहते थे | पांच छह वर्षों के बाद कुछ दिनों सरोजनी नगर रहने का मौक़ा मिला तो वहां से संजय लेक पार्क या मुबारक कोटला के पूर्वी किनारे पर स्थित त्याग राज पार्क में चक्कर लगाने का सहज सुख मिलता रहा | फिर मन में आया क्यों न कुछ दिन यू ० पी ० ए ० की चेयर परसन श्रीमती सोनिया गांधी के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली में रहकर काटे जांय | लाल गंज में बैंक आफ बड़ौदा में अधिकारी के रूप में मेरे पुत्र की नियुक्ति मेरे लिये ऐसा सुअवसर ले आयी थी | परिवार के लिये उसने रायबरेली में ही रहने का प्रबन्ध कर रखा था | मैनें बहुतों से पूछा कि शहर में घूमने के लिये क्या कोई बाग़ बगीचे हैं | तो सबका एक ही उत्तर था कि इन्दिरा उद्यान में ही जाकर घूमा जा सकता है | बाकी तो छोटा शहर है दोनों कोनें एक घण्टे में छुए जा सकते हैं और फिर तो खेत ही खेत हैं | इधर भी सांई नदी और उधर भी साई नदी | वर्तुलाकार चक्र के बीच स्थित रायबरेली का नींद के झोंके लेता छोटा शहर | कानपुर और लखनऊ रोड पर वाहनों की भरमार | बघ्घी ,रिक्शे ,घोड़ा ठेले ,स्कूली मिनी बसें और दुपहिये वाहन | यह पूछने पर क्या कोई दर्शनीय स्थल भी है बताया गया कि शहर के दक्षिणी छोर पर साईं नदी के पार मुन्शी गंज में शहीद स्मारक है जहां स्व ० राजीव गांधी ने कदम्ब का पौधा रोपा था | वहां भारत माता का भवन निर्माण करवाया गया है और आस -पास कुछ पेंड़ पौधे लगाकर साज -सज्जा की गयी है | उस दिन शाम हाँथ में छड़ी लेकर मैं शहीद स्मारक देखने चल पड़ा | अमरीशपुरी से साईं नदी के पुल तक पहुंचने में चालीस पैतालिस मिनट लगे | पुल पार किया अंग्रेजी जमानें के बनें उस पुल में पत्थर के बड़े -बड़े खम्भों पर मजबूत टीन के चादर डालकर एक छह फुटी निकलने का रास्ता बना दिया गया है | स्मारक की साज -सज्जा करते समय पुल पर भी कुछ रेलिंग लगा दी गयी है और बैठने के लिये पत्थर की कुछ बेन्चे भी स्थापित की गयी हैं | पुल पर खड़े होकर नीचे बहते चक्करदार प्रवाह को देखना मन को अच्छा लगा | पुल को पार कर ऊबड़ -खाबड़ कटानों से होता हुआ भारत माता का भवन देखा फिर उसके बाद शहीद स्मारक और आगे जाते हुये मुन्शी गंज मार्ग पर साज -सज्जा की दस्तकारी ने प्रभावित किया | स्मारक के दोनों ओर साई नदी से मिले हुये घास -फूस के झंखार और बीच -बीच में पानी से भरे हुये छोटे -मोटे गड्ढे दिखाई पड़े | मन में आया कि नीचे उतरकर घासफूस पर थोड़ी देर चहल कदमी कर ली जाय | कोई सौ कदम चला हूँगा कि देखा पानी के एक छोटे कीचड भरे गढ्ढे के आस -पास एक विशालकाय सर्प घूम रहा है | सहसा पैर रुक गया | हाँथ में एक हल्की छड़ी थी पर मन आश्वस्त नहीं हुआ कि इस छड़ी से अपनी रक्षा की जा सकती है | पर साथ ही सोचा कि इस विशालकाय फणिधर से हमारा क्या लेना -देना | शायद उसे मेरे आने की भनक भी न हो क्योंकि पढ़ रखा था कि सर्प के कान नहीं होते और उसे चक्षुश्रवा कहा जाता है | यानि वह आँखों से सुनता है | मेरे  वैज्ञानिक मन ने कहा कि धरती पर पैरों की उपजी तरंगायित ध्वनि अभी तक सर्प तक नहीं पहुँची है और इसलिये अभीतक उसे मेरी उपस्थिति का आभाष नहीं है | फिर सोचा यह छह फुटा सर्प पानी का विषहीन सर्प तो लगता नहीं फिर इस गढ्ढे के आस -पास क्या कर रहा है | सोच ही रहा था कि सत्य उभरकर मेरे सामने आ गया एक बड़ा मेढक गढ्ढे से उछलकर बाहर आया ही था कि सर्प ने उसे पीछे से अपने मुंह में दबोच लिया मेढक का मुख   आगे था पर उसके पिछले दो पैर और पृष्ठ भाग सर्प के मुंह में थे | मेढक की टे टे की आवाज इतनी करुणापूर्ण थी कि मेरा दिल दहल गया | वह अपने को छुड़ाने की भरपूर कोशिश कर रहा था पर मौत के जबड़े से क्या कभी कोई निकल सका है ?मैं विस्मय से पैर थामें चोर द्रष्टि से जीवन और मृत्यु के उस संघर्ष को देखता रहा | करुणा भरी टर्र टे अपनी रिरिआहट के साथ मेरा अन्तर भेदती रही पर मैं कर ही क्या सकता था ? धीरे -धीरे मेढक मुंह के अन्दर खिंचता चला गया | आह ! अब उसकी दो बड़ी -बड़ी ऑंखें ही दिखायी पड़ रही थीं और अब वे भी अन्दर चली गयीं | सर्प का फूला हुआ अग्र भाग स्पष्ट बता रहा था कि मेढक धीरे -धीरे पेट की ओर खिसक रहा है | चोर पैरों से पीछे मुड़कर ऊंचाई चढ़ कर मुख्य मार्ग पर आ गया और फिर स्मारक और भवन से पार होता हुआ पुल से होकर डांमर वाली सड़क पर खड़ा हो गया | दर्शन के न जानें कितने प्रश्न मन में उठे और मन ने ही उनका उत्तर खोज लिया | मेरे लिये क्या उचित था ? मान लो मेरे हाँथ में छड़ी न होकर बड़ी लाठी होती या फिर बन्दूक ही होती तो क्या मैं सर्प को मार देता ? पर क्या मुझे उसको मारने का हक़ है ? मानव का नीतिशास्त्र क्या सर्प पर लागू किया जा सकता है ? वन्य प्राणियों के संरक्षक क्या उत्तर देंगें मैं नहीं जानता | मैं मानता हूँ कि मेढक को जीने का हक़ है पर सर्प भी तो अपने भोजन पाने का अधिकारी हो जाता है | तो क्या प्रकृति निर्मम है | क्या मानवीय विधान प्रकृति की मूल प्रवृत्ति से विपरीत है | इन्हीं उलझनों से होता हुआ कुछ आगे ही बढ़ा था कि दांयीं ओर एक अच्छी -खासी परकोटे से घिरी बिल्डिंग दिखायी पडी | एक बड़े से द्वार पर कोई बोर्ड लगा था जिसमें स्कूल का कोई नाम था और लिखा था वह प्लस टू तक सेन्ट्रल बोर्ड आफ सेकेण्डरी एजुकेशन से मान्यता प्राप्त है | स्कूल का एरिया बहुत बड़ा नहीं तो छोटा भी नहीं था और सामने लान में शायद ताजी -ताजी घास लगायी गयी थी और पेंड़ पौधों की कुछ रोपाई भी हुयी थी | बिना बस्ती वाले साईं नदी के पास उस क्षेत्र में एक स्कूल की स्थापना और संचालन एक जोखिम का काम लगा पर शिक्षा जगत से सम्बन्धित रहने के कारण मैं जानता हूँ कि जहां कहीं पूंजी एकत्रित हो जाती है वहां दूर के खुले क्षेत्रों में स्कूल चलाने का व्यापार शुरू कर दिया जाता है | सेन्ट्रल सेकेण्डरी बोर्ड अपनी उदार शिक्षा नीति के कारण बिल्डिंग देखकर और झूठे सच्चे स्टाफ का विवरण पाकर मान्यता प्रदान कर देता है और इसप्रकार शिक्षा के नाम पर विशेषतः पब्लिक स्कूल के नाम पर और शुरू से ही अंग्रेजी पढानें के नाम पर कमाई प्रारम्भ हो जाती है | खाते -पीते घरों के बच्चे हिन्दुस्तानी अंग्रेज बनने के लालच  में इन स्कूलों में भारी फीस देकर ऊंची शिक्षा पाने का भ्रम पालते रहते हैं | खुले फाटक से अन्दर जाकर मैं बाहर लान के आगे खड़े होकर एक सज्जन से जो शायद बिल्डिंग की देख -रेख में रहे हों बात करने लगा | वे शिक्षित जान पड़ते थे और उनकी मोटर साइकिल भी वहां खड़ी थी | अंग्रेजी के पूछे गये प्रश्नों में निहित जिज्ञासाओं का वे हिन्दी में कोई ठीक  उत्तर नहीं दे पा रहे थे इसलिये मैं हिन्दी में उनसे बातचीत कर स्कूल के विषय में जानकारी लेने लगा | सीढ़ियों के ऊपर खुले दरवाजे वाले बरामदा नुमें कमरे में कुछ कुर्सियां पडी थीं और मैनें जानना चाहा कि क्या वह स्टाफ रूम है इसपर उन्होंने बताया कि वह प्रिन्सिपल का कमरा है और मेरे विषय में जानना चाहा | शायद उन्हें मुझे किसी अधिकारी के रूप में समझनें का भ्रम रहा हो मैनें बताया कि मैं रायबरेली में नया आया हूँ और दिल्ली के पास हूँ | इसबीच ऊपर के कमरे से मझोले कद की एक अधेड़ महिला निकल आयी और उन्होंने बताया कि वे इस स्कूल की प्राचार्या हैं | मैनें पूछा कि क्या वे वहीं रहती हैं और उन्होंने अंग्रेजी में सकारात्मक उत्तर देते हुये कहा , "ya I have my residence in the campus itself."अब हमारी बातचीत अंग्रेजी भाषा में होने लगी | मेरा सक्षिप्त परिचय पाकर और सम्भवतः मेरे भाषा ज्ञान से किंचित प्रभावित होकर उन्होंने सम्भवतः स्कूल में लगी हुयी और उनकी व्यक्तिगत सेवा में तैनात एक मेड सरवेंट को बुलाया उससे कुर्सी बाहर निकलवाकर बैठने की व्यवस्था की और फिर उससे चाय बनाने को कहकर भेज दिया | शिक्षा के क्षेत्र में लम्बे समय तक मेरा जुड़ा रहना और मेरा वार्धक्य उन्हें मेरे प्रति अपने शैक्षिक जीवन के उतार -चढ़ाव की बातें बताने के लिये प्रेरित करने लगा | उन्होंने बताया कि वे केरल से हैं | शादी के बाद एक पुत्री होने के बाद पति से उनका सम्बन्ध विच्छेद हो गया था | त्रिवेन्द्रम के किसी कालेज से स्नातक होने के बाद उन्होंने नर्सरी टीचर की कोई विशिष्ट ट्रेनिंग की थी और उसी के बल पर उन्हें जेसस मेरी कान्वेन्ट दिल्ली में काम मिल गया था | 10 -12  वर्ष के बाद उनके सहयोगी किसी शिक्षक ने उनसे प्रेम का नाटक कर उनके शरीर से खिलवाड़ करने का प्रयास किया मनोवैज्ञानिक तनाव से अपने को मुक्त करने के लिये वे दिल्ली से दूर हटकर लखनऊ आ गयीं जहाँ लख़नऊ पब्लिक स्कूल में उन्हें शिक्षिका का काम मिल गया | वहां वे लगभग आठ -दस वर्ष रहीं इस बीच उनकी पुत्री रोजी ग्रेजुएट हो चुकी थी और वे उसे बी ० एड ० कराकर शिक्षा के क्षेत्र में लाना चाहती थीं | पर पब्लिक स्कूल के मैनेजमेन्ट में कुछ नये तरुण सदस्यों का आगमन हुआ और उन्होंने रोजी को खिलौना बनाना चाहा | नौकरी खोने के भय से उन्होंने कुछ महीनें धीरज के साथ काटकर रोजी को बी ० एड ० के  इम्तिहान में बिठा दिया | उन्होंने आगे कहा व्यक्तिगत Supervision के कारण मैनेजमेन्ट का शरारती एलीमेन्ट अभी तक रोजी को हाँथ नहीं लगा सका था | पर अप्रत्यक्ष रूप से पब्लिक स्कूल की प्राचार्या मेरे शिक्षण में टोंका -टांकी कर मुझे नौकरी खो देने का भय दिखाती रही | स्त्री होने के नाते मैं जानती थी कि स्कूल की इंचार्ज स्वयं कितनी आचरण पवित्रता से बंधी हैं | उनका सारा रोब - रुवाब भी तो एक सौदा ही था | मैं जान गयी  कि समय रहते मुझे कोई दूसरा स्कूल चुनना पडेगा | पर अब तक में पैतालिस के आस पास पहुँच चुकी थी और मुझे लगता था कि मेरे लिये शायद ही कोई खतरे से मुक्त मार्ग मिल सके | इसी  बीच अभी पिछले साल ही रायबरेली में खुलने वाले इस नये पब्लिक स्कूल में प्राचार्या के पद के लिये मैनें अंग्रेजी के हिन्दुस्तान टाइम्स में एक विज्ञापन देखा और मैंने उसके लिये बताये गये फोन न ० पर सम्पर्क किया | मुझसे पूछा गया कि मेरे साथ कौन -कौन है और मैनें बताया कि मेरी लड़की ही मेरे साथ है और मैं कैम्पस में ही रहना चाहूँगीं | अभी तक मैं ठीक से नहीं जानती कि इस स्कूल के मैनेजमेन्ट में कौन -कौन से गणमान्य व्यक्ति हैं | पर प्रधान पद पर आसीन ठाकुर कुलदीपक सिंह ने मेरा साक्षात्कार लेकर मुझे इस पद पर आसीन किया है | स्कूल में लगभग 300  बच्चे हैं | और अभी नाइन्थ क्लास ही सबसे बड़ा क्लास है | प्रधान जी स्वयं में एक बहुत सज्जन पुरुष हैं पर पिछले कुछ दिनों से उनका एक जवान लड़का अपने कई मित्रों के साथ इस स्कूल के चक्कर लगाता रहता है | अभी तक मैं प्रधान जी से कुछ कहने का साहस नहीं जुटा पायी हूँ पर रोजी को लेकर मुझे बहुत चिन्ता लगी रहती है | वह एक निश्छल स्वभाव की लड़की है और सहज ही में दूसरों का विश्वास कर लेती है हम लोग केरल से हैं और वहां नारी की स्वतन्त्रता समाज में सहज रूप से स्वीकृत होती है | यहां पर मुझे लग रहा है कि स्त्री को केवल खिलौनें की वस्तु समझा जाता है और मुझे नहीं लगता कि मैं यहां अधिक दिन टिक पाऊंगीं आप हरियाणा से हैं और आप जिस कालेज से जुड़े थे उसमें पब्लिक स्कूल भी है क्या मेरे और रोजी के लिये वहां कोई ओपनिंग मिल सकती है | मेड सर्वेन्ट चाय बनाकर ले आयी थी और हम दोनों चाय के प्याले पर बात करते -करते शिक्षा  से जुडी स्वतन्त्र चेता नारियों के आगे आने वाले जोखिमों पर चर्चा करने लगे थे | इसी बीच स्कूल के बड़े गेट के सामने एक चमचमाती गाड़ी रुकी और उससे तीन तरुण उतरकर स्कूल में प्रविष्ट हुये | मेड सर्वेन्ट ने दौड़कर प्राचार्या को बताया कि कुंवर साहब अपने मित्रों के साथ आ रहे हैं | आदर्शों के प्रति समर्पित केरल की वह प्रौढ़ शिक्षिका उठकर स्वागत के लिये खड़ी हो गयी | उसके मुख पर कातरता की एक ऐसी छाया थी जो मैं पहले कहीं देख चुका था | मैनें उठकर कहा अच्छा मैं चलता हूँ फिर आऊँगा | उसने हाँथ जोड़कर मुझे विदा किया |
                 फाटक से बाहर आकर मैंने सोचा कि प्रौढ़ शिक्षिका के मुंह पर कातरता का जो भाव मैनें देखा था उसकी झलक और कहाँ देखने को मिली थी | और अभी देखे हुए एक ताजे द्रश्य की कौंध मेरे दिमाग में चमक गयी | अरे यह क्या, एक लम्बा काला फणियर अपने मुंह में किसी बेबस मेढ़की को दबाये है और मेढ़की की कातर टे टे ,टर्र -टर्र और उसकी दयनीय आँखें मेरा हृदय चीर रही हैं | पर काले सर्प का जबड़ा निरन्तर उसे निगलता जा रहा है | पर मैं क्या कर सकता हूँ | सत्तर और अस्सी के बीच में स्वास्थ्य समस्याओं से जूझता मेरा जीवन भ्रष्टाचार का फन कुचल पाने में क्या समर्थ हो पायेगा | अपने को धिक्कारता हुआ मैं घर की ओर चल पड़ा |
        अबूझा समाधान

पपीता लेकर संकट मोचन मन्दिर के पास वाली गली से घर की ओर वापस आ रहा था | मन्दिर के पास मझोले कद के एक मजदूर से लगने वाले नवयुवक ने मास्टर जी कहकर नमस्ते किया | मैं ठीक से नहीं जानता कि कुछ लोग मेरे नाम के साथ मास्टर जी क्यों जोड़ देते हैं | शायद इसलिये हो कि सुबह शाम घूमने जाते समय मेरे हाँथ में लकड़ी की एक छोटी सी रूल होती है | और रूल का सम्बन्ध अधिकतर मास्टरों के साथ ही जोड़ा जाता है | जो भी हो , मुझे यह सम्बोधन अच्छा भी लगता है क्योंकि लड़कपन में अंग्रेजी में पढ़ा हुआ यह कथन  "Jack of all ,master of non,"मुझे मास्टर कह देने के बाद मेरे ऊपर लागू नहीं किया जा सकता और फिर आज की बेकारी के जमानें में भला मास्टर होना भी क्या कोई छोटी बात है |
                              तो मैनें नमस्ते के बदले नमस्ते बेटे कहकर राह पर अपने कदम बढ़ाये पर उसने मुझे सुनाते हुए कहा , " मास्टर जी , अब मर जानें का जी चाहता है | मेरे मन की पहली प्रतिक्रिया यह थी कि मैं उसकी बात पर गौर किये बिना अपनी राह चला जाऊँ | आखिर क्या जरूरत पडी है मुझे किसी को समझाने की कि जब तक मौत स्वयं न आवे उसे बुलाना नहीं चाहिये | पर उसके मुंख  पर कुछ ऐसा दयनीय भाव था कि मुझे लगा कि वह अपनी व्यथा कथा मुझे सुनाना चाहता है | साहित्य का अध्यापक होने के नाते मैनें किसी क्लास को रूसी लेखक चेखव की एक कहानी पढ़ाई थी | इस कहानी में एक दुःखी इक्केवाला ठंड के मौसम में जब हिमपात हो रहा है अपनी दुःख भरी कहानी अपने घोड़े को सुनाता है | घोड़ा सहानुभूति पूर्वक गर्दन हिलाकर उसे सांत्वना देता है | आखिर दुनिया में जब सारे मानव आत्मकेन्द्रित हो गये हैं तो कहीं न कहीं तो सहानुभूति खोजनी ही पड़ेगी | चलते हुये अपने साथ कदम मिलाते उस नवयुवक से मैनें पूछा , बेटे क्यों मरना चाहते हो ?
                     उसने उत्तर दिया कि वह अपनी पत्नी को लेने उसके मायके गया था | पत्नी के पास उसकी एक दो वर्ष की बच्ची भी है | वह अपनी बच्ची को बहुत चाहता है पर पत्नी ने उसके साथ आने से इन्कार कर दिया और उसके साले ने उसे बेइज्जत कर घर से चले जानें को कहा | मैनें पूछा कि पत्नी को अपने मायके गये हुये कितने दिन हुये | उसने बताया कि लगभग दो महीने पहले उसका बाप आकर उसे लिवा गया था | बाप ने बेरी के एक  बहुत बड़े बाग़ का ठेका ले रखा है और उसकी पत्नी  भाई के साथ उस बाग़ की देख -रेख कर रही है | बाप कहता है कि अब वह ,उसे हमारे साथ नहीं भेजेगा | " क्यों , तुम्हारे साथ भेजने में उसे क्या ऐतराज है |  " वह कहता है तू निठल्ला है | पहले ही मेरी लड़की काफी कमजोर हो चुकी है | अब मैं उसे यहीं रखूंगा |"
                           " तुम क्या काम करते हो ?"
                            " मैं बिजली का काम जानता हूँ |"
" अच्छा इलेक्ट्रीशियन "किसी टेक्निकल इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा किया है |"नहीं बजली की दुकानों पर काम सीखा है | किस बिजली की दुकान पर बैठते हो ?फिलहाल बंसल इलेक्ट्रिकल्स एण्ड इलेक्ट्रॉनिक्स के यहां बैठता हूँ | इसके पहले तनेजा के यहां बैठता था | क्या महीनें की तनख्वाह बंधी हुयी है ?  " नहीं काम आने पर कुछ हिस्सा दिया जाता है |"
 "रोज की औसत आमदनी कितनी हो जाती है ?"
" किसी दिन दो सौ ,किसी दिन सौ , ढाई तीन हजार महीनें पड़ जाता है |"
किसी किसी महीनें ज्यादा आमदनी भी हो जाती है | " घर का मकान है ?"
" है तो पर बाप ने घर से निकाल दिया था |"किराये पर कमरा लेकर रह रहा हूँ | सात सौ रुपये बिजली का खर्चा मिलाकर देना पड़ता है |"
" तो इतने में तो तुम्हारा काम चल जाना चाहिये ,बच्ची तो अभी छोटी ही है |"मेरा बड़ा भाई राशन के दफ्तर में बाबू है | मेरी भाभी बड़े ठाठ बाट से रहती है | मेरा बाप भी उसका साथ देता है | मेरी औरत कहती है कि मुझे भी उसी तरीके से रख | उसकी जेठानी उसकी हंसी उड़ाती है | कहती है ठीक कमा , अच्छे घर में रख ,तभी मैं तेरे साथ रहूंगी | अब मास्टर जी बताओ मैं क्या करूँ ? दो महीने  से अपने हांथों से कभी रोटी सुबह ठोंक ली कभी शाम को | दुकान पर जाकर काम करने का मन भी नहीं होता | किसी किसी दिन चाय के पैसे भी जेब में नहीं होते | जब वह मेरे साथ रहती थी तो मैं उसके और बच्ची के लिये कमाता था | अब मैं अकेले जी कर क्या करूँ ? मैनें उससे यह बात कही तो उसने कहा , ' जा मरना है तो मर जा पिता जी तो कहते हैं कि वे  मेरे लिये दूसरा ठीक घर देख लेंगें |"मैं सुनकर सोचने में लग गया कि क्या मैं इस समस्या का कोई समाधान निकाल सकने में समर्थ हो पाऊंगा | मेरे अभिजात्य संस्कार मुझे यह स्वीकार ही नहीं करने देते थे कि कोई नारी अपने युवा पति को छोड़कर अन्य घर में जाने की सोचती हो और उसके पिता और भाई उसे ऐसा करने के लिये प्रेरित कर रहे हों पर जमीनी सच्चायी मेरे मस्तिष्क  को झकझोर कर समाधान मांग रही थी |
             मैंने उससे कहा ," अरे भाई तू बिजली की कोई दुकान क्यों नहीं खोल लेता ? उसने कहा दुकान के लिये लाखों की पगड़ी देनी होती है , फिर सामान , फिर हर महीनें का किराया , पैसा कहाँ है ?
                      मैनें कहा सरकार की तमाम स्कीमें हैं , बैंक से कर्ज ले लो | उसने कहा मास्टरजी आप किस दुनिया में रहते हैं मुझ जैसे को कोई बैंक लोन देगा ?मुझे तो ढकेल कर बाहर निकलवा दिया जायेगा | म्युनिसपिल काउन्सलर से बात करो , वह कर्ज दिला देगा |
                    " लेखी राम से , कमीना ,गुण्डा , कहता था बैंक में साथ चलने के लिये एक हजार रुपये ले कर आ | पड़ोस के हर घर की गरीब औरत उसके लुच्चेपन से डरती है | अब मेरे सोचने का रास्ता फिर बन्द हो गया | और क्या किया जा सकता है ,व्यक्तिगत रूप से मैं सौ पचास रुपये की मदत तो कर सकता हूँ और फिर क्या पता कि ये मिस्त्री भरोसे मन्द इन्सान है भी या नहीं | बचकर निकल आने का मैनें मार्ग तलाशा और कहा, बेटे एक बार  फिर तू  उसके मायके जा कहना मैं अपनी बेटी को ले जाऊँगा तू चले या न चले | मैनें सोचा कि उसके पिता या भाई शायद बेटी के प्रति उसके प्यार से प्रभावित हो जायें और उसकी पत्नी का मन पिघल जाये | मैनें यह कहकर कि फिर कभी मिलेंगें तब बात करेंगें उसे सड़क मोड़ पर छोड़ दिया और घर चला आया |
                       लगभग पन्द्रह दिन बाद की बात है उस दिन मैं खोखरा कोट की ओर घूमने के लिये निकल गया | कहते हैं खोखरा कोट कभी राजा हरिश्चन्द्र का किला था जिनके बेटे रोहताश्व के नाम पर ही रोहतक का नामकरण हुआ है | शताब्दियों से यह कोट खण्डहर के रूप में पड़ा है | और अब इसकी ऊबड़ -खाबड़ ऊँचाइयों पर समाज के नीचे तबके के लोगों ने जिनमें हिन्दू ,मुसलमान दोनों शामिल है अपने अपने घर खड़े कर लिये हैं | ये सारे कब्जे अनाधिकृत हैं | पर भला हो जनतन्त्र का एक न एक दिन इनका नियमतीकरण हो जायेगा | खोखरा कोट पर एक छोटी -मोटी मस्जिद भी बन गयी है और बाबा बालकनाथ का दो ढाई कमरे का एक नाथ सम्प्रदायी डेरा | यहां बाबा बालकनाथ अपनी धुनी जमाये रहते हैं और कई बार निम्न श्रेणियों की औरतों से घिरे देखे जा सकते हैं | कोट के बीच से सांसद फण्ड की मदद से एक उल्टी -सीधी सड़क बना दी गयी है जो चमरिया गांव को रोहतक से जोड़ती है | घूमने के दौरान मैं कई बार मुख्य सड़कों से हटकर एकान्त मार्गों पर ही निकल जाता हूँ | बाबा बालकनाथ आश्रम के नीचे सड़क पर वह नौजवान  मिस्त्री मुझे मिला | शायद उसने ऊपर से मुझे आते हुये देखा हो और साठ ,सत्तर सीढ़ियां उतरकर मुझसे मिलने सड़क पर चला आया था | बरगद ,पीपल कीकरों ,नीमों और पाकरों से घिरा वह डेरा अँधेरे में अवश्य ही डर की अनुभूति देता होगा | मिस्त्री ने कहा , " मास्टर जी सब कुछ ठीक हो गया |"मैनें कहा , " चलो अच्छा हुआ |"बिटिया को ले आये | उसने कहा अब मैं यहीं बाबा बालकनाथ के डेरे में रहता हूँ बाबा की धुनी की भष्म लेकर मैं उसके पास गया था | बाबा ने कहा था कि धुनी की भस्म देकर उससे बोलना कि मैं उसको चेली बनाता हूँ | मैं मछन्दर नाथ का पुजारी हूँ | डेरे में आकर रहेगी तो सोने से लाद दूंगा | मैनें ऐसा ही किया और जय हो बाबा बालक नाथ की अब  वह यहीं डेरे पर रह रही है और बाबा जी की तन मन से सेवा कर रही है | मैनें कहा मिस्त्री जी क्या तुम बाबा बालकनाथ को पहले से ही जानते थे | उसने कहा हाँ , शादी के बाद जब पिताजी ने घर से निकाला तो वह एक हप्ते डेरे में ही रही थी  | मैं तो भोपाल बिजली का काम करने चला गया था |
                                           मैं उसको मुबारकबाद देता हुआ आगे निकल गया | मन में सोचा तुरन्त व्याह कर लायी हुयी औरत को एक सप्ताह तक अकेले डेरे में छोडनें की अपार श्रद्धा जिस सेवक में है उसका उद्धार तो होना ही है | जिस समस्या का समाधान न तो सरकार कर पाती है और न समाज की टूटती पारिवारिक व्यवस्था उसका समाधान धूनी धारी बाबाओं के हाँथ में है | मेरा तार्किक मन मुझ पर हँसता है पर मेरे अन्तर की अन्ध श्रद्धा हमें अपनी हंसी रोकने पर विवश करती है |
          प्रवक्ता की नियुक्ति

                       महानगर दिल्ली में मोटर गाड़ी से भरी सड़कें और कान सुन्न कर देने वाला घोर कोलाहल पैदल चलने वालों के लिए  मानसिक यन्त्रणा का कारण बन जाता है | पर दिल्ली में बड़े -बड़े पार्कों की सुविधा मेरे जैसे सेवा निवृत्त बुजुर्गों के लिये वरदान ही साबित होती है | शाहपुर जाट के पास हौज ख़ास में रहते हुये मैं कभी रोज गार्डेन ,कभी डियर पार्क , कभी पंचशील पार्क और कभी तिकोना पार्क निकल जाता था और मन भर घूम फिर लेता था | पर रोहतक शहर में पार्कों की ऐसी सुविधा उपलब्ध नहीं है | दिल्ली रोड पर दो एक अच्छे पार्क अवश्य हैं पर बढ़ते हुये शहर के छोरों पर बसे मुहल्लों से वहां पहुँचना संभ्भव नहीं हो पाता | घूमने वालों के लिये सुबह , शाम का भ्रमण पूजा जैसा महत्व रखता है | जब तक कोई अनिवार्य बाध्यता न आ जाये घूमना उनके लिये शारीरिक और मानसिक दोनों सकून प्रदान करता है तो सुन्दरपुर की नयी रोड बन जानें की सुविधा ने शहर के पश्चिमी छोर पर रहने वाले घुमन्तुओं के लिये आनन्द का एक नया अवसर ला दिया है | मैं भी हाँथ में छड़ी उठाकर सांयकाल इस सड़क पर घूमने निकल जाता हूँ | कुछ एक मोटर वाहन जो सुन्दरपुर से टिटौली और खड़वारी की ओर जाते हैं इस सड़क पर से भी गुजरते हैं | पर अपेक्षाकृत यहां शान्ति रहती है | सुन्दरपुर के पास कई बगीचे हैं और वृक्षों से घिरा हुआ एक आर्यसमाजी गुरुकुल भी है | पानी के लिये एक सरकारी माइनर तो है ही साथ में जलकूपों की प्रचुर सुविधा भी उपलब्ध है | आश्रम के पास थोड़ी -बहुत देर बैठकर ऊँचे विचारों में डूबने की गहरायी का आनन्द लिया जा सकता है | उस दिन जब घूमकर वापस आ रहा था तो शहर की ओर से आते हुये एक युवक ने नमस्ते कर के कहा कि वह मुझसे कुछ पूछना चाहता है | गौर वर्ण का यह युवक एक शोभन व्यक्तित्व का धनी था | उसने साफ़ -सुथरे कपडे पहन रखे थे | मैनें सड़क के एक कोनें में एक वृक्ष की छाँह में खड़े होकर उससे अपनी बात कहने के लिए कहा | युवक बोला कि वह लगभग सवा महीनें पहले जाट कालेज में भौतकी के लेक्चरर पद के लिये इन्टरव्यूह पर बुलाया गया था | इंटरव्यूह देने के बाद उसे कालेज के प्राचार्य ने बधाई का फोन किया था और बताया था कि उसकी नियुक्ति हो गयी है | पर उसे अभीतक नियुक्ति का पत्र नहीं मिला है | वह जानना चाहता था कि प्रवक्ता के Appointment की प्रक्रिया में कौन -कौन सी औपचारिकतायें पूरी की जाती हैं | मैनें उससे सबसे पहले उसका नाम पूछा | उसने बताया कि उसका नाम शीशपाल है |
" इस इंटरव्यूह को देने के पहले कहीं काम करते रहे हो ?"
 " जी हाँ |"
" मैं वेरी में एक प्राइवेट 10 +2  स्कूल में फिजिक्स पढ़ा रहा हूँ |"
 " बेटे शीशपाल , M,Sc. में फर्स्ट क्लास था न ?"जी हाँ ,साथ में एम. फिल.भी कर रखा है जिसमें 75 % से ऊपर नम्बर आये |
इंटरव्यूह में कितने लोग आये थे ?शायद 10 के करीब रहे होंगें ज्यादा भी हो सकते हैं |
कितनी पोस्ट थी ?
जी दो पोस्ट थी |
तुम्हारा सेलेक्शन पहले नम्बर पर हुआ था या दूसरे नम्बर पर
"जी ,पहले नम्बर पर मेरे से सीनियर एक लेडी कंडीडेट का चयन हुआ है |वह  दिल्ली यूनिवर्सिटी से एम. फिल. करके आयी है | "
                          मैनें कहा कालेज की मैनेजिंग कमेटी के प्रधान से कोई बातचीत हुयी थी | उसने बताया कि उन्होंने भी मुझे मुबारकवाद का फोन किया था | मैनें कहा कि वैसे अब तक तुम्हें नियुक्ति पत्र मिल जाना चाहिये था पर हो सकता है कि डी. एच. ई. का Approval अभी न मिला हो | अखबार में मैनें कहीं पढ़ा था कि डी. एच. ई. का कहीं तबादला हो गया है और कोई दूसरा अधिकारी वहां चार्ज लेने के लिये पहुँच रहा है | इसीलिये मैनें शीशपाल को Suggest किया कि वो चंडीगढ़ जाकर Latest developmentकी जानकारी ले आये |
                          दो तीन दिन बाद जब मैं जीन्द रोड से होकर घर की ओर वापस आ रहा था तो सड़क के किनारे बनी हुयी दुकानों में से एक    सज्जन निकल कर आये और मुझे नमस्ते किया | मैनें देखा कि उनकी दुकान में बिजली का सामान भरा है और एक बड़ा सा साइन बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है " अम्बर इलेक्ट्रिकल्स " इन सज्जन ने मुझे बताया कि वे शीशपाल के पिता हैं और अभी कुछ दिन पहले पुलिस डिपार्टमेन्ट से डी. एस. पी.के पद से रिटायर हुये हैं | मैनें अन्दाज लगाया कि वे 58 -60  के आस -पास होंगें | अच्छा खासा गोरा शरीर और मित्र भाव लिये हुए सहज चेहरा | उन्होंने मुझे दुकान के अन्दर पडी हुई  कुर्सियों पर चलकर बैठने का आग्रह किया | घूम तो मैं चुका ही था सोचा कुछ देर बैठ लूँ |
                       उन्होंने मुझे बताया कि उनका नाम चन्द्रपाल है और वे सी. आई.डी. डिपार्टमेन्ट में थे | उनके दो बेटे हैं बड़ा बेटा शिशुपाल दिल्ली में अध्यापक है वह एम.ए.,बी. एड. है उससे छोटा शीशपाल अभी कल ही जाट कालेज में प्रवक्ता के रूप में नियुक्त हुआ है |उससे छोटी बेटी एम.ए. करके इसी वर्ष बी.एड. के इम्तिहान में बैठी है | वे खडवाडी गाँव के हैं पर अब उन्होंने रिटायरमेन्ट के बाद जींद रोड और सुन्दरपुर रोड के जोड़ पर अपना निजी मकान बनवा लिया है | और यहीं रह रहे हैं|  गाँव में यदाकदा देखरेख के लिये चले जाते हैं | उन्होंने मुझे चाय लेने के लिये बहुत आग्रह किया पर चूंकि मैं घूमने और रात्रि के खानें के बीच में कुछ भी न लेने का आदी हूँ इसलिये मैनें उन्हें विनम्रता पूर्वक चाय लेने से इन्कार कर दिया |
             दो एक दिन के बाद जब मैं उसी मार्ग से फिर लौट रहा था तो बिजली की उस दुकान से एक नवयुवक ने बाहर निकलकर मुझे नमस्कार किया मैं जान गया कि यह शिशुपाल होगा जो रिटायर्ड डी. एस.पी.इन्द्रपाल का बड़ा बेटा है | उसने भी मुझे बैठने का आग्रह किया और मैनें पूछा कि वह दिल्ली से पढ़ाकर कब वापस आ जाता है | उसने बताया कि वह जिस सरकारी स्कूल में पढ़ाता है उसमें दो शिप्ट्स हैं वह सुबह की शिफ्ट में है और एक बजे उसे छुट्टी मिल जाती है | वह तीन और चार के बीच रोहतक आ जाता है और पिताजी को घर पर आराम करने के लिये भेजकर स्वयं दुकान पर बैठ जाता है | मैनें उससे पूछा कि  उसका उसका व्याह हुआ है या नहीं | उसने बताया कि वह शादीशुदा है और उसके एक बच्ची है | पत्नी ने पढ़ना छोड़ दिया था पर अब एम. ए. कर रही है | उसके पास पत्तों से ढके हुये मक्के के हरे भुट्टे रखे हुये थे | उसने कहा कि मैं कुछ भुट्टे अपने साथ लेता जाऊँ और पोलीथीन के एक बैग में भुट्टे डालकर देने लगा | मैनें कहा , "शिशुपाल बेटे , अब हम दोनों के दांत बहुत कमजोर हो गये हैं | वैसे भी हम उबली हुयी चीज इस्तेमाल करते हैं |  शिशुपाल बोला , " गुरूजी चाय तो चलेगी न |"मैनें कहा ," नहीं बेटे मैं शाम को खानें और घूमने के बीच कुछ भी नहीं लेता |"शिशुपाल ने कहा सर ,गाँव से कुछ मगाना हो तो बता देना मैं छुट्टी के दिन खडवाडी जाता रहता हूँ |
                                  मैं समझ गया कि इन्द्रपाल डी.एस.पी.गाँव के खाते -पीते किसानों में हैं | उनके पास अच्छी खासी जमीन होगी | उनका बेटा शीशपाल जाट कालेज में लेक्चरर लग ही गया है | हरियाणा में जाट जमींदारों के पास अच्छी खासी जमीन है और हरियाणा की यह स्वाभिमानी वीर कौम अपने परिश्रम और वीरता के लिये विश्व भर में जानी -मानी जाती है | कुछ दिन के बाद सुन्दरपुर रोड के पहले मोड़ पर ही इन्द्रपाल जी मुझे दिखायी पड़े | वह लपककर मेरे पास आये और उन्होंने मुझे बताया कि यहीं लगभग सौ गज की दूरी पर उन्होंने अपना मकान बनवाया है | अत्यन्त विनम्रता पूर्वक उन्होंने मुझसे घर पर चलने का आग्रह किया | एक रिटायर्ड डी.एस.पी. के आग्रह को स्वीकार न करना मुझे अच्छा नहीं लगा और मैं उनके साथ उनके घर पर चला गया घर  पर उस समय उनकी पत्नी और बेटी थी मैनें देखा कि उन्होंने लगभग तीन सौ वर्ग गज में एक अच्छा -खासा मकान बनवाया है जिसमें आगे कुछ कच्ची जमीन है | इस जमीन में कुछ मौसमी सब्जियां उगाई गयी थीं उन्होंने मुझसे कहा कि मैं एक फूल गोभी लेता जाऊँ | पर मैनें उन्हें बताया कि हम दोनों पात गोभी का इस्तेमाल करते हैं और फूल गोभी हमें सूट नहीं करती | इसी बीच मेरे बिना जानें चाय के दो प्याले एक तश्तरी में हमारी मेज पर आ गये | उन्होंने बताया कि यह उनकी बिटिया हिमानी है जो बी.एड.में पढ़ रही है और चाय तुलसी की पत्ती डालकर बनायी गयी है | मैं असमंजस में पड़ गया क्योंकि मेरे निजी चिकित्सक ने मुझे सख्त हिदायत दे रखी है कि शाम के घूमने और रात्रि के खाने के बीच में चाय नहीं लेनी है | मैनें यह बात डी.एस.पी. साहब को बतायी पर वे बोले ,"डा. बाक्टर तो यह सब कहते ही रहते हैं | आपको चाय लेनी ही होगी | घर पर आकर हमारी चाय भी न पियें तो हमें कैसा लगेगा | गाँव से तो आप कुछ मंगवाते ही नहीं | मैनें चाय लेने से विनम्रता पूर्वक इन्कार करते हुये अपनी छड़ी उठायी और वहां से उठनें के लिये प्रस्तुत हुआ | मैनें कहा , ' चौधरी साहब , कभी आप के गांव चलूँगा तो वहीं पर अपने खेतों से ताजी मक्के की छल्लियाँ तोड़कर गोसे की आग में भूंजकर खिलाना | और मैं उठकर खड़ा हो गया |
                                    उनका चेहरा तमतमा उठा और मैं आश्चर्य में पड़ गया कि उनके क्रोध का क्या कारण हो सकता है | वे खड़े हो गये और वे बोले मैं जानता हूँ आप हमारी कोई चीज क्यों खाते -पीते नहीं | जमीन की बात कहकर आप हमारी खिल्ली उड़ाते हैं | हम लोग खेतिहर मजदूर हैं | हम चमार जाति से हैं |
                                   मैं तुरन्त बैठ गया | चाय का प्याला हाँथ में उठाकर मुंह में लगाते हुये कहा , भाई इन्द्रपाल मेरा तो सारा जीवन ही मानव -समानता की विचारधारा को फैलाने में बीता है | आप डी. एस. पी. अवश्य रहे हैं पर आप मुझे समझ नहीं सके | मैनें जो कुछ कहा था वह सच था कहीं ऐसा तो नहीं कि आप स्वयं में ही कोई Complex Develop कर रहे हों | हीन भावना से मुक्त होने के लिये मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ |
                                उनकी आँखें छलछला आयीं | शर्मशार होते हुये उन्होंने मेरे पैरों पर हाँथ रख दिये और बोले , "गुरुवर मुझे क्षमा करना ,मैनें आपको गलत समझा था | "
         निर्मम सत्य

                      उमर के साथ स्मृति पर पड़ा हुआ धुधंलका गहराता जाता है | काफी पहले की बात है मैं उस समय गाँव के मिडिल स्कूल में आठवीं का विद्यार्थी रहा हूँगा | दीवाली के आस -पास उन दिनों कट्टर धार्मिक हिन्दुओं में भी जुंआ खेलने का रिवाज था |  तरुण , बड़े और बूढ़े सभी पाँसा फेंककर या कौड़ियां चलाकर आने वाले वर्षों में अपने भाग्य की अजमाइस करते थे जीत गए तो सुखद भविष्य की कल्पना और हारे तो भजन ,पूजन में मानसिक शान्ति की कल्पना | जो लोग जुंआ के व्यसनी होते हैं उन्हें तो वर्ष के हर दिन बिना कौड़ी फेंकें नहीं रहा जाता | वे तो एक प्रकार के मानसिक रोगी होते हैं | हार जीत का उल्लास और अवसाद उन्हें नशा बनकर अपनी चपेट में दबोच लेता है | यों उन्हें आशावादी भी कहा जा सकता है जो जीवन के प्रति एक सकारात्मक द्रष्टिकोण का परिचायक  है | निरन्तर हारने वाला जुआड़ी भी हर बार अगला दांव जीत लेने की संजीवनी शक्ति जुटाता रहता है | और यही मिथ्या मरीचका उसे जीवन का सम्बल प्रदान करती है | महाकवि ने कितनी सटीक अभिव्यक्ति की है ?" सूझ जुआरिह आपन दाऊँ |" पर दीवाली के दिन का जुआँ एक प्रकार से परम्परागत स्वीकृत धार्मिक मान्यता थी | ऐसा विश्वास था कि लक्ष्मी जी की कृपा और विमुखता कौड़ियों के माध्यम से जानी जा सकती है और आने वाले वर्ष भर के लिये उनकी कृपा से अवगत होना एक शुभकारी हस्तकला है और इसे अधिकाँश हिन्दू समाज सहज रूप से लेता था | यों महाभारत के पाठक जानते ही हैं कि ध्यूत क्रीड़ा का उन्माद बड़े से बड़े धर्मात्मा को भी अपनी जकड में ले लेता था |
                            तो पड़ोस के घर की एक दालान में आस -पास के लोगों का जमवाड़ा होता और इकन्नी ,दुअन्नी ,चवन्नी ,रुपया दांव पर लगाकर लक्ष्मी जी की कृपा की आहट ली जाती थी | हम कुछ किशोर भी उस भीड़ के आस -पास बैठकर मुठ्ठियों में बन्द कौड़ियों की खड़खड़ाहट और नक्की दुआ की आवाजों के साथ उनकी फेंक देखा करते थे | कई बार बडी  सनसनी का माहौल बन जाता था | उस समय तक भारत स्वतन्त्र नहीं हुआ था पर ब्रिटिश क़ानून के अन्तर्गत भी खुले आम जुआं खेलना एक  अपराध था | पर दीवाली के दिन गाँव के थाने में परम्परा का आदर होता था और एक दिन और रात अनकही स्वीकृति के साथ कौड़ियों का खेल चलता रहता था | उस दीवाली को छुट्टी के दिन 12 बजे दालान में काफी भीड़ -भाड़ थी | नक्की दुआ का बाजार गर्म था | शहर में एक प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने वाले गाँव के अध्यापक राम औतार शुक्ल महफ़िल में जमा थे | हुआ कुछ ऐसा कि हारते चले जाते थे और हर हार के बाद दुगनी बोली लगाते थे | पर भाग्य ने उनका साथ देना छोड़ दिया था , कुछ लोगों ने उनसे कहा भी कि महूरत उनके साथ नहीं चल रहा है और वे खेल छोड़कर उठ जांय | पर शुक्ला जी थे जो अपनी जिद्द पर अड़े थे कि वे जीत कर ही रहेंगें | पर हुआ वही जो होना था | धर्मराज युधिष्ठिर सहज रूप से हारे थे या शकुनि के छल भरे पाशों के कारण | महाभारतकार तो इसमें शकुनि का ही दोष बताते हैं पर उस दिन तो मुझे ऐसा  ही लगा कि राम औतार शुक्ल की भाग्य लक्ष्मी उन्हें छोड़कर  कहीं और चली गयीं हैं | जो हो आखिर जो कुछ जेब में था सब खाली कर देने के बाद शुक्ल जी मैदान छोड़कर उठ खड़े हुये | बोले मैं भागा नहीं जा रहा हूँ | दोबारा जेब भरकर वापस आऊंगा | शायद वह उनकी डींग ही रही हो पर हम किशोरों को उनकी इस बात ने प्रभावित किया | हमनें इतिहास में पढ़ा था कि मुगलों के आक्रमण के समय भारत के सभी योद्धा बहुत बहादुरी के साथ लड़ते थे | यह दूसरी बात थी कि उन्हें अधिकतर पराजय की ही मुंह देखना पड़ता था | मेरे किशोर मन पर राम औतार शुक्ल की Heroic छाप पड़ चुकी थी | वे लगभग 28 वर्ष के थे और सुनने में आया था कि आने वाली गर्मी में उनकी शादी पड़ोस के गाँव की एक पढ़ी लिखी लड़की से होने वाली है | समय कभी रुका है ? तीन वर्ष बीत गये और मैं गाँव से शहर में जाकर दसवीं पास कर इण्टर में दाखिल हो गया | उमर के साथ व्यवहारिक ज्ञान में भी कुछ बढ़ोत्तरी हो गयी थी | ग्राम्य जीवन और शहरी जीवन के बीच की विसंगतियां मुझे स्पष्ट रूप से नजर आने लगी थीं | मुझे रहन -सहन , कमरे के लिये और पढ़ाई के खर्च के लिये आमदनी के किसी साधन की तलाश थी | शहर के जिस प्राइमरी  स्कूल में राम औतार जी पढ़ाते थे उसी के पास के मुहल्ले में मैनें रहने के लिये एक छोटा सा कमरा ले रखा था | एक शाम कहीं से पता लगाकर शुक्ल जी मेरे कमरे में आये | उम्र में काफी छोटे होने के कारण और गाँव के सहज व्यवहार से परिचित होने के कारण मैनें उनका चरण स्पर्श करके अभिवादन किया | उन्होंने कहा, "  कोई काम करना चाहोगे ? पास ही एक स्कूल खुल रहा है | भारत सरकार ने पंजाब से आये शरणार्थियों के लिये प्राइवेट रूप में दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में बैठने की इजाजत दे दी है | स्कूल में दसवीं की छात्रायें और छात्र हैं | ज्यादातर उमर में तुमसे बड़े हैं पर मुझे विश्वास है कि तुम उन्हें पढ़ा लोगे | तुमनें दसवीं में बहुत अच्छे अंक प्राप्त किये हैं और गाँव में तुम्हारी बड़ी तारीफ़ है |"
                                         मैनें कहा हाँ हाँ क्यों नहीं चलिये आज शाम से ही आप के साथ चलकर काम की शुरुआत करते हैं | आपकी आशाओं पर खरा उतरने की कोशिश करूँगा | और इस प्रकार पढानें के प्रारम्भिक दौर की शुरुआत हुयी जो मेरे अन्तिम वर्ष पास कर लेने तक चलता रहा | राम औतार शुक्ल जो कभी महीनें दो महीनें में सड़क पर मिल जाते तो हालचाल पूछते और फिर बड़े होने के नाते मुझे ठीक राह पर चलते रहने की सलाह देकर चले जाते | मैं जानता था कि उनकी शादी हो चुकी है पर मैं यह नहीं जानता था कि वे कहाँ और किस मकान में रहते हैं क्योंकि वे मुझे अपने साथ घर पर नहीं ले गये थे | और समय चलता रहा | इण्टर करके मैं बी. ए. में भर्ती हुआ | तरुणायी आयी | शरीर भर गया | कक्षा में मित्रों की प्रशंसा पाकर आत्मविश्वास से आचरण में आदर्श प्रियता झलकने लगी | बहुत से पुराने सम्बन्ध पुराने पड़ गये | नये मित्र मिलते गये | राम औतार जी कहाँ हैं और कैसे हैं इस विषय में अधिक जानकारी न जुटा सका फिर वे मुझसे उमर में 12 -13 वर्ष बड़े थे | मैं जानता था कि एक अच्छे अध्यापक होने के नाते शादी के बाद वे एक सफल नागरिक और सद्गृहस्थ का कर्तव्य निभा रहे होंगें और अब तक पिता होने का गौरव भी  प्राप्त कर सकें होंगें | देखते ही देखते बी. ए. की परीक्षायें सम्पन्न हुयीं और फिर परिणाम की परीक्षा और फिर आशा के अनुरूप चर्चा के लायक सफलता की प्राप्ति ,सोचा एम. ए. के लिये किसी और अच्छे कालेज में प्रवेश लिया जाय ऐसा सम्भव हो पाया क्योंकि अंकतालिका ने मुझे एक बड़े दायरे में चर्चा का विषय बना दिया था | एम. ए. के प्रथम वर्ष में मेरे कुछ नये मित्रों में एक था मेधावी सुधाकर तिवारी |
                                    सुधाकर मोहक व्यक्तित्व का धनी था और साथ ही कक्षा के अच्छे विद्यार्थियों में उसकी गणना थी | कुछ दिनों में ही मैं जान गया कि वह मेरे गाँव से लगभग 10 मील दूर के गाँव गहलौं से आया हुआ है , कि उसके पिता भी उसी गाँव में जिला बोर्ड के अंतर्गत चलने वाले एक स्कूल में अध्यापक हैं कि उसका एक छोटा भाई और दो बड़ी बहनें हैं ,कि दोनों बड़ी बहनों का व्याह हो चुका है ,कि उसका छोटा भाई इण्टर में पढ़ रहा है ,कि पिताजी की सेवा निवृत्ति के दो -तीन साल बाकी हैं ,कि वह एम.ए. के बाद तुरन्त नौकरी करना चाहेगा आदि आदि |
                             बरसात के बाद दशहरा और दीवाली के बीच की लम्बी छुट्टी होती थी और शायद अब भी होती है | उन दिनों गाँव में दशहरा के मेले में गन्ने आ जाया करते थे | सिघांड़ों की भी भरमार रहती थी | और फिर उसके गाँव में दशहरे का मेला भी कई दिन तक लगता था और रात्रि को आयोजित होने वाले कुछ रामायणी कार्यक्रम जैसे फुलवारी और धनुष यज्ञ तो देखने योग्य ही होते थे | परशुरामी के क्षेत्र में तो उन दिनों शिवदत्त की धूम थी और जनक के पाठ के लिये वंश लाल जानें -मानें जाते थे | सहपाठी सुधाकर तिवारी ने प्रस्ताव किया कि दशहरे के दो दिन मैं उसके साथ रहकर उसके गाँव में बिताऊँ | मित्रता के निश्छल आग्रह ने मुझे उसके प्रस्ताव के लिये स्वीकृत देने को बाध्य कर दिया |
                                   उस शाम जब मैं उसके गाँव गहलौ पहुंचा तो मेरे लिये जलपान लेकर उसकी बड़ी बहन सुषमा बाहर आयी | शुषमा की माँ एक बुलावे के कारण पड़ोस में हो रहे कीर्तन में गयी थीं | कुछ देर बाद मैनें सुधाकर से पूछा कि शुषमा उसकी सबसे बड़ी बहन है या उससे छोटी तो उसने बताया कि शुषमा से छोटी बहन अपने ससुराल में है पर शुषमा हमारे पास ही रहती है | मैनें पूछा आपके Elder Brother Inlaw क्या काम करते हैं तो उसने बताया कि वे  शहर के म्युनिसपिल प्राइमरी स्कूल में शिक्षक हैं | बात आयी गयी हुयी | उस रात धनुष यज्ञ का आयोजन हुआ और शिवदत्त अग्निहोत्री की परशुरामी ने हम सबको काफी प्रभावित किया ,अगले दिन वहां से जानें से पहले मैं सुधाकर की माँ के पैर छूने अन्दर गया तो उन्होंने अपने पास पडी एक चारपायी  पर मुझे बैठने को कहा और मुझसे पूछा कि मैं किस गाँव का हूँ और कहाँ का मिश्रा हूँ | विज्ञ पाठक जानते ही होंगें कि कान्यकुब्ज ब्राम्हणों में बीघा -बिस्वा की मर्यादायें चलती हैं और परम्परागत विचारों में बीस बिस्वा वाले ब्राम्हणों को कुछ अधिक महत्व दिया जाता है | अब शायद यह मान्यता समाप्त प्राय हो गयी है पर जिस समय की यह बात है उस समय तक सामान्य कान्यकुब्ज घरों में इस मान्यता का काफी बोलबाला था | मैनें उन्हें बताया कि मैं अमुक गाँव का हूँ और कहाँ का मिश्रा  हूँ | गाँव का नाम सुनकर वह कुछ देर चुप रहीं और फिर कहा , " बेटा तुम राम औतार शुक्ल को जानते होंगे |" मैनें कहा हाँ हाँ अम्मा उन्हें मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ | बहुत अच्छे आदमी हैं | शहर में अध्यापक हैं फिर मैनें पूछा कि राम औतार शुक्ल को कैसे जानती हो ? उन्होंने दुःख भरी आवाज में कहा ," राम औतार जी  तो मेरे बड़े दामाद हैं | शुषमा उन्हीं को व्याही है |"मुझे सुधाकर ने बताया था कि शुषमा उसी के घर रहती है | इसलिये मैनें माँ से पूछा कि शुषमा कब से ससुराल नहीं गयी है | उन्होंने कहा , 'बेटा  क्या बताऊँ शादी के बाद ससुराल से लौटने के बाद से आज तक शुषमा ससुराल नहीं गयी है |"मैनें पूछा ऐसा क्यों है ?तो उन्होंने बताया कि राम औतार उन्हें अपनी पत्नी के रूप में नहीं स्वीकारते और वे कहते हैं कि उससे उनका कोई सम्बन्ध नहीं है | यह सुनकर मैं आश्चर्य में पड़ गया | शुषमा मुझे पढ़ी- लिखी ,सुरुचिपूर्ण और समझदार नारी के रूप में दिखायी पड़ रही थी | तो क्या राम औतार शुक्ल का चारित्रिक दिखावा महज एक आडम्बर है | क्या वे अन्य किसी शारीरिक सम्बन्ध में उलझ गये हैं | मुझे तो वे एक शुभ चिन्तक हितैषी के रूप में मूल्यवान मानव गुणों से विभूषित दिखायी पड़ रहे थे | मेरे मन में एक विचार उठा कि मैं  मित्र सुधाकर से इस विषय में कुछ बात चीत करूँ फिर न जानें क्यों मुझे ऐसा लगा कि मैं दूसरों की जिन्दगी में दखल न देकर अपनी अपनी राहों पर चलने दूँ |
                                         समय चलता गया | रुक जानें पर संसार का काम भला कैसे चलेगा | समय को तो चलना ही है | एम. ए. की परीक्षा का परिणाम आ गया था | मेरी उपलब्धि फिर आस -पास के गाँवों में चर्चा का विषय बन गयी थी | मित्र बधाई दे रहे थे | मेरे गाँव में भी मेरे कुछ समवयस्कों ने मुझे सम्मानित करना चाहा | इन्हीं आयोजकों में एक थे राम औतार शुक्ल के सबसे छोटे भाई रमापति शुक्ला | उस छोटे से जमाव में कुछ देर की हंसी -खुशी के माहौल के बाद मैनें रमापति जी से पूछा कि उनके बड़े भाई राम औतार शुक्ला जी शहर के किस मुहल्ले में रहते हैं वे कुछ देर चुप रहे फिर बोले कि उन्हें ठीक पता नहीं है पर शायद ग्वालटोली में वे किसी रिटायर्ड मास्टरनी के मकान में रहते हैं |
                                        कुछ ऐसा संयोग हुआ कि ग्वालटोली के पास ही एक बड़ी बीमा कम्पनी के दफ्तर में मेरी नियुक्ति का सुअवसर मिला | एक दिन शाम को बाजार में घूमते हुये मैनें देखा कि राम औतार शुक्ल एक अधेड़ प्रौढ़ा के साथ झोला लिये हुये एक सब्जी की दुकान पर मोल भाव कर रहे हैं | उन्हें देखकर और उनके साथ एक प्रौढ़ा को देखकर मेरे मन में कुछ संकोच आया और मुझे लगा कि मुझे उनको  नमस्कार करने का यह सुअवसर नहीं है | पर उन्होंने मेरे साथ मेरे हाई स्कूल पास करने के बाद जो अहसान किया था उसका गहरा बोध मेरी चेतना पर गहरा दबाव डाल रहा था और आखिरकार मैनें उनके पास पहुँचकर मैनें उन्हें नमस्कार किया और झुककर उनके पैरों की ओर हाँथ बढ़ाया | उन्होंने कहा कौन अजय | कहाँ हो ? क्या करते हो ? मैनें उन्हें बताया कि मैं  फिलहाल ओरियन्टल इन्श्योरेंस कम्पनी में असिस्टेन्ट मैनेजर हूँ और सिविल सर्विसेज की तैय्यारी कर रहा हूँ | फिर मैनें उस प्रौढ़ा की ओर देखकर दोनों हाँथ जोड़कर नमस्कार किया | कुछ हिचक कर शुक्ला जी बोले ," ये शुक्लाइन हैं | विधवां हैं ,प्राइमरी की मास्टरी से सेवा निवृत्त हो चुकी हैं | मैं इन्हीं के साथ रहता हूँ | हम दोनों मिलकर पतियों द्वारा पत्नियों पर हो रहे दुर्व्योहार को रोकने के लिये एक संगठन बना रहे हैं | यह पतियों द्वारा परित्यक्त स्त्रियों के लिये बड़ा रचनात्मक काम कर रही हैं | आडम्बर भरे आदर के साथ मैनें राम औतार शुक्ल को दुबारा नमस्कार किया और कहा कि उन दोनों के पारस्परिक सहयोग से निश्चय ही उपेक्षित नारी समाज का अभूतपूर्ण कल्याण होगा | इस बात को पांच वर्ष बीत चुके हैं | अभी कल ही अखबार में एक खबर पढ़ी है कि राम औतार शुक्ल नाम के एक प्राइमरी अध्यापक और उनकी सेवानिवृत्त प्रौढ़ा साथिन ने नारी शरीर बेचने का धन्धा चला रखा था | और उन्हें आई.पी.सी. की धारा के मातहत गिरफ्तार कर लिया गया है | मेरा विश्वास है कि गिरफ्तार होने वाले राम औतार शुक्ल मेरे गाँव वाले नहीं हैं | हे! प्रभु ,हे श्रष्टि के रक्षक ,मेरे विश्वास को तोड़ मत देना |
         मांटो स्मृति

                     एक सुबह जब मास्टर कन्हैया लाल घूम कर वापस आये तो उनके पीछे -पीछे एक देशी -विदेशी कुत्ते का पिल्ला भी घर में घुस आया | मास्टर कन्हैया लाल की पत्नी हेमलता ने उसे 'दुर -दुर  करके बाहर निकालने की कोशिश की पर वह अड़ियल पिल्ला मास्टर जी से सटा खड़ा रहा | मास्टर जी ने अपनी पत्नी को यह कहकर कि थोड़ी देर बाद यह चला जायेगा घर के काम काज में उलझा दिया | बच्चे अभी छोटे थे और हेमलता उन्हें उठाकर उनको स्कूल भेजने की तैयारी में लग गयीं | बाहर बरामदे में बैठकर मास्टर कन्हैया लाल ने अखबार की सुर्ख़ियों पर नजर डाली और 10 -15 मिनट उनमें उलझे रहे | पिलोरा  उनके पैरों के पास बैठा आँखें बन्द कर झपकी लेता रहा | 10 मिनट बाद मास्टर जी ने बाहर का गेट खोला और पिलोरे की ओर देख कर बोले , " जा भाई , मेरे पीछे क्यों चिपक रहा है मैं अब अधिक मोह माया में नहीं फंसना चाहता | पर पिलोरा था जो टकटकी लगाकर उनकी  ओर देखता रहा ,पूँछ हिलाता रहा और उनके पैरों के पास खड़े -खड़े किसी अतिन्द्रीय सुख में डूब सा गया | आखिरकार मास्टर जी ने हारकर गेट बन्द कर लिया | बोले ,"अगर नहीं जाता तो लात मारकर नहीं निकालूँगा ,पर हेमा तुझे घर में नहीं रहने देगी |"पिलोरा कुर्सी के पास तख़्त के नीचे बरामदे में जाकर लेट गया और झपकी लेने लगा | मास्टर जी अन्दर नित्य कर्म से निवृत्त होने और नाश्ता करके स्कूल जानें की तैय्यारी में लग गये | कुछ देर बाद उनकी  बड़ी बेटी रम्मो और छोटा बेटा डब्बू अपनी -अपनी यूनिफार्म पहनकर और पानी की बोतल लेकर माँ के साथ गेट पर आ गये | पिलोरे ने आँखें खोली और लपककर रम्मो और डब्बू के पैरों में लोटनें लगा | हेमां गेट खोलकर स्कूल बस की प्रतीक्षा करने लगी | रम्मो और डब्बू पिलोरा के प्यार में फंस गये वे उसके सुरमई बालों पर हाँथ फिरा -फिरा कर अपने प्यार का इजहार करने लगे | जब मास्टर जी घूमकर वापस आये थे तब थोड़ा सा धुंधलका था और पिलोरे की सूरत शक्ल साफ़ नहीं दिखाई पड़ रही थी | पर अब सूरज की किरणों में चमकदार बाल लिये पिलोरे के नाक -नक्श और शरीर गठन आकर्षक से लगे | स्कूल बस आती दिखाई पडी | बच्चों ने पिलोरे से टाटा किया और बस पर जा बैठे | माँ से कहते गये कि वह लौटकर माण्टों से खेलेंगें और हिदायत दी कि पिलोरे को जिसे उन्होंने माण्टों नाम दिया था घर से बाहर न निकाला जाय | हेमलता असमंजस में पड़ गयी | मन ही मन बोली ,'नासपीटा यह पिलोरा न जानें कहाँ से पीछे लग गया |"अब मैं क्या करूँ | यह तो घर से निकलने का नाम ही नहीं लेता | अन्दर जाकर मास्टर जी से पूछा -कि उन्हें यह पिलोरा कब और कैसे मिला और वे उसे साथ -साथ क्यों ले आये ? मास्टर जी ने बताया कि जब वे सिंहपुरा की कच्ची सड़क से खेतों के बीच से निकल रहे थे तो यह पिलोरा किसी खेत में फूस के गठ्ठरों के नीचे बैठा था | वह दौड़कर उनके पीछे आ गया | और एक घण्टे से ऊपर जब तक वो घूमते रहे उनके पीछे -पीछे चलता रहा | उन्होंने कई बार उसको भग  जानें की बात कही  पर वह पीछे लगा ही रहा और आखिरकार गेट के अन्दर तक चला आया | सुबह -सुबह उन्होंने उसे मारकर भगाने की कोशिश नहीं की क्योंकि उसका प्यार और उनके प्रति उसका विश्वास उन्हें पिलोरे के प्रति नरम बनाये रहा | हेमा बोली , "  अब बोलो क्या किया जाये , रम्मो और डब्बू स्कूल जाते -जाते कह गये हैं कि पिलोरे को घर से बाहर न निकाला जाय | उन दोनों ने इसका  एक नाम भी रख दिया है मन्टो | पता नहीं किसी पाठ में यह नाम पढ़ा होगा | ज़रा सा है पर दो तीन बार मन्टो- मन्टो पुकारने पर कान खड़ा करने लगा है | ' हेमा ने मास्टर जी से मन्टो नाम का अर्थ जानना चाहा | तो मस्टर जी ने बताया कि मांटो शायद अंग्रेजी के Mount शब्द का बिगड़ा हुआ रूप है जिसका मतलब होता है चोटी | या हो सकता है मांटो अंग्रेजी के शब्द Mint से निकला हो जिसका मतलब होता है टकसाल| | हिन्दी में मांटो शायद आंटी के बिगड़े रूप अनटो से बिगड़कर मानटो  हो गया  हो | या हो सकता है कि हिन्दी के मिठ्ठ या मठ्ठा से बिगड़कर मांटो बन गया हो | लम्बी व्याख्या सुनकर हेमा ऊब गयी बोली ," अपनी मास्टरी क्लास में किया करो | मुझे सीधी साधी बात बताया करो | " मेज पर नाश्ता ज्यों ही लगा और मास्टर जी कुर्सी पर खानें के लिये बैठे वैसे ही न जानें कैसे मांटो को जो बरामदे में तख़्त के नीचे लेटा था इसकी खबर लग गयी | वह दौड़कर गैलरी से होता हुआ कमरे के द्वार पर भोली आँखों से टुक -टुक देखता हुआ पूँछ हिलानें लगा और फिर दबे पाँव आकर मास्टर जी  के पास कुर्सी के पायों के साथ चिपक कर बैठ गया | अब क्या किया जाय ? मास्टर जी ने एक बिस्कुट नीचे डाला | मांटो ने अत्यन्त श्रद्धा पूर्वक प्रसाद ग्रहण कर लिया | हेमा कमरे में आयी निगोड़े मांटो को कुर्सी की पायों के पास बैठे हुये देखा और जान गयी कि मास्टर जी नाश्ते का अच्छा खासा भाग उसे खिला देंगें | , " बोली आप अपना नाश्ता करिये मैं इसे बरामदे में ही ठीक तरह से खिला दूंगीं | | अब बच्चों के लिये इसको भी पालना  ही होगा | पर गू- मूत कौन करेगा | नाशपीटा जगह -जगह टांग उठाकर मूतेगा | मैं इसे गेट के पास ही जंजीर से बांधकर रखने का इन्तजाम करूँगीं | तुम्हें देर हो रही है ,तैयार होकर स्कूल जाओ | "मास्टर जी ने खुशगवार नज़रों से अपनी पत्नी को देखा और स्कूल जानें की तैयारी में जुट गये | हेमा ने ब्रेड के कुछ पीस सेंके ,कुछ बिस्कुट लिये और बरामदे में आकर तखत पर बैठ गयी | मांटो तखत के नीचे बैठकर उनकी ओर टुकुर -टुकुर देखने लगा | उसकी आँखों का भोलापन और मालिकिन के प्रति उसके अटूट विश्वास ने हेमा का मन जीत लिया | वह एक -एक बिस्कुट डालती रही और वह उसे खाकर दुबारा फिर याचना भरी आँखों से उसकी ओर देखता | कई ब्रेड पीस और कई बिस्कुट खाकर वह अब और डाले गये बिस्कुटों को सूंघकर छोड़ने लगा | हेमा जान गयी कि उसका पेट भर गया है और वह उसे बरामदे में छोड़कर अन्दर चली गयी | अन्दर के कमरे से उसने काठ की एक पुरानी बड़ी चौकी निकाली | फिर खोजकर उसने चौकी की साइज की पुरानी गद्दियाँ निकालीं इन दोनों को उसने गेट के पास दीवाल से लगे पक्के बार्डर पर रख दिया | फिर टीन के एक चैड़े जग में पीनें का पानी लाकर वहां रख दिया | अब बरामदे में आकर उसने हुक्म दिया ,मांटो ,मांटो उठ  जाकर उस चौकी पर जाकर सो जा | न जानें कैसे मांटो को उस भाषा की पूरी समझ आ गयी | वह उठा ,चौकी के पास गया ,सपड़ -सपड़ करके चार पांच बार पानी पिया  और फिर चौकी पर लेटकर आँखें बन्द कर लीं | हेमा को लगा कि मांटो समझदार है | यह बच्चों का एक अच्छा दोस्त साबित होगा | थोड़ा बहुत झंझट तो  है पर अब जब अपने आप आ गया है तो वह उसे नहीं निकलेगी | चौकी पर लेटा -लेटा मांटो कभी झपकी लगाता ,कभी आँखें खोलता ,कभी बरामदे के बाहर की लम्बी चौक में इधर से उधर घूमकर नयी जगह का जायजा लेता रहा | एकाध बार मालिकिन के गेट के पास आने पर वह चुपचाप आज्ञाकारी सेवक की भांति उनके पीछे खड़ा होता रहा | फिर दिन के डेढ़ बजे के करीब जब स्कूल बस गेट के पास आकर रुकी तो मांटो उछलकर गेट के पास खड़ा होकर दुम हिलानें लगा ,और कूँ -कूँ करके अपने प्यार का इजहार करने लगा |  उसे पता चल गया  कि रम्मो और डब्बू आ रहे हैं | रम्मो और डब्बू के गेट से अन्दर घुसते ही वह उनके पैरों पर लोटनें लगा | और कूँ -कूँ की आवाज करता हुआ उनसे मांग करता रहा कि वे उसकी पीठ पर हाँथ फेरें | हेमा बोली ,"अरे बेशर्म कपड़े तो बदल लेने दे फिर तू अपनी नौटंकी करना |" पर रम्मो और डब्बू अपना -अपना स्कूली बैग माँ को थमाकर मांटो से खेलने में लग गये | कभी वे उसे गोद में बिठलाते ,कभी वे उसे हांथों में उठाते और कभी उसके साथ गलियारे में दौड़ लगाते | काफी समय तक यह खेल चलता रहा ,फिर हेमां ने कपड़े बदलकर खानें के लिये आवाज लगायी तो  मांटो जान गया कि उसके भी लंच खानें का टाइम आ गया है | बच्चों ने कमरे के अन्दर के बजाय बाहर बरामदे में तखत पर खाना पसन्द किया ताकि मांटो भी उनके पास बैठा रहे | वे खानें में सभी चीजें एक तश्तरी में रखकर मांटो के पास अलग से रख आये | माँ ने कहा था कि पप्पी को मीठा नहीं खिलाना चाहिये इसलिये उन्होंने मांटो की तश्तरी में हलुआ नहीं रखा था | रम्मो और डब्बू ने खाना शुरू करके दूर बैठे मांटो से खानें के लिये कहा पर उसने सभी चीजें सूंघकर खाना शुरू नहीं किया | रम्मो ने मम्मी को बुलाकर पूछा कि मांटो खाना क्यों नहीं खाता क्या वह बीमार है | हेमा को अपने मायके में अच्छी नस्ल के कुत्तों के साथ रहने खेलने का सुअवसर मिला था | वह इन वफादार प्राणियों के स्वभाव से भली भांति परिचित थी | वह जान गयी कि मांटो क्यों खाना शुरू नहीं कर रहा है | उसने रम्मो और डब्बू को बताया कि मांटो जानता है कि उसकी तश्तरी में और सब कुछ तो है पर हलुआ नहीं रखा गया है और जब तक हलुआ उसकी तश्तरी में नहीं रखा जायेगा वह खाना शुरू नहीं करेगा | और ऐसा ही हुआ | ज्यों ही मां ने रसोई घर से लाकर थोड़ा सा हलुआ मांटो की तश्तरी में रखा उसने खाना शुरू किया | और तश्तरी की सारी चीजें चट कर गया | रम्मो और डब्बू जान गए कि मांटो के साथ पक्की दोस्ती निभानी होगी | कि उससे कुछ भी छिपाना न होगा और मांटो उनके लिये हमेशा एक वफादार दोस्त और सेवक बना रहेगा | हेमा भी जान गयी कि मांटो किसी ऊँची नस्ल का पप्पी है | वह भटककर कहीं से खेत में आ गया होगा | मांटो का नाक -नक्शा ,बाल और शरीर गठन बता रहे थे कि उसके पीछे कई अच्छी पीढ़ियों की प्रजनन प्रक्रिया रही होगी | खाना खानें के बाद मांटो अपनी चौकी पर अलसाई आँखों से बैठा था उसी समय सड़क की नाली से रेंगता हुआ एक तिलचट्टा गेट के नीचे से घुसकर भीतर आ गया | मांटो ने झपट कर उसे अपने पंजों में दबोच लिया निर्जीव तिलचट्टा गेट के पास पड़ा था पर मांटो को यह नहीं भाया | लगता था मांटो को गन्दगी कतई पसन्द नहीं | अभी वह पूरी तरीके से भौंक नहीं पाता था पर उसने हल्की भू -भू की आवाज की | हेमा अन्दर से गेट के पास आयी और मांटो मालिकिन को मरे हुये तिलचट्टे को वहां से बाहर फेंक देने की इच्छा अपने हाव -भाव से जाहिर करने लगा |
                                                 हेमा सारी बात समझ गयी और उसने झाड़ू उठाकर तिलचट्टे को गेट खोलकर बाहर सड़क पर बटोरकर फेंक दिया | मांटो फिर अपनी चौकी पर पहरेदारी करने लगा | इसी बीच भूरे बालों वाली एक बिल्ली ऊपर की रेलिंग पर दिखाई दी | मांटो ने फिर हल्की भू -भू की | हेमा ने बाहर आकर रेलिंग को पार करती हुयी बिल्ली को देखा और जान गयी कि मांटो उसको सावधान कर रहा है कि दूध यदि बाहर रखा है तो उसे फ्रिज में रख दें | हेमा को बहुत खुशी हुयी कि घर के काम -काज में मदद करने वाला एक वफादार नन्हा साथी मिल गया है | चार बजे के बाद मास्टर कन्हैया लाल जी के कदमों की आवाज गेट के पास सुनायी पडी | मांटो उछलकर खड़ा हो गया | फिर वही द्रश्य ,पैरों के पास वही लोट -पोट | मास्टर जी से अपने शरीर पर प्यार भरा हाँथ फेरने की मांग | मास्टर कन्हैया लाल जी मांटो को देखकर काफी प्रसन्न से लगे और बोले ,"अरे यार मैं तो सोचता था कि तुझे घर निकाला मिल गया होगा | पर उस्ताद निकला तू | तूने तो हेमा का मन जीत लिया | हेमा मास्टर जी के लिये चाय और बिस्कुट लायी | मांटो बाहर चौकी पर ही बैठा रहा | वह जानता था कि उसके मालिक उसे सच्चे दिल से चाहनें लगे हैं और वे उसे जरूर बिस्कुट खिलाने आयेंगें | और ऐसा ही हुआ | अभी चाय समाप्त भी नहीं हुयी थी कि बाहर से रम्मो और डब्बू दौड़ते हुये आये और बोले कि पुलिस की एक गाड़ी बाहर हमारे घर का पता पूंछकर आ रही है | रम्मो और डब्बू कुछ दोस्तों के साथ बैट -बाल खेल रहे थे उन्होंने गाड़ी के ड्राइवर को अपने घर का पता पूँछते हुये सूना | थोड़ी ही देर में पुलिस वैन में ड्राइवर के साथ डी .एस.पी. होशियार सिंह साहब आ पहुंचें | मास्टर कन्हैया लाल जी ने उन्हें आदर से बुलाकर उनसे पूछा कि उनका आना कैसे हुआ | डी.एस.पी. साहब ने बताया कि बीते कल की शाम को उनका छोटा लड़का मुकेश ड्राइवर के साथ गाड़ी में बैठकर कबड्डी का मैच देखने सिंहपुरा गया था | सिंहपुरा की कबड्डी का मैच इतना रोमांचक होता है कि खेल प्रेमी किशोरों के लिये उसके आकर्षण को रोकना बहुत कठिन साबित होता है | अपने साथ वह घर में पला हुआ एक छोटा पप्पी जिसे हमनें मांटो नाम दिया है भी लेता गया था | मांटो मेरे आला अफसर एस. पी. रूद्र प्रताप सिंह के यहां पली हुयी अच्छी नस्ल की कुतिया रानी का बेटा है | मेरे बड़े आग्रह पर उन्होंने मुझे इसे दिया था | कबड्डी का मैच देखते समय मुकेश को यह ध्यान नहीं रहा कि मांटो उनके पैरों के पास से किधर निकल गया | बाद में उसने काफी तलाश की पर हमें कुछ पता न चला | सारी रात हम लोग बेचैन रहे | हमें शक था कि कोई उसे फुसला कर उठा ले गया है | आज सुबह दिल्ली पब्लिक स्कूल में आपके बच्चों ने अपने दोस्तों से खुशी -खुशी में बताया कि उनके घर एक पप्पी आ गया है | जो पापा के पीछे -पीछे सुबह घूमने के समय चला आया | आप शायद जानते ही होंगें कि मेरी एक छोटी बेटी आपकी बेटी रम्मो के साथ फोर्थ क्लास में पढ़ती है | उसने घर आकर पप्पी की आपके घर आने की बात मेरी पत्नी को बतलायी उसे ही लेने मैं आपके पास आ गया हूँ | आपनें क्या उसका कोई नाम भी रख दिया है |
                                          मास्टर कन्हैया लाल ने उन्हें बताया कि उन्होंने तो कोई नाम नहीं रखा पर रम्मो और डब्बू ने न जानें कैसे उसे मांटो कह कर पुकारा और उसने इसका रिस्पान्स भी दिया | जाहिर है कि मांटो ही आपका पप्पी है | कमरे के भीतर हो रही इन बातों की भनक मांटो को मिल गयी और वह भागकर बिना इजाजत लिये कमरे में घुस आया उसने मास्टर कन्हैया लाल को देखा फिर डी.एस.पी. साहब को और फिर कभी इनके पैरों पर लोटनें लगा कभी उनके फिर हेमा की ओर देखा और दौड़कर उनके पैरों पर लोटनें लगा | हेमा ने उसे उठाकर गोद में बिठाकर हाँथ फेरने लगी | रम्मो और डब्बू भी पास आकर खड़े हो गये | हेमा जिसे  पहले दुर -दुर कर भगाना चाहा था वही उसके लिये अपना बेटा बन गया था | रम्मो और डब्बू का तो वह पक्का दोस्त ही था | और मास्टर कन्हैया लाल की आँखों के आँसू क्या रोके जा सकते थे |  बेटे की विदायी की बेला आ गयी थी | कई पैकेट बिस्कुट के साथ डी.एस.पी. होशियार सिंह की गोद में बैठकर मांटो मास्टर कन्हैया लाल के घर से विदा हुआ पर उसकी स्मृति उस परिवार में हमेशा के लिये रह गयी | तभी तो मास्टर कन्हैया लाल ने हेमलता से सहमति लेकर एक पट्टिका गेट के ऊपर लटकवा दी है| पट्टिका पर लिखा है -मांटो की स्मृति कन्हैया , हेम, रम्मो और डब्बू के लिये जीवन भर सुरक्षित रखने वाली निधि बनकर रहेगी | लोग उस पट्टिका को पढ़कर कई बार मांटो के विषय में पूँछ -तांछ करते हैं | आशा है कि इस कहानी को पढ़ने के बाद ऐसी किसी पूँछ -तांछ की जरूरतनहीं रहेगी | 
             पुनर्व्याख्या प्रयास

                          नथ्थू का लड़का शंटू आखिर तीसरी बार 10 वीं की परीक्षा पास ही कर गया | नथ्थू की पत्नी शंटू की माँ गुलाबो मुहल्ले भर में घूम -घूम कर बता आयी कि उसका छोरा हाई स्कूल हो गया | मेरा घर पास ही था | नथ्थू कपड़ों पर लोहा करने का काम करता था | एक छोटीसी कोठरी में मेंज डाल रखी थी | आस -पास के घरों से कपड़ा ले जाता था और लोहा करके दे जाता था | उसकी पत्नी गुलाबो भी उसकी मदद कर देती थी | घर में पांच बच्चे थे तीन लडकियां और दो लड़के | शंटू सबसे बड़ा था उससे छोटी बहिन छुनिया थी जो इस बार ग्यारहवीं पास कर बारहवीं में चली गयी थी | मां के साथ वह भी कभी -कभी कपड़ों में प्रेस के काम में लग जाती थी पर शंटू था जो रोज अपने बालों को नये ढंग से सजाकर अकड़ में घूमता रहता था | उसने कभी लोहे पर हाँथ नहीं लगाया था | उसके दोस्त उसे हीरो कहकर बुलाते थे | उनके लिये शंटू हीरो  था भी क्योंकि वे आठवीं ,नौवीँ में ही पढ़ाई छोड़ चुके थे | अगली बार नथ्थू जब घर पर कपड़े देने आया तो शंटू के विषय में मेरी राय मांगीं | बोला शंटी हाई स्कूल पास हो गया है | अब आपकी राय में उसे आगे पढ़ना चाहिये या नहीं | मैनें जानना चाहा कि शंटू ने कितने प्रतिशत नम्बर प्राप्त किये हैं तो नथ्थू ने बताया कि 40 -41 के आस -पास प्रतिशत है | बस पास- पास हुआ है | फिर कहने लगा उसकी छोटी बहन छुनिया बहुत अच्छे नम्बरों से पास हुयी थी | ग्यारहवीं में वजीफा मिला और अब फिर उसके अच्छे नम्बर आये हैं | आगे भी वजीफा मिलता रहेगा | शंटू का दिमाग कुछ ठोस है | क्या शंटू को भी वजीफा मिल सकता है ? मुझे सरकारी स्कीमों का खास कर पढ़ाई -लिखायी में सरकारी मदद की स्कीमों का न के बराबर ज्ञान था | मैनें नथ्थू को बताया कि मुझे इस बारे में ठीक पता नहीं है वो स्कूल जाकर हेड मास्टर साहब से मिलकर पता कर ले | जहां तक मैं सोचता हूँ शायद सरकार ने अनुसूचित जाति के बच्चों के लिये वजीफे की कोई न कोई स्कीम लागू अवश्य की होगी |
                              नथ्थू स्कूल जाकर पूरी जानकारी हासिल कर लाया | उसने पता लगा लिया कि जब तक शंटू पास होता रहेगा उसकी फीस माफ़ रहेगी ,किताबें मुफ्त मिलेंगी और वजीफा भी मिलता रहेगा | सचमुच भारत का संविधान भारत सरकार द्वारा दलितों को ऊपर उठाने के लिये कितने कारगार कदम उठाने की ताकत देता रहता है | एक तरफ तो मेरा मन यह सब सोच -सोच कर खुश होता था पर दूसरी तरफ मेरे मन में यह भी होता था कि यह सारी सुविधायें उच्च वर्ग कहे जानें वाले गरीब परिवार के बच्चों को भी मिलनी चाहिये | मेरे एक परिचित दीन दयाल शुक्ला कई बार घर पर पैसे मांगनें आये थे क्योंकि उन्हें अपने स्कूल में पढनें वाले बच्चों की फीस भरनी होती थी | बिचारे शुक्ला जी ने मन्दिर के पास फूलों की एक छोटी सी दुकान खोल रखी थी | मुश्किल से उनका गुजर -बसर हो रहा था | रोटी के लाले पड़ रहे थे फिर फीस कहाँ से दें ? उनके पूर्वजों ने कुछ जानें -अनजानें ऐसी समाज व्यवस्था की तरफदारी की होगी जो आज उनके लिये अभिशाप बन गयी थी | कई बार मन्दिर जाते समय मैं उनकी दुकान से फूल ले लेता और कहता ,"अरे पण्डित जी कैसे हैं ?ठीक तो चल रहा है ? तो वे उत्तर देते समदर्शी जी ,मुझे पण्डित जी मत कहा करिये | पण्डित होना तो आज पाप हो गया है | बाप दादों द्वारा किये गये किसी कल्पित अपराध का बदला हम लोगों से चुकाया जा रहा है |
                                     समय तो रुकता नहीं शंटू ग्यारहवीं में फेल हो गया और उसका वजीफा बन्द हो गया | शुक्ला  जी का बेटा माधव बारहवीं में अच्छे नम्बरों से पास हो गया | बैंक पड़ोस के कस्बे में एक नयी शाखा खोलनें जा रहा था | एक चपरासी की नियुक्ति होनी थी , पहले यह नियुक्ति तदर्थ स्तर पर होनी थी फिर इसे स्थायी करना था |
                                   मिनिमम क्वालीफिकेशन हाई स्कूल पास होना था | एम. और बी.ए. पास न जानें कितनी दरख्वास्तें आयीं | शुक्ला जी का लड़का माधव भी एक अप्लीकेन्ट था | वे मेरे पास माधव की नियुक्ति के लिये प्रार्थना करने आये , मैनें उन्हें स्पष्ट बता दिया कि माधव नहीं लग सकता | ऊपर से यह निर्देश है कि अनुसूचित जाति के लिये ही यह पद सुरक्षित है | अब देखिये अनुसूचित जाति के अप्लीकेंट्स में कौन बाजी मारता है | हर एक के साथ कोई न कोई भारी -भरकम नेता खड़ा है | आखिर बाजी शंटू के हाँथ लगी | नथ्थू कई बड़े लोगों के कपड़े प्रेस करता था और उसने जोड़ -तोड़ कर ऐसी सिफारिश लगवायी कि लखनऊ का रीजनल आफिस शंटू की योग्यता से प्रभावित हो गया | अब शंटू के हीरो होने में कोई शक नहीं रहा | उसकी चाल -ढाल ,बालों की स्टाइल और सिगरेट पीने की मुद्रा सभी में ऊँचे वर्ग की झलक आने लगी | पैसों के अभाव में माधव की पढ़ाई बन्द हो गयी और उसने अपने पिता जी के साथ दुकान में बैठना प्रारम्भ कर दिया | दिन बीतते गये ,एकाध वर्ष गुजरा माधव ने जोड़ -तोड़ कर दुकान पर हवन सामग्री भी रख ली | पर सब मिलाकर अब भी मुश्किल से दो जून की रोटी जुट पाती थी | जन्माष्टमी की पहली वाली शाम को मैं शुक्ला जी की दुकान पर फूल लेने गया | माधव ने उठकर मेरे पैर छुए और बोला चाचा जी क्या करें ? मेरा मन तो आत्महत्या करने का कर लेता है | जब भीख मांगनें की नौबत आ जाये तो रास्ता ही क्या बचता है ?मैं भीतर ही भीतर काँप गया | इतना भला ,तीब्र बुद्धि और चरित्रवान लड़का आत्महत्या की सोच रहा है | यह कैसी समाज व्यवस्था है ? इसका अपराध तो केवल इतना ही तो है कि यह किसी ब्राम्हण के घर जन्मा है | मैनें कहा माधव ,अपने पिता जी को घर पर भेजना मैं उनसे कुछ बात करूँगा | जन्माष्टमी को मेरा ब्रत था | शुक्ला जी आ गये | माधव के सम्बन्ध में बात -चीत चल पड़ी ,मैनें कहा ," शुक्ला जी आप बुरा न मानें तो एक बात कहूँ | आप की बात का बुरा मानूगां तो फिर अपना किसे कहूंगां | अच्छा तो एक काम करिये | बोलो क्या करना है ? माधव को मेरे पास भेज देना ,मैं उसको एक अप्लीकेशन लिखा दूंगा | वह तो दस्तखत करेगा ही आप भी उस पर दस्तखत कर दें | उसके साथ आपको गरीबी रेखा से नीचे जो कार्ड मिला है उसकी कॉपी लगानी होगी और एक सर्टिफिकेट और भी लगानी होगी | कैसी सर्टिफिकेट ? शहर में रमेश भाई की एक लॉण्ड्री की बड़ी दुकान है वहां से एक सर्टिफिकेट लेना है कि माधव ने लॉण्ड्री में 6 महीनें काम किया है और उसे ड्राई क्लीनिंग और कपड़ों पर प्रेस करने का अनुभव है |
                                         शुक्ला जी चिन्तित हो उठे | कुछ देर सोच कर बोले समदर्शी जी तो क्या हम लोग कपडे धोनें और प्रेस करने का काम करेंगें ? हमारी खानदानी इज्जत और कुल की मर्यादा का क्या होगा ? और फिर माधव का व्याह भी तो करना है | उसकी छोटी बहिन भी तो 9 वीं में पढ़ रही है आप हमें यह क्या करने को कह रहे हैं ? मैनें शुक्ला जी से विनम्रता के साथ निवेदन किया |
                                       " देखो पण्डित जी जितना पवित्र काम मन्दिर के द्वार पर फूल बेचना है उससे कम पवित्र काम कपड़ों पर प्रेस करना नहीं है | सच पूछों तो प्रत्येक ईमानदारी का काम उतना ही पवित्र है जितना पूजा | किसी भी गन्दगी को चाहे वह तन की हो या मन की ,कपड़ों की हो या घर के बाहर चबूतरे की सभी का साफ़ करना पवित्रता को बढ़ावा देना है | आप तो स्वयं पण्डित हैं ,मुझे अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है | हमारे समाज के कुछ गर्वीले लोगों ने काम के साथ मनुष्यों की ऊंचाई नीचाई का सम्बन्ध जोड़ दिया | इस घातक विष ने हमारे समाज को निर्जीव कर दिया है | कपड़ों की धुलाई और प्रेस का काम किसी एक जाति का नहीं है ठीक उसी प्रकार जैसे फूल बेचने का काम या पूजा करने का काम किसी एक जाति का नहीं है | यह सब मान्यतायें इस बदले जमानें में मरे कुत्ते को ढोनें के समान हैं | मनुष्य अपने चरित्र ,ईमानदारी और सामाजिकता के कारण बड़ा या छोटा होता है | गृहस्थी संचालन और जीवन संचालन के लिये वह कोई भी काम जो उसके लिये उचित आमदनी जुटा सके कर सकता है | माधव तीब्र बुद्धि है निश्चय ही वह मेरी सोच का समर्थन करेगा |
                                          और ऐसा ही हुआ | माधव ने दौड़ -धूप कर कागजात पूरे कर लिये मेरे प्रयत्न से  और शुक्ला जी की छल रहित सादगी के कारण शहर की एक चलती -फिरती सड़क पर एक दुकान मिल गयी | मेरे मित्र श्री धर रावत ने किराया भी बर्दाश्त करने के लायक रखा | दुकान की साइट फोटो भी अप्लीकेशन के साथ लगा दी गयी ,सभी बातें नियमानुसार होने के कारण मैनें लोन रिकमेन्ड कर दिया | उस दिन मुझे कितनी खुशी हुयी जब रीजनल आफिस से लोन की अप्लीकेशन मंजूर होकर आ गयी | 2 मई  2016  को शुक्ला जी को दो लाख रुपये का लोन मिल गया | सालाना व्याज की दर केवल 8 प्रतिशत थी | लोन मिलने पर माधव मेरे पास आया ,पैर छूकर बोला चाचा जी मुझे एक महीनें रमेश भाई की लॉण्ड्री में ट्रेनिंग के लिये रिकमेन्ड कर दीजिये | इस बीच मशीनों का और दूसरे जरूरी फर्नीचर आदि का इन्तजाम हो जायेगा मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं जी तोड़ मेहनत करूंगा और सफल होकर दिखाऊंगा | रमेश भाई ने एक होनहार नवयुवक की मदद की | 18 जुलाई 2017 माधव मेरे पास एक निमन्त्रण पत्र लेकर आया यहां मैं बता दूँ कि पहले में लालगंज में था अब मेरा तबादला लखनऊ की एक ब्रान्च में हो गया है | माधव ने कहा चाचा जी आपनें मेरी तकदीर बदल दी आज माधव लॉण्ड्री को लालगंज में कौन नहीं जानता | दुकान भी मेरी अपनी हो गयी है ,मैनें खरीद ली है | तीन सहयोगी लगा दिये हैं | काम चुकाये नहीं चुकता ,सोचता हूँ कि एक और दुकान खोल लूँ | फिर उसने दुबारा मेरे पैर छूकर कहा चाचा जी मेरी शादी में अवश्य आइयेगा | आपकी होने वाली बहू कल्पना के पिता भी आपके बैंक में ही कानपुर में आफीसर हैं | कल्पना आपका आशीर्वाद पाकर धन्य हो जायेगी | आज्ञां दीजिये | खुशी से मेरा मन भर गया |
                                     इस घटना ने भारतीय हिन्दू समाज के विकास के लिये मुझे एक नयी द्रष्टि प्रदान की है | मैं  समझता हूँ कि छोटे कहे जानें वाले कामों में बड़ी कही जानें वाली जाति के नवयुवकों को पूरी महारथ हासिल करनी चाहिये | आपसी सहयोग ,आपसी सदभाव और यदि सम्भव हो तो समर्थ लोगों द्वारा वित्तीय सहायता या सरकारी सहायता के बल पर छोटे कहे जाने वाले काम बड़ी कही जाने वाली जाति के नवयुवकों के लिये आमदनी का बहुत अच्छा सुअवसर प्रदान कर सकते हैं | और इन कामों के कुशलता पूर्वक करने में वे सचमुच बड़े होने का गौरव पा सकेंगें |
                                 'माटी ' के पाठक मेरी उस अपार खुशी को यह कहानी पढ़कर अनुभव कर लेंगें जब माधव और उसकी पत्नी कल्पना मेरी पत्नी मधु और मेरे चरणों के पास बैठकर मेरा आशीर्वाद मांगनें आयें | यदि हम अपने को ऊंचा मानते हैं तो हमें कुछ ऊंचा करके दिखाना होगा |
     संस्कृत से दूध जलेबी तक
                 पण्डित दीना नाथ ने संस्कृत साहित्य में डाक्टरेट की | सौभाग्य से उसी समय उ ० प्र ० के रायबरेली के फिरोजगांधी महाविद्यालय में संस्कृत प्रवक्ता की एक पोस्ट खाली हुयी | अपने गुरु और रिसर्च गाइड अंबरीष शास्त्री की सिफारिश के बल पर वे इण्टरव्यूह में सेलेक्ट कर लिये गये | डा ० दीनानाथ का व्याह तो हो चुका था पर अभी तक कोई सन्तान न थी | महाविद्यालय परिसर में क्वार्टर न मिलने के कारण उन्होंने किराये पर एक मकान ले लिया | मध्यम वर्गीय जीवन चल निकला | संस्कृत प्रवक्ताओं को ट्यूशन और कोचिंग से अधिक आमदनी नहीं हो पाती | इसलिये वह विज्ञान और अंग्रेजी के प्राध्यापकों से मन ही मन थोड़ा -बहुत खिन्न रहते हैं | डा ० दीनानाथ भी वेद और शास्त्रों की महिमा और संस्कृत साहित्य के अमर गौरव की बातें करते न थकते थे ,इसमें कोई शक नहीं कि संस्कृत पर इनका अच्छा अधिकार था | पर बोलचाल की भाषा न होने के कारण संस्कृत के विद्वान को   गौरव  गोष्ठियों में ही मिल पाता है | समय पाकर प ० दीनानाथ के दो पुत्र हुये श्री धर बड़ा था और हलधर उससे तीन वर्ष छोटा | बच्चों की मां सद्ग्रहणी थी ,घर के काम -काज और पूजा -पाठ में लगी रहती थी | घर की सफाई के लिये एक अंशकालिक महरी लगा ली गयी थी | श्रीधर जब पांच वर्ष का हुआ तो उसकी शिक्षा -दीक्षा प्रारम्भ हुयी | वह पढनें -लिखने में बहुत तेज था , हर वर्ष अपनी कक्षा में प्रथम आता | इनाम पर इनाम इकठ्ठे होते चले गये | पण्डित दीनानाथ को गर्व था कि उनका लड़का उनकी ख्याति को चतुर्दिक फैला देगा | पर छोटा लड़का हलधर श्रीधर से बिल्कुल उल्टा था बड़ी मेहनत के बाद बस इम्तहान भर पास कर पाता था | समय तो निरन्तर गतिशील है देखते -देखते 10 वर्ष निकल गये | श्रीधर अब कालेज का टॉपमोस्ट विद्यार्थी था और हलधर हाईस्कूल में फेल होकर दुबारा इम्तिहान की तैय्यारी कर रहा था | भगवान् का भी कैसा विचित्र  विधान है दोनों सन्तानें मां बाप के संयोग से जन्मी थीं पर दोनों की प्रतिभा अलग -अलग थी | श्रीधर ऊंची साहित्यिक बातें करता था और हलधर अलग -अलग किस्म की मिठाई खानें में लगा रहता था | कई बार वह अपने एक दोस्त जिसके पिता मिठाई की एक दुकान करते थे के पास चला जाता था और वहां मिठाइयों के सम्बन्ध में जानकारी इकठ्ठा करता और मित्र की मित्रता के बल पर उनका स्वाद भी चखा करता था | अर्ध दशक की कड़ी मेहनत के बाद श्रीधर सबार्डिनेट सर्विसेस का इम्तहान पास कर गया और नायब तहसीलदार के नाते उसकी नियुक्ति हो गयी | डा ० दीनानाथ ने चारो ओर कहना शुरू किया कि थोड़े ही दिनों में श्रीधर तहसीलदार हो जायेगा फिर डिप्टी कलक्टर और उसे कलक्टर बन कर रिटायर होना है | घर में खुशियां फ़ैल गयीं और बड़े -बड़े घरों से सम्बन्ध आने प्रारम्भ हो गये | हलधर दूसरी बार भी हाईस्कूल में गणित में रह गया | पण्डित दीनानाथ बहुत नाराज हुये बोले तू क्या करेगा ,ठेला लगायेगा ,अपने भाई को देख तूने घर की इज्जत चौपट कर दी ,लोग कहते हैं कि प ० दीनानाथ का दूसरा लड़का गुन्डू है | विचारा हलधर बिना बोले सब कुछ सहता रहता | आखिर उसके पिता की बातों में सच्चाई  तो थी ही | क्या करे उसको  गणित भी नहीं आती | दुकान भी कोई खुलवायी जाय तो हिसाब -किताब में गड़बड़ी करेगा | निराशा भरे क्षणों में वह अपने दोस्त श्रीदत्त के पास चला जाता और जब श्री दत्त के पिता घर होते और श्री दत्त मिठाई की दुकान पर होता तो वह मिठाई की दुकान पर भी बैठ जाता | उसके दोस्त ने उसे बताया कि पहले उसकी दुकान का पेड़ा बहुत चलता था पर अब लोग जलेबी ज्यादा खानें लगे हैं पर रायबरेली में अच्छी जलेबी बनाने वाले हैं ही नहीं | लखनऊ के मोटेमल हलवाई की जलेबी जो एक बार खा लेता है जिन्दगी भर नहीं भूलता | उस दिन हलधर जब अपने घर आया  तो वह किसी गहरी सोच में पड़ गया उसने अपने पिता से कहा कि वह लखनऊ जायेगा ,उसके पिता ने उसे डांट लगाई क्या करेगा लखनऊ जाकर ,झाड़ू लगायेगा | मेहनत करके हाई स्कूल पास करे कहीं चपरासी -अपरासी लगा देंगें | हलधर ने अपनी मां के पास रोकर कहा कि उसे 500 रुपये दे वह दो तीन दिन में लखनऊ में नौकरी तलाश करके कोई छोटा -मोटा काम कर लेगा ,यदि न मिला तो वापस आ जायेगा | माँ की ममता तो अपार होती है | वैसे हलधर छोटा होने से मां को अधिक प्यारा था | श्रीधर बड़े भाई में कुछ बड़प्पन का भाव आ गया था | यद्यपि उसके भारतीय संस्कार उसे विनम्र बनाये रखते थे | मां से 500 रुपये लेकर हलधर लखनऊ में मोटामल की दुकान पर  पहुंचा | मोटामल के पास दो -तीन नौकर थे ,पर एक नौकर बड़ा कामचोर था ,कई दिन से काम पर नहीं आ रहा था | कड़ाही पूरी तरह साफ़ नहीं होती थी क्योंकि दूसरे नौकर कड़ाही की सफाई के काम को इतना अच्छा नहीं जानते थे जितना कि वह कामचोर नौकर | मोटामल ने हलधर से कुछ घर की बातें पूछीं जान लिया कि लड़का अच्छे घर का है ,चोरी- चकारी नहीं करेगा | फिर बोला कढ़ाई साफ़ कर लोगे | हलधर सब कुछ करने को तैय्यार था , वह जानता था कि पढ़ाई में अब वह आगे नहीं बढ़ सकता पर जिन्दगी में कुछ करके अवश्य दिखलायेगा | उसने हमीं भरी मोटेमल ने कहा अच्छा ठीक है अन्दर और नौकरों के साथ बैठो शाम को कढ़ाई साफ़ करके दिखाना | उस शाम हलधर कढ़ाई की सफाई में डेढ़ -दो घण्टे लगा रहा | ,वह काफी बड़ी कड़ाही थी वैसे तो और भी कढाइयाँ  थीं पर कई कढ़ाइयों से होकर इस बड़ी कढ़ाई के जलाव में जलेबी को विशेष स्वाद देने के लिये डाला जाता था | मोटामल काम देखकर बहुत खुश हुआ ,शाबासी दी बोला बताओ रहोगे कहाँ | हलधर ने कहा दुकान पर ही सो लेगा और पास के सड़क के ढाबे में खा आया करेगा | मोटामल ने उसे रोज के 100 रुपये और 200 ग्राम जलेबी देने पर नौकर रख लिया |
                                     इधर श्रीधर की शादी तय हो गयी | लड़की अभी एम ० ए ० के फाइनल में थी इसलिये शादी की तिथि फ़ाइनल इम्तहान  होने के बाद की तय की गयी | हलधर को अपने दोस्त के द्वारा सारी सूचना मिल जाती थी | उसके दोस्त नें उससे कहा कि पड़ोस में एक मिठाई की दुकान खाली होनें वाली है उसके पिता उसे खरीदना चाहते हैं | अगर हलधर तबतक काम सीख जाता है वही हमारे पास आकर यहीं रायबरेली में ही अपनी दुकान चला ले | हलधर भले ही हाई स्कूल न कर पाया हो पर अब उसने बड़े गौर से जलेबी बनाने की प्रतिक्रिया को देखनें -समझनें की कोशिश की | किस तरीके से और कितनी देर तक मैदा फेटी जायेगी उसमें और क्या -क्या मिलाया जायेगा | किस ब्राण्ड के शुद्ध घी का इस्तेमाल होगा | कितनी देर तक जलेबी घी कढ़ाई में रहेगी | जलेबी के वर्तुल आकार को किस तरीके से खूबसूरत बनाया जाय | उसके रंग को निखारनें के लिये क्या कुछ और अतिरिक्त समिश्रण की आवश्यकता है | बड़ी कडाही  में जलाव किस मात्रा में और कितनी मिठास का बनेगा और उसमें गर्म शुद्ध घी की महक लिये हुये चक्राकार जलेबी कितनी देर तक भिगो कर रखी जायेगी फिर यदि सारा माल हाथ के हाथ नहीं बिक जाता तो उसका संरक्षण कैसे किया जायेगा ताकि उसके स्वाद में कोई कमी न आये | चार महीनें के कठिन परिश्रम , घोर ईमानदारी और सीखने की तीव्र अन्तर इच्छा ने हलधर को पक्का जलेबी एक्सपर्ट बना दिया | मोटेमल का माल हांथो हाँथ बिक जाता था | जलेबी निकलने से पहले ही ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी | कइयों को लम्बा इन्तजार करना होता था | मोटेमल ने दुकान के पास एक अलग भट्टी पर अपने लड़के सोने लाल को भी गर्म दूध की कडाही के साथ बिठा रखा था | मलाई पड़ा हुआ दूध और मोटेमल की चक्राकार जलेबियाँ सुबह के लिये एक बहुत अच्छा नाश्ता मानी जाती थीं | डा  ० दीनानाथ को हलधर के विषय में जानकारी करने के लिये श्री दत्त के पिता से मिलना पड़ा | यह जानकर कि वह जलेबी की दुकान पर कढ़ाई मांज रहा है डा ० दीनानाथ झल्ला गये | घर आकर हलधर की मां से लड़ाई की बोले तुमनें पैसे देकर लड़के को बर्बाद कर दिया | अब दुनिया कहेगी डा ० दीनानाथ का लड़का हलवाई की दुकान पर कढ़ाई मांजता है | मैं तो मुंह दिखाने लायक नहीं रहा | हलधर की मां ने धीरे से कहा कमा कर खाता है चोरी तो नहीं करता | देख लेना एक दिन हलधर हमारे लिये सहारा बनेगा | कभी -कभी मोटामल जब अस्वस्थ होते तो दुकान में आकर गद्दी पर बैठ जाते और जलेबी बनाने का पूरा काम हलधर करता था और उसकी बनी हुयी जलेबी मोटामल की जलेबी से कम नहीं मानी जाती थी |जैसे -जैसे हलधर का हाँथ साफ़ होता गया वह और बढ़िया कारीगर बनता गया | अब ग्राहक मोटामल की जलेबी पसन्द न करके हलधर के हाँथ की जलेबी मांगनें लगें | मोटेमल ने सोचा कि यह लड़का तो उसे बाजार में नाकामयाब कर देगा | इसलिये उसने हलधर से कहा कि वह अपना और कहीं इन्तजाम कर ले |
                                                हलधर यों तो हाई स्कूल पास नहीं कर पाया था पर उसने अंग्रेजी का एक वाक्य या कहावत सुन रखी थी | " God helps those who helps themselves ." हलधर ने अपने दोस्त श्रीदत्त से मुलाक़ात की जैसा कि पहले कहा जा चुका है पास वाली दुकान को श्रीदत्त के पिता ने खरीद लिया था | श्रीदत्त के पिता जलेबियाँ नहीं बनाते थे बाकी और सब मिठाइयां बनाते थे ,उनका पेड़ा तो सारे शहर में मशहूर था | हलधर ने श्रीदत्त की मदद से पास की दुकान में जलेबी का काम शुरू किया साथ में ताजा दूध मलाई चढ़ाकर जलेबी के साथ लेने के लिये लोगों में नाश्ते की नयी आदत डालने की कोशिश की |  अच्छी और शुद्ध चीज सभी को भा जाती है | हलधर का काम चल निकला ,उसने श्रीदत्त के पिता को जो किराया जो माँगा देना शुरू कर दिया | खर्च निकालकर उसे  शुरू में दो तीन सौ रुपये प्रतिदिन की बचत होने लगी | लखनऊ से कुछ नयी बातें भी सीख आया था | उसने अपनी जलेबी और दूध के प्रचार के लिये पर्चे छपवाये और अखबार के हॉकरों को कुछ पैसे देकर उन पर्चों को घर -घर पहुंचाया | जो भी हलधर के  दुकान की जलेबी खाकर उसका दूध पी गया वह वह फिर हमेशा के लिये हलधर का ही हो जाता था | दुकान पर इतनी भीड़ होने लगी कि उसने सफाई और दूसरे कामों के लिये दो लड़के लगा लिये | अब सारे शहर में हलधर की जलेबी और दूध ,श्रीदत्त का पेड़ा मशहूर हो गया | बड़े भाई श्रीधर की कुल तनख्वाह कुल मिलाकर 2000 रुपये पड़ती थी हलधर ने पाया कि वह नौकरों का खर्च निकालकर 1000 रुपये की आमदनी प्रतिदिन करने लगा | काम बढ़ाने के लिये वह शहर के मुख्य मार्ग पर दुकान की तलाश करने लगा | हर रोज की आमदनी बैंक में जमा करने लगा | डा ० दीनानाथ अभी तक हलधर की दुकान पर नहीं गये थे पर धीरे -धीरे उन्होंने अपने कालेज के साथी प्राध्यापकों से हलधर की जलेबी और दूध की तारीफ़ सुनी पर उनका आभिजात्य का अहंकार अपने बेटे को हलवाई बना देखकर चोटिल हो रहा था | इधर श्रीधर की शादी की तारीख निकट आ रही थी ,चढ़ावे के लिये पूरी उत्तर प्रदेशीय परम्परा में सोने के बनें कुछ गहनें बनवानें आवश्यक होते हैं | सोना 30 -31  हजार 10 ग्राम की ऊंचाई पर चल रहा था , जेवरों की कीमत लाखों में पहुँच रही थी | श्रीधर के पास अभी इतना पैसा नहीं था | डा ० दीनानाथ ने अपने प्रावीडेन्ट फण्ड से लोन लेने के लिए अप्लाई कर दिया | शिवदत्त के द्वारा यह सूचना हलधर को मिली | हलधर उस शाम घर पहुंचा , मां के पास बैठकर डरता -डरता पिता का इन्तजार करने लगा | जब पिता जी आये तो उसने पैर छुये पर डा ०   दीनानाथ ने उससे बातचीत नहीं की | हलधर ने मां को बताया कि पिताजी को लोन लेने की जरूरत नहीं है , जेवरों के लिए जो पैसा लगेगा मैं दूंगा | फिर वह अपनी दुकान पर चला गया | उसकी दुकान पर अब 5 -6 नौकर काम करते थे और सुबह 6 बजे से दिन को 10. 30 बजे तक सड़क पर  भीड़ खड़ी रहती थी | हलधर की मां ने रात को यह बात अपने पति दीनानाथ को बतायी | डा ० दीनानाथ चकित रह गये , हे भगवान् हाई स्कूल पास न करने वाला भोंदू 50000 /-रुपये का आदमी बन गया | मां ने कहा हलधर कहता था कि उसने एक नयी दुकान देखी है वहां पर अपनी नयी ब्रांच खोलेगा | अब नयी प्रकार की मशीन आ गयी है | जिनसे बहुत गोल खूबसूरत जलेबियाँ निकाली जा सकती हैं | जलाव में भी कुछ पौष्टिक रसायन मिलाये जाते हैं | अब पेड़े बर्फी का संसार सूना होने लगा है और जलेबी का संसार बसने लगा है | फिर डा ० दीनानाथ की पत्नी ने कहा देखा मेरा भोंदू हलधर तुम्हारी पंडिताई को मात कर गया | भगवान ने चाहा तो एक दिन आपको हलधर ही गौरव के शिखर पर बिठा  देगा | श्रीधर की अफसरी ससुराल के बंधनों से घिर जायेगी पर हलधर आखरी सांस तक हमारी सेवा करेगा | मैं उसके लिये कोई एम ० ए ० फेमें बहू नहीं लाऊंगी ,बढ़िया भोजन बनाने वाली ,गृहस्थी चलाने वाली सामान्य घर की ब्राम्हण कन्या हमारे घर का श्रृंगार बनेगी | फिर हंसकर बोली पण्डितजी एक काम करो हलधर की दुकान पर जाकर उसे आशीर्वाद दे आओ और कह देना की उसकी मां ने जलेबी और दूध मंगाया है | सारी जिन्दगी बाजी जीतने वाले डा ० दीनानाथ अपने भोंदू लड़के से बाजी हार गये |