Saturday 4 September 2021

Gurudevo Bhavh

इस कहानी का सम्बन्ध बिहार में मोतीहारी के नजदीक एक ग्राम मिसरौली से है | घटना वास्तविक है पर पात्रों और स्थानों के नाम बदल दिये गये हैं | इन्जीनियर श्री कान्त मिश्र से सम्बन्धित इस कहानी को उन्हीं के मुंहसे लगभग 10 वर्ष पहले सुना था | सेवा निवृत्त के बाद वह इस सँसारको भी छोड़ चुके हैं | पर जब कभी उनकी यह कहानी याद आती है मुझे उनमें मानवता का सजीव रूप दिखायी पड़ता है | श्री कान्त जी नें कहा , " मेरे पिताजी दसवीं पास करके साइकिल के एक मिस्त्री के साथ काम करने लगे थे | धीरे -धीरे उन्होंने छोटी-मोटी मशीनों को ठीक करने में भी महारथ हासिल कर ली फिर उन्हें पटना की सिलाई मशीन बनानें वाली एक फैक्ट्री में काम मिल गया | वहाँ से वे हरियाणा में लक्ष्मी सिलाई मशीन की नयी फैक्ट्री खुलने पर जूनियर इन्जीनयर के पद के लिये अप्लीकेशन भेजी | उन्हें बुलाया गया और मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट में उनका टेस्ट लिया गया | काम में तो वह होशियार थे ही फैक्ट्री में जूनियर इन्जीनियर बन गये, अब तक उनके दो बच्चे हो गये थे | मैं बड़ा था लगभग पाँच साल का और एक थी तीन साल की मेरी छोटी बहिन कुसुमा | पिताजी को फैक्ट्री में तीन कमरों वाला एक अच्छा मकान दे दिया गया और डिप्लोमा न होने पर भी जूनियर इन्जीनियर होने के नाते उनका रुतवा बड़ा माना जाने लगा | माँ के साथ हम दोनों बच्चे उनके पास आ गये| मेरी माँआठवीं पास थीं | और खाते -पीते पण्डितों के घर से थीं | उन्हें पहिनने खाने का शौक भी था और ज्ञान भी | यह फैक्ट्री हरियाणा के जीन्द नामक शहर में खुली थी |पास ही में एक अच्छा सा पब्लिक स्कूल था जिसमें कुछ नयी चाल -ढाल की पंजाबी लड़कियां छोटे बच्चों का क्लास लेती थीं | मेरे पिताजी नें मुझे प्री नर्सरी क्लास में भर्ती करवा दिया | तीन साल तक कभी एक मस्टरानी कभी दूसरी मस्टरानी पढ़ाती | अब मैं क्लास थर्ड में पहुँच गया था | स्कूल अब तक काफी तरक्की कर चुका था और उसके संचालक परमानन्द ठकुराल प्रभावशाली लोगों के सम्पर्कमें आ गये थे | स्कूल अब एक बहुत अच्छी बिल्डिंग में शिफ्ट कर दिया गया था और आठवीं तक के क्लास लगने लगे थे |कहा जा रहा था कि एक दो वर्ष में उसको केन्द्रीय बोर्ड से दसवीं तक मान्यता मिल जायेगी | हेड मास्टर साहब एक बुजुर्ग थे जिनका नाम था नन्द किशोर शास्त्री और अधिकतर अध्यापिकायें लेडीज थीं | जब में कक्षा तीन के इम्तिहान में बैठ गया और चौथी में प्रमोट हुआ तो दोस्तों नें मुझे बताया कि एक नयी ईसाई मास्टरनी आयी है और वह हमें अंग्रेजी और मैथमेटिक्स पढ़ायेगी यहाँ में यह बता देना चाहता हूँ न तो मैं अंग्रेजी में अच्छा था और मैथमेटिक्स में मुझे इनका बस काम चलाऊ ज्ञान था | कुछ दिनों के बाद मैंने जाना कि मेरी नयी मैडम का नाम मिस जूलिया है | वे अभी अविवाहित हैं और जीन्दके छोटे से चर्च में रहने वाले ईसाई पादरी फादर मैथ्यू की बेटी हैं | मैं अपनी कक्षा में आगे की कुर्सियों में न बैठकर बीच में बैठता था और अपनी मैडमों से कोई भी बात पूंछने में बहुत संकोची था | मैडम जूलिया कुछ पढ़ाने के बाद कुछ काम करनें को देती थीं और क्लास में ही वह काम करके दिखाना होता था | इस दौर में वह मेरे काम को देखने के लिये मेरे पास खड़ी हुयीं मैं बता ही चुका हूँ किये दोनों ही विषय मुझे कठिन लगते थे जबकि हिन्दी और सामान्य ज्ञान में मैं काफी तेज था | करीब दस दिन के बाद आगे पड़ी एक खाली छोटी कुर्सी की ओर इशारा करते हुयेमैडम जूलिया नें कहा , " Shri kant Come here ." फिर उन्होंने हिन्दी में कहा इस कुर्सी पर बैठो |अब यहीं आगे से बैठा करो | सकपका कर मैं कुर्सी पर बैठ गया | मैडम जूलिया नें मेरी कापी ली कुछ करेक्शन किये और पूंछाकिघर में कोई पढ़ा लिखा है | मैंने बताया कि मेरे पिता जूनियर इन्जीनियर हैं और मेरी माँ भी पढ़ी-लिखी है | उन्होंने कहा श्री कान्त बेटे कहाँ रहते हो ? मैंने कहा लक्ष्मी स्वेविंग मशीन के कैम्पस में मिले एक क्वार्टर में रहता हूँ | मैडम जूलिया नें कहा ठीक है अपनी माँ को यह कापी दिखाना और वे तुम्हें जो गल्तियाँ है बता देंगीं | मैंने घर जाकर अपनी माँ को सब बातें बतायीं और उन्होंने पिताजी से कुछ बातचीत की | उस दिन के बाद मेरी माताजी और पिताजी दोनों मुझे घर के दिये हुये काम में मदद करने लगे | करीब एक महीने बाद मैंने पाया कि मैडम जूलिया जो पहले सलवार और कुर्ता पहन कर आती थीं अब पैन्ट और हाफ शर्ट पहन कर आने लगी हैं | हम सब बच्चों पर इस पहनावे का अच्छा खासा रौब पड़ा क्योकि वहां पर और कोई भी मैडम पैन्ट-शर्ट नहीं पहनती थी | समय गुजरता गया मैडम जूलिया मेरी कापियाँ देखती रहीं और उनके रिमार्कस Fair से satisfactory होते हुये Good तक पहुँच गये| इसी बीच मैं चौथी पास कर पाँचवीं में प्रमोट कर दिया गया | पाँचवीं में भी मैथमेटिक्स और अंग्रेज़ी पढ़ाने के लिये मैडम जूलिया को मेरी क्लास की जिम्मेवारी सौपी गयी थी | दरअसल वह अंग्रेजी साहित्य और अंग्रेजी के साथ ग्रेजुएट थीं और साथ ही एजूकेशन की डिग्री भी उनके पास थी | वे दसवीं तक इन विषयों की क्लास लेने में सक्षम थीं | उनकी योग्यता के प्रति सारा मैनेजमेन्ट आश्वस्त था और यद्यपि ईसाई होने के नाते अन्य अध्यापिकायेंेे उन्हें अपने से कुछ अलग समझती थीं पर उनके मिलनसार स्वभाव नें किसी को उनका विरोधी नहीं बनाया था | हाँ क्रिश्चियन होने के नाते उनका पहनावा औरों से कुछ अलग जरूर था | कक्षा पाँच में मैं उनके और नजदीक आ गया वे अक्सर मुझे बुलाकर घर में किये गये काम को बार -बार देखतीं और नये-नये सुझाव देतीं | लक्ष्मी सिलाई मशीन फैक्टरी का कैम्पस उसी रास्ते पर पड़ता था जिससे होकर वह चर्च जाती थीं | एक दिन स्कूल में जल्दी छुट्टी हो गयी | स्टाफ को मैनेजमेन्ट के प्रधान नें किसी फंक्शन की बातचीत के लिये रोक लिया था | मैं चार बजे के करीब घर से निकलकर फैक्टरी के मेन गेट से बाहर आकर सड़क के पास एक खुले मैदान पर खेलने के लिये जा रहा था | रास्ते में गुजरते हुये मैडम जूलिया नें हमें देख लिया और हाँथ से मुझे पास आने का इशारा किया | मैं दौड़कर उनके पास पहुँच गया उन्होंने कहा" श्रीकान्त You Live here ." मैंने कहा Yes Mam!उन्होंने कहा , " Your Mother is at Home ." मैंने कहा Yes mam उन्होंने कहा चलो घर चलते हैं | I would like to meet your mother ? मेरी माँ मैडम जूलिया से कुछ ही वर्ष बड़ी होंगीं |बिहारी पण्डितों में सत्रह -अठारह की उम्र आते -आते शादी हो जाती है और चौबीस -पच्चीस होते -होते दो एक बच्चे हो जाते हैं | पैन्ट पहन कर आती हुयी मेरी मैडम को देखकर पहले तो मेरी माँ कुछ सँकोच में आ गयीं फिर उन्होंने कहा श्रीकान्त जा कुर्सियाँ उठा ला यहीँ बाहर खुले में बैठेंगें | मैडम जूलिया की सरल बातचीत और सहज स्वभाव नें मेरी माँका मन जीत लिया उन्होंने मेरी माँ को बताया कि श्रीकान्त का दिमाग अच्छा है यदि इस पर ध्यान दिया जाय तो यह क्लास के सबसे अच्छे बच्चों में आ सकता है | साथ ही उन्होंने मेरे सरल स्वभाव की प्रशंसा भी की | आज्ञाकारी और झगड़े फसाद से दूर रहने वाले विद्यार्थी मैडम जूलिया को पसन्द थे संसार में और कहीं कुछ रूक जाये पर समय की गति कभी नहीं रुकती घड़ी टिक -टिक करती रही और महीनों पर महीनें और फिर तीन वर्ष निकल गये अब मैं सातवीं पास कर आठवीं में आ गया था और क्लास के सबसे अच्छे चार- पांच बच्चों में मेरा सुमार होने लगा था | मैडम जूलिया इस बीच मेरी माँ की अच्छी खासी दोस्त बन चुकी थीं | वे अनेक बार घर आ कर माँ को नयी -नयी खाने की चीज़ें बनाने का नुस्खा बताती थीं और कई बार उनकी बनायी हुयी चीजों का स्वाद भी लेती थीं | उनकी प्रशंसा से माँ बहुत खुश होती थीं | मैं तो उनका चहेता विद्यार्थी बन ही गया था | आठवीं क्लास को शुरू हुये लगभग एक महीना हुआ था पता चला कि मैडम जूलिया अब हमें नहीं पढायेंगी उनकी जगह मैडम सुरेखा अरोड़ा आ रही हैं | पता चला कि मैडम जूलिया की शादी तय हो गयी है और उनका होने वाला पति आस्ट्रेलिया की एक बड़ी कम्पनी में इन्जीनियर है वे उसी के साथ जाकर रहेंगीं | जाने के एक दिन पहले मैडम जूलिया मेरे घर आयीं माँ से मिलीं और मेरे सिर पर हाँथ रखकर कहा " श्री कान्त Keep remembering me, when I come back to India , I will meet you all in the school." आठवीं पास करके नवीं और दसवीं में मैं स्कूल के टापर्स में गिना जाने लगा | इस बीच स्कूल दसवीं से आगे बढ़कर प्लस टू तक पहुँच गया था और उसे केन्द्रीय बोर्ड की मान्यता भी मिल गयी थी | लगभग चार वर्ष बाद जब मैं बारहवीं कक्षा के इम्तिहानों के लिये होने वाली तैय्यारी में जुटा था स्कूल में काफी चहल -पहल हुयी | पता चला कोई मैडम जूलिया अपने पति इन्जीनियर हूबर्ट के साथ स्कूल देखने आयी हैं | मैनेजमेन्ट के प्रधान उन्हें घूम -घूम कर सारा स्कूल दिखा रहे हैं | मैडम जूलिया नें अपनी एक पुरानी कुलीग से पूंछा कि क्या श्री कान्त नामक लड़का अभी इस स्कूल में है | उनकी कलीग नें बताया कि श्री कान्त स्कूल का टापर विद्यार्थी है और आज से बारहवीं कक्षा के इम्तिहान के लिये उसकी प्रिपरेशन लीव हो रही है आज उसका आख़री क्लास है और मैडम सुरेखा मैथमैटिक्स के कुछ प्रश्न समझा रही हैं | इन चार वर्षों में मैं काफी लम्बा हो गया था | होठों पर हल्के-हल्के रोयें निकल आये थे और जेन्डर डिफरेंसेस का भी मुझे ज्ञान हो गया था | मैडम जूलिया क्लास में आयीं | उनकेइन्जीनियर हसबैंड आफिस में ही बैठे थे | मैंने उन्हें देखा पर मैंने न पहचानने का बहाना किया |उन्होंने मुझे पहचान लिया और कहा श्री कान्त " Well You have grown big . Please convey my Namaste to your Mother . किशोरा अवस्था के उस दौर में मैं सिर्फ यही कह पाya Sure Madam आज मैं सोचता हूँ कि ये मेरी कितनी बड़ी नालायकी थी कि जीवन बनाने वाली उस श्रेष्ठ अध्यापिका के प्रति मैं अपना आभार भी व्यक्त नहीं कर सका | समय अबाध गति से हता रहा मैडम जूलिया के बनाये हुये आधार नें मुझे इतना समर्थ कर दिया था कि मैं टेन प्लस टू के बाद रुड़की यूनिवर्सिटी के सिविल इन्जीनियरिंग के कम्पटीशन में आ गया | डिग्री लेकर मैंने पोस्ट ग्रेजुएशन किया और फिर सरकारी नौकरी में प्रवेश करके पंजाब के चीफ इक्जीक्यूटिव इन्जीनियर के पद पर पहुँचा | आज मैं सेवा निवृत्त हो चुका हूँ | मेरा पोता सन्दीप आज उसी स्थिति में है जिसमें मैं साठ साल पहले था | मैडम जूलिया तुम इस संसार में हो या नहीं मैं नहीं जानता पर जहाँ कहीं भी हो अपने इस विद्यार्थी के प्रणाम स्वीकार करना धिक्कार है उस कृतघ्न राष्ट्र को जो अपने आदर्श गुरुओं का आदर करना नहीं जानता |

Saturday 4 April 2020

यौवन पार से ---------------------

आज यौवन पार से विश्राम ने मुझको पुकारा
ओ प्रमंजन ठहर सम्मुख खड़ा सीमा द्वार तेरा |
तोड़ता चलता रहा तू है सभी युग  -मान्यतायें
भ्रान्ति के कितनें घरौंदे तोड़कर तूने ढहाये
रूढ़ि के अश्वत्थ भीमाकार अविचल
वज्र टक्कर से हिला तूनें गिराये
अगति की औंधी शिलायें क्षार कर दीं
खण्ड बन बन प्रतिक्रिया के दुर्ग टूटे
नीति -आडम्बर बना उड़ फेन -जाला
ध्वंस -ध्वनि कर भ्रम -कपट के कुंभ फूटे
राह अनजानी न कोई चल सका जो
चरण चिन्हों से उसे तूने जगाया
अमा का आवर्त घिरता ही गया जब
प्राण - लौ की दीप्ति दे तूनें भगाया
ध्वंस नींवों पर नयी रचना सजा दी
खंडहर में रच दिया इतिहास ताजा
दी लगा ललकार तूनें मृत्यु को भी
शक्तिहीने , शक्ति हो तो आज आजा
रौंद डाली जिन पगों नें दस दिशायें
श्रम - लहर का हो रहा क्यों उन पगों में आज फेरा
आज यौवन --------------------------
हर दुपहरी ढल सुनहरी साँझ होती ,
हर कदम थक कर कहीं विश्राम पाते
बरस कर जलधर नहीं चुकते सदा को
शक्ति लेनें फिर जलधि के पास जाते
एक गति पर सूर्य भी चलता कहाँ है
ढल ढला कर स्वर्ण -वर्णीं रूप लाता
रोक कर क्षण भर गगन में पंख पक्षी
हो त्वरित फिर से नयी आशा जगाता
थकन की अनुभूति फिर अभिशाप हो क्यों
शक्ति संचय में लगे विश्राम - बेला
हो सजग फिर कवि -गुरु की पंक्ति बोले
उठ पथिक , तू चल अकेला , चल अकेला
जोड़ दे इतिहास में अनजान राहें
मूर्त कर दे तू युगों के स्वप्न सारे
अंजनी - सुत  बन गरज ललकार दे दे
निशिचरों से हाथ हों दो चार प्यारे |
रक्त -शोषी , अमर बेली सभ्यता को क्षार कर दे
तोड़ दे कुंठा कपाटों के कुलाबे
रुद्ध घुटती संस्कृति को साँस दे दे
नग्न कर दे छील कर झूठे छलावे
सांस के संयत्र चलता रह अभी तू
दूर है अब तक अरे स्वर्णिम सवेरा
आज यौवन --------------------

Friday 13 March 2020

नागफनी 

लो कथा सुनाता हूँ
मन व्यथा सुनाता हूँ
आजादी के गत  बावन वर्षों  की कथा सुनाता हूँ
था पाँच बरस का जब
नेहरू जी आये थे
घर को गोबर से लीप पोत
तब माँ नें दिये जलाये थे
मैदान मदरसे का जो
उसमेँ जुड़ी भीड़ फिर भारी थी
आशाओं की नव फसल
काटनें की भारी तैय्यारी थी
जोरों का जय - जयकार हुआ
फिर उत्सुक भीड़ लगी सुननें
आशा के डोरों से कल के
अति सुन्दर स्वप्न लगी बुननें
गान्धी जी का जो राम राज्य
फिर से भारत में आयेगा
दहि - दूध बहेगा गलियों में
घर घर में वैभव छायेगा
नन्हें -मुन्हें जो अभी तलक
दुख में अभाव में पलते थे
जीवन भर अपनी जठर अग्नि में
जिन्दा जलते रहते थे
जिनके होठों ने कभी न जाना
क्षुधा -तृप्ति का मुसकाना
दम तोड़ सिसकता रहा सदा से
व्यथा भरा जिनका गाना
वे नव भारत की नयी वायु में
सिंच पलकर लहरायेंगें
खिलते फूलों से निखर निखर
हर डगर डगर पर छायेंगें
उनका भारत हो स्वर्ण - देश
जग में महिमा- मण्डित होगा
सम्मान देश की माटी का
फिर कभी नहीं खण्डित होगा
 मिट नहीं सकेगी भटक भटक
फिर कभी देश की तरूणाई
हर युवा रहेगा कर्म - निरत
हर घर में सुख की शहनाई
हिन्दू , मुस्लिम , पारसी , सिक्ख
एक ही राग में गायेंगें
ईसाई , बौद्ध , जैन , नास्तिक
घुलमिल हिन्दी कहलायेंगें
सोने की बाली फसलों में
उद्योगों से धन बरसेगा
सदियों का मुरझाया भारत
आजादी जल पा सरसेगा |
मैं खड़ा हुआ था भीड़ बीच
कुछ अधिक समझ में आ न सका
था घटा कहीं कुछ दिव्य , महत
जिसकी तह तक मैं जा न सका
कौतूहल रत था पास वहीं
नन्हाँ इस्माइल खड़ा हुआ
चाचा वजीर की बाँह थाम
था किसी चित्र सा जड़ा  हुआ
थे हम दोनों अनजान किन्तु
दोनों के मन नें जाना था
कुछ नष्ट हुआ कुछ सृष्ट हुआ
कुछ आया है कुछ आना था
घर आकर माँ  से पूछा था
अब दूध - भात मिल जायेगा
शंकर साहू के मंगू सा
क्या मेरा तन खिल जायेगा ?
माँ  ने हँस कर था कहा
अभी कल ही आजादी आयी है
हीरे मोती की गठरी भी
क्या बाँध साथ वह लायी है ?
तुम पढ़ो लिखो मेहनत करके
फिर तुम जवान हो जाओगे
आजाद देश की धरती पर
सम्मान ढेर भर पाओगे
आजादी है आ गयी न अब
धन का जन पर शासन होगा
धनवान बाँट कर खायेंगें
हर जगह न्याय आसन  होगा
मैं उस विरवे  सा पनप चला
जो मरुथल में लहराता है
लू के झोंकों से पल पुसकर
जो नाग - फनी बन जाता है
मैं पढ़ लिख कर तैय्यार हुआ
पर पाया कोई काम न था
चल गयीं योजनायें कितनी
पर हम जैसों का नाम न था
इस्माइल भी ऐमें करके
सड़कों पर घूमा करता है
आजाद देश के ख्यालों को
सपनों में चूमा करता है
माँ भी अब बूढ़ी हुयी
न उसके स्वप्न अभी साकार हुये
मैं भी जवान हो गया
न उसके तन पर कपड़े  चार हुये
चाचा वजीर ढल गये न अब
मजदूरी पर जा पाते हैं
घर के सारे प्राणीं जानें
दो जून कहाँ से खाते हैं
माँ की आँखें भी हुयी मंद
अब अधिक नहीं वह सिल  पाती है
बेकार पुत्र को देख देख
भीतर से कुछ हिल जाती है
शंकर साहू हैं फूल गये
अब मुशकिल से उठ पाते हैं
उनके सुपुत्र ' मंगू बेटा '
सोनें की फसल उगाते हैं
है लेंन  देंन बढ़ गया -
तेल ,सीमेन्ट  सभी का सौदा है
हैं चुनें गये सरपंच और
अब ऊँचा उनका हौदा है
मंजूर अली के दो बेटे
जो बी. ए. पास न कर पाये
हैं बड़े दरोगा थानें मेँ -
फारम भरवानें थे आये
अगला चुनाव लड़ काजी जी
क़ानून बनानें जायेंगें
नौकरियों में जो पक्षपात
उस पर काफी चिल्लायेंगें
इस्माइल मुझ से कभी कभी
संजीदा होकर कहता है
किसलिये बगावत ठहरी है
यह किला नहीं क्यों ढहता है
मैनें देखा है वह अकसर
है दूर कहीं ताका करता
धंसती आँखें हैं बता रहीं -
शायद हर दिन फाँका करता
जब भींच मुठ्ठियाँ हाँथों की
वह घर का हाल बताता है
गढ्ढों में जलती आँखों से
तब खून झलक कर आता है
मुझको चिन्ता है बीज नक्सली
उसमें कहीं न जग जाये
मानव - मूल्यों की फसल - बीच
हिंसा की आग न लग जाये
पर क्या कह कर आश्वस्त करूं
मैं बेकारी का मारा हूँ
सच पूछो तो मन ही मन मैं
उसके तर्कों से हारा हूँ -
दुखियारी माँ  के पास बैठ
उस दिन मैं भी तो बोला था
कुछ क्षण को मेरा मन भी तो
मानव - मूल्यों से डोला था
मैं बोला,  माँ मैं बड़ा हुआ
पढ़ लिख कर आज जवान बना
दो रोटी तुमको दे न सका
मैं कहाँ देश की शान बना ?
पढनें में अव्वल रहा सदा
मंगू न चार के पार हुआ
यह देश मुझे ठुकराता है
मंगू सबका सरदार हुआ
इस्माइल भूखा डोल रहा
कादिर है थानेदार बना
क्या यही देश की आजादी
है यह कितना अन्धेर घना
जब अपनें हिलते हाँथों से
कपड़ों पर सुई चलाती हो
मेरा तब खून उबलता है
कब तक बज्जर की छाती हो ?
भूखी जनता की निबल देह
भेड़िये नोच कर खाते हैं
फिर मंचों पर चिल्ला चिल्ला
वे देश -भक्त कहलाते हैं
बन सत्यकाम बन देख लिया
जग का न द्वार खुल पायेगा
शायद हिंसा की बाँह पकड़
ही नया सवेरा आयेगा
मेरे जैसे लाखों शिक्षित
शायद घुल घुल मर जायेंगें
पर उनमें से दस पांच उभर
इस्माइल बन कर आयेंगें
ओ महादेश के नेताओ
मत जान बूझ अनजान बनों
बस समय शेष थोड़ा सा है
फिर से भावी की शान बनों
यह अन्तिम मौक़ा मिला  तुम्हें
अब पापों का परिहार करो
जीवन की ढलती बेला में
कुछ तो स्वदेश से प्यार करो
कूड़ा -करकट बन मैला - घर में
अगर न तुम को सड़ना है
तो बेकारी से खड्ग उठा
सबसे पहले अब लड़ना है
है यह लंम्बा वृतान्त
एक परिकथा सुनाता हूँ
मन व्यथा सुनाता हूँ
आजादी के गत बावन वर्षों  कथा सुनाता हूँ ||

Wednesday 11 March 2020

बदलते  परिवेश ( गतांक से आगे )

धुँधलकों का संसार वार्धक्य की विरासत होती है ,कभी लगता है धुंधलका साफ़ हो रहा है| तो  अगले ही क्षण ऐसा लगने लगता है कि विस्मृति की एक गहरी परत यादों को स्पष्ट नहीं होने देती | मेरे दूसरे पुत्र दिवंगत मेजर संजय कुमार अवस्थी के सम्बन्ध में किसी विवेचक चर्चा  से मैं अब तक बचता रहा हूँ | | उनका असमय निधन मैं और मेरी पत्नी के लिये सबसे हृदय विदारक  घटना थी | काफी समय तक तो मैं अपना मानसिक सन्तुलन ही स्थापित नहीं कर सका  था | मेरी अन्तस चेतना में विच्छिप्ति की एक अद्रश्य धारा बहती रहती थी अब लगभग 2 - 2 1 /2  वर्ष बीत जानें के बाद कुछ स्मृतियाँ आकार लेती दिखायी पड़ने लगी हैं | अपनी स्नातक उपाधि के शिक्षण काल में संजय ने उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त कर ली थीं | पढ़ाई लिखायी के क्षेत्र में वे सामान्य से कुछ थोड़ी बहुत अधिक प्रतिभा का ही प्रदर्शन कर सके थे पर स्पोर्ट्स के क्षेत्र में और मंचीय उपलब्धियों के क्षेत्र में उन्हें विश्वविद्यालीय ख्याति मिल चुकी थी | वे अपने वजन में यूनिवर्सिटी के वेट लिफ्टिंग चैम्पियन थे और साथ ही साथ बॉक्सिंग चैम्पियन भी थे | मंच पर उनकी गणना प्रभावशाली वक्ताओं में होती थे और नाटक के क्षेत्र में भी उनकी अदाकारी सराही जाती थी | कला स्नातक हो जानें पर मैं उन्हें सामाजिक विज्ञान के किसी विषय में परास्नातक शिक्षण के लिये भेजना चाहता था पर अपनी जिस मित्र मण्डली में वे रहते -विचरते थे उसने उन्हें क़ानून की डिग्री हासिल करने के लिये प्रतिबद्धित कर लिया | मैं जानता था कि ला क्लासेज़ में अध्ययन की गंभीरता तो थोड़ी बहुत ही होती थी पर राजनीतिक उठा पटक ने देखने परखने और भाग लेने का अच्छा मौक़ा मिल जाता था | | साथ ही मैं यह  भी जानता था कि वेट लिफ्टिंग व बॉक्सिंग की राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने के कारण वे शायद ला क्लासेज में अपनी नियमित उपस्थित दर्ज न करा सकें | इधर रोहतक रेडियो स्टेशन से भी कुछ प्रोग्राम मिलने लग गये थे | बीस वर्षीय अपने इस स्वस्थ सुशोभन तरुणपुत्र को अपने जीवन का मार्ग चुनने के लिये स्वतन्त्र छोड़ दिया | उनकी मित्र मण्डली के तरुणों के सनद के नाम मुझे याद नहीं हैं पर उनके पुकारे जानें वाले नाम अब तक भलीभांति याद हैं
| उनमें तोता था ,उनमें लाफा था ,उनमें कालीचरन था ,उनमें अंशू था ,उनमें निक्की था  और भेंगा भी था और भी न जानें कितने पढ़े लिखे लेकिन दुस्साहसी नवयुवक उनकी मण्डली में थे \ उपस्थित का प्रतिशत कम  होने के कारण वे एक वर्ष ला के इम्तहान में बैठ नहीं पाये पर आखिरकार शायद मेरे सम्मान का ध्यान रखते हुये उन्होंने तीन वर्ष का ला कोर्स चार वर्ष में प्राप्त कर लिया  और सम्भवतः  उनके प्राप्तांक भी औसत से कुछ अधिक ही थे \ स्पोर्ट्स के चैम्पियन होने के नाते उनका मन भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त करनें की ओर झुकने लगा \ हरियाणा राज्य में सिविल सर्विसेज का उतना महत्व नहीं है जितना कि भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त कर लेने का | सम्भवतः पंजाब में भी कुछ ऐसी ही प्रकृति है यही कारण है कि पंजाब और हरियाणा भारतीय सेना का भाग बनकर उभरे हैं  और इन राज्यों की संपन्नता में भी भारतीय सेना के सेवा के दौरान पायी गयी निपुणता की झलक दिखायी  पड़ती है |   चूँकि एन० डी  ० ए ० में जानें का समय बीत चुका था  इसलिये चि ० संजय ने शार्ट सर्विस कमीशन लेने का निर्णय किया | अपने प्रथम प्रयास में ही वह लिखित परीक्षा  उत्तीर्ण कर गये और शारीरिक क्षमता तो उनमें थी ही इसलिये शारीरिक शक्ति परीक्षा में  उन्होंने बाजी मार ली || क़ानून के स्नातक होने के नाते उन्हें मनोविज्ञान का इतना ज्ञान हो गया था कि साइक्लोजिकल टेस्ट भी उन्होंने पास कर लिया पर अन्त में एक अड़चन आड़े आ गयी | मेडिकल परीक्षा में  उन्हें पूर्ण पूर्ण सफलता नहीं मिली | शायद ब्लड प्रेशर की कोई समस्या थी | उन्होंने अपील की और उन्हें अम्बाला में मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने को कहा गया | सौभाग्य से बोर्ड ने उन्हें हरी झण्डी दिखा दी और वे मद्रास के आफीसर ट्रेनिंग सेन्टर में जानें के लिये सन्नद्ध हो गये | तैयारियां पूरी हो जानें के बाद माता पिता का आशीर्वाद लेकर वे कुछ मित्रों के साथ उनकी गाड़ी में दिल्ली एयरपोर्ट के लिये रवाना हो गये | मैनें सोचा प्रभु ने मेरे ऊपर  अत्यन्त कृपा की है | बड़ा पुत्र बैंक में लग ही चुका था |  अब मेरा दूसरा पुत्र भी राष्ट्रपति से कमीशन लेकर परिवार  के गौरव को अक्षुण रखेगा | हम दोनों हर्ष के  साथ दिन भर बात -चीत करते रहे  और शाम का धुँधलका उतरने लगा | ठीक इसी समय बाहर एक स्कूटर आकर खड़ा हुआ और उससे एक गौर वर्ण का लम्बा  नवयुवक  उतारकर कर घर के फाटक पर खड़ा होकर अन्दर आनें  की इजाजत  मांगनें लगा | उस युवक के सुशोभन व्यक्तित्व ने मुझे प्रभावित किया  और मैनें उसे अन्दर आने को कहा | अन्दर आकर उसने मेरे चरण स्पर्श किये और उसने पूछा कि उसकी छोटी बहन गीता  कहाँ है ? मैं भौचक्का रह गया  क्योंकि मैं गीता के विषय  में कुछ जानता ही नहीं था | मैनें पूछा कि गीता कौन है ? और मैं तो उसे जानता ही नहीं हूँ  और न मैनें कभी उसे संजय के साथ देखा | तो उसने बताया कि गीता उसकी छोटी बहन है और यूनिवर्सिटी में एम ० एड ०  कर रही है  और वह संजय के प्रशंसकों में है और संजय की मित्र मण्डली भी उसे जानती है | मैनें उससे कहा कि मैं गीता के  विषय में कुछ नहीं जानता  और अगर वह दिल्ली संजय को सी आफ करने यानि विदा देने गयी है तो संजय ने मुझे उस विषय में कुछ नहीं बताया | मैनें उस युवक से घर और व्यवसाय के विषय में पूछा तो उसने बताया कि रेलवे रोड पर उसका घर है | वे लोग पांच भाई हैं | वह स्वयं परास्नातक है और बी ० एस ० एन ० एल ०  में एकाउंटेंट है | उसके सभी भाई पढ़े लिखे हैं | उसके पिता घड़ियों के प्रसिद्ध कारीगर हैं  और उसके भाइयों की झझ्झर रोड पर दुकानें हैं | उसके सारे भाई ड्राइव कर लेते हैं और उसका परिवार रोहतक के पण्डितों  के एक सम्भ्रान्त परिवार के रूप में जाना जाता है | मैनें उसे चाय -पानी आदि के विषय में पूछ कर विदा दी और  कहा कि जब गीता का पता  जाये तो मुझे आकर बता दे क्योंकि मैं भीतर से चिन्ता ग्रस्त हो उठा था | सौभाग्य से अगले दिन वह अपनी गाड़ी में अपने एक भाई के साथ आया और मुझे बता गया कि उसकी छोटी बहन गीता दिल्ली में अपनी बुआ के पास है और चिन्ता की कोई बात नहीं है | संसार का इतिहास निरन्तर परिवर्तन की राह चलता रहता है | व्यक्ति के जीवन का इतिहास भी न जानें कितने अनजान कारणों से अनेकानेक मोड़ लेता रहता है | मैं जानता था  कि संजय के अनेक गुणों में एकाध दुर्गुण भी है | मदिरा सेवन और खुमारी में लापरवाही करना उन्हें कहीं प्रशिक्षण के दौरान पीछे न ढकेल दे  कुछ हुआ भी ऐसा ही एक साल का कोर्स लगभग ड़ेढ़ साल में पूरा हुआ  पर आखिर में उन्हें भारत के राष्ट्रपति का कमीशन मिल ही गया  और वहां भी उन्होंने अच्छी रैंक हासिल की | इस बीच में उनकी रुपये पैसे सम्बन्धी हर मांगें जोड़ -तोड़ कर पूरी करता रहा | | उस समय प्रशिक्षण का खर्चा सरकार नहीं उठाती थी | और उनका मद्रास का यह ट्रेनिंग कोर्स मेरे  ऊपर एक काफी बड़ा बोझ छोड़ गया | बाद में शायद रक्षा मंत्रालय ने क़ानून बनाकर प्रशिक्षण का खर्चा वापस कर दिया पर उसका जो भी उपयोग हुआ हो उसे संजय ही जानते होंगें | अब हमारे परिवार में एक कमीशन्ड आफीसर था और हम जानते थे कि वह शीघ्र ही लेफ्टीनेन्ट से कप्तान बन जायेगा | हष्ट - पुष्ट  शरीर ,एक लम्बा जवान जिसका पिता व बड़ा भाई ऊँची नौकरियों में थे इज्जतदार लड़कियों के लिये एक चहेता वर था  पर संजय ने शायद अपने जीवन साथी का चयन कर ही लिया था और वह चयन गीता पर ही आ टिका था | इसका पता मुझे बाद में लगा पर अभी इस अनकही कहानी के बहुत से अछूते पहलू हैं | स्मृति की छेनी  से मैं धीरे -धीरे विस्मृति की परतें कुंदेर रहा हूँ | ज्यों -ज्यों द्रश्य उज्वल होता जायेगा वैसे   ही मैं शब्दों में उसे परसीमित करने का प्रयास करूंगा | 65 साल की डा ० उज्ज्वला शर्मा को अपने पुराने प्यार को पाने में लगभग पूरे अपने जीवन काल का समय लग गया  तो प्यार की कहानी न जानें कितने अनगिनत मोड़ लेकर चलती रहती है और अब मैं एक ऐसे ही मोड पर आ खड़ा हुआ हूँ | उस दिन सुबह से शाम तक बादल बरसते रहे थे | शाम के धुंधलके में एक किशोर के साथ एक तरुणीं मेरे द्वार पर आयी और उसने अन्दर आकर मुझसे कुछ बात करनी चाही उसने बताया कि वह एम ० एड ० की छात्रा है | पहली नजर में मुझे लगा कि वह किसी कुलीन और मर्यादित कुल की पुत्री है | उसने कहा कि प्रोफ़ेसर साहब ----------------------

Friday 28 February 2020

होली उल्लास
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होली आयी होली आयी
राधा लिये अबीर डोलती
छिपते फिरते कृष्ण कन्हाई
होली आयी होली आयी |

गर्मी ने ललकार लगायी
सर्दी डर भागी पहाड़ पर
दादी की हट गयी रजाई
होली आयी होली आयी |

पीली ,नीली , लाल ,गुलाबी
बेलों की छतरी लहरायी
सूख पुरानी झड़ी पत्तियां
डाल डाल फिर से मुस्काई
होली आयी होली आयी |

आओ हम सब मिलकर खेलें
भेदभाव की करें पिटायी
माथे पर गुलाब का टीका
बाटें घर -घर प्यार- मलाई
होली आयी होली आयी |

हम उस भारत माँ के बेटे
जग ने जिसकी महिमा गायी
माँ की शान न जानें दूँगा
प्राणो की है होड़ लगायी
होली आयी होली आयी | 

Thursday 9 January 2020



काल का अजगर 

काल का अजगर
आज अर्ध रात्रि में
 केंचुल की परतें उतारेगा
नयी साज सज्जा ले
नयी शक्ति संचय कर
हिंसा -दबोच में
शांत मृग छौनें को
घेर बाँध
तोड़ मोड़ डालेगा |
आँखों में जल रहे
मारक सम्मोहन से
द्रष्टि- बद्ध मन्त्र -खचित
खिंचे चले आवेंगें
दूब के हरित तृण
दाँतों में दाबे
भोले शश -शावक |
जबड़े खुल जायेंगें
गरल - रसायन की छींटें पा
कितनें निरीह तन
कितनें अबोध मन
पड़े पड़े
उदर गुहा की
अंधेरी - अंध राहों में
हाय ! घुल जायेंगें |
काल का अजगर
रात्रि - सन्नाटे में
शिथिल कर गुंजलक
अन्तिम दम तोड़ते
बीते हुए वर्ष को
हड़पेगा |
दूर कहीं तारों भरी गलियों से
झाँक रहा शान्ति दूत
आंसू ढाल
तार तार
तड़पेगा |
शेष पर आस है
एक विश्वास है
नया वर्ष जन्मा है
इसे एक धार दो
गिरनें से पहले ही
उठ रही गुंजलक के
पार दो |
नारी मूल्याँकन 

और कि यह
प्रोफ़ेसर , पंडित ,  कलाकार , कवि
सृष्टिकार सब
जो
प्रसाद से , तुर्गनेव से
पंत , नीत्से और पिकासो से
नीचे है बात न करते
देख कहीं लेते निज पथ पर
रूपगर्विता
ऐसी रमणीं
सीख चुकी है जो
आधुनिका का पहरावा
जहां उग्र की या जोला की
कला मूर्त हो कर रह जाती
तो
चाल बदलते
चुपके चुपके मन के भीतर
हाल बदलते
कालर पर की गर्द भगाते
कंठ -लंगोटी खींच सजाते
और कहीं नेता गण हों तो
मत्थे पर की सीधी टोपी ,
कर देती जो घाव
अगर पड़ जाये किन्हीं मांसल अंगों पर ,
तिरछी करते
और
उसी दिन
कला - भवन में , ज्ञान - कक्ष में
संसद में
सर्वोदय के कल्याण -पक्ष में
भाषण देते
'  नारी पूज्य महान
भोग की नहीं वस्तु है | '

नई डगर 

चल रहा हूँ जो डगर अब तक रही अनजान है
इसलिये सब  कह रहे हैं यह सिर - फिरा इन्सान है
हंस रहीं प्रिय तुम , जगत उपहास करता
स्वप्न -जीवी कह न मुझसे बात करता
सोचता जग मैं पुरानी लीक पर चढ़ बढ़ता चलूँ
स्वर्ग -सीढ़ी पर संभल हर वर्ष मैं चढ़ता चलूँ
पर मुझे वह राह चलनी जो निबल के द्वार तक
जा सके लेकर मुझे दुखिया बहन के प्यार तक
राह जो फुटपाथ पर सोते अनाथों तक चले
राह जिसपर गान्धी की , बुद्ध की ममता पले
राह जिससे राह खुल जाये व्यथा -उन्मुक्ति का
राह जिससे राह खुल जाये कि अन्तर -मुक्ति का
चल सके जो राह यह छोटा नहीं इन्सान है
क्या हुआ यदि राह यह तुम तक रही अनजान है
चल रहा हूँ जो डगर ------------------------------
हर हिंडोला स्वर्ग का संसार में होता नहीं
विलखता शिशु देख करके हर हृदय रोता नहीं
हर हृदय- विश्वास कब पहुँचा प्रिया के द्वार तक
हर लहर  पहुँचीं भला क्या तीर के उस पार तक
क्या हुआ यदि मैं तुम्हारी राह से हटता गया हूँ
चन्द्रमा सा हर दिवस आकार में घटता गया हूँ
और हैं जो द्रष्टि - पथ पर प्रिय तुम्हारे चल सकेंगें
स्वप्न तेरे ,हृदय में उनके निरन्तर पल सकेंगें
राज पथ पर चल सकें जो वे तुम्हारा साथ देंगें
हेम -मण्डित  सीढ़िया चढ़ हाथ में वे हाँथ देंगें
पर मुझे चल कर पहुँचना हर गली चौपाल में
आस्था के स्वर जगानें हैं कृषक गोपाल में
श्रवण - दुनिया के अपरचित हैं रहे जिस गीत से
सर्वथा नूतन रचे जय -गीत की यह तान है
चल रहा हूँ जो डगर --------------------------
बहुत संम्भव है कि जीवन इस तरह ही बीत जाये
मृत्यु मेरी कामना पर खिलखिलाकर कर जीत जाये
पर झरे जो बीज धरती पर उगेंगें
पुष्प उनमें फिर कभी निश्चय लगेंगें
सूख कर भी बूँद , प्रिय क्या नष्ट होती
वायु में मिलकर जलद में सृष्टि होती
और फिर मिट भी गया यदि इस क्षणिक संसार से
मुक्त ही होगी धरा कुछ हड्डियों के भार से
हैं सहस्त्रों उठ रहे निश दिन धरा की गोद से
जगत का व्यापार पर चलता सदा ही मोद से
राज पथ पर जो चले हैं धूल में मिल जायेंगें
सोम रस पीती रही दुनियां युगों से आज तक
किन्तु शिव की साधना तो बस गरल का पान है
चल रहा हूँ जो डगर -----------------------------
राह जो मैनें चुनी है राजपथ बन जायेगी
धूल से उठकर सितारों तक प्रिये तन जायेगी
उस समय शायद न हूँ मैं देखनें को यह छटा
ज्वार का उन्माद कब कुछ बूँद घटनें से घटा
इस नये संसार की  ही खोज मेरी राह है
है यही बस स्वप्न मेरा , एक ही यह चाह है
हूँ अकेला ही नहीं मैं और भी कुछ साथ हैं
किन्तु गोवर्धन उठानें के लिये कम हाँथ हैं
प्रलय को बरसात सर पर आ रही है
अणु  -घटा  बढ़ती घहरती छा रही है
बह  न जायें चूर्ण होकर दीन दुखियों के बसेरे
कृष्ण पर , युग बोध पर , फिर से न कोई अब हँसे रे
थूक दे हीरक - खचित इस जगमगाते ताज पर
दे बता ओ तरुण , तेरी देह में भी जान है
चल रहा हूँ जो डगर -------------------------------


सोम, 14 मई 2018, 7:03 pm

गुलाब की कलम 

जब कभी सृजन के गीत पिरोने बैठा हूँ
जब कभी तूलिका से आकाश उतारा है
सौ धूम केतु घिर घिर आये हैं आँखों में
हर बार तड़प कर गीत गद्य से हारा है |
जब जब गुलाब की कलम लगाने बैठा हूँ
बन्ध्या युग धरती प्रश्न चिन्ह बन आयी है
जब मलय बयार चली है मन की दुनिया में
चिन्ता दोपहरी तप्त बगूले लाई है
जब कभी भाव की टेक उभर उठ आती है
मन की चट्टानें ही सीमा बन जाती हैं
कुछ सरस पनपने से पहले मन आँगन में
शंका की काली छायायें तन जाती हैं
यह साँझ सुबह का अन्तहीन अविनासी क्रम
माटी की धरती को प्राणों से प्यारा है
जब कभी ---------------------------------
काली रातों के अँधियारे में बार बार
द्वितिमान पिंड रह रह कर राह दिखाते हैं
अभिभूत नहीं होना मावस की छाहों में
कुछ ऐसा ही सन्देश गगन से लाते हैं
हर बार असाढ़ी मेघों के पंखों पर चढ़
चाहा विस्तार गगन का मुझको मिल जाये
 जो विश्व भावना दबी पड़ी मन ऊसर में
रस की छींटें पा विहँस मुक्त हो खिल जायें
मैं एक नवल संसार बसा दूँ धरती पर
जिसमें न घुटन हो , क्षुधा न मानव पीड़ा हो
जिसमें न देह का दर्शन निगले प्राणों को
जीवन निसर्ग की निश्छल मादक क्रीड़ा हो
पर मेरे मन का सृष्टिकार निष्क्रिय हो बैठा वात - ग्रस्त
यह क्षुधा , घुटन का विश्व अभी वैसा सारा का सारा है
जब कभी -------------------------------------------
मेरी नाजुक कल्पना सितारों में इठलाती रही सदा
धरती की  जलती राह न वह चल पायी है
समता की दुनिया सजा सजा कर सपनों में
अपनें को ही बस आज तलक  छल  पायी है
अन्याय , अन्धेरा , पाप पल रहा राहों पर
उनसे भगकर कल्पना कहाँ तक जायेगी
टकरा कर क्षितिज किनारों से असहाय विवश
आखिर माटी की ठोस धरा  पर  आयेगी
उठनें को आकुल  नयी सृष्टि का हर अंकुर
रौंदते पगों की निठुर चाप से हारा है
जब कभी -------------------------------


सोम, 14 मई 2018, 7:02 pm

श्यामली आँचल 

हर सुबह प्रतिज्ञा करता हूँ अब वीतराग बन जाऊँगा
हर शाम श्यामली आँचल में फिर याद तुम्हारी आती है
कितना चाहा मन - मधुप विरागी बन जाये
मन की लहरों का कोई और किनारा हो
माटी की मटियाली राहों को छोड़ बढ़ूँ
मंजिल मेरी भी नील गगन का तारा हो
जो प्यास रूप - मदिरा पर पलती रहती है
वह प्यास सृष्टि - जिज्ञासा बनकर ढल जाये
जो सांस वक्ष के सरगम पर स्वर भरती है
वह सांस प्राण की पीड़ा बन कर पल जाये
जो द्रष्टि उभारों के सौष्ठव से खेल रही
वह द्रष्टि दीप्त हो युग का सत्य दिखा जाये
जो वक्ष पिया  के आतुर अंग सम्हाल रहा
वह वक्ष कठिन हो यौवन - धर्म सिखा  जाये
जो चाह देह की  बाता छू छू जलती है
वह चाह उमग  कर इश्क - हकीकी बन जाये
जो राह तुम्हारे द्वारे आकर रुकती है
वह राह पसरकर आसमान तक तन जाये
पर द्वार तुम्हारे पहुँच कदम रुक जाते हैं
साँसों में केशों की सुगन्ध बस जाती है
हर सुबह प्रतिज्ञा करता हूँ ------------------
माना कि ऊर्ध्वगामी राहें कुछ विरले ही चल पाते हैं
हर एक जन्म अमरत्व नहीं बन पाता है
हर प्रीती मिलन के द्वार नहीं पहुँचा करती
हर सत्य कला का तत्व नहीं बन पाता है
हर भाव  चाह  कर भी कब कविता बन पाया
हर कली कहाँ यौवन पाकर मुस्काती है
हर एक संदेशा मुखर नहीं होता माना
हर पवन - लहर कब बनी पिया की पाती है
फिर भी प्रयास का दर्शन था मैनें सोचा
कुछ दूर लक्ष्य की ओर मुझे ले जायेगा
उद्दातीकरण प्रक्रिया के परिमल से मिल
आध्यात्म्य समीरण की सुगन्ध दे जायेगा
पर हर प्रयास बाँहों के बन्धन में जकड़ा
जाने कब से है सिसक सिसक दम तोड़ रहा
हठ योग पड़ा है औंधाये मुँह देहरी पर
वेदान्त बिचारा रच रच जूड़ा जोड़ रहा
लाखों लहरों पर तिरा सत्य इतना पाया
हर लहर पिया के पैर चूमनें आती है


सोम, 14 मई 2018, 6:59 pm

वन्ध्यत्व 

ठीक है सर कर न पाया पार हूँ मैं 
ठीक है अब तक पड़ा मंझधार  हूँ मैं 
जो न तेरे धार में विजयी बनें हैं 
कर्म -रत  सच्ची कलम की हार हूँ मैं | 
पर न इसका अर्थ मैं गतिहीन था 
याकि  पहुँचे पार  जो वे वीर थे 
बात इतनी है कि मैं तेरा स्वयं 
जबकि उनके पाँव नीचे तीर थे | 
चतुर्दिश जय -घोष  उनका गूंजता है 
नट - तमाशे  ढोल -स्वर  पर चल रहे 
 सृजन  - रत  हलधर  उपेक्षित हैं पड़े 
मुफ्तखोरे सांड़ कितनें पल रहे | 
पर दमामों का दबेगा शोर जब 
सत्य का स्वर उभर कर छा जायेगा 
उछल  कर लघु बूँद सा सहसा , प्रिये 
नाम अपना भी कहीं आ जायेगा | 
समुद है स्वीकार इस जग की उपेक्षा 
पर गला अपना किसी का स्वर न लूँगा 
दान काली को करूँगा जीभ अपनी 
पर उसी माँ की शपथ मैं वर न लूँगा | 
जान लूँगा जब कलम बंध्या हुयी है 
रेत का प्रस्तार मन पर छा रहा है 
छोड़ प्राणों का अनूठा देश मेरा 
कवि कहीं परदेश को प्रिय जा रहा है | 
जान लूँगा जब विगत पर जी रहा हूँ 
काल से है कट चुका अनुबन्ध मेरा 
श्रोत अन्तर के सिमट कर चुक गये हैं 
सतह से ही शेष है सम्बन्ध मेरा | 
तो नये अंकुर जगाने को धारा में 
खाद बनकर देह यह मिल जायेगी 
देखते ही देखते इतिहास के सन्दर्भ में 
फसल कविता की नयी खिल जायेगी | 


सोम, 14 मई 2018, 6:49 pm

दोहरी जिन्दगी

हूँ एक जिन्दगी साथ तुम्हारे काट रहा
पर एक जिन्दगी और कहीं मैं जीता हूँ
तुम मेरे लिये  किसी की केवल छाँह रहीं
तुमसे चलकर मैं और कहीं पर जाता हूँ
तुमको समेट कर बाहों में सुधि के रथ पर
मैं पास खींचकर और किसी को लाता हूँ
केशों में गुम्फित बेला -पुष्पों की सुगन्धि
वन नीम -मंजरी की सुवास लहराती है
नासा -पुट रख उन केशों में जो पाया था
उसकी सुगन्ध प्राणों से कभी न जाती है
अधरों पर रखे अधर तुम्हारे सच मानों
मैं और किसी की अधर -सुधा को पीता हूँ
हूँ एक जिन्दगी साथ तुम्हारे काट रहा -------
तुमको मुस्कान समर्पित है ,तुम क्या जानों
निः शब्द रात की गहरायी में रोया हूँ
तुम पास पड़ीं परितृप्त -शिथिल जब सो जातीं
बाहों में बंधकर मैं भी कभी न सोया हूँ
विस्मृति के उन अनुराग -क्षणों में कभी कभी
जब अधर - दान देकर मुझको ठगती हो
संवरित लता सी वक्ष -वृक्ष का संम्बल ले
आन्दोलित होकर सोते सोते जगती हो
तब क्या जानों तुम अंक - शायिनी पास पड़ा
रस छींटों से मैं विरस   रेत सा रीता हूँ
हूँ एक जिन्दगी साथ तुम्हारे काट रहा --------
कुछ रूठ कभी तुम कहती हो जब प्राणनाथ ,
तकते ही रहते मुझे सदा कुछ बोलो ना
स्मृति के पंखों पर उड़ आते वही शब्द
' गुमसुम 'से बैठे आज अधर  अब खोलो ना
हूँ बहुत बार लड़ चुका स्वयं से मैं अब तक
इसलिये कि तुमको तुम करके मैं पा जाऊँ
माध्यम बननें की जगह तुम्हीं बन सको लक्ष्य
तुमसे कल का गुजरा संसार बसा पाऊँ
पढ़ सको गीत को आज राज यह कह देना ,
प्रिय , सुषमा होकर भी मैं  ही संगीता हूँ
हूँ एक जिन्दगी साथ तुम्हारे काट रहा
पर एक जिन्दगी  और कहीं मैं जीता हूँ |



Tuesday 31 December 2019

     आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें | 
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                  हर प्रभात होली बन जाये | 
                      हर संध्या दीवाली || 
                 हर धमनी में मुखर हो उठे | 
                     शुद्ध रक्त की लाली ||